Wednesday, 30 September 2026
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डॉक्टरों के एनपीए, एडहॉक प्रमोशन और जॉब ट्रेनी नियुक्तियों पर उठे सवाल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों के ट्रांसफर और प्रमोशन को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों के ट्रांसफर और प्रमोशन के लगातार आदेश जारी हो रहे हैं। लेकिन प्रमोशन के बाद वित्तीय लाभ को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से डॉक्टरों में असमंजस बना हुआ है। उनका कहना है कि सरकार को यह साफ करना चाहिए कि प्रमोशन किस तारीख से प्रभावी होगी और उससे जुड़े आर्थिक लाभ कब से मिलेंगे। मेडिकल कॉलेजों में सहायक प्रोफेसर के पद पर की जा रही प्रमोशन को लेकर डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें प्रमोशन देकर नई जिम्मेदारी तो दी जा रही है, लेकिन व्यवस्था अभी भी एडहॉक आधार पर चल रही है। उनकी मांग है कि सहायक प्रोफेसर के पद पर प्रमोशन को नियमित किया जाए और प्रमोशन की तारीख से ही उससे जुड़े सभी वित्तीय लाभ दिये जायें।
प्रमोशन और वित्तीय लाभ को लेकर कर्मचारियों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि सरकार समय रहते नीति स्पष्ट कर दे तो ऐसे विवाद अदालत तक जाने से रोके जा सकते हैं।
डॉक्टरों की नाराजगी केवल प्रमोशन तक सीमित नहीं है। एनपीए बंद होने का मुद्दा भी लगातार उठ रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि देश के कई राज्यों में सरकारी डॉक्टरों को नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस दिया जा रहा है, जबकि हिमाचल में इसे बंद रखा गया है। सरकारी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकते, ऐसे में एनपीए उनके लिए महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ है। डॉक्टरों का कहना है कि एनपीए बंद होने से उनको आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। सरकार को इस पर स्पष्ट फैसला लेना चाहिए।
डॉक्टरों की जॉब ट्रेनी के नाम पर की जा रही नियुक्तियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि मेडिकल की पढ़ाई और प्रशिक्षण में कई साल लगते हैं। इसके बाद डॉक्टरों को नियमित सेवा देने के बजाये जॉब ट्रेनी के नाम पर नियुक्त करना उनके पेशे के साथ उचित नहीं है।
हालांकि हिमाचल सरकार ने अगस्त माह में जॉब ट्रेनी मेडिकल ऑफिसर ;स्पेशलिस्टद्ध का मासिक वेतन 33,660 से बढ़ाकर 60 हजार रुपये कर दिया है। पीजी डॉक्टरों, सीनियर रेजिडेंट और सुपर स्पेशलिस्ट के स्टाइपेंड में भी बढ़ोतरी की है। फिर भी डॉक्टरों का तर्क है कि स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विभाग में डॉक्टरों को स्पष्ट सेवा शर्तों और नौकरी की सुरक्षा के साथ नियुक्त किया जाना चाहिए। ट्रेनी के नाम पर लंबे समय तक अस्थायी व्यवस्था रखना डॉक्टरों के मनोबल पर असर डाल सकता है।
स्वास्थ्य विभाग पहले ही डॉक्टरों की कमी और दूरदराज के अस्पतालों में विशेषज्ञ सेवाएं उपलब्ध कराने की चुनौती से जूझ रहा है। ऐसे में डॉक्टरों के बीच प्रमोशन, वेतन लाभ, एनपीए और नियुक्ति व्यवस्था को लेकर बढ़ता असंतोष सरकार के लिए चिंता का विषय है।
