Tuesday, 04 August 2026
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जयराम ठाकुर का सुक्खू सरकार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित करने का आरोप

शिमला/शैल। पंचायत और नगर निकाय चुनावों के बाद हिमाचल प्रदेश की राजनीति अब अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों के चुनाव को लेकर नए टकराव के दौर में प्रवेश कर गई है। नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्राी जयराम ठाकुर ने कांग्रेस सरकार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने, जनादेश को पलटने का प्रयास करने और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर दबाव बनाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि जिन स्थानीय निकायों में भाजपा समर्थित सदस्यों का बहुमत है, वहां सरकार जानबूझकर अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव टाल रही है ताकि राजनीतिक समीकरण बदले जा सकें।
शिमला में आयोजित पत्रकार वार्ता में जयराम ठाकुर ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार शुरू से ही पंचायत चुनाव कराने के पक्ष में नहीं थी। उन्होंने कहा कि पहले विभिन्न कानूनी और प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर चुनाव टालने की कोशिश की गई, लेकिन हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय और बाद में उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण चुनाव करवाने पड़े। अब चुनाव परिणाम आने के बाद सरकार अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में देरी कर रही है।
नेता प्रतिपक्ष ने इसे ‘जनादेश का अपमान’ बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार चुनावी परिणामों को स्वीकार करने के बजाये ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के जरिए स्थानीय निकायों में सत्ता पर कब्जा बनाए रखने की रणनीति अपना रही है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का फैसला सर्वाेपरि होता है, लेकिन वर्तमान सरकार उस जनादेश को स्वीकार करने से बच रही है।
जयराम ठाकुर ने दावा किया कि प्रदेश की लगभग 70 प्रतिशत पंचायतों में भाजपा समर्थित प्रधान और उपप्रधान निर्वाचित हुए हैं। उन्होंने इसे राज्य सरकार के खिलाफ जनता के स्पष्ट जनादेश के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार नगर निकायों में भी भाजपा को व्यापक समर्थन मिला है। उन्होंने कहा कि धर्मशाला नगर निगम में भाजपा ने 17 में से 11 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है, जबकि अन्य कई नगर निकायों में भी पार्टी की स्थिति कांग्रेस से मजबूत है।
उन्होंने जिला परिषद और ब्लॉक समिति चुनावों के आंकड़े भी प्रस्तुत किए। उनके अनुसार प्रदेश की 12 जिला परिषदों में से केवल तीन में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव कराए गए हैं और शेष स्थानों पर चुनाव लंबित रखे गए हैं। उन्होंने दावा किया कि जिन तीन जिला परिषदों में चुनाव हुए, वहां कांग्रेस उम्मीदवार तक नहीं उतार सकी। इसी तरह 92 ब्लॉक समितियों में से केवल 47 में चुनाव कराए गए, जिनमें भाजपा समर्थित उम्मीदवार 31 स्थानों पर विजयी हुए, जबकि कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों को 16 स्थानों पर सफलता मिली।
भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि जिन निकायों में भाजपा समर्थित सदस्यों का बहुमत है, वहां जानबूझकर चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं किया जा रहा। उनका कहना था कि इस दौरान निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा समर्थित जिला परिषद, बीडीसी और नगर निकाय सदस्यों के खिलाफ विजिलेंस और अन्य मामलों में कारवाई की जा रही है, उनके परिजनों के तबादले किए जा रहे हैं तथा विभिन्न माध्यमों से उन्हें प्रभावित करने का प्रयास हो रहा है। उन्होंने सुजानपुर नगर परिषद का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि वहां गुप्त मतदान की निर्धारित प्रक्रिया का भी पालन नहीं किया गया।
जयराम ठाकुर ने कहा कि भाजपा ऐसे अधिकारियों की सूची तैयार कर रही है, जो कथित रूप से सरकार के दबाव में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव कार्यक्रम जारी न करने या भाजपा समर्थित प्रतिनिधियों के विरुद्ध कारवाई करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी। उनके अनुसार भाजपा इस पूरे मामले को न्यायालय में भी उठाएगी और आवश्यकता पड़ने पर प्रदेशभर में राजनीतिक आंदोलन भी करेगी।
