जयराम ठाकुर का सुक्खू सरकार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित करने का आरोप
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Created on Thursday, 02 July 2026 08:27
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। पंचायत और नगर निकाय चुनावों के बाद हिमाचल प्रदेश की राजनीति अब अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों के चुनाव को लेकर नए टकराव के दौर में प्रवेश कर गई है। नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्राी जयराम ठाकुर ने कांग्रेस सरकार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने, जनादेश को पलटने का प्रयास करने और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर दबाव बनाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि जिन स्थानीय निकायों में भाजपा समर्थित सदस्यों का बहुमत है, वहां सरकार जानबूझकर अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव टाल रही है ताकि राजनीतिक समीकरण बदले जा सकें।
शिमला में आयोजित पत्रकार वार्ता में जयराम ठाकुर ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार शुरू से ही पंचायत चुनाव कराने के पक्ष में नहीं थी। उन्होंने कहा कि पहले विभिन्न कानूनी और प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर चुनाव टालने की कोशिश की गई, लेकिन हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय और बाद में उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण चुनाव करवाने पड़े। अब चुनाव परिणाम आने के बाद सरकार अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में देरी कर रही है।
नेता प्रतिपक्ष ने इसे ‘जनादेश का अपमान’ बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार चुनावी परिणामों को स्वीकार करने के बजाये ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के जरिए स्थानीय निकायों में सत्ता पर कब्जा बनाए रखने की रणनीति अपना रही है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का फैसला सर्वाेपरि होता है, लेकिन वर्तमान सरकार उस जनादेश को स्वीकार करने से बच रही है।
जयराम ठाकुर ने दावा किया कि प्रदेश की लगभग 70 प्रतिशत पंचायतों में भाजपा समर्थित प्रधान और उपप्रधान निर्वाचित हुए हैं। उन्होंने इसे राज्य सरकार के खिलाफ जनता के स्पष्ट जनादेश के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार नगर निकायों में भी भाजपा को व्यापक समर्थन मिला है। उन्होंने कहा कि धर्मशाला नगर निगम में भाजपा ने 17 में से 11 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है, जबकि अन्य कई नगर निकायों में भी पार्टी की स्थिति कांग्रेस से मजबूत है।
उन्होंने जिला परिषद और ब्लॉक समिति चुनावों के आंकड़े भी प्रस्तुत किए। उनके अनुसार प्रदेश की 12 जिला परिषदों में से केवल तीन में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव कराए गए हैं और शेष स्थानों पर चुनाव लंबित रखे गए हैं। उन्होंने दावा किया कि जिन तीन जिला परिषदों में चुनाव हुए, वहां कांग्रेस उम्मीदवार तक नहीं उतार सकी। इसी तरह 92 ब्लॉक समितियों में से केवल 47 में चुनाव कराए गए, जिनमें भाजपा समर्थित उम्मीदवार 31 स्थानों पर विजयी हुए, जबकि कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों को 16 स्थानों पर सफलता मिली।
भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि जिन निकायों में भाजपा समर्थित सदस्यों का बहुमत है, वहां जानबूझकर चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं किया जा रहा। उनका कहना था कि इस दौरान निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा समर्थित जिला परिषद, बीडीसी और नगर निकाय सदस्यों के खिलाफ विजिलेंस और अन्य मामलों में कारवाई की जा रही है, उनके परिजनों के तबादले किए जा रहे हैं तथा विभिन्न माध्यमों से उन्हें प्रभावित करने का प्रयास हो रहा है। उन्होंने सुजानपुर नगर परिषद का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि वहां गुप्त मतदान की निर्धारित प्रक्रिया का भी पालन नहीं किया गया।
