Saturday, 24 October 2026
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सियासत के बीच जनता के सवाल

हिमाचल प्रदेश की राजनीति अब धीरे-धीरे 2027 के विधानसभा चुनाव की दिशा में बढ़ रही है। कांग्रेस और भाजपा की गतिविधियों, नेताओं के बयानों, संगठनात्मक बैठकों और एक-दूसरे पर हमलों को केवल रोजमर्रा की राजनीतिक बयानबाजी मानना सही नहीं होगा। इन गतिविधियों के पीछे सत्ता में बने रहने और सत्ता में वापसी की रणनीति काम कर रही है। लेकिन इस राजनीतिक मुकाबले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दोनों प्रमुख दल अपनी चुनावी तैयारी में कितनी जगह जनता के वास्तविक सवालों को देते हैं।
मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के लिए यह समय अपने कार्यकाल के मूल्यांकन का है। सरकार के पास अभी भी अपनी नीतियों और फैसलों के परिणाम जनता के सामने रखने का अवसर है। चुनावी गारंटियों की प्रगति, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं, ग्रामीण विकास, महंगाई और राज्य की आर्थिक स्थिति ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सरकार को स्पष्ट जवाब देने होंगे। प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन या नए जिलों की संभावनाओं पर विचार तभी सार्थक होगा, जब उसका आधार जनसुविधा, भौगोलिक परिस्थितियां और प्रशासनिक दक्षता हो। यदि ऐसे फैसलों को राजनीतिक लाभ के चश्मे से देखा जाने लगे, तो उनकी उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकार को इस आशंका को दूर करने के लिए पारदर्शी मानदंड और स्पष्ट कार्ययोजना सामने रखनी चाहिए।
नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राजीव बिंदल आर्थिक स्थिति, विकास कार्यों, चुनावी वादों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर कांग्रेस को घेर रहे हैं। हाल के दिनों में नए जिलों के गठन की संभावनाओं और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की राजनीतिक विरासत को लेकर भी दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप सामने आए हैं। इससे स्पष्ट है कि चुनाव से पहले राजनीतिक विमर्श केवल सरकार के कामकाज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक पहचान के सवाल भी इसमें शामिल होंगे।
सरकार की कमियां गिनाना विपक्ष का अधिकार और दायित्व है, लेकिन क्या भाजपा जनता के सामने अपना ठोस वैकल्पिक कार्यक्रम भी रख रही है? यदि कांग्रेस की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो भाजपा को यह बताना होगा कि राज्य की वित्तीय चुनौतियों से निपटने का उसका रास्ता क्या होगा। यदि रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकार की आलोचना की जा रही है, तो इन क्षेत्रों में भाजपा की प्राथमिकताएं और प्रस्ताव क्या हैं? केवल सरकार बदलने का दावा करना पर्याप्त नहीं होगा। जनता को यह भरोसा चाहिए कि बदलाव से उसकी समस्याओं का समाधान होगा।
भाजपा आंतरिक चुनौतियों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। चुनाव में नेतृत्व का चेहरा कौन होगा, टिकट वितरण कैसे होगा और अलग-अलग नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन कैसे बनेगा ये ऐसे प्रश्न हैं, जिनका जवाब समय रहते तलाशना होगा। कांग्रेस की आंतरिक चुनौतियों को मुद्दा बनाने वाली भाजपा को अपने भीतर के समीकरण भी स्पष्ट रखने होंगे।
स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा की सफलता ने उसे राजनीतिक बढ़त का दावा करने का अवसर दिया है, जबकि कांग्रेस के लिए यह परिणाम आत्ममंथन का संकेत है। विधानसभा चुनाव में मतदाता सरकार के समग्र प्रदर्शन, नेतृत्व, नीतियों और भविष्य की संभावनाओं को भी परखते हैं। इसलिए दोनों दलों के लिए जरूरी है कि वे इन परिणामों से राजनीतिक संदेश तो लें, लेकिन जनता के मूड को लेकर अतिआत्मविश्वास से बचें।
राज्य की वित्तीय स्थिति पर बहस केवल कर्ज के आंकड़े उछालने या केंद्र और राज्य सरकार के बीच आरोप लगाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि राजस्व बढ़ाने, अनावश्यक खर्च रोकने, विकास परियोजनाओं को समय पर पूरा करने और सामाजिक कल्याण योजनाओं को प्रभावी बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार को अपने खर्च और उपलब्धियों का हिसाब देना चाहिए, जबकि विपक्ष को आलोचना के साथ व्यवहारिक विकल्प भी प्रस्तुत करने चाहिए।
हिमाचल की जनता को आरोपों की अंतहीन लड़ाई नहीं, जवाबदेह सरकार, जिम्मेदार विपक्ष और विकास की स्पष्ट दिशा चाहिए। सत्ता की जंग में राजनीतिक दलों की असली परीक्षा उनके काम, नीतियों और जनता के प्रति जवाबदेही से होगी।

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