क्या सुक्खू सरकार उसी शिक्षा मॉडल को अपना रही है, जिसका कांग्रेस देशभर में विरोध करती रही है?

Created on Wednesday, 08 July 2026 13:03
Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में सरकारी स्कूलों को चरणबद्ध तरीके से सीबीएसई बोर्ड से जोड़ने के फैसले ने एक नई राजनीतिक और वैचारिक बहस छेड़ दी है। सरकार का कहना है कि इससे प्रदेश के छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर अवसर मिलेंगे और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा। लेकिन शिक्षा के क्षेत्रा से जुड़े लोग इसे केवल शिक्षा सुधार का फैसला नहीं मान रहे हैं। उनका सवाल है कि क्या कांग्रेस सरकार उसी शिक्षा व्यवस्था को अपना रही है, जिसे लेकर वह केंद्र की भाजपा सरकार पर लगातार निशाना साधती रही है?
असल विवाद केवल सीबीएसई बोर्ड को लेकर नहीं है। विवाद उस एनसीईआरटी पाठयक्रम को लेकर है, जो सीबीएसई स्कूलों में पढ़ाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में एनसीईआरटी की इतिहास, राजनीति विज्ञान और समाज विज्ञान की किताबों में कई बदलाव किए गए हैं। इन बदलावों पर देशभर में बहस हुई। कई इतिहासकारों, शिक्षाविदों और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि किताबों से कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं और व्यक्तित्वों को कम महत्व दिया गया या हटाया गया।
आलोचकों का कहना है कि नई किताबों में मुगल काल, दिल्ली सल्तनत, महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगों और भारतीय मुसलमानों के इतिहास से जुड़े कुछ हिस्सों में बदलाव किए गए हैं। वहीं भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन भारत, सांस्कृतिक विरासत और कुछ आध्यात्मिक विषयों को पहले की तुलना में अधिक जगह दी गई है। इन बदलावों का कई शिक्षाविदों ने विरोध किया और कहा कि इतिहास को संतुलित रूप में पढ़ाया जाना चाहिए, न कि किसी एक दृष्टिकोण से।
दूसरी ओर केंद्र सरकार और एनसीईआरटी का पक्ष अलग है। उनका कहना है कि यह बदलाव नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति और नए पाठयक्रम के तहत किए गए हैं। उनका दावा है कि पाठयक्रम को छात्रों के लिए सरल बनाया गया है और भारतीय संस्कृति, परंपरा तथा ज्ञान प्रणाली को उचित स्थान दिया गया है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि पाठयक्रम को अधिक प्रासंगिक बनाना है।
यहीं से हिमाचल की राजनीति में सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर कई बार केंद्र सरकार की शिक्षा नीति और पाठयक्रम में किए गए बदलावों का विरोध करती रही है। ऐसे में अब जब हिमाचल की कांग्रेस सरकार सरकारी स्कूलों में सीबीएसई लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, तो अब यह सवाल उठ रहा है कि यदि पाठयक्रम पर आपत्ति थी, तो उसी बोर्ड को अपनाने की जरूरत क्यों पड़ी?
हालांकि सरकार तर्क दे रही है कि आज देश की लगभग सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाएं-जेईई, नीट और सीयूईटी-एनसीईआरटी आधारित होती हैं। निजी स्कूलों और केंद्रीय विद्यालयों के अधिकांश छात्रा सीबीएसई से पढ़ते हैं। ऐसे में सरकार का मानना है कि यदि हिमाचल के सरकारी स्कूलों के छात्रों को समान अवसर देने हैं, तो उन्हें भी उसी बोर्ड से जोड़ना जरूरी है।
लेकिन उसका दूसरा पक्ष यह है कि क्या हिमाचल के अपने इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन में प्रदेश के योगदान, पहाड़ी संस्कृति, लोक परंपराओं और स्थानीय नायकों को नई व्यवस्था में पर्याप्त स्थान मिलेगा। यदि पूरा ध्यान केवल राष्ट्रीय पाठयक्रम पर रहेगा, तो प्रदेश की स्थानीय पहचान और इतिहास कमजोर पड़ने का खतरा भी जताया जा रहा है।
राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला आने वाले समय में बड़ा मुद्दा बन सकता है। इसे भाजपा को मौका मिल गया है कि जिस शिक्षा नीति और पाठयक्रम में किए गए बदलावों पर कांग्रेस ने केन्द्र में सवाल खडे किये थे प्रदेश कि कांग्रेस सरकार ने उसे अपना कर कांग्रेस केे उस विरोध् पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। अब प्रदेश को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वह केवल सीबीएसई की परीक्षा प्रणाली अपना रही है या पाठयक्रम में मौजूद विवादित बदलावों से भी पूरी तरह सहमत है। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि नई पीढ़ी की सोच और इतिहास की समझ तैयार करने का आधार भी होती है।
फिलहाल इतना तय है कि हिमाचल में सीबीएसई स्कूलों की शुरुआत केवल शिक्षा सुधार का विषय नहीं रह गई है। यह अब शिक्षा, राजनीति और विचारधारा-तीनों के केंद्र में आ चुकी है। आने वाले दिनों में सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने के साथ-साथ इतिहास की संतुलित समझ और हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत को कैसे सुरक्षित रखेगी। यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होगा।