जयराम ठाकुर ने कहा कि भाजपा ऐसे अधिकारियों की सूची तैयार कर रही है, जो कथित रूप से सरकार के दबाव में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव कार्यक्रम जारी न करने या भाजपा समर्थित प्रतिनिधियों के विरुद्ध कारवाई करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी। उनके अनुसार भाजपा इस पूरे मामले को न्यायालय में भी उठाएगी और आवश्यकता पड़ने पर प्रदेशभर में राजनीतिक आंदोलन भी करेगी।
पत्रकार वार्ता के दौरान नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से लंबित अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष चुनाव शीघ्र कराने की मांग करते हुए कहा कि यदि सरकार ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप बंद नहीं किया तो भाजपा अदालत से लेकर सड़क तक संघर्ष करेगी। उन्होंने यह भी दावा किया कि पंचायत और नगर निकाय चुनावों के परिणाम आगामी विधानसभा चुनावों की राजनीतिक दिशा का संकेत हैं और जनता ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ अपना रुख स्पष्ट कर दिया है।
राजभवन पहुंचा विमल नेगी प्रकरण दोषियों के खिलाफ कारवाई की मांग
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Created on Thursday, 02 July 2026 03:57
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश पावर कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (एचपीपीसीएल) के पूर्व चीफ इंजीनियर विमल नेगी की मौत का मामला एक बार फिर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन के केंद्र में आ गया है। इस बार विमल नेगी की पत्नी किरण नेगी ने प्रेस वार्ता में बताया कि जांच एजेंसी ने पेखुबेला सौर ऊर्जा परियोजना में कथित अनियमितताओं, वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव और विमल नेगी के मानसिक उत्पीड़न के बीच संबंधों की पुष्टि की है। उन्होंने हिमाचल जनजातीय लोक अधिकार महासंघ के प्रतिनिधियों के साथ राज्यपाल से मुलाकात कर निष्पक्ष जांच, दोषी अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कारवाई करने और विमल नेगी प्रकरण मे न्याय दिलवाने के लिये आवश्यक हस्तक्षेप की मांग की है।
प्रेस वार्ता के दौरान किरण नेगी ने कहा कि उनके पति पर सरकारी परियोजना में भ्रष्टाचार से जुड़े निर्णयों को मंजूरी देने का लगातार दबाव बनाया जा रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब विमल नेगी ने नियमों के विपरीत प्रस्तावों का समर्थन करने से इन्कार किया तो उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनके अनुसार, घंटों कार्यालय में खड़ा रखा जाता था, लगातार दबाव में रखा जाता था और कार्यस्थल का माहौल इतना तनावपूर्ण बना दिया गया था कि उनकी तबीयत लगातार बिगड़ने लगी। उन्होंने दावा किया कि कॉर्पाेरेट कार्यालय में स्थानांतरण के बाद ही उनके पति को उच्च रक्तचाप सहित कई स्वास्थ्य समस्याएं होने लगी थीं।
जांच दस्तावेज़ में जांच के दौरान विमल नेगी के मामले में "systematic pattern of mental torture, professional harassment and criminal conspiracy" पैटर्न सामने आया। जांच में यह पाया गया है कि वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कथित रूप से परियोजना संबंधी मंजूरियों और भुगतानों को सुविधाजनक बनाने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। हालांकि यह उल्लेखनीय है कि इन दस्तावेज़ों में दर्ज निष्कर्षों की अंतिम कानूनी पुष्टि न्यायालय में होना अभी बाकी है।
जांच के अनुसार विमल नेगी ने 15 जून 2024 को शोंगटोंग परियोजना से स्थानांतरित होकर एचपीपीसीएल के कॉर्पाेरेट कार्यालय में कार्यभार संभाला था। इसके बाद 10 मार्च 2025 को उनके लापता होने और 18 मार्च 2025 को सतलुज नदी से उनका शव बरामद होने का उल्लेख है। मल्टी इंस्टीटयूशनल मेडिकल बोर्ड ने मौत का कारण "Ante Mortem Drowning" अर्थात जीवित अवस्था में डूबने से मृत्यु बताया। लेकिन परिवार का कहना है कि यह रिपोर्ट केवल मृत्यु का चिकित्सकीय कारण बताती है, यह नहीं बताती कि वह किन परिस्थितियों में नदी तक पहुंचे और मौत से पहले उनके साथ क्या हुआ।
सीबीआई जांच में पेखुबेला सौर ऊर्जा परियोजना को प्रमुख आधार बताया गया है। दस्तावेज़ के अनुसार मई 2023 में इस परियोजना का ठेका एक निजी कंपनी को दिया गया था और इसे 180 दिनों के भीतर पूरा किया जाना था। लेकिन तय समय में परियोजना पूरी नहीं हो सकी और ठेकेदार को पांच बार अस्थायी समय-विस्तार दिया गया। जांच में इसी प्रक्रिया की समीक्षा की गई।
