Wednesday, 04 February 2026
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यूजीसी नियमों पर उठे विरोध के परिणाम दूरगामी होंगे

क्या देश में फिर से मण्डल बनाम कमण्डल का खेल खेला जाने की तैयारी हो रही है? यह सवाल यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में बढ़ते जातिगत उत्पीड़न को रोकने के लिये लाये गये नये नियमों के विरोध में उठतेे रोष की पराकाष्ठा को देखते हुये एक बड़ा सवाल बनकर सामने आया है। देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न के मामलों में यूजीसी के अपने मुताबिक ही 2019-20 से 2023-24 तक 118 प्रतिशत की बढ़ौतरी हुई है। इस बढ़ौतरी का अर्थ है कि अब तक जो नियम और प्रावधान इस उत्पीड़न को रोकने के लिये बनाये गये थे उनके वांछित परिणाम नहीं आये हैं। इसलिये नये नियमों की आवश्यकता मानी गयी है। यह आवश्यकता रोहित वेमुला और पायल तड़वी के प्रकरणों के बाद एकदम अनिवार्य हो गयी थी। क्योंकि रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताएं अपने बच्चों को इंसाफ दिलाने के लिये अदालत तक पहुंची और यह मामला सर्वाेच्च न्यायालय तक पहुंच गया। सर्वाेच्च न्यायालय की उसी पीठ के सामने यह मामला आया था जिसने अब इन नियमों पर रोक लगाई है। जब यह मामला सर्वाेच्च न्यायालय में पहली बार सामने आया था तब सर्वाेच्च न्यायालय ने जातिगत उत्पीड़न को लेकर बनाये गये नियमों को नाकाफी करार देकर तुरन्त प्रभाव से नये नियम बनाने के लिये कहा था। सर्वाेच्च न्यायालय के ही निर्देश पर यह नये नियम लाये गये थे और अब जब नियमों पर स्वर्ण जातियों ने विरोध का स्वर उठाया तब सर्वाेच्च न्यायालय ने इन नियमों पर तुरन्त प्रभाव से रोक लगा दी। इस रोक पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं कुछ भाजपा नेताओं की आयी हैं उससे और कई शंकाएं उभर आयी हैं क्योंकि केन्द्र सरकार ने सर्वाेच्च अदालत में अपने ही बनाये नियमों के पक्ष में कुछ नहीं कहा है। इसी से सरकार की नीयत और नीति पर सवाल उठ रहे हैं। भाजपा संघ परिवार की एक राजनीतिक इकाई है। यह एक स्थापित सच है। संघ देश में हिन्दू राष्ट्र स्थापित करना चाहता है और इसका हर प्रयास इस दिशा में उठा एक कदम है। यदि किसी कारण से संघ को अपने इस उद्देश्य को छोड़ना पड़े तो संघ में ही सबसे बड़ा विरोध और विद्रोह देखने को मिलेगा। संघ भाजपा के रिश्तों का आकलन इसी तथ्य से किया जा सकता है कि भाजपा में संगठन मंत्री का पद हर स्तर पर संघ के ही प्रतिनिधि को सौंपा जाता है। देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है इसलिये देश के ढांचे में कोई भी बदलाव सविधान को बदले बिना नहीं हो सकता और संविधान को संसद के रास्ते सरकार के माध्यम से ही बदला जा सकता है। 2024 से आज 2026 तक सरकार को जब भी मौका मिला है उसने संविधान को बदलने के लिये कदम उठाये हैं। लेकिन आज केन्द्र की मोदी नीत भाजपा सरकार जिस तरह अपना आधार लगातार खोती जा रही है उसमें भाजपा संघ की कठिनाइयां भी बढ़ती जा रही है। क्योंकि 2024 से लेकर आज तक सरकार के मंत्रालय और उसकी विभिन्न योजनाओं की जो रिपोर्ट संसद के पटल पर आयी है उनसे सरकार की परफॉरमैन्स और नीयत पर सवाल गहराते जा रहे हैं। क्योंकि सरकार का चुनाव जीतने का सच वोट चोरी के तथ्यात्मक प्रमाणों के बाद प्रश्नित हो गया है। सरकार की यह स्थिति कहीं नई पीढ़ी में चर्चा का विषय न बन जाये यह सबसे बड़ा सवाल इस समय बन चुका है। नई जनरेशन को इस सवाल पर अपना ध्यान केंद्रित करने से रोकने के लिये ही मण्डल बनाम कमण्डल पहले खड़ा हुआ था और आज उसी तर्ज पर यूजीसी के नियमों पर विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। स्मरणीय है जब ओबीसी को 27% आरक्षण का प्रावधान किया गया था तब उसका विरोध करने के लिये इस आरक्षण के विरोध में आन्दोलन खड़ा किया गया था इस विरोध में तब आत्मदाह तक हुये थे। इस परिदृश्य में यूजीसी नियमों पर उठे विरोध के परिणाम दूरगामी होंगे।

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