हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति आज किसी एक फैसले या एक वर्ष की उपज नहीं है, बल्कि वर्षों की लापरवाही, अव्यावहारिक वादों और कमजोर वित्तीय अनुशासन का परिणाम बन चुकी है। सुक्खू सरकार ने सत्ता संभालते समय जिस ‘‘व्यवस्था परिवर्तन’’ का नारा दिया था, वह आज अपने ही बोझ तले दबता दिखाई दे रहा है। संविधान के तहत चलने वाली स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था, वित्तीय नियमों और जवाबदेही के ढांचे से ऊपर आखिर क्या बदला जाना था, यह सवाल आज भी प्रदेश की जनता के सामने अनुत्तरित है। जनता ने कांग्रेस को सत्ता इसलिए सौंपी थी क्योंकि वह पिछली सरकार से असंतुष्ट थी और कांग्रेस ने दस गारंटियों के रूप में एक वैकल्पिक भरोसा प्रस्तुत किया था। लेकिन सत्ता में आते ही जिस तरह श्रीलंका जैसे हालात की चेतावनी देकर भय का माहौल बनाया गया, उससे यह उम्मीद बनी थी कि सरकार खर्च पर लगाम लगाएगी और वित्तीय अनुशासन को प्राथमिकता देगी। व्यवहार में हुआ ठीक इसके विपरीत।
राजस्व घाटा अनुदान यानी आरडीजी की समाप्ति ने सरकार की असल तैयारी और सोच को पूरी तरह उजागर कर दिया है। आरडीजी कोई स्थायी आय का साधन नहीं था, बल्कि सीमित अवधि के लिए दी जाने वाली राहत थी, जिसकी समाप्ति पूर्वनिर्धारित थी। इसके बावजूद राज्य सरकार ने अपनी योजनाओं और खर्च संरचना को इस अनुदान पर निर्भर बना लिया। अब जब यह सहायता बंद हुई है, तो संकट के लिए केंद्र को दोषी ठहराने की कोशिश की जा रही है, जबकि वास्तविक समस्या राज्य के भीतर है। बीते तीन वर्षों में सरकार ने जनता पर करों और उपकरों का भारी बोझ डालकर करोड़ों रुपये अतिरिक्त राजस्व जुटाया, फिर भी वित्तीय संतुलन नहीं बन पाया। जब सरकार सत्ता में आई थी, तब प्रदेश का कर्ज लगभग 76 हजार करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। यह कर्ज किस विकास में लगा, इसका ठोस और पारदर्शी विवरण आज तक जनता के सामने नहीं रखा जा सका है।
कैग रिपोर्ट ने इस वित्तीय अव्यवस्था की पुष्टि आधिकारिक तौर पर कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार सरकार द्वारा लिए जा रहे कर्ज का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे प्रतिबद्ध खर्चों में जा रहा है, जबकि विकासात्मक कार्यों के लिए सीमित धन ही बच पा रहा है। नियमों के तहत कर्ज केवल उन्हीं परियोजनाओं के लिए लिया जाना चाहिए जिनसे भविष्य में आय उत्पन्न हो, लेकिन हिमाचल में विकास के नाम पर लिया गया कर्ज रोजमर्रा के खर्चों की भरपाई में झोंका जा रहा है। यही कारण है कि भारी कर्ज और बढ़े हुए करों के बावजूद कर्मचारियों को समय पर वेतन और पेंशनरों को समय पर पेंशन नहीं मिल पा रही है।
सरकार की गारंटियों की जमीनी हकीकत भी वित्तीय प्रबंधन की कमजोरी को उजागर करती है। प्रतिवर्ष एक लाख रोजगार देने का वादा बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़ों के सामने दम तोड़ता नजर आता है। महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह देने की गारंटी कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सिमट गई है। अन्य गारंटियों में लगातार शर्तें जोड़कर उनके दायरे को कम किया जा रहा है। यह सवाल अब स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस को सत्ता में आने से पहले प्रदेश की वास्तविक आर्थिक स्थिति का आकलन नहीं था, या फिर सत्ता प्राप्ति के लिए जानबूझकर ऐसे वादे किए गए जिन्हें निभाना संभव ही नहीं था।
वित्तीय संकट के बीच सरकार के फैसले विरोधाभासों से भरे रहे हैं। एक ओर जनता से त्याग की अपील की जाती है, दूसरी ओर राजनीतिक नियुक्तियां, सलाहकारों की नियुक्ति, निगमों और बोर्डों में मानदेय वृद्धि और प्रशासनिक खर्च लगातार बढ़ते रहे हैं। जिसका सीधा असर प्रदेश की वित्तीय सेहत पर पड़ना स्वाभाविक है।
आरडीजी की समाप्ति के बाद आने वाला समय हिमाचल के लिए और भी चुनौतीपूर्ण होने वाला है। ऐसे में वेतन, पेंशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सेवाओं का सुचारु संचालन सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है।
हिमाचल की वित्तीय हकीकत अब नारों और आरोप-प्रत्यारोप से परे है। आरडीजी की समाप्ति कोई अचानक आया तूफान नहीं है, बल्कि पहले से तय प्रक्रिया थी, जिसके लिए समय रहते तैयारी की जा सकती थी। लेकिन सरकार ने खर्च नियंत्रण, राजस्व बढ़ाने और पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन की बजाये अल्पकालिक राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप आज प्रदेश कर्ज, करों और अनिश्चित भविष्य के चक्रव्यूह में फंसता जा रहा है। यदि अब भी ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल के भविष्य का संकट बन जाएगा।