

स्त्री-पुरुष कुछ संकल्पों के बंधन में बंधते हैं। भारतीय समाज में 'विवाह' स्त्री और पुरुष के जीवन में महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी संस्कार है। विवाह की व्याख्या ऊपर उठाना, योग देना, ग्रहण करना, धारण करना आदि के अर्थ में की गई है। दांपत्य जीवन त्याग और समर्पण की भावना पर आधारित है। यह पितृ ऋण उतारने का एक साधन है।
दो व्यक्तियों के इस शारीरिक और मानसिक एकीकरण के लिए हिंदू विवाह पद्धति में बहुत सारे विधि-विधान हैं। विवाह संस्कार के मूल आधार गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र हैं। मुख्य रूप से पारस्कर और बौधायन गृह्यसूत्र के अनुसार इस अनुष्ठान को संपन्न किया जाता है।
आदर्श दांपत्य जीवन के लिए पति-पत्नी में सखा भाव अनिवार्य है। इस दृष्टि से विवाह पद्धति में उल्लेखनीय संस्कार हैं -पाणिग्रहण, सप्तपदी, हृदयालम्भन या हृदय स्पर्श, पतिगृह में वधू का स्वागत और स्थालीपाक होम।
पाणिग्रहण संस्कार से पहले कन्यादान करने की प्रथा है। उस समय कन्या का संरक्षक वर के सामने प्रतिबंध अर्थात् शर्त रखता है कि तुम धर्म, अर्थ, काम की प्राप्ति में इसका अतिक्रमण (उपेक्षा) न करना। तीन बार यह शर्त दुहराई जाती है और हर बार वर कहता है 'नहीं करूंगा।'
पाणिग्रहण के समय कन्या का दाहिना हाथ अपने हाथ में लेता हुआ वह कहता है- मैं सौभाग्य के लिए तेरा पाणिग्रहण करता हूं। तू मुझ पति के साथ दीर्घायु होना। कुछ सूत्रों में इस कर्म के बाद यह भी कहलवाया गया -मैं साम हूं, तुम ऋचा हो, मैं आकाश हूं, तुम पृथ्वी हो, आओ हम दोनों विवाह करें, बहुत से पुत्र उत्पन्न करें, हम एक दूसरे को प्रिय हों, हमारी एक दूसरे में आसक्ति हो, हमारा मन प्रसन्न रहे। हम सौ वर्ष तक जीवित रहें।
सप्तपदी का महत्व सभी स्मृतिकारों ने स्वीकार किया है। मनु के अनुसार इसके बिना विवाह पूर्ण नहीं मानाजाएगा। इसमें वर और वधू अपना - अपना दाहिना पैर एक - एक पद के साथ आगे बढ़ाते हैं। पहले वर, पीछेकन्या। जिस जगह से सीधा पैर उठाया, उसी जगह बायां पैर रखते जाते हैं।
इस प्रकार सात मंत्रों से सप्तपदचलते हैं। मंत्रों के माध्यम से वर वधू को सखी मान कर अन्न, ऊर्जा, धन, पशुओं और सभी ऋतुओं में सुख औरसातों लोकों में यश की प्राप्ति की कामना करता है। कई मंत्रों में वर विश्व के पोषक विष्णु की सहायता से धनधान्यऔर सुख की प्राप्ति की कामना करता है।
कुछ मंत्रों में कन्या द्वारा यज्ञ, दान, धन रखने, पशु खरीदने में अपनी सम्मति का अधिकार मांगा गया है।सप्तपदी के बाद हृदयालम्भन अथवा हृदय स्पर्श का विधान है। वर अपना दाहिना हाथ वधू के दायें कंधे पर से लेजाकर उसके हृदय का स्पर्श करते हुए मंत्र पाठ करता है जिसका आशय यह है कि मेरे हृदय में तुम्हारा हृदय हो,अपने मन के साथ मेरे मन को संयुक्त करो।
अनन्य चित्त होकर मेरे वचन का पालन करो, प्रजापति तुम्हें मेरेलिए नियुक्त करें अर्थात् मेरे प्रति तुम्हारी आसक्ति करें। यह मंत्र केवल शरीर - संयोग की स्थिरता का ही नहीं मन, वचन और कर्म से पति - पत्नी के हृदयों के एक होने का भी प्रतीक है।
पति गृह में प्रवेश के कुछ समय बाद पति, पत्नी को पका हुआ अन्न खिलाता है। इसे ' स्थालीपाक होम ' कहाजाता है। आजकल यही प्रथा ' प्रीतिभोज ' कहलाती है। पहला ग्रास खिलाते हुए पति का कथन पूर्ण एकीकरण काप्रतीक है - मैं अपने प्राणों से तेरे प्राणों को, अपनी अस्थियों से अस्थियों को, मांस से मांस को और त्वचा सेत्वचा को धारण करता हूं। दांपत्य में इसी एकात्म भाव की आवश्यकता होती है।
इसके अभाव में संबंधों में दरारेंआने लगती हैं। इनको पाटने के लिए किसी मैरिज काउंसिलर के पास जाने की जरूरत नहीं। सिर्फ विवाह केसमय दिए और लिए गए करारों को फिर से याद करने की दरकार होती है।