महामहिम राज्यपाल का अभिभाषण पर आचरण क्या संकेत है?

Created on Thursday, 19 February 2026 10:45
Written by Shail Samachar

इस समय हिमाचल सरकार के सामने राजस्व घाटा अनुदान बहाल करवाने तथा राज्यसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी को विजयी बनाने और पंचायत चुनाव में पार्टी तथा हाईकमान की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौतियां एक साथ सामने आ गयी हैं। राज्यसभा चुनाव 16 मार्च को और पंचायती चुनाव मई के अन्त तक होने हैं। क्या सरकार इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर पायेगी यह सवाल हर आदमी के सामने खड़ा है। क्योंकि पिछली बार भी कांग्रेस की सरकार होते हुये भी राज्यसभा भाजपा छीन कर ले गयी थी। भाजपा इस बार भी चुनाव लड़ेगी और जब भाजपा चुनावी मैदान में होगी तो कांग्रेस हार की आशंका से मुक्त नहीं हो सकती। पार्टी और सरकार के भीतर जो राजनीतिक परिस्थितियां पिछले चुनाव के दौरान थी वह शायद इस बार पहले से ज्यादा मुखर है। पिछली बार कांग्रेस का संगठन था परन्तु इस बार यह संगठन जिला अध्यक्षों की नियुक्तियों से अभी तक आगे नहीं बढ़ पाया है। पिछली बार कांग्रेस के नाराज लोगों ने अपनी नाराजगी हाईकमान तक पहुंचाने के लिये चिट्ठी पत्र का माध्यम चुना था। इस बार सरकार के मंत्रियों और विधायकों ने खुलेआम अफसरशाही पर निशाना साधते हुये अपरोक्ष में मुख्यमंत्री और हाईकमान दोनों को एक साथ इंगित कर दिया है। ऐसे ही वातावरण में वीरभद्र कांग्रेस के गठन की संभावनाएं भी गंभीरता से तैरना शुरू हो गई है। क्योंकि अनचाहे ही यह संदेश और संकेत खुलेआम चले गये हैं कि मुख्यमंत्री वीरभद्र समर्थकों को किनारे लगातेे चले आ रहे हैं। शिमला, सोलन, सिरमौर और मण्डी संसदीय क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले कांग्रेसियों के क्षेत्र से जितने कार्यकर्ताओं को राजनीतिक तजापोशियां दी गयी हैं उनसे अनचाहे ही कई मंत्रियों और दूसरे प्रभावी नेताओं के सामने इन नियुक्तियों के माध्यम से समानान्तर सत्ता केन्द्र स्थापित किये जा रहे हैं। वैसे भी इन ताजपोशियों में क्षेत्रीय संतुलन को लगभग नजरअन्दाज कर दिया गया है। पिछली बार राज्यसभा सीट इस कारण हारी थी क्योंकि उम्मीदवार प्रदेश से बाहर का व्यक्ति था। इस बार भी यदि पिछले ही क्रम को दोहराया गया तो पहले जैसा ही आचरण होने की संभावनाएं शायद बढ़ जायेगी। फिर पंचायत चुनाव टालने की सरकार ने हर संभव कोशिश कर ली है। सर्वाेच्च न्यायालय तक दस्तक दे दी। लेकिन अन्त में अदालत के फैसले से चुनाव करवाने की बाध्यता आ गयी। इससे भी सरकार के पक्ष में कोई सकारात्मक संदेश नहीं गया। इसी वस्तुस्थिति में राजस्व घाटा अनुदान बन्द होने का फैसला आ गया। सरकार ने 16वें वित्त आयोग के सामने जो भी पक्ष रखा उसका कोई लाभ नहीं मिला। लेकिन इसी संकट के बीच जब एपीएमसी की गाड़ी खरीद का प्रकरण सामने आ गया तो सरकार के प्रति जन सहयोग और सहमति पर स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग गये। सरकार द्वारा की गई सारी राजनीतिक ताजपोशियां चर्चा में आ गयी। क्योंकि इस आर्थिक संकट के बीच राजनीतिक ताजपोशी पाये एक भी मित्र ने अपने वेतन भत्ते त्यागने या पद छोड़ने की पेशकश नहीं की। इसी कारण सरकार की आज तक की सारी कार्यप्रणाली और फैसले जन समीक्षा का केन्द्र बन गये हैं। जिन अफसरशाहों को उनके दिल्ली से मधुर संपर्क को और रिश्तों के नाम पर सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवा विस्तार और पुनः नियुक्तियों से नवाजा गया था वह भी इस आर्थिक संकट में कोई ठोस सहायता नहीं दे पाये। इस समय कुल मिलाकर जो परिस्थितियां निर्मित हो गयी हैं उनसे जो वातावरण बन चुका है उससे राजनीतिक खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है। यह स्वभाविक है कि जो लोग सरकार की कार्य प्रणाली पर मत भिन्नता रखते हैं उन्हें अपने रोष को हवा देने का पूरा-पूरा संयोग खड़ा हो गया है। क्योंकि विधानसभा में जिस तरह से महामहिम राज्यपाल ने अपने अभिभाषण में वित्त आयोग पर आई टिप्पणियों को नहीं पढ़ा है उसका संकेत और संदेश बहुत दूरगामी है यह तय है। इस परिदृश्य में यह संभावना बहुत प्रबल हो गयी है कि इस सब का प्रतिफल सहज नहीं होगा। इसे आने वाले संकट का संकेत मानना ही होगा।