सरकार को अब इन सभी मामलों पर स्पष्ट नीति बनानी होगी। प्रमोशन सिर्फ कागज पर नहीं होनी चाहिए। उसके साथ पद के अनुसार वित्तीय लाभ भी मिलना चाहिए। एनपीए पर फैसला होना चाहिए और जॉब ट्रेनी के नाम पर नियुक्तियों की व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए। अगर स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना है तो डॉक्टरों का मनोबल भी मजबूत करना होगा।

शिमला जिला परिषद हार से कांग्रेस में खलबली

  • दिल्ली में मंत्रियों की सक्रियता के बीच हाईकमान के सामने बढ़े सवाल
शिमला/शैल। शिमला जिला परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर भाजपा की जीत ने कांग्रेस के लिये बड़ा राजनीतिक झटका दिया है। 25 सदस्यीय जिला परिषद में भाजपा समर्थित 11, कांग्रेस समर्थित 10 और चार निर्दलीय सदस्य थे। इसके बावजूद भाजपा अपने उम्मीदवारों को दोनों प्रमुख पदों पर बैठाने में सफल रही। करीब 26 साल बाद जिला परिषद की कमान कांग्रेस के हाथ से निकलना शिमला में पार्टी के संगठनात्मक प्रभाव के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है।
इस हार की अहमियत इसलिये बढ़ जाती है क्योंकि शिमला जिले से कांग्रेस के चार विधायक और सरकार में तीन मंत्री हैं। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू भी चुनावी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए थे। इसके बावजूद पार्टी अपने समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा सकी। भाजपा की रणनीति में राज्यसभा सांसद हर्ष महाजन और सांसद डॉ. सिकंदर कुमार की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
चुनाव लंबे समय से लंबित था और इसके लिए कांग्रेस के पास तैयारी का पर्याप्त समय था। ऐसे में परिणाम ने पार्टी के भीतर संगठनात्मक तालमेल और स्थानीय स्तर पर प्रभावी रणनीति को लेकर सवाल खड़े कर दिये हैं। भाजपा ने सीमित संख्या होने के बावजूद निर्दलीय सदस्यों का समर्थन जुटाकर बाजी पलट दी।
इसी बीच पिछले दिनों दिल्ली में मंत्रियों की सक्रियता ने प्रदेश कांग्रेस के भीतर चल रही चर्चाओं को और हवा दी। कई मंत्रियों के हाईकमान के नेताओं से मिलने और प्रदेश के राजनीतिक तथा सरकारी कामकाज से जुड़े मुद्दे रखने की खबरें सामने आयी है। हालांकि इन बैठकों के बाद किसी बड़े फैसले की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन मंत्रियों का दिल्ली जाकर अपनी बात रखना पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को सामने जरूर लाता है।
शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर की सीबीएसई स्कूलों को लेकर सामने आई राय भी इसी संदर्भ में चर्चा में है। उन्होंने पुराने सरकारी स्कूलों को मजबूत करने को प्राथमिकता दिए जाने की बात कही, हालांकि साथ ही मुख्यमंत्री के फैसलों का सम्मान करने की बात भी स्पष्ट की। इससे सरकार के भीतर नीतिगत फैसलों पर अलग-अलग राय होने की तस्वीर सामने आयी है।
दूसरी ओर सरकार के कामकाज को लेकर विभिन्न संगठनों के आंदोलन भी लगातार सामने आ रहे हैं। पिछले दिनों विधानसभा सत्र के दौरान टैक्सी ऑपरेटरों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों और अन्य वर्गों की ओर से अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किये गये हैं। सुधीर शर्मा और राजेंद्र राणा भी कुछ मुद्दों को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर हैं।
