आसान नहीं होगा कांग्रेस अध्यक्ष का सफर

Created on Thursday, 27 November 2025 09:09
Written by Shail Samachar

शिमला/शैल। क्या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हाईकमान की अपेक्षाओं पर खरे उत्तर पाएंगे? क्या वह भाजपा को चुनौती दे पाएंगे? क्या कांग्रेस को पुनः सत्ता की दहलीज तक पहुंचा पाएंगे? ऐसे अनेकों सवाल आज प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के सामने सत्ता के गलियारों से लेकर सड़क तक खड़े हो गये हैं। क्योंकि नया प्रदेश अध्यक्ष तलाश करने में एक वर्ष का समय पार्टी का लग गया है। जब एक वर्ष से लेकर ब्लॉक स्तर तक की सारी कार्यकारिणीयों को भंग कर दिया गया था तब हाईकमान ने पर्यवेक्षकों की टीम संगठन के कर्मठ और सक्रिय कार्यकर्ताओं की तलाश के लिये भेजी थे। लेकिन इस टीम की रिपोर्ट पर कोई अमल नहीं हुआ। प्रदेश में संगठन की खराब हालत का दोष हर नेता ने सीधे हाईकमान के नाम लगाया परन्तु कोई असर नहीं हुआ। इस वस्तुस्थिति में यदि प्रदेश सरकार और संगठन के पिछले तीन वर्षों के रिश्तों तथा सरकार की उपलब्धियां पर नजर डालें तो यह सच्चाई सामने आती है कि सरकार के अब तक के कार्यकाल में हुए लोकसभा चुनाव में चारों सीटें पार्टी हार गयी और राज्यसभा हारने के साथ ही पार्टी के छः विधायक दलबदल कर गये। अब स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव किसी न किसी बहाने टाले जा रहे हैं। नगर निगम अधिनियम में संशोधन का असर यह हुआ है कि पार्षदों का एक बड़ा वर्ग विद्रोह के कगार पर पहुंच गया है। हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभाओं के चुनाव में हिमाचल सरकार के कुछ फैसले विशेष चर्चा का विषय रहे हैं। सरकार हर समय प्रदेश की कठिन वित्तीय स्थिति के लिए पूर्व की सरकार को लगातार दोष देती आ रही है। लेकिन आज तक पिछले सरकार के कार्यकाल में घटे भ्रष्टाचार का कोई भी मामला कायम नहीं कर पायी है। कांग्रेस विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता को दस गारंटियां देकर सत्ता में आयी थी। इन गारंटियों कि आज व्यवहारिक स्थिति क्या है इस पर सरकार के ब्यानी दावों के अतिरिक्त जमीन पर स्थिति पूरी तरह अलग है। पार्टी का कोई भी विधायक और कार्यकर्ता जमीनी सच्चाई पर कुछ भी खुलकर बोलने और सवाल पूछने की स्थिति में नहीं है। लेकिन जनता जो भुक्त भोगी है वह आगे-आगे पूरी तरह मुखर होती जायेगी। विपक्ष सरकार और व्यक्तिगत रूप से नेताओं के भ्रष्टाचार को निशाना बनायेगी। क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर देश की राजनीति जिस मुकाम पर पहुंच चुकी उसका असर हर प्रदेश पर होगा। प्रदेश भाजपा को पार्टी के राष्ट्रीय निर्देशों पर सरकार को ठोस प्रमाणों के साथ घेरने की बाध्यता आ जायेगी भले ही आज तक भाजपा का अघोषित समर्थन सुक्खू सरकार को रहा है। लेकिन आने वाले समय में स्थितियां एकदम बदल जायेगी। इस परिदृश्य में पार्टी के नये अध्यक्ष के सामने भारी चुनौतियां होगी। सरकार और संगठन को व्यवस्था परिवर्तन के जुमले से बाहर निकलना होगा। स्व. विमल नेगी की मौत प्रकरण सरकार से जवाब मांगेगा यह तय है। प्रशासन में पूर्व मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना का सेवा विस्तार और फिर पुनर्नियुक्ति निश्चित रूप से उच्च न्यायालय के फैसले के बाद जनता में चर्चा का विषय बनेगा ही। क्योंकि उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका को मैनटेनेबल करार देकर गेंद राज्य सरकार के पाले में धकेल दी है। इन व्यवहारिक स्थितियों के परिदृश्य में अध्यक्ष का काम काफी चुनौती पूर्ण हो जायेगा।