जांच रिपोर्ट में आरोप है कि तत्कालीन प्रबंध निदेशक हरिकेश मीणा और निदेशक ;(इलेक्ट्रिकल) देशराज ने कथित रूप से ठेकेदार के पक्ष में प्रस्ताव तैयार करवाने के लिए अधीनस्थ अधिकारियों पर दबाव बनाया। जांच में यह भी दर्ज है कि अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा ई-ऑफिस फाइलों में दर्ज टिप्पणियों और आपत्तियों को दबा दिया गया तथा उनके स्थान पर ठेकेदार के पक्ष में प्रस्ताव आगे बढ़ाए गए। दस्तावेज़ में इन अधिकारियों पर सार्वजनिक पद का दुरुपयोग करते हुए कथित आपराधिक साजिश के तहत ठेकेदार को लाभ पहुंचाने का आरोप भी दर्ज किया गया है। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा।
किरण नेगी का कहना है कि उनके पति इसी कथित दबाव का विरोध कर रहे थे। उनका दावा है कि विमल नेगी ने नियमों के विपरीत किसी भी फाइल को मंजूरी देने से इन्कार किया, जिसके बाद उन्हें लगातार मानसिक तनाव में रखा गया। उन्होंने कहा कि यदि जांच एजेंसी ने भी मानसिक प्रताड़ना और पेशेवर उत्पीड़न का उल्लेख किया है तो सरकार अब यह नहीं कह सकती कि मामला केवल व्यक्तिगत तनाव का था। उन्होंने मांग की कि जांच में जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आई है, उनके खिलाफ तत्काल कारवाई की जाए।
प्रेस वार्ता में किरण नेगी ने सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने इस पुरे प्रकरण के पीछे किसी नेता के होने की बात भी प्रेसवार्ता में कही। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने सच्चाई सामने लाने के बजाये उन्हीं लोगों से रिपोर्ट तैयार करवाई जिन पर सवाल उठ रहे थे। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता का दावा करने वाली सरकार को इस मामले में पूरी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि लोगों के सामने वास्तविक तथ्य आ सकें।
उन्होंने कहा कि घटना को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है लेकिन आज भी सबसे महत्वपूर्ण सवालों का जवाब नहीं मिला है। आखिर 10 मार्च से 18 मार्च के बीच विमल नेगी कहां थे? क्या उनका अपहरण किया गया था? उनके मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच में क्या सामने आया? यदि मौत आत्महत्या थी तो उसके पीछे परिस्थितियां क्या थीं और यदि कोई अन्य कारण था तो उसका खुलासा क्यों नहीं किया गया? उनका कहना है कि परिवार आज भी इन सवालों के जवाब का इंतजार कर रहा है।
किरण नेगी का कहना है कि उन्हें किसी राजनीतिक लाभ की नहीं बल्कि निष्पक्ष न्याय की अपेक्षा है। उनका कहना है कि यदि एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी भी कथित दबाव और प्रताड़ना से सुरक्षित नहीं है तो यह पूरे प्रशासनिक तंत्रा के लिए चिंता का विषय है।
विमल नेगी का मामला अब केवल एक अधिकारी की मौत का मामला नहीं रह गया है। कथित सीबीआई दस्तावेज़ों में परियोजना आवंटन, समय-विस्तार, फाइल प्रक्रिया, वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका और मानसिक प्रताड़ना जैसे कई गंभीर मुद्दों का उल्लेख होने के कारण यह मामला सरकारी परियोजनाओं में पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ गया है। यदि जांच एजेंसी के निष्कर्ष आगे न्यायिक परीक्षण में भी कायम रहते हैं तो इसके दूरगामी प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभाव हो सकते हैं।
फिलहाल सरकार या दस्तावेज़ों में जिन अधिकारियों का उल्लेख किया गया है, उनकी ओर से इन आरोपों पर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में मामले का दूसरा पक्ष आना अभी बाकी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि परिवार द्वारा सार्वजनिक किए गए कथित सीबीआई दस्तावेज़ों ने इस पूरे प्रकरण को नया मोड़ दे दिया है। अब निगाहें सरकार की अगली कारवाई, संबंधित अधिकारियों के जवाब और सबसे महत्वपूर्ण, न्यायालय में होने वाली आगे की कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हैं, क्योंकि आरोप चाहे जितने गंभीर हों, उनकी अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।