कांग्रेस के लिए अब सबसे बड़ा सवाल अगले विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को संभालने का है। सत्ता में होने के बावजूद शिमला जैसे महत्वपूर्ण जिले में जिला परिषद के शीर्ष पद गंवाना पार्टी के लिए सामान्य स्थानीय राजनीतिक घटनाक्रम मानकर टालना आसान नहीं होगा। खासकर तब, जब अगले विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है।
शिमला जिला परिषद का परिणाम कांग्रेस के लिए एक साफ राजनीतिक संदेश है कि सत्ता का प्रभाव तभी चुनावी ताकत में बदलता है, जब संगठन की पकड़ जमीन पर भी दिखाई दे। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि हाईकमान दिल्ली में मिले फीडबैक और शिमला के इस परिणाम को किस गंभीरता से लेता है तथा प्रदेश संगठन और सरकार के बीच बढ़ती खाई को पाटने के लिए क्या कदम उठाता है।

कैग के कटघरे में सुक्खू सरकार का वित्तीय मॉडल

  • कर्ज लेकर कर्ज चुकाने की नौबत, 81% राजस्व वेतन-पेंशन-ब्याज में खर्च
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति को लेकर कैग की 2024-25 की रिपोर्ट ने सुक्खू सरकार के सामने बड़ा वित्तीय और राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था 9.20 प्रतिशत की दर से बढ़ी, लेकिन राज्य की अपनी आय उस रफ्तार से नहीं बढ़ सकी। टैक्स और गैर-टैक्स राजस्व बजट अनुमानों से पीछे रहे। दूसरी ओर वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे प्रतिबद्ध खर्चों का दबाव इतना बढ़ गया कि राजस्व प्राप्तियों का करीब 81 प्रतिशत इन्हीं मदों में चला गया। विकास और कल्याण के लिए करीब 19 प्रतिशत ही उपलब्ध रहा।
कैग की रिपोर्ट ने सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल कर्ज के इस्तेमाल को लेकर खड़ा किया है। वर्ष 2024-25 में प्रदेश का राजस्व घाटा 6,805 करोड़ रुपये और राजकोषीय घाटा 12,611 करोड़ रुपये रहा। राजकोषीय घाटा सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 5.44 प्रतिशत रहा है। रिपोर्ट के अनुसार घाटे की भरपाई के लिए लिया जा रहा कर्ज बड़े स्तर पर पुराने कर्ज को चुकाने में इस्तेमाल हो रहा है। यानी नई उधारी से पुरानी देनदारी का भुगतान एक ऐसी स्थिति बन गयी है जिससे नई परिसंपत्तियां बनाने की क्षमता कमजोर होती जा रही है। कैग ने इसे कर्ज के जाल की स्थिति पैदा करने वाला बताया है।
यही वह बिंदु है जो सरकार की वित्तीय नीति को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला सकता है। यदि उधार का पैसा सड़क, पुल, सिंचाई, बिजली, उद्योग या ऐसी अन्य उत्पादक परिसंपत्तियां बनाने में लगे, जो भविष्य में राज्य के लिए आय पैदा करें, तो कर्ज का आर्थिक औचित्य समझ में आता है। लेकिन पुराने कर्ज की अदायगी के लिए लगातार नई उधारी की जरूरत बढ़ती जाए तो राज्य की वित्तीय गुंजाइश लगातार सिकुड़ती जाती है। कैग ने स्पष्ट तौर पर नए कर्ज को उत्पादक पूंजीगत खर्च तक सीमित करने की सलाह दी है।
प्रदेश की देनदारियों का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) की तुलना में बढ़ता अनुपात भी चिंता का विषय है। कैग के मुताबिक यह (FRBM Act)एफआरबीएम एक्ट के निर्धारित लक्ष्यों से ऊपर है और देनदारियां आर्थिक वृद्धि से तेज गति से बढ़ रही हैं। रिपोर्ट ने प्रदेश की वित्तीय स्थिति में संरचनात्मक कमजोरी की ओर इशारा करते हुए कहा है कि राज्य दिन-प्रतिदिन के खर्चों को पूरा करने के लिए भी उधारी के चक्र में फंस रहा है।