पत्रकार वार्ता के दौरान नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से लंबित अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष चुनाव शीघ्र कराने की मांग करते हुए कहा कि यदि सरकार ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप बंद नहीं किया तो भाजपा अदालत से लेकर सड़क तक संघर्ष करेगी। उन्होंने यह भी दावा किया कि पंचायत और नगर निकाय चुनावों के परिणाम आगामी विधानसभा चुनावों की राजनीतिक दिशा का संकेत हैं और जनता ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ अपना रुख स्पष्ट कर दिया है।

राजभवन पहुंचा विमल नेगी प्रकरण दोषियों के खिलाफ कारवाई की मांग

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश पावर कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (एचपीपीसीएल) के पूर्व चीफ इंजीनियर विमल नेगी की मौत का मामला एक बार फिर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन के केंद्र में आ गया है। इस बार विमल नेगी की पत्नी किरण नेगी ने प्रेस वार्ता में बताया कि जांच एजेंसी ने पेखुबेला सौर ऊर्जा परियोजना में कथित अनियमितताओं, वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव और विमल नेगी के मानसिक उत्पीड़न के बीच संबंधों की पुष्टि की है। उन्होंने हिमाचल जनजातीय लोक अधिकार महासंघ के प्रतिनिधियों के साथ राज्यपाल से मुलाकात कर निष्पक्ष जांच, दोषी अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कारवाई करने और विमल नेगी प्रकरण मे न्याय दिलवाने के लिये आवश्यक हस्तक्षेप की मांग की है।
प्रेस वार्ता के दौरान किरण नेगी ने कहा कि उनके पति पर सरकारी परियोजना में भ्रष्टाचार से जुड़े निर्णयों को मंजूरी देने का लगातार दबाव बनाया जा रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब विमल नेगी ने नियमों के विपरीत प्रस्तावों का समर्थन करने से इन्कार किया तो उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनके अनुसार, घंटों कार्यालय में खड़ा रखा जाता था, लगातार दबाव में रखा जाता था और कार्यस्थल का माहौल इतना तनावपूर्ण बना दिया गया था कि उनकी तबीयत लगातार बिगड़ने लगी। उन्होंने दावा किया कि कॉर्पाेरेट कार्यालय में स्थानांतरण के बाद ही उनके पति को उच्च रक्तचाप सहित कई स्वास्थ्य समस्याएं होने लगी थीं।
जांच दस्तावेज़ में जांच के दौरान विमल नेगी के मामले में "systematic pattern of mental torture, professional harassment and criminal conspiracy" पैटर्न सामने आया। जांच में यह पाया गया है कि वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कथित रूप से परियोजना संबंधी मंजूरियों और भुगतानों को सुविधाजनक बनाने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। हालांकि यह उल्लेखनीय है कि इन दस्तावेज़ों में दर्ज निष्कर्षों की अंतिम कानूनी पुष्टि न्यायालय में होना अभी बाकी है।
जांच के अनुसार विमल नेगी ने 15 जून 2024 को शोंगटोंग परियोजना से स्थानांतरित होकर एचपीपीसीएल के कॉर्पाेरेट कार्यालय में कार्यभार संभाला था। इसके बाद 10 मार्च 2025 को उनके लापता होने और 18 मार्च 2025 को सतलुज नदी से उनका शव बरामद होने का उल्लेख है। मल्टी इंस्टीटयूशनल मेडिकल बोर्ड ने मौत का कारण "Ante Mortem Drowning" अर्थात जीवित अवस्था में डूबने से मृत्यु बताया। लेकिन परिवार का कहना है कि यह रिपोर्ट केवल मृत्यु का चिकित्सकीय कारण बताती है, यह नहीं बताती कि वह किन परिस्थितियों में नदी तक पहुंचे और मौत से पहले उनके साथ क्या हुआ।
सीबीआई जांच में पेखुबेला सौर ऊर्जा परियोजना को प्रमुख आधार बताया गया है। दस्तावेज़ के अनुसार मई 2023 में इस परियोजना का ठेका एक निजी कंपनी को दिया गया था और इसे 180 दिनों के भीतर पूरा किया जाना था। लेकिन तय समय में परियोजना पूरी नहीं हो सकी और ठेकेदार को पांच बार अस्थायी समय-विस्तार दिया गया। जांच में इसी प्रक्रिया की समीक्षा की गई।
जांच रिपोर्ट में आरोप है कि तत्कालीन प्रबंध निदेशक हरिकेश मीणा और निदेशक ;(इलेक्ट्रिकल) देशराज ने कथित रूप से ठेकेदार के पक्ष में प्रस्ताव तैयार करवाने के लिए अधीनस्थ अधिकारियों पर दबाव बनाया। जांच में यह भी दर्ज है कि अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा ई-ऑफिस फाइलों में दर्ज टिप्पणियों और आपत्तियों को दबा दिया गया तथा उनके स्थान पर ठेकेदार के पक्ष में प्रस्ताव आगे बढ़ाए गए। दस्तावेज़ में इन अधिकारियों पर सार्वजनिक पद का दुरुपयोग करते हुए कथित आपराधिक साजिश के तहत ठेकेदार को लाभ पहुंचाने का आरोप भी दर्ज किया गया है। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा।
