आरएसएस कानून से ऊपर नहीं’ खड़गे के सवालों पर संघ-भाजपा-वीएचपी एकजुट

Created on Thursday, 25 June 2026 12:33
Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियंक खड़गे के एक पत्र ने आरएसएस, भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद को सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। खड़गे ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर संगठन के कानूनी दर्जे, रजिस्ट्रेशन, फंडिंग, खर्च, टैक्स और सार्वजनिक गतिविधियों पर जवाब मांगा है। इसके बाद मोहन भागवत ने साफ कहा कि उन्हें इस पर जवाब देने की जरूरत नहीं लगती। भाजपा ने इसे कांग्रेस की राजनीति बताया, जबकि विश्व हिन्दू परिषद ने भी खड़गे के सवालों को संघ पर हमला करार दिया। अब यह मामला सिर्फ एक पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि आरएसएस की जवाबदेही बनाम कांग्रेस के राजनीतिक हमले की बड़ी लड़ाई बन गया है।
प्रियंक खड़गे ने अपने पत्र में कहा कि आरएसएस कोई छोटा संगठन नहीं है। उन्होंने लिखा कि संघ खुद दावा करता है कि देशभर में उसकी 60 हजार से ज्यादा शाखाएं और करोड़ों स्वयंसेवक हैं। खड़गे ने एबीपीएस की 2025-26 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा इतने बड़े पैमाने पर काम करने वाले संगठन को सिर्फ ‘सांस्कृतिक’ या ‘अनौपचारिक’ कहकर नहीं छोड़ा जा सकता।
खड़गे ने अपने पत्र में आरएसएस से कई सीधे सवाल पूछे। उन्होंने जानना चाहा कि आरएसएस का कानूनी दर्जा क्या है, वह किस कानून या ढांचे के तहत काम करता है, उसका रजिस्ट्रेशन किस रूप में है, उसके पदाधिकारी कौन हैं, संगठन के पास पैसा कहां से आता है, वह कहां खर्च होता है, क्या आरएसएस टैक्स देता है, और अगर वह रजिस्टर्ड नहीं है तो इतनी बड़ी गतिविधियां किस कानूनी आधार पर चल रही हैं।
खड़गे ने इस मुद्दे को केवल राजनीति नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता का सवाल बताया। उनका कहना है कि जब आम नागरिक, एनजीओ, ट्रस्ट, कंपनियां, धार्मिक संस्थाएं और दूसरे संगठन कानून के तहत रजिस्ट्रेशन, ऑडिट और टैक्स जैसे नियमों का पालन करते हैं, तो आरएसएस को इससे बाहर क्यों रखा जाये। उन्होंने कहा कि आरएसएसअपने 100 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है, ऐसे में यह समय सिर्फ उत्सव का नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी होना चाहिए। खड़गे का सीधा संदेश है कि अगर आरएसएस खुद को अनुशासन, राष्ट्रवाद और सेवा का प्रतीक बताता है, तो उसे पारदर्शिता भी दिखानी चाहिए।
लेकिन इन सवालों पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, ‘मुझे इसका जवाब देने की जरूरत नहीं है।’ भागवत ने कहा कि आरएसएस कोई गुप्त संगठन नहीं है। संघ खुले मैदानों में शाखाएं लगाता है, सार्वजनिक रूप से काम करता है और समाज के बीच सक्रिय रहता है।
भागवत ने यह भी कहा कि रजिस्ट्रेशन आमतौर पर उन संस्थाओं के लिए जरूरी होता है जो सरकार से पैसा लेती हैं या किसी विशेष कानूनी लाभ के लिए औपचारिक ढांचा चाहती हैं। उनके मुताबिक आरएसएस ऐसा संगठन नहीं है। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि देश में कई चीजें बिना रजिस्ट्रेशन के चलती हैं और आरएसएस भी उसी तरह एक सामाजिक - सांस्कृतिक संगठन है। भागवत का यह बयान भी चर्चा में है कि ‘हिंदू धर्म भी रजिस्टर्ड नहीं है।’ इस बयान के जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि आरएसएस को किसी कंपनी या संस्था की तरह देखने की कोशिश गलत है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सरकारें आरएसएस को अच्छी तरह जानती हैं, क्योंकि संघ पर पहले तीन बार प्रतिबंध लग चुका है। भागवत के मुताबिक अगर सरकारों ने कभी आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया और बाद में हटाया, तो इसका मतलब यह है कि संघ कोई छिपा हुआ संगठन नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस ने 1950 के दशक में अपना लिखित संविधान सरकार को सौंप दिया था, और तब उससे कभी यह नहीं कहा गया कि उसे अलग से रजिस्ट्रेशन कराना होगा।