सरकार के खर्च की प्राथमिकता पर भी रिपोर्ट सवाल खड़े करती है। प्रदेश का 2024-25 का कुल बजट 79,475.53 करोड़ रुपये था, लेकिन वास्तविक खर्च 75,325.02 करोड़ रुपये हुआ। उपयोग 94.78 प्रतिशत रहा। कैग ने बड़े स्तर पर बचत को कमजोर बजट योजना और क्रियान्वयन से जोड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पूंजीगत खर्च में करीब एक-तिहाई तक विचलन दर्ज हुआ है। ऐसे समय में जब प्रदेश को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने के लिए पूंजीगत निवेश की जरूरत है, बजट राशि का समय पर और प्रभावी इस्तेमाल न होना सरकार की कार्ययोजना पर सवाल खड़ा करता है।
वित्तीय अनुशासन की तस्वीर भी सरकार के लिए राहत देने वाली नहीं है। कैग के मुताबिक नौ अनुदानों से जुड़े 16 मामलों में 438.66 करोड़ रुपये बिना बजट प्रावधान के खर्च किए गए। सात अनुदानों और चार विनियोगों में विधानसभा द्वारा अधिकृत राशि से 3,102.88 करोड़ रुपये ज्यादा खर्च किए गए। 13 मामलों में 1,575.44 करोड़ रुपये के अनुपूरक प्रावधान अनावश्यक साबित हुए। वहीं 14 योजनाओं में 673.11 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान होने के बावजूद कोई खर्च नहीं हुआ। यानी एक तरफ बिना प्रावधान के खर्च, दूसरी तरफ स्वीकृत बजट खर्च न कर पाना-दोनों स्थितियां वित्तीय प्रबंधन पर सवाल उठाती हैं।
सरकारी निवेश का रिटर्न भी चिंता बढ़ाता है। राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों और अन्य संस्थाओं में 6,239 करोड़ रुपये लगाए गए, लेकिन इसके मुकाबले केवल 191 करोड़ रुपये का रिटर्न मिला। लाभार्थियों को दिए गए कर्ज की वसूली भी नगण्य रही। कैग ने सार्वजनिक उपक्रमों और स्वायत्त संस्थाओं के प्रदर्शन की समयबद्ध समीक्षा तथा घाटे में चल रही संस्थाओं के पुनर्गठन की जरूरत बताई है।
वित्तीय पारदर्शिता को लेकर भी रिपोर्ट में गंभीर कमियां दर्ज हैं। विभागों द्वारा एकत्र उपकर समय पर सरकारी खाते में जमा न करना, सरकारी धन को ट्रेजरी के बाहर बैंक खातों में रखना, उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित रहना और खातों का समय पर मिलान न होना वित्तीय नियंत्रण की कमजोरी दिखाता है। कैग के अनुसार ऐसी कमियां राज्य की वित्तीय स्थिति की वास्तविक तस्वीर को प्रभावित कर सकती हैं।
अब सरकार के सामने राजनीतिक सवाल यह नहीं है कि कैग ने क्या कहा, बल्कि यह है कि सरकार इन आपत्तियों पर करेगी क्या। कैग ने राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा कम करने के लिए समयबद्ध रोडमैप, पूंजीगत खर्च बढ़ाने, गैर-उत्पादक राजस्व खर्च घटाने, राज्य की अपनी आय बढ़ाने और नए कर्ज को उत्पादक परिसंपत्तियों तक सीमित करने की सिफारिश की है।
आने वाले समय में विपक्ष के लिए यह रिपोर्ट सरकार को घेरने का बड़ा आधार बन सकती है। सवाल सीधे हैं जब 81 प्रतिशत राजस्व प्रतिबद्ध खर्च में जा रहा है, तो विकास के लिए पैसा कहां से आएगा? जब नए कर्ज का इस्तेमाल पुराने कर्ज चुकाने में हो रहा है, तो कर्ज का बोझ कब घटेगा? जब करोड़ों रुपये का बजट होने के बावजूद योजनाओं में खर्च नहीं हुआ, तो जवाबदेही किसकी तय होगी?
