चुनावी साल में खुलेंगी भ्रष्टाचार की फाइलें या फिर चार्जशीटों तक सिमट जाएगी सियासत?

Created on Tuesday, 01 September 2026 12:22
Written by Shail Samachar
सुधीर शर्मा और जनक राज पर विजिलेंस कारवाई से गरमाया माहौल,
पुराने आरोपों पर कारवाई की परीक्षा, भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले सियासत का तापमान बढ़ने लगा है। धर्मशाला से विधायक सुधीर शर्मा और भरमौर विधायक जनक राज से जुड़े विजिलेंस मामलों ने उस राजनीतिक लड़ाई को नया मुद्दा दे दिया है, जिसकी जमीन पिछले कई वर्षों से भ्रष्टाचार, जमीन सौदों, भर्ती और सरकारी फैसलों में कथित अनियमितताओं के आरोपों से तैयार होती रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन किस पर आरोप लगा रहा है, बल्कि यह है कि क्या चुनावी वर्ष में आरोपों की फाइलें वास्तव में जांच और कारवाई के अगले चरण तक पहुंचेंगी या हिमाचल की राजनीति एक बार फिर चार्जशीटों और प्रेस कांफ्रेंसों के घेरे में ही घूमती रहेगी?
सुधीर शर्मा के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति से जुड़े मामले में विजिलेंस कारवाई ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दिया है। क्या आने वाले दिनों में सरकार पुराने मामलों में जांच आगे बढ़ाती है? सत्ता में आने से पहले कांग्रेस ने तत्कालीन भाजपा सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और कथित अनियमितताओं को लेकर चार्जशीट जारी की थी। चुनावी मंचों पर इन आरोपों को बड़ा मुद्दा बनाया गया और सत्ता में आने के बाद कारवाई का भरोसा भी दिया गया।
चार साल के कार्यकाल पुरा होने को है अब जनता जानना चाहती है कि उन आरोपों में कितने मामलों में जांच हुई, कितने मामलों में एफआईआर हुई और कितने मामले अदालत तक पहुंचे? यहीं से कांग्रेस सरकार की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है। चार्जशीट में लगाए गए आरोप यदि सही थे तो उन पर अब तक क्या कारवाई हुई है? और यदि कारवाई नहीं हुई तो क्या वे आरोप केवल चुनावी राजनीति का हिस्सा थे?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमाचल में सरकार बदलने के साथ आरोपों की दिशा भी बदलती रही है। विपक्ष में रहते हुए हर पार्टी सत्ता पक्ष पर गंभीर आरोप लगाती है, सत्ता में आने के बाद जांच का भरोसा देती है और फिर अगला चुनाव आते-आते वही मुद्दे राजनीतिक भाषणों में दोबारा लौट आते हैं।
दूसरी ओर विपक्ष अधूरी गारंटियां, बढ़ता वित्तीय दबाव, रोजगार, भर्ती प्रक्रियाएं और भ्रष्टाचार पर कांग्रेस सरकार को घेरने की तैयारी में है। लेकिन भाजपा के सामने भी यह सवाल रहेगा कि वह केवल आरोप लगाएगी या जिन मामलों को गंभीर बता रही है, उन्हें दस्तावेजों के साथ जनता के सामने रखकर कानूनी कारवाई की मांग भी करेगी?
विपक्ष के लिए आने वाला वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल सरकार की आलोचना से चुनावी माहौल नहीं बनेगा। उसे यह बताना होगा कि किस मामले में क्या अनियमितता हुई, किसके खिलाफ क्या दस्तावेज हैं और सरकार से किस कारवाई की मांग की जा रही है। भाजपा को भ्रष्टाचार के आरोपों पर ब्यानबाजी कर इसका फायदा आने वाले चुनाव में तभी मिल पायेगा जब वह दस्तावेजी प्रमाण जनता के सामने रख पायेगी।
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू से जुड़े जमीन संबंधी आरोप भी विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकते हैं। मुख्यमंत्री इन आरोपों को खारिज कर अपना पक्ष विधानसभा में रख चुके हैं। ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक ब्यानबाजी से नहीं निकलेगा बल्कि निष्पक्ष जांच एजैंसियों द्वारा करवाई गयी जांच के निर्णय से निकलेगा। चुनावी राजनीति में जमीन और संपत्ति से जुड़े आरोपों का असर गहरा होता है।
भ्रष्टाचार के अलावा कांग्रेस सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा रोजगार के मोर्चे पर होगी। चुनाव के समय किए गए रोजगार संबंधी वादे अब सरकार के चार साल पूरे होने के साथ विपक्ष के निशाने पर हैं। प्रदेश का युवा सरकारी भर्ती, परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों को लेकर स्पष्ट परिणाम चाहता है। यदि सरकार आने वाले एक साल में रोजगार और भर्ती के मोर्चे पर ठोस उपलब्धियां दिखाने में सफल रहती है तो वह विपक्ष के हमले की धार कम कर सकती है। लेकिन यदि रोजगार के सवाल पर चुनावी वर्ष में भी प्रदेश सरकार कुछ नया नही कर पायी तो भाजपा के लिए यह सबसे प्रभावी मुद्दों में से एक होगा।
हिमाचल की राजनीति में आरोपों का इतिहास लंबा है। सत्ता बदलती है, चार्जशीट बदलती है, आरोपी बदलते हैं और राजनीतिक बयान भी बदल जाते हैं। लेकिन जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल वही रहता है कि किस मामले में आखिर हुआ क्या?
एफआईआर हुई तो जांच कहां पहुंची? जांच पूरी हुई तो चार्जशीट दाखिल हुई या नहीं? चार्जशीट हुई तो अदालत में क्या हुआ? और यदि आरोप गलत निकले तो जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
आने वाला एक वर्ष इसी कसौटी पर कांग्रेस और भाजपा दोनों को परखेगा। कांग्रेस के पास सत्ता है और जांच एजेंसियों के माध्यम से पुराने मामलों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी। भाजपा के पास विपक्ष की भूमिका है और सरकार से जवाब मांगने का राजनीतिक अवसर भी।
लेकिन यदि कांग्रेस केवल भाजपा नेताओं पर कारवाई को उपलब्धि बताती रही और भाजपा केवल कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाती रही, तो जनता के सामने फिर वही पुराना सवाल खड़ा होगा कि चार्जशीट बहुत हुई, कारवाई कितनी हुई?
इसलिए अगले विधानसभा चुनाव से पहले हिमाचल की राजनीति में असली मुकाबला सिर्फ कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं होगा। मुकाबला यह भी होगा कि कौन आरोपों को सबूत, जांच और कानूनी परिणाम तक ले जाता है।
सुधीर शर्मा और जनक राज से जुड़े मामले इस बड़ी राजनीतिक लड़ाई की शुरुआत भर हैं। आने वाले दिनों में यदि पुरानी फाइलें खुलती हैं, नई जांचें शुरू होती हैं और जमीन, संपत्ति, भर्ती तथा भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों पर कारवाई तेज होती है, तो हिमाचल का चुनावी माहौल असाधारण रूप से गर्म हो सकता है। और यदि सब कुछ आरोप-प्रत्यारोप, चार्जशीट और राजनीतिक ब्यानबाजी तक सीमित रहा, तो चार साल की सत्ता और पांच साल की विपक्षी राजनीति के बीच जनता के सामने फिर वही सवाल रहेगा कि आखिर कारवाई हुई कहां?