किरण नेगी का कहना है कि उनके पति इसी कथित दबाव का विरोध कर रहे थे। उनका दावा है कि विमल नेगी ने नियमों के विपरीत किसी भी फाइल को मंजूरी देने से इन्कार किया, जिसके बाद उन्हें लगातार मानसिक तनाव में रखा गया। उन्होंने कहा कि यदि जांच एजेंसी ने भी मानसिक प्रताड़ना और पेशेवर उत्पीड़न का उल्लेख किया है तो सरकार अब यह नहीं कह सकती कि मामला केवल व्यक्तिगत तनाव का था। उन्होंने मांग की कि जांच में जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आई है, उनके खिलाफ तत्काल कारवाई की जाए।
प्रेस वार्ता में किरण नेगी ने सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने इस पुरे प्रकरण के पीछे किसी नेता के होने की बात भी प्रेसवार्ता में कही। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने सच्चाई सामने लाने के बजाये उन्हीं लोगों से रिपोर्ट तैयार करवाई जिन पर सवाल उठ रहे थे। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता का दावा करने वाली सरकार को इस मामले में पूरी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि लोगों के सामने वास्तविक तथ्य आ सकें।
उन्होंने कहा कि घटना को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है लेकिन आज भी सबसे महत्वपूर्ण सवालों का जवाब नहीं मिला है। आखिर 10 मार्च से 18 मार्च के बीच विमल नेगी कहां थे? क्या उनका अपहरण किया गया था? उनके मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच में क्या सामने आया? यदि मौत आत्महत्या थी तो उसके पीछे परिस्थितियां क्या थीं और यदि कोई अन्य कारण था तो उसका खुलासा क्यों नहीं किया गया? उनका कहना है कि परिवार आज भी इन सवालों के जवाब का इंतजार कर रहा है।
किरण नेगी का कहना है कि उन्हें किसी राजनीतिक लाभ की नहीं बल्कि निष्पक्ष न्याय की अपेक्षा है। उनका कहना है कि यदि एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी भी कथित दबाव और प्रताड़ना से सुरक्षित नहीं है तो यह पूरे प्रशासनिक तंत्रा के लिए चिंता का विषय है।
विमल नेगी का मामला अब केवल एक अधिकारी की मौत का मामला नहीं रह गया है। कथित सीबीआई दस्तावेज़ों में परियोजना आवंटन, समय-विस्तार, फाइल प्रक्रिया, वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका और मानसिक प्रताड़ना जैसे कई गंभीर मुद्दों का उल्लेख होने के कारण यह मामला सरकारी परियोजनाओं में पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ गया है। यदि जांच एजेंसी के निष्कर्ष आगे न्यायिक परीक्षण में भी कायम रहते हैं तो इसके दूरगामी प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभाव हो सकते हैं।
फिलहाल सरकार या दस्तावेज़ों में जिन अधिकारियों का उल्लेख किया गया है, उनकी ओर से इन आरोपों पर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में मामले का दूसरा पक्ष आना अभी बाकी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि परिवार द्वारा सार्वजनिक किए गए कथित सीबीआई दस्तावेज़ों ने इस पूरे प्रकरण को नया मोड़ दे दिया है। अब निगाहें सरकार की अगली कारवाई, संबंधित अधिकारियों के जवाब और सबसे महत्वपूर्ण, न्यायालय में होने वाली आगे की कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हैं, क्योंकि आरोप चाहे जितने गंभीर हों, उनकी अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

आर्थिक संकट का बहाना या शासन की विफलता? साढ़े तीन साल बाद सुक्खू सरकार पर उठने लगे सवाल

शिमला/शैल। जब दिसम्बर 2022 में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सत्ता संभली थी, तब से लेकर आज तक उनकी सरकार का सबसे बड़ा राजनीतिक तर्क प्रदेश की खराब आर्थिक स्थिति रहा है। हर बड़े फैसले, हर वित्तीय कटौती और हर अधूरे वादे के पीछे सरकार ने खजाना खाली होने का हवाला दिया। मुख्यमंत्री कई बार सार्वजनिक मंचों से यह तक कह चुके हैं कि हिमाचल की आर्थिक स्थिति कभी भी श्रीलंका जैसी हो सकती है। लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि स्थिति इतनी ही गंभीर थी तो साढ़े तीन साल के कार्यकाल में सरकार ने उसे सुधारने के लिए क्या ठोस परिणाम दिए?