कैग की रिपोर्ट ने हिमाचल की वित्तीय चुनौती का चेहरा साफ कर दिया है। राज्य की समस्या केवल कर्ज का बढ़ना नहीं है समस्या यह भी है कि कर्ज के बावजूद पर्याप्त उत्पादक परिसंपत्तियां और राजस्व पैदा नहीं हो रहा। यदि इस चक्र को नहीं तोड़ा गया तो आने वाले वर्षों में वेतन, पेंशन और ब्याज के बाद विकास के लिए बचने वाली वित्तीय गुंजाइश और सीमित हो सकती है। अब सरकार को राजनीतिक सफाई से ज्यादा कर्ज, घाटे और खर्च की प्राथमिकताओं पर ठोस जवाब देना होगा।

कैग की रिपोर्ट में वित्तीय निगरानी पर भी उठे सवाल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में सरकारी पैसे के इस्तेमाल को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। कैग की 2024-25 की रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च 2025 तक सरकार से मिली 3,324.53 करोड़ रुपये की राशि के कुल 2,521 उपयोग प्रमाणपत्र (Utilisation Certificate) लंबित है।
सरल शब्दों में कहें तो सरकार ने अलग-अलग संस्थाओं और विभागों को काम के लिए पैसा दिया, लेकिन उसका कितना पैसा और किस काम पर खर्च हुआ, इसका प्रमाण समय पर सरकार को नहीं दिया गया। उपयोगिता प्रमाणपत्र यह बताता है कि सरकार से मिला पैसा जिस काम के लिये दिया गया था, उसी काम पर खर्च हुआ या नहीं। इसलिए इतने बड़े स्तर पर यूसी लंबित होना सरकारी धन की निगरानी और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।
हिमाचल प्रदेश वित्तीय नियम-2009 के Rule 157 के अनुसार अनुदान मिलने के बाद उसे तीन महीने के भीतर खर्च करना होता है। पैसा खर्च होने के बाद उसका ऑडिट किया हुआ उपयोग प्रमाणपत्र छह महीने के भीतर सरकार को देना होता है। साथ ही अगली किस्त जारी होने से पहले भी पिछली राशि का यूसी देना जरूरी है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में यूसी वर्षों से लंबित हैं। CAG ने चेताया है कि यूसी जमा नहीं होने पर यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि सरकारी पैसा वास्तव में सही जगह और तय काम पर खर्च हुआ या नहीं।
रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में 19,522 यूसी 5,092.21 करोड़ रुपये की राशि के लिए जमा होने थे। इसके अलावा वर्ष की शुरुआत में 2,990 यूसी 2,795.23 करोड़ रुपये के पहले से लंबित थे। साल के दौरान 19,991 यूसी का निपटारा किया गया, लेकिन इसके बाद भी 2,521 यूसी 3,324.53 करोड़ रुपये के लंबित रह गये। सबसे ज्यादा लंबित यूसी पांच विभागों से जुड़े हैं। शहरी विकास, ग्रामीण विकास, पंचायती राज, आयुष और श्रम एवं रोजगार विभागों में कुल 2,915.63 करोड़ रुपये के यूसी लंबित हैं। यह कुल लंबित राशि का करीब 88 प्रतिशत है। कई मामलों में एक से अधिक वित्तीय वर्षों से उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित हैं।
शहरी विकास विभाग की स्थिति सबसे खराब है। यहां 254 यूसी से जुड़े 1,227.03 करोड़ रुपये का हिसाब लंबित है। इसका मतलब है कि हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद संबंधित विभागों या संस्थाओं की ओर से यह प्रमाणित नहीं किया गया है कि राशि का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के लिए किया गया है। कैग ने ऐसी स्थिति को वित्तीय नियंत्रण के लिहाज से गंभीर माना है। कैग ने कहा है कि विभागों को सरकारी पैसे के इस्तेमाल की निगरानी मजबूत करनी होगी और समय पर यूसी लेना सुनिश्चित करना होगा। जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करने की जरूरत है। वित्त विभाग ने भी इस समस्या को गंभीर माना है और लंबित यूसी जल्द लेने के लिए कदम उठाने की बात कही है।
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि हिमाचल प्रदेश पहले ही वित्तीय दबाव से गुजर रहा है। राज्य का राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा बढ़ा हुआ है तथा राजस्व का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे खर्चों में चला जाता है। ऐसे में सरकार के पास उपलब्ध प्रत्येक रुपये के इस्तेमाल और उसके हिसाब की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है।
