हिमाचल प्रदेश में मानसून की शुरुआत से पहले ही भूस्खलन, पहाड़ दरकने और पेड़ों के गिरने की घटनाएं सामने आने लगी हैं। हर साल की तरह इस बार भी प्रशासन अलर्ट पर है, आपदा प्रबंधन की बैठकें हो रही हैं, विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए जा रहे हैं और संभावित नुकसान को कम करने की रणनीतियों पर चर्चा हो रही है। लेकिन इन सारी तैयारियों के बीच सबसे बड़ा सवाल फिर सामने खड़ा है क्या हिमाचल केवल आपदाओं के बाद राहत, मुआवजे और पुनर्वास तक सीमित रहेगा, या कभी उन नीतियों और विकास मॉडल पर भी गंभीरता से सवाल उठाएगा जो इन आपदाओं को लगातार गहरा रहे हैं?
पिछले कुछ वर्षों का इतिहास देखें तो हिमाचल प्रदेश ने ऐसी त्रासदियां झेली हैं, जिन्हें केवल प्राकृतिक आपदा कहकर नहीं टाला जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश में आयी आपदाओं से सैकड़ों लोगों की जानें गई, हजारों मकान क्षतिग्रस्त हुए, सड़कें बह गईं, पुल टूट गए और हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। शिमला के समरहिल में मंदिर ध्वस्त हुआ, कृष्णानगर में मकान जमींदोज हुए, मंडी, कुल्लू, चंबा और किन्नौर में पहाड़ टूटे और पूरी बस्तियां खतरे की जद में आ गईं। उस समय विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि यह केवल अत्यधिक वर्षा का परिणाम नहीं है, बल्कि वर्षों से प्रकृति के साथ की जा रही छेड़छाड़ का नतीजा भी है।
विडंबना यह है कि इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी विकास के मॉडल पर गंभीर पुनर्विचार नहीं हुआ। आज भी प्रदेश में फोरलेन परियोजनाएं, सुरंग निर्माण, जलविद्युत परियोजनाएं और बड़े-बड़े भवन निर्माण कार्य उसी गति से चल रहे हैं। विकास किसी भी राज्य की आवश्यकता है, लेकिन सवाल विकास का नहीं, उसके स्वरूप का है। क्या हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास का वही मॉडल लागू किया जा सकता है जो मैदानी इलाकों में अपनाया जाता है?
हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसकी भौगोलिक संरचना नाजुक है और यहां की मिट्टी तथा चट्टानें लगातार परिवर्तनशील हैं। इसके बावजूद अनेक स्थानों पर पहाड़ों को लगभग सीधा काटा जा रहा है। भारी निर्माण गतिविधियों के कारण कई क्षेत्रों में जल स्रोतों के सूखने, भूमि धंसने और घरों में दरारें आने की शिकायतें लगातार मिलती रही हैं। किन्नौर, चंबा, मंडी और कुल्लू जैसे जिलों में स्थानीय समुदाय वर्षों से अपनी चिंताएं व्यक्त कर रहे हैं। दुर्भाग्य से इन चिंताओं को अक्सर विकास विरोधी मानसिकता बताकर खारिज कर दिया जाता है।
एक और बड़ा संकट प्राकृतिक जल निकासी तंत्र के साथ हो रही छेड़छाड़ है। जब भारी वर्षा होती है तो पानी अपना रास्ता खुद बनाता है और तब वह अपने साथ मिट्टी, पत्थर, मकान और कभी-कभी पूरी जिंदगी बहा ले जाता है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई भी इस संकट को बढ़ा रही है। आज विकास परियोजनाओं के नाम पर हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं।
इन परिस्थितियों में भी हर आपदा के बाद सरकारें राहत पैकेजों, मुआवजों और पुनर्वास योजनाओं पर अधिक ध्यान देती हैं, जबकि आपदा की जड़ों पर प्रहार करने के लिए कठोर निर्णय लेने से बचती हैं। पर्यावरणीय मंजूरियों में ढील, निर्माण मानकों के पालन में लापरवाही और परियोजनाओं की निगरानी में कमजोर व्यवस्था ऐसे मुद्दे हैं जिन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
यह भी सच है कि हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य को सड़कें, बिजली और आधुनिक सुविधाएं चाहिएं। लेकिन विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी मानना सबसे बड़ी भूल होगी। आज जरूरत केवल आपदा प्रबंधन की नहीं, बल्कि आपदा रोकथाम की है। प्रकृति बार-बार चेतावनी दे रही है क्या हम उससे पहले अपनी गलतियों को सुधारने का साहस दिखा पायेंगे।
हिमाचल का भविष्य राहत शिविरों और मुआवजे की घोषणाओं से सुरक्षित नहीं होगा। वह तभी सुरक्षित होगा जब विकास की हर योजना में पहाड़ों की संवेदनशीलता, पर्यावरणीय संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के हितों को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी जाएगी। अन्यथा हर मानसून के साथ हम वही दुखद कहानियां दोहराते रहेंगे और प्रकृति हमें हमारी भूलों की कीमत चुकाने पर मजबूर करती रहेगी।