साढ़े तीन सालो में आर्थिक संकट की आड़ में प्रदेश की जनता पर लगातार बोझ डाला गया है। पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ी, बिजली-पानी महंगे हुए, विभिन्न सरकारी सेवाओं पर शुल्क बढ़े जिससे आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त भार पड़ा है। सरकार ने इसे वित्तीय सुधारों की मजबूरी बताया, लेकिन जनता के सामने यह सवाल आज भी कायम है कि इन फैसलों से प्रदेश की आर्थिक सेहत में आखिर कितना सुधार हुआ है।
कांग्रेस चुनाव से पहले जिन गारंटियों और वादों को लेकर सत्ता में आई थी, वे भी अब सरकार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक बोझ बनते दिखाई दे रहे हैं। रोजगार, आर्थिक सहायता और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के बड़े दावे किए गए थे, लेकिन अधिकांश वादे अभी भी अधूरे हैं। यही कारण है कि सरकार लगातार अपने बचाव में दिखाई देती है, जबकि जनता परिणामों की प्रतीक्षा कर रही है।
हाल ही में नगर निकाय और पंचायत चुनावों के परिणामों ने भी राजनीतिक संकेत दिए हैं। कांग्रेस भले इन चुनावों को स्थानीय मुद्दों से जोड़कर देख रही हो, लेकिन यह सरकार के खिलाफ बढ़ती नाराजगी का संकेत तो नही है? चुनावी नतीजों ने इतना जरूर स्पष्ट किया है कि सरकार के सामने जनविश्वास बनाए रखने की चुनौती पहले से कहीं अधिक बड़ गयी है।
सबसे बड़ा विरोधाभास हाल ही में सामने आया जब सरकार ने कुछ समय पहले वित्तीय संकट का हवाला देकर विधायकों के वेतन और भत्तों में कटौती की, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उन्हें फिर बहाल करने की घोषणा कर दी। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर तीन महीने के भीतर ऐसा कौन सा आर्थिक चमत्कार हुआ जिसने सरकार का रुख बदल दिया? क्या प्रदेश की वित्तीय स्थिति अचानक सुधर गई या फिर इसके पीछे राजनीतिक समीकरण अधिक प्रभावी थे?
कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भी सरकार दबाव में दिखाई दे रही है। शिमला में एक महिला की गोली मारकर हत्या की घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। घटना से पहले महिला द्वारा सोशल मीडिया पर सुरक्षा की गुहार लगाए जाने के दावे सामने आए। यदि ये दावे सही हैं तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता और कानून-व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
पर्यटन प्रदेश की अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता है, लेकिन हाल के महीनों में पर्यटकों से जुड़े विवादों और आपराधिक घटनाओं के वीडियो लगातार सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं। इन घटनाओं ने हिमाचल की शांत और सुरक्षित पर्यटन स्थल वाली छवि को प्रभावित किया है। सरकार के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि प्रदेश की पहचान और अर्थव्यवस्था दोनों पर इसका असर पड़ सकता है।
राजनीतिक स्तर पर भी कांग्रेस पूरी तरह सहज नहीं दिख रही। मंत्रियों, विधायकों और संगठन के नेताओं के बीच समय-समय पर सामने आने वाली नाराजगी ने यह संदेश दिया है कि सत्ता और संगठन के बीच सब कुछ सामान्य नहीं है।
मुख्यमंत्री सुक्खू के सामने अब चुनौती केवल विपक्ष का मुकाबला करने की नहीं है, बल्कि अपने ही दावों को साबित करने की है। सरकार का आधे से अधिक कार्यकाल पूरा हो चुका है। ऐसे में जनता अब आर्थिक संकट की कहानी नहीं, बल्कि आर्थिक सुधार का परिणाम देखना चाहती है। रोजगार कहां है, निवेश कहां है, कानून-व्यवस्था में सुधार कहां है और चुनावी वादों की वास्तविक स्थिति क्या है इन सवालों के जवाब आने वाले समय में सरकार की राजनीतिक दिशा तय करेंगे।
फिलहाल इतना तय है कि हिमाचल की राजनीति में अब बहस इस बात पर नहीं है कि प्रदेश आर्थिक संकट में था या नहीं, बल्कि इस बात पर है कि साढ़े तीन साल बाद भी क्या सरकार उस संकट से बाहर निकलने का कोई भरोसेमंद रास्ता दिखा पायी है। यही सवाल आने वाले समय में मुख्यमंत्री सुक्खू और उनकी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा बनने वाला है