सरकार ने दिसंबर 2024 में उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा करने की व्यवस्था में बदलाव भी किया था। नई व्यवस्था के तहत अनुदान प्राप्त करने वाले संस्थानों को राशि के इस्तेमाल के छह महीने के भीतर ऑडिटेड यूसी देना है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में पुराने प्रमाणपत्र लंबित रहना व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
अब सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2,521 लंबित यूसी से जुड़े 3,324 करोड़ रुपये का पूरा हिसाब कब सामने आएगा। किन योजनाओं में पैसा खर्च हुआ, किस एजेंसी ने खर्च किया और उसका प्रमाण क्यों लंबित रहा है इन सवालों का जवाब सरकार को देना होगा।
कैग की रिपोर्ट का संदेश साफ है कि केवल बजट जारी करना और पैसा खर्च दिखाना पर्याप्त नहीं है। सरकारी धन का सही इस्तेमाल और उसका समय पर प्रमाणित होना भी उतना ही जरूरी है। हिमाचल जैसे वित्तीय दबाव वाले राज्य में हजारों करोड़ रुपये से जुड़े यूसी लंबित रहना सरकार की वित्तीय निगरानी व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है।

हिमाचल में 26 वर्ष बाद लॉटरी की वापसी पर सियासी टकराव तेज

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में करीब 26 वर्ष बाद लॉटरी व्यवस्था दोबारा शुरू करने को लेकर भाजपा ने कांग्रेस सरकार पर हमला तेज कर दिया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू को पत्र लिखकर वित्त विभाग की ओर से जारी लॉटरी टेंडर तत्काल वापस लेने की मांग की है। वहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस सरकार चंद करोड़ रुपये के राजस्व के लिए प्रदेश के युवाओं और परिवारों के भविष्य को जुए की मानसिकता की ओर धकेल रही है।
अनुराग ठाकुर ने 26 अगस्त को मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में वित्त विभाग के ई-टेंडर का हवाला देते हुए कहा कि ऑनलाइन और ऑफलाइन लॉटरी व्यवस्था के लिए बिक्री एजेंट नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। उन्होंने सरकार से इस पूरी प्रक्रिया को तत्काल निरस्त करने की मांग की। उन्होने कहा कि लॉटरी हिमाचल की वित्तीय समस्या का समाधान नहीं हो सकती और सरकार को राजस्व बढ़ाने के लिए स्थायी वित्तीय सुधारों पर ध्यान देना चाहिए।
अनुराग ठाकुर ने कहा कि हिमाचल में लॉटरी पर प्रतिबंध किसी एक राजनीतिक दल की नीति नहीं रही, बल्कि इस मुद्दे पर लंबे समय तक दलगत सहमति बनी रही। उन्होंने कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की सरकार ने 1999 में लॉटरी पर प्रतिबंध लगाया था। इसके बाद जब लॉटरी दोबारा शुरू हुई तो तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 2007 में इसे फिर बंद किया। बाद की सरकारों ने भी इस व्यवस्था को दोबारा लागू नहीं किया।
भाजपा सांसद ने दावा किया कि लॉटरी के कारण हिमाचल में कर्मचारियों, पेंशनरों, मजदूरों और युवाओं की आय तथा बचत प्रभावित हुई थी और कई परिवार आर्थिक संकट में पहुंचे। आज भी इसका सबसे अधिक प्रभाव निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों पर पड़ने की आशंका है।
अनुराग ठाकुर ने राज्य की वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि 2026 में हिमाचल का कर्ज 1,10,010 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है और ऋण-जीडीपी अनुपात 42 प्रतिशत से अधिक है। उनके अनुसार प्रस्तावित लॉटरी से सालाना करीब 100 करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है, जो राज्य की वित्तीय चुनौतियों के मुकाबले बेहद सीमित राशि है।
उन्होंने सरकार को जीएसटी अनुपालन मजबूत करने और डिजिटल एकीकरण बढ़ाने का सुझाव देते हुए दावा किया कि इन उपायों से सालाना 250 से 350 करोड़ रुपये तक अतिरिक्त राजस्व जुटाया जा सकता है। उनका कहना है कि इससे लॉटरी के सामाजिक दुष्परिणामों के बिना राज्य की आय बढ़ाई जा सकती है।
इस बीच डॉ. राजीव बिंदल ने कांग्रेस सरकार पर और तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार युवाओं को जुए की लत की ओर धकेलने की तैयारी कर रही है। बिंदल ने कहा कि हिमाचल जैसे शिक्षित और मेहनतकश प्रदेश में युवाओं के सामने रोजगार और अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है, न कि उन्हें आसान पैसे और जुए की मानसिकता की ओर ले जाने की। उन्होंने सरकार से लॉटरी का फैसला तत्काल वापस लेने की मांग की और चेतावनी दी कि भाजपा इसे जनता के बीच बड़ा मुद्दा बनाएगी।

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