धारा 118 के प्रस्तावित सरलीकरण से सरकार की नीयत पर उठे सवाल

Created on Wednesday, 29 October 2025 04:36
Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। सुक्खू सरकार भू-राजस्व अधिनियम की धारा 118 का सरलीकरण करने जा रही है। चर्चाओं के अनुसार सरकार ने इसके लिये एक मंत्री स्तरीय कमेटी का भी गठन कर दिया है। नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने इस प्रस्तावित सरलीकरण को हिमाचल के हितों को बेचने का प्रयास करार दिया है। जयराम ठाकुर ने आरोप लगाया है कि इस सरलीकरण के माध्यम से सरकार अपने खास मित्रों को लाभ पहुंचाना चाहती है। सरकार की नीयत पर इसलिये सवाल उठने लगे हैं क्योंकि इस सरकार में सबसे पहले लैण्ड सीलिंग एक्ट में संशोधन लाकर बेटियों को अधिकार देने की बात की है और यह संशोधन 1972 से ही लागू हो जायेगा जब से यह कानून बना था। अभी इस संशोधन पर राष्ट्रपति की स्वीकृति शायद नहीं मिल पायी है। इस संशोधन के बाद सरकार ने धारा 118 में संशोधन करके धार्मिक संगठनों को यह छूट दे दी कि वह अपनी जमीन बेच सकते हैं। विपक्ष ने विधानसभा में इसका विरोध किया था। इसी के साथ सरकार ने कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर को 40 हेक्टेयर जमीन कुछ व्यवसायीयों को बेचने का काम कर दिया जो उच्च न्यायालय के दखल के बाद रुका। इस पृष्ठभूमि में यदि देखा जाये तो प्रस्तावित सरलीकरण पर शंकाएं उभरना स्वभाविक हो जाता है। क्योंकि लैण्ड सीलिंग एक्ट 1972 में पारित हुआ था। इसके मुताबिक प्रदेश में कोई भी व्यक्ति 161 बीघा से ज्यादा जमीन नहीं रख सकता। यदि उसकी सारी जमीन काश्त योग्य न हो तो अन्यथा यह सीमा और भी कम है।
1972 से लागू हुये इस कानून के मुताबिक तो आज एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं होना चाहिये जिसके पास तय भूमि सीमा से अधिक जमीन हो। लेकिन अब जब सुक्खू सरकार ने लैण्ड सीलिंग एक्ट में संशोधन करके बेटियों को हक देने की बात की तो निश्चित है कि सरकार के संज्ञान में ऐसे मामले आये होंगे जहां व्यक्ति के पास भू-सीमा से अधिक जमीन है और उसके वारिसों में सिर्फ बेटियां ही है। जिन्हें लैण्ड सीलिंग एक्ट के तहत दिये जाने का प्रावधान करने की आवश्यकता आन पड़ी हो। क्योंकि सामान्य नियमों के अनुसार तो बेटियों को बाप की जमीन में हक हासिल ही है। लेकिन सरकार ने लैण्ड सीलिंग एक्ट में संशोधन करते समय इस आश्य का कोई सर्वे सामने नहीं लाया है। क्योंकि यदि आज किसी के भी पास तय भू-सीमा से अधिक जमीन है तो संबंधित राजस्व और प्रशासन अधिकारियों के खिलाफ कारवाई करनी पड़ेगी कि आज पचास वर्षों में भी इस कानून की अनुपालना क्यों नहीं हुई? इसी तरह जब इसी तरह जब धार्मिक संगठनों को जमीन बेचने की अनुमति दी गयी तब भी लैण्ड सीलिंग एक्ट और भू-राजस्व की धारा 118 के प्रावधानों को नजरअन्दाज कर दिया गया। यह प्रश्न अपनी जगह खड़ा रहा कि क्या धार्मिक संगठन को दान में मिली हुई जमीन को बेचने का हक होना चाहिये।
हिमाचल की सामाजिक और भौगोलिक स्थितियों को देखते हुये ही लैण्ड सीलिंग एक्ट लाया गया था। 1953 के ‘‘बड़ी जिम्मेदारी उन्मूलन एक्ट’’ के तहत भी लाखों बीघा जमीन सरकार के पास आयी है क्योंकि करीब दो दर्जन पहाड़ी रियासतों का प्रदेश रहा है हिमाचल और जिसका भूलगान सौ रूपये या उससे अधिक था वह सब बड़े जिम्मेदारों की परिभाषा में और उनकी सरप्लस जमीने सरकार में विहित हुई। लेकिन उन जमीनों का क्या हुआ इसके ऊपर सरकारें आज तक खामोश हैं। आजादी के दौरान विस्थापित हुए लोगों की संपत्तियों के लिये कानून बना था। हर प्रदेश में इसके कार्यालय थे। जब यह कानून भारत सरकार ने निरस्त कर दिया तब इसके तहत लंबित मामले राजस्व सरकारों में विहित हो गये थे। इसमें भी भारी भू संपत्तियां हिमाचल सरकार को मिली है जिनके बारे में कुछ भी सार्वजनिक नहीं हो पाया है। हिमाचल में धारा 118 के दुरुपयोग को लेकर प्रदेश की सरकारों पर हिमाचल को बेचने के आरोप लगातार लगते आये हैं। धारा 118 के दुरुपयोग को लेकर प्रदेश में आज तक चार जांच आयोग बैठ चुके हैं। हरेक की रिपोर्ट हजारों पन्नों में है। लेकिन इन जांच रिपोर्टों पर क्या कारवाई हुई है इसकी आज तक कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। धूमल सरकार के दौरान सदन में एक प्रश्न आया था की धारा 118 के तहत किस-किस को अनुमति मिली है। उसके जवाब में सदन में सौ पृष्ठों का उत्तर आया था और उसमें सैकड़ो लोगों के नाम थे जिनमें प्रदेश सरकार के कई बड़े नौकरशाहों के नाम भी आये हैं। हिमाचल में कई बड़े नौकरशाहों ने धारा 118 के तहत कई बार जमीन खरीद की अनुमतियां ली है और बेची हैं। क्योंकि धारा 118 में यह सबसे बड़ी कमी है कि कोई आदमी इसके तहत है कितनी बार और कितनी जमीन खरीद की अनुमतियां ले सकता है इसको लेकर नियम खामोश है और इसलिये इसका खुलकर दुरुपयोग हो रहा है। लेकिन कोई भी सरकार इस कमजोरी को दूर करने का प्रयास नहीं कर पायी है। इसलिये हर सरकार की नीयत पर इस संबंध में सवाल उठते रहे हैं।