आपदा राहत के आंकड़ों पर भाजपा और कांग्रेस आमने सामने

Created on Wednesday, 31 December 2025 12:41
Written by Shail Samachar

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में आपदाओं के बाद केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) के तहत 601.92 करोड रूपये़ की वित्तीय सहायता को लेकर एक बार फिर राजनीति तेज हो गई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और हमीरपुर से सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने इस सहायता को ‘आपदा पीड़ित हिमाचल के ज़ख्मों पर मरहम’ बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का आभार जताया है। भाजपा इसे केंद्र सरकार की संवेदनशीलता और हिमाचल के प्रति विशेष लगाव का प्रमाण मान रही है, जबकि विपक्ष इस मुद्दे पर अलग दृष्टिकोण रखता है।
भाजपा का तर्क है कि मोदी सरकार ने संकट की घड़ी में हिमाचल को अकेला नहीं छोड़ा। अनुराग सिंह ठाकुर के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में आई बाढ़, बादल फटने और भूस्खलन जैसी घटनाओं से प्रदेश की सड़कों, पुलों, ग्रामीण ढांचे और जल स्रोतों को भारी नुकसान पहुंचा। ऐसे समय में 601.92 करोड़ रूपये की NDRF सहायता राहत एवं पुनर्निर्माण कार्यों को गति देने में अहम भूमिका निभाएगी। भाजपा यह भी रेखांकित करती है कि तटीयकरण और नदी चैनलाइजेशन जैसे कार्यों के लिए केंद्र सरकार द्वारा अब तक 8,625 करोड रूपये़ का आवंटन किया जा चुका है, जो दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन की दिशा में बड़ा निवेश है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि यह सहायता केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ज़मीनी स्तर पर पुनर्निर्माण, सुरक्षा कार्य और भविष्य की आपदाओं से बचाव संभव होगा। अवैध खनन और जंगल कटान से नदियों के स्वरूप में आये बदलाव को भी आपदा की तीव्रता का एक कारण बताया जा रहा है, और केंद्र की मदद को इन प्रभावों को संतुलित करने की दिशा में आवश्यक बताया जा रहा है।
वहीं कांग्रेस का कहना है कि NDRF के तहत मिलने वाली सहायता कोई राजनीतिक अनुदान नहीं, बल्कि संवैधानिक और वैधानिक अधिकार है, जिसे किसी राज्य को उसकी आपदा की तीव्रता के आधार पर दिया जाता है। कांग्रेस का तर्क है कि केंद्र द्वारा दी गई राशि पर राजनीतिक श्रेय लेने के बजाये यह देखा जाना चाहिए कि क्या यह सहायता समय पर, पर्याप्त मात्रा में और बिना प्रशासनिक बाधाओं के ज़मीनी स्तर तक पहुंच रही है या नहीं।
कांग्रेस यह भी सवाल उठा रही है कि 601.92 करोड़ रूपये की राशि हिमाचल में हुए कुल नुकसान के मुकाबले कितनी पर्याप्त है। पिछले वर्षों में हुए जान-माल के नुकसान, ढांचागत तबाही और पुनर्वास की व्यापक जरूरतों को देखते हुये कांग्रेस का कहना है कि राहत राशि कई बार वास्तविक जरूरतों से कम पड़ जाती है और राज्य को अतिरिक्त संसाधनों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
भाजपा इसे मोदी सरकार की मानवीय सोच और त्वरित निर्णय क्षमता का उदाहरण बता रही है, जबकि विपक्ष इसे केंद्र-राज्य संबंधों में राजनीतिक प्रचार का हिस्सा मानता है। कांग्रेस का आरोप है कि जब भी कोई आपदा आती है, राहत राशि को राजनीतिक मंच से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि असली चुनौती पुनर्वास और दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन की होती है।
हिमाचल के आपदा पीड़ितों के लिए यह बहस कम मायने रखती है कि श्रेय किसे मिले। उनके लिए असली सवाल यह है कि राहत राशि कितनी जल्दी ज़मीनी स्तर तक पहुंचती है, पुनर्निर्माण कितनी पारदर्शिता से होता है और भविष्य में ऐसी आपदाओं से बचाव के लिये ठोस कदम उठाये जाते हैं या नहीं। केंद्र और राज्य-दोनों सरकारों की जिम्मेदारी है कि राजनीतिक बयानबाज़ी से आगे बढ़कर राहत और पुनर्निर्माण को प्राथमिकता दी जाए।
आपदा के समय सहयोग राजनीति का विषय नहीं, बल्कि मानवता की कसौटी होता है। हिमाचल के संदर्भ में केंद्र की सहायता महत्वपूर्ण है, लेकिन उसका वास्तविक मूल्यांकन तभी होगा जब यह सहायता लोगों के जीवन में सुरक्षा, भरोसा और स्थायित्व लेकर आएगी।