शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस में बढ़ती अंदरूनी खींचतान अब केवल संगठन का मामला नहीं रह गई है। इसका सीधा असर सरकार की कार्यप्रणाली और जनता के बीच उसकी छवि पर पड़ रहा है। सरकार पांच साल में सभी गारंटियां पूरी करने का दावा कर रही है, मुख्यमंत्री मिशन रिपीट की बात कर रहे हैं और कांग्रेस नेता अगली सरकार भी कांग्रेस की बनने का भरोसा जता रहे हैं। लेकिन जमीन पर दिखाई दे रही तस्वीर इन दावों से बिल्कुल अलग है। जनता सवाल पूछ रही है और सरकार के पास उन सवालों के ठोस जवाब नजर नहीं आ रहे।
सबसे बड़ा संकट यही है कि सरकार के दावों और धरातल की स्थिति के बीच लगातार दूरी बढ़ती जा रही है। जिन गारंटियों और वादों को लेकर कांग्रेस सत्ता में आई थी, उनमें से कितने पूरे हुए और कितने अभी फाइलों में हैं, इसका स्पष्ट हिसाब जनता मांग रही है। महंगाई, रोजगार, कर्मचारियों और पेंशनर्स से जुड़े मुद्दे, छोटे कारोबारियों की परेशानियां और रेहड़ी-फड़ी वालों की समस्याएं सरकार के सामने लगातार खड़ी हैं। ऐसे में केवल उपलब्धियों का प्रचार और मिशन रिपीट का नारा जनता के असंतोष को दबाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
प्रदेश कांग्रेस संगठन में हालिया घटनाक्रम ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। किन्नौर कांग्रेस की कार्यकारिणी भंग किए जाने के बाद जिस तरह पार्टी के भीतर प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उससे साफ है कि असंतोष केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं है। वरिष्ठ नेता जगत सिंह नेगी की प्रतिक्रिया ने भी इस घटनाक्रम को सामान्य संगठनात्मक बदलाव मानने की गुंजाइश कम कर दी है। जब सरकार और संगठन के भीतर ही फैसलों को लेकर सवाल उठने लगें तो इसका संदेश कार्यकर्ताओं और जनता दोनों के बीच जाता है।
आज कई विधायक भी निजी बातचीत में यही सवाल पूछने को मजबूर हैं कि अगली बार वे जनता के बीच आखिर क्या लेकर जाएं। पांच साल का रिपोर्ट कार्ड क्या होगा? किन उपलब्धियों को गिनाकर वोट मांगे जाएंगे? और उन वादों का क्या जवाब होगा, जिनकी उम्मीद में जनता ने कांग्रेस को सत्ता सौंपी थी? यह सवाल जितना सरल है, सरकार के लिए उतना ही गंभीर।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि पार्टी के भीतर से समय-समय पर नेतृत्व को जमीनी स्थिति से अवगत कराने की कोशिशें होती रही हैं, लेकिन यदि हाईकमान तक वास्तविक तस्वीर नहीं पहुंच रही या पहुंचने के बावजूद प्रभावी कारवाई नहीं हो रही, तो इसकी कीमत पूरी कांग्रेस को चुकानी पड़ सकती है। किसी भी सरकार के लिए सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब सत्ता का नेतृत्व अपने आसपास के राजनीतिक असंतोष को कम आंकने लगे और संगठन की चेतावनियों को नजरअंदाज कर दे।
कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल मिशन रिपीट का नारा नहीं, बल्कि जनता का भरोसा दोबारा हासिल करना है। सत्ता में वापसी भाषणों, दावों और नारों से नहीं होती। उसके लिए जमीन पर काम, स्पष्ट उपलब्धियां और जनता के साथ लगातार संवाद जरूरी है। यदि कर्मचारी, पेंशनर्स, बेरोजगार, छोटे व्यापारी और रेहड़ी-फड़ी वाले जैसे अलग-अलग वर्ग सरकार से नाराज हैं, तो इसे केवल राजनीतिक विरोध बताकर खारिज करना आत्मघाती भूल होगी।
समय अभी भी कांग्रेस के हाथ में है, लेकिन समय तेजी से निकल रहा है। हाईकमान को यदि प्रदेश की वास्तविक राजनीतिक स्थिति का आकलन करना है तो उसे सरकारी दावों से आगे बढ़कर संगठन, विधायकों और आम जनता से मिलने वाली जमीनी रिपोर्ट पर भरोसा करना होगा। नेतृत्व को यह तय करना होगा कि समस्या को छिपाना है या उसका समाधान करना है।
यदि अंदरूनी खींचतान जारी रही, संगठन कमजोर होता गया और जनता के सवालों का जवाब देने के बजाय सरकार केवल मिशन रिपीट के दावे करती रही, तो अगला चुनाव कांग्रेस के लिए बेहद कठिन हो सकता है। सत्ता बचाना तो दूर, पार्टी सत्ता से कोसों दूर भी जा सकती है। हिमाचल का मौजूदा राजनीतिक माहौल कम से कम इतना संकेत जरूर दे रहा है कि कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। अब देखना यह है कि हाईकमान इस आवाज को सुनता है या फिर चुनावी नतीजे ही उसे जवाब देते हैं।