पूर्व रेरा चेयरमैन और वकील पर दर्ज हुई एफआईआर से प्रशासनिक हलकों में हलचल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक और कानूनी गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई जब राज्य के पूर्व मुख्य सचिव संजय गुप्ता की शिकायत पर पूर्व मुख्य सचिव एवं पूर्व रेरा चेयरमैन श्रीकांत बाल्दी तथा हाईकोर्ट के अधिवक्ता विनय शर्मा के खिलाफ अलग-अलग एफआईआर दर्ज कर ली गईं। दोनों मामलों में आरोपों का केंद्र मुख्य सचिव की कार्यशैली, भूमि खरीद और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर लगाये गये गंभीर आरोप हैं, जिन्हें संजय गुप्ता ने झूठा, दुर्भावनापूर्ण और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला बताया है।
शिमला के ईस्ट पुलिस थाना में दर्ज मामलों ने अब केवल व्यक्तिगत विवाद का स्वरूप नहीं रखा है, बल्कि यह मामला प्रदेश की नौकरशाही, प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक मंचों पर लगाये जाने वाले आरोपों की वैधता को लेकर भी चर्चा का विषय बन गया है। खास बात यह है कि जिन व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है, उनमें एक प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और दूसरा हाईकोर्ट का अधिवक्ता है। ऐसे में मामला सामान्य कानूनी विवाद से कहीं अधिक महत्व रखता है।
पूर्व मुख्य सचिव संजय गुप्ता ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि पूर्व रेरा चेयरमैन श्रीकांत बाल्दी ने प्रेस बयान जारी कर उनके खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए। शिकायत के अनुसार इन आरोपों में पद के दुरुपयोग, अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय लेने, विशेष परियोजनाओं को लाभ पहुंचाने तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन करने जैसे आरोप शामिल थे। पूर्व मुख्य सचिव का कहना है कि इन आरोपों का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है और इन्हें जानबूझकर सार्वजनिक किया गया ताकि उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि प्रेस बयान को प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर व्यापक रूप से प्रसारित किया गया, जिससे आम जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता और ईमानदारी पर सवाल खड़े करने का प्रयास हुआ। पूर्व मुख्य सचिव का दावा है कि उनके खिलाफ लगाये गये आरोप न केवल व्यक्तिगत स्तर पर मानहानिकारक हैं, बल्कि राज्य के सर्वाेच्च प्रशासनिक पद की संस्थागत गरिमा को भी प्रभावित करते हैं।
दूसरी ओर, अधिवक्ता विनय शर्मा के खिलाफ दर्ज एफआईआर में आरोप है कि उन्होंने भूमि खरीद, आय के स्रोत और पद के दुरुपयोग से जुड़े गंभीर आरोप लगाये। पूर्व मुख्य सचिव का कहना है कि भूमि खरीद से संबंधित सभी जानकारियां नियमानुसार सरकार को उपलब्ध करवाई गई थीं तथा वित्तीय लेन-देन और स्वीकृतियों का पूरा रिकॉर्ड मौजूद है। इसके बावजूद तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया और ऐसे आरोप लगाये गये जिनका उद्देश्य उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाना था।
पूर्व मुख्य सचिव ने अपनी शिकायतों में यह भी उल्लेख किया है कि उन्हें सरकार की ओर से सतर्कता स्वीकृति (विजिलेंस क्लीयरेंस) और इंटीग्रिटी सर्टिफिकेट प्राप्त है। उनका कहना है कि उनके खिलाफ लगाये गये आरोप तथ्यों के विपरीत हैं और संबंधित व्यक्तियों ने उपलब्ध रिकॉर्ड की अनदेखी करते हुए जानबूझकर भ्रामक जानकारी सार्वजनिक की।
इन दोनों मामलों में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस अब शिकायतों में लगाये गये आरोपों, संबंधित दस्तावेजों, प्रेस बयानों और अन्य साक्ष्यों की जांच करेगी। जांच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि आरोपों के समर्थन में क्या तथ्य उपलब्ध हैं और क्या शिकायतकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप कानूनी कसौटी पर खरे उतरते हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इन एफआईआर को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक पक्ष इसे मुख्य सचिव की प्रतिष्ठा और संस्थागत गरिमा की रक्षा के लिए उठाया गया कदम मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे प्रशासनिक विवाद के कानूनी मोर्चे पर पहुंचने के रूप में देख रहा है। हालांकि दोनों मामलों में अंतिम स्थिति जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी।
