कैग के कटघरे में सुक्खू सरकार का वित्तीय मॉडल

Created on Wednesday, 09 September 2026 13:14
Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति को लेकर कैग की 2024-25 की रिपोर्ट ने सुक्खू सरकार के सामने बड़ा वित्तीय और राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था 9.20 प्रतिशत की दर से बढ़ी, लेकिन राज्य की अपनी आय उस रफ्तार से नहीं बढ़ सकी। टैक्स और गैर-टैक्स राजस्व बजट अनुमानों से पीछे रहे। दूसरी ओर वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे प्रतिबद्ध खर्चों का दबाव इतना बढ़ गया कि राजस्व प्राप्तियों का करीब 81 प्रतिशत इन्हीं मदों में चला गया। विकास और कल्याण के लिए करीब 19 प्रतिशत ही उपलब्ध रहा।
कैग की रिपोर्ट ने सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल कर्ज के इस्तेमाल को लेकर खड़ा किया है। वर्ष 2024-25 में प्रदेश का राजस्व घाटा 6,805 करोड़ रुपये और राजकोषीय घाटा 12,611 करोड़ रुपये रहा। राजकोषीय घाटा सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 5.44 प्रतिशत रहा है। रिपोर्ट के अनुसार घाटे की भरपाई के लिए लिया जा रहा कर्ज बड़े स्तर पर पुराने कर्ज को चुकाने में इस्तेमाल हो रहा है। यानी नई उधारी से पुरानी देनदारी का भुगतान एक ऐसी स्थिति बन गयी है जिससे नई परिसंपत्तियां बनाने की क्षमता कमजोर होती जा रही है। कैग ने इसे कर्ज के जाल की स्थिति पैदा करने वाला बताया है।
यही वह बिंदु है जो सरकार की वित्तीय नीति को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला सकता है। यदि उधार का पैसा सड़क, पुल, सिंचाई, बिजली, उद्योग या ऐसी अन्य उत्पादक परिसंपत्तियां बनाने में लगे, जो भविष्य में राज्य के लिए आय पैदा करें, तो कर्ज का आर्थिक औचित्य समझ में आता है। लेकिन पुराने कर्ज की अदायगी के लिए लगातार नई उधारी की जरूरत बढ़ती जाए तो राज्य की वित्तीय गुंजाइश लगातार सिकुड़ती जाती है। कैग ने स्पष्ट तौर पर नए कर्ज को उत्पादक पूंजीगत खर्च तक सीमित करने की सलाह दी है।
प्रदेश की देनदारियों का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) की तुलना में बढ़ता अनुपात भी चिंता का विषय है। कैग के मुताबिक यह (FRBM Act)एफआरबीएम एक्ट के निर्धारित लक्ष्यों से ऊपर है और देनदारियां आर्थिक वृद्धि से तेज गति से बढ़ रही हैं। रिपोर्ट ने प्रदेश की वित्तीय स्थिति में संरचनात्मक कमजोरी की ओर इशारा करते हुए कहा है कि राज्य दिन-प्रतिदिन के खर्चों को पूरा करने के लिए भी उधारी के चक्र में फंस रहा है।
सरकार के खर्च की प्राथमिकता पर भी रिपोर्ट सवाल खड़े करती है। प्रदेश का 2024-25 का कुल बजट 79,475.53 करोड़ रुपये था, लेकिन वास्तविक खर्च 75,325.02 करोड़ रुपये हुआ। उपयोग 94.78 प्रतिशत रहा। कैग ने बड़े स्तर पर बचत को कमजोर बजट योजना और क्रियान्वयन से जोड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पूंजीगत खर्च में करीब एक-तिहाई तक विचलन दर्ज हुआ है। ऐसे समय में जब प्रदेश को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने के लिए पूंजीगत निवेश की जरूरत है, बजट राशि का समय पर और प्रभावी इस्तेमाल न होना सरकार की कार्ययोजना पर सवाल खड़ा करता है।
