हिमाचल सरकार जिस तरह के आर्थिक संकट में घिर गयी उसने हर व्यक्ति का ध्यान इस ओर आकर्षित कर रखा है। क्योंकि इस समय सरकार का कुल कर्जभार एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर गया है। चिन्ता और चिन्तन इस बात की है कि हमारे माननीय विधायकों ने एक भी विधानसभा सत्र में इस पर कोई चर्चा नहीं की कि इस बढ़ते कर्ज से कैसे मुक्ति मिल सकती है। जबकि अपने वेतन भत्ते बढ़ाने के लिये सभी ध्वनि मत से एक थे। सुक्खू सरकार ने जब कार्यभार संभाला था तो प्रदेश पर पचहतर हजार करोड़ का कर्ज था और दस कजार करोड़ की देनदारियां पिछली सरकार विरासत में छोड़ गयी थी। सुक्खू सरकार अब तक 29046 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। अगले 2 वर्षों में इतना ही कर्ज और लेना पड़ेगा। क्योंकि आगे तो चुनावी वर्ष होगा सरकार चुनाव की नजर से कर्ज लेगी। यह एक स्थापित सत्य है कि बढ़ते कर्ज के कारण सरकार को अपना राजस्व व्यय कम करना पड़ता है जिसका सीधा प्रभाव स्थायी सरकारी रोजगार पर पड़ेगा और हिमाचल में सरकार ही सबसे बड़ी रोजगार प्रदाता है। जो सरकार इस समय ही मल्टीटास्क वर्कर भर्ती से मित्रा योजना तक पहुंच गयी है उसे यह मित्र योजनाएं भी बन्द करनी पड़ेगी। सुक्खू सरकार ने अब तक 26683 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व जुटाया है जिसका अर्थ है कि यह सरकार हर बार कर्ज मुक्त बजट देकर इतने का करभार प्रदेश की जनता पर लाद चुकी है। इस राजस्व जुटाने से क्या आम आदमी को कोई राहत मिलती है शायद नहीं। प्रदेश का कर्जभार जीडीपी के 44% से बढ़ गया है जबकि यह पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं बढ़ना चाहिए। इसी के साथ प्रदेश के 90% लोगों के बैंक खाते हैं और कर्ज केवल 4% ने ही ले रखा है। प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 2.57 हजार है और कर्ज एक लाख है जिस प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 2.57 हजार हो क्या उस प्रदेश में सरकार पर आर्थिक संकट होना चाहिये? क्या उस प्रदेश के आम आदमी को सरकार के सस्ते राशन पर निर्भर रहना चाहिए? व्यवहारिक रूप से शायद नहीं। लेकिन आज हिमाचल बेरोजगारी में छठे स्थान पर पहुंच चुका है और आम आदमी की सस्ते राशन पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। ऐसा इसलिये है कि इन आंकड़ों का आम आदमी से कोई लेना देना नहीं है। यह आंकड़े सरकार को प्रभावित करते हैं। एक बड़े निवेश से सरकार का जीडीपी बढ़ जाता है और उससे सरकार की कर्ज लेने की सीमा बढ़ जाती है जिसका आम आदमी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सरकारें कर्ज लेकर और एक दूसरे को दोष देकर अपना काम निकाल लेती हैं लेकिन कालान्तर में इसका कुप्रभाव आम आदमी पर पड़ता है। इसलिये यह सोचना आवश्यक हो जाता है कि कहीं सरकार की सोच और योजनाएं ऐसी तो नहीं रही जिनका प्रदेश के आम आदमी के साथ कोई लेना देना ही नहीं था। क्योंकि स्व. रामलाल ठाकुर के कार्यकाल तक प्रदेश पर कोई कर्ज भार नहीं था। हिमाचल पहाड़ी प्रदेश है और इस नाते कृषि और बागवानी के लिये तो अनुकूल है पर शायद औद्योगिकरण के लिये नहीं। क्योंकि उद्योग के लिये कच्चा माल और उपभोक्ता दोनों में से एक का प्रचुर मात्रा में होना आवश्यक है और यह दोनों तत्व प्रदेश में बड़ी मात्रा में उपलब्ध नहीं है। प्रदेश में खनिज के रूप में सीमेंट बनाने के लिये पर्याप्त कच्चा माल है। लेकिन संयोग से इस उद्योग में हिमाचल सरकार की अपनी कोई इकाई स्थापित नहीं है। सीमेंट के अतिरिक्त प्रदेश में नदी जल की काफी उपलब्धता है। इसका दोहन जल विद्युत परियोजनाओं के लिये हुआ। लेकिन इसमें भी जब 1980 के दशक में बिजली बोर्ड के तत्कालीन चेयरमैन स्व.कैलाश महाजन की बोर्ड से बर्खास्तगी के बाद प्रदेश सरकार इस दिशा में अपने स्वामित्व में कोई बड़ी योजना स्थापित नहीं कर पायी है। उस समय बसपा परियोजना बोर्ड से छीनकर जेपी उद्योग को दे दी गयी। इस पर तब तक हुआ सोलह करोड़ का निवेश जे.पी. से कभी वापस नहीं मिला। बल्कि जब यह राशि बढ़कर 92 करोड़ हो गयी तो इस बट्टे खाते में डाल दिया गया। कैग ने इस पर गंभीर सवाल उठाये हैं जिन्हें नजर अन्दाज कर दिया गया। आज जिस मुकाम पर स्थितियां पहुंच चुकी है उससे अब तक के इतिहास पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है।