इतना तय है कि प्रदेश की नौकरशाही से जुड़े इस हाई-प्रोफाइल विवाद ने प्रशासनिक व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है। राज्य के दो वरिष्ठ सार्वजनिक व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज इन एफआईआर ने आने वाले दिनों में इस पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील तथा चर्चित बना दिया है।

विमल नेगी प्रकरण में सीबीआई चार्जशीट को लेकर सियासत तेज

शिमला/शैल। विमल नेगी प्रकरण में सीबीआई द्वारा अदालत में दायर चार्जशीट को लेकर प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। भाजपा के राज्यसभा सांसद हर्ष महाजन ने चार्जशीट को कांग्रेस सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला दस्तावेज बताते हुए कहा कि इसमें सामने आये तथ्य पूरे मामले में सत्ता और प्रशासन की भूमिका पर प्रश्न खड़े करते हैं।
शिमला से जारी बयान में हर्ष महाजन ने कहा कि चार्जशीट में फर्जी कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी करने, आधिकारिक दस्तावेजों में कथित हेरफेर, अधिकारियों पर दबाव बनाने, नियमों की अनदेखी करने और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने जैसे गंभीर आरोपों का उल्लेख किया गया है। उन्होंने कहा कि यदि जांच एजेंसी द्वारा अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों में ऐसे तथ्य दर्ज हैं तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर जवाबदेही तय किए जाने का मामला है।
महाजन ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार को अब प्रदेश की जनता को बताना चाहिए कि आखिर नियमों को दरकिनार करने के पीछे कौन लोग थे, अधिकारियों पर कथित दबाव किसके निर्देश पर बनाया गया और दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ के आरोपों की जिम्मेदारी किसकी है। उन्होंने कहा कि पूरे मामले में शुरुआत से ही सच्चाई को दबाने और वास्तविक जिम्मेदार लोगों को बचाने की कोशिश की गई।
भाजपा सांसद ने विशेष रूप से जांच को प्रभावित करने और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा पहुंचाने से जुड़े आरोपों को गंभीर बताते हुए कहा कि यदि साक्ष्यों को प्रभावित करने या रिकॉर्ड में बदलाव करने का प्रयास हुआ है तो यह कानून के शासन और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सीधा हमला है। ऐसे मामलों में केवल निचले स्तर के अधिकारियों पर कारवाई कर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा कि जब-जब विपक्ष ने निष्पक्ष जांच की मांग उठाई, तब-तब सरकार ने मामले को हल्के में लेने या उसका राजनीतिक असर कम करने की कोशिश की। अब सीबीआई चार्जशीट ने उन आशंकाओं को और बल दिया है जिन्हें भाजपा लगातार उठाती रही है। महाजन ने कहा कि जनता यह जानना चाहती है कि इस पूरे मामले में किन लोगों को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया और इसके लिए किस स्तर तक नियमों को नजरअंदाज किया गया।
हर्ष महाजन ने कहा कि इस पूरे प्रकरण में प्रशासनिक, राजनीतिक और संस्थागत स्तर पर जुड़े सभी व्यक्तियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति दोषी पाया जाए, उसके खिलाफ सख्त कानूनी कारवाई की जानी चाहिए, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो।
उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या चार्जशीट में सामने आए तथ्यों के बाद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कारवाई की जाएगी या फिर उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिलता रहेगा।

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