वित्तीय अनुशासन की तस्वीर भी सरकार के लिए राहत देने वाली नहीं है। कैग के मुताबिक नौ अनुदानों से जुड़े 16 मामलों में 438.66 करोड़ रुपये बिना बजट प्रावधान के खर्च किए गए। सात अनुदानों और चार विनियोगों में विधानसभा द्वारा अधिकृत राशि से 3,102.88 करोड़ रुपये ज्यादा खर्च किए गए। 13 मामलों में 1,575.44 करोड़ रुपये के अनुपूरक प्रावधान अनावश्यक साबित हुए। वहीं 14 योजनाओं में 673.11 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान होने के बावजूद कोई खर्च नहीं हुआ। यानी एक तरफ बिना प्रावधान के खर्च, दूसरी तरफ स्वीकृत बजट खर्च न कर पाना-दोनों स्थितियां वित्तीय प्रबंधन पर सवाल उठाती हैं।
सरकारी निवेश का रिटर्न भी चिंता बढ़ाता है। राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों और अन्य संस्थाओं में 6,239 करोड़ रुपये लगाए गए, लेकिन इसके मुकाबले केवल 191 करोड़ रुपये का रिटर्न मिला। लाभार्थियों को दिए गए कर्ज की वसूली भी नगण्य रही। कैग ने सार्वजनिक उपक्रमों और स्वायत्त संस्थाओं के प्रदर्शन की समयबद्ध समीक्षा तथा घाटे में चल रही संस्थाओं के पुनर्गठन की जरूरत बताई है।
वित्तीय पारदर्शिता को लेकर भी रिपोर्ट में गंभीर कमियां दर्ज हैं। विभागों द्वारा एकत्र उपकर समय पर सरकारी खाते में जमा न करना, सरकारी धन को ट्रेजरी के बाहर बैंक खातों में रखना, उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित रहना और खातों का समय पर मिलान न होना वित्तीय नियंत्रण की कमजोरी दिखाता है। कैग के अनुसार ऐसी कमियां राज्य की वित्तीय स्थिति की वास्तविक तस्वीर को प्रभावित कर सकती हैं।
अब सरकार के सामने राजनीतिक सवाल यह नहीं है कि कैग ने क्या कहा, बल्कि यह है कि सरकार इन आपत्तियों पर करेगी क्या। कैग ने राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा कम करने के लिए समयबद्ध रोडमैप, पूंजीगत खर्च बढ़ाने, गैर-उत्पादक राजस्व खर्च घटाने, राज्य की अपनी आय बढ़ाने और नए कर्ज को उत्पादक परिसंपत्तियों तक सीमित करने की सिफारिश की है।
आने वाले समय में विपक्ष के लिए यह रिपोर्ट सरकार को घेरने का बड़ा आधार बन सकती है। सवाल सीधे हैं जब 81 प्रतिशत राजस्व प्रतिबद्ध खर्च में जा रहा है, तो विकास के लिए पैसा कहां से आएगा? जब नए कर्ज का इस्तेमाल पुराने कर्ज चुकाने में हो रहा है, तो कर्ज का बोझ कब घटेगा? जब करोड़ों रुपये का बजट होने के बावजूद योजनाओं में खर्च नहीं हुआ, तो जवाबदेही किसकी तय होगी?
कैग की रिपोर्ट ने हिमाचल की वित्तीय चुनौती का चेहरा साफ कर दिया है। राज्य की समस्या केवल कर्ज का बढ़ना नहीं है समस्या यह भी है कि कर्ज के बावजूद पर्याप्त उत्पादक परिसंपत्तियां और राजस्व पैदा नहीं हो रहा। यदि इस चक्र को नहीं तोड़ा गया तो आने वाले वर्षों में वेतन, पेंशन और ब्याज के बाद विकास के लिए बचने वाली वित्तीय गुंजाइश और सीमित हो सकती है। अब सरकार को राजनीतिक सफाई से ज्यादा कर्ज, घाटे और खर्च की प्राथमिकताओं पर ठोस जवाब देना होगा।