हालांकि प्रियंक खड़गे ने कहा कि यह कोई निजी चिट्ठी नहीं है, बल्कि कर्नाटक सरकार की ओर से लिखा गया आधिकारिक पत्र है। इसलिए आरएसएस यह नहीं कह सकता कि जवाब देने की जरूरत नहीं है। खड़गे ने कहा कि जब राज्य सरकार को आरएसएस के कार्यक्रमों और बड़े आयोजनों के लिए सुरक्षा और प्रशासनिक इंतजाम करने पड़ते हैं, तो सरकार को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वह किस संगठन के लिए यह सब कर रही है। खड़गे ने साफ कहा कि यह सवाल वैचारिक लड़ाई का नहीं, बल्कि कानूनी और प्रशासनिक जिम्मेदारी का है।
इस बीच भाजपा ने खड़गे के पत्र को कांग्रेस का राजनीतिक एजेंडा बताया। पार्टी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस अपनी सरकार की नाकामियों और असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए आरएसएस को निशाना बना रही है।
विवाद तब और बढ़ गया जब भाजपा सांसद रमेश जिगाजिनगी ने प्रियंक खड़गे पर हमला करते हुए सवाल किया कि ‘एक दलित को आरएसएस की चिंता क्यों होनी चाहिए? इस बयान ने नई बहस छेड़ दी। खड़गे ने इसका तीखा जवाब दिया और कहा कि वे डरने वालों में नहीं हैं और संविधान के दायरे में सवाल पूछना उनका अधिकार है। खड़गे ने कहा कि किसी भी जनप्रतिनिधि या मंत्री का काम सवाल पूछना और जवाबदेही तय करना है, चाहे सामने कोई भी संगठन हो। जिगाजिनगी के बयान के बाद यह विवाद राजनीतिक और सामाजिक टकराव का रूप भी लेने लगा।
विश्व हिंदू परिषद भी इस विवाद में खुलकर आरएसएस के साथ खड़ी नजर आयी। वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार और संघ परिवार से जुड़े नेताओं का कहना है कि आरएसएस कोई गुप्त संगठन नहीं, बल्कि खुला सामाजिक -सांस्कृतिक संगठन है। वीएचपी का मानना है कि कांग्रेस का यह अभियान दरअसल संघ और हिंदू संगठनों पर राजनीतिक हमला है।
यही वजह है कि यह पूरा विवाद अब केवल एक पत्र या एक जवाब तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस की कोशिश है कि आरएसएस को वैचारिक बहस से निकालकर कानूनी और वित्तीय जवाबदेही के घेरे में लाया जाये। कांग्रेस यह सवाल खड़ा करना चाहती है कि अगर कोई संगठन लाखों लोगों को जोड़ता है, समाज और राजनीति पर असर डालता है, तो उससे पारदर्शिता और कानून के पालन पर सवाल क्यों न पूछे जायें। दूसरी तरफ आरएसएस, भाजपा और वीएचपी इस पूरी कवायद को राजनीतिक बदले की कारवाई या ‘संघ को बदनाम करने की कोशिश’ बता रहे हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आरएसएस प्रियंक खड़गे के पत्र का औपचारिक लिखित जवाब देगा या नहीं। मोहन भागवत ने अभी तक साफ कर दिया है कि उन्हें जवाब देने की जरूरत नहीं लगती। लेकिन खड़गे इस मामले को छोड़ने के मूड में नहीं दिखते। उन्होंने साफ कहा है कि जब राज्य सरकार को संघ के कार्यक्रमों के लिए सुरक्षा और व्यवस्था करनी पड़ती है, तो आरएसएस की कानूनी पहचान और जवाबदेही जानना जरूरी है।
कुल मिलाकर, प्रियंक खड़गे के इस पत्र ने आरएसएस की कानूनी स्थिति, फंडिंग, टैक्स और जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है। अब देखना यह होगा कि यह विवाद सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहता है या आगे चलकर कानूनी, प्रशासनिक या राजनीतिक कारवाई की दिशा भी लेता है। फिलहाल इतना तय है कि आरएसएस पर खड़े हुए ये सवाल जल्दी शांत होते नहीं दिख रहे।