शिमला जिला परिषद हार से कांग्रेस में खलबली
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Created on Monday, 14 September 2026 17:07
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Written by Shail Samachar
- दिल्ली में मंत्रियों की सक्रियता के बीच हाईकमान के सामने बढ़े सवाल
शिमला/शैल। शिमला जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर भाजपा की जीत ने कांग्रेस के लिये बड़ा राजनीतिक झटका दिया है। 25 सदस्यीय जिला परिषद में भाजपा समर्थित 11, कांग्रेस समर्थित 10 और चार निर्दलीय सदस्य थे। इसके बावजूद भाजपा अपने उम्मीदवारों को दोनों प्रमुख पदों पर बैठाने में सफल रही। करीब 26 साल बाद जिला परिषद की कमान कांग्रेस के हाथ से निकलना शिमला में पार्टी के संगठनात्मक प्रभाव के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है।
इस हार की अहमियत इसलिये बढ़ जाती है क्योंकि शिमला जिले से कांग्रेस के चार विधायक और सरकार में तीन मंत्री हैं। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू भी चुनावी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए थे। इसके बावजूद पार्टी अपने समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा सकी। भाजपा की रणनीति में राज्यसभा सांसद हर्ष महाजन और सांसद डॉ. सिकंदर कुमार की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
चुनाव लंबे समय से लंबित था और इसके लिए कांग्रेस के पास तैयारी का पर्याप्त समय था। ऐसे में परिणाम ने पार्टी के भीतर संगठनात्मक तालमेल और स्थानीय स्तर पर प्रभावी रणनीति को लेकर सवाल खड़े कर दिये हैं। भाजपा ने सीमित संख्या होने के बावजूद निर्दलीय सदस्यों का समर्थन जुटाकर बाजी पलट दी।
इसी बीच पिछले दिनों दिल्ली में मंत्रियों की सक्रियता ने प्रदेश कांग्रेस के भीतर चल रही चर्चाओं को और हवा दी। कई मंत्रियों के हाईकमान के नेताओं से मिलने और प्रदेश के राजनीतिक तथा सरकारी कामकाज से जुड़े मुद्दे रखने की खबरें सामने आयी है। हालांकि इन बैठकों के बाद किसी बड़े फैसले की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन मंत्रियों का दिल्ली जाकर अपनी बात रखना पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को सामने जरूर लाता है।
शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर की सीबीएसई स्कूलों को लेकर सामने आई राय भी इसी संदर्भ में चर्चा में है। उन्होंने पुराने सरकारी स्कूलों को मजबूत करने को प्राथमिकता दिए जाने की बात कही, हालांकि साथ ही मुख्यमंत्री के फैसलों का सम्मान करने की बात भी स्पष्ट की। इससे सरकार के भीतर नीतिगत फैसलों पर अलग-अलग राय होने की तस्वीर सामने आयी है।
दूसरी ओर सरकार के कामकाज को लेकर विभिन्न संगठनों के आंदोलन भी लगातार सामने आ रहे हैं। पिछले दिनों विधानसभा सत्र के दौरान टैक्सी ऑपरेटरों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों और अन्य वर्गों की ओर से अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किये गये हैं। सुधीर शर्मा और राजेंद्र राणा भी कुछ मुद्दों को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर हैं।
कांग्रेस के लिए अब सबसे बड़ा सवाल अगले विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को संभालने का है। सत्ता में होने के बावजूद शिमला जैसे महत्वपूर्ण जिले में जिला परिषद के शीर्ष पद गंवाना पार्टी के लिए सामान्य स्थानीय राजनीतिक घटनाक्रम मानकर टालना आसान नहीं होगा। खासकर तब, जब अगले विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है।
शिमला जिला परिषद का परिणाम कांग्रेस के लिए एक साफ राजनीतिक संदेश है कि सत्ता का प्रभाव तभी चुनावी ताकत में बदलता है, जब संगठन की पकड़ जमीन पर भी दिखाई दे। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि हाईकमान दिल्ली में मिले फीडबैक और शिमला के इस परिणाम को किस गंभीरता से लेता है तथा प्रदेश संगठन और सरकार के बीच बढ़ती खाई को पाटने के लिए क्या कदम उठाता है।