Tuesday, 04 August 2026
Blue Red Green

ShareThis for Joomla!

CM की पत्नी के चुनावी प्रतिद्वंद्वी पर FIR से देहरा की सियासत से सत्ता के गलियारों तक बढ़ा राजनीतिक तापमान

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर देहरा विधानसभा क्षेत्र चर्चा के केंद्र में है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू की पत्नी और देहरा से कांग्रेस विधायक कमलेश ठाकुर के खिलाफ 2024 के उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी रहे तथा दो बार निर्दलीय विधायक चुने गए होशियार सिंह चंब्याल के खिलाफ राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने भारतीय दंड संहिता की धारा 409 और 420 के तहत एफआईआर दर्ज की है। मामला विधायक ऐच्छिक निधि के कथित दुरुपयोग से जुड़ा है।
एफआईआर दर्ज होते ही यह मामला कानूनी दायरे से निकलकर राजनीतिक बहस का विषय बन गया है, क्योंकि होशियार सिंह वही नेता हैं जिन्होंने पहले निर्दलीय रहते हुए भाजपा का समर्थन किया, राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ मतदान किया और बाद में भाजपा के टिकट पर मुख्यमंत्री की पत्नी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा।
विजिलेंस ब्यूरो के अनुसार शिकायत होशियार सिंह की एक कंपनी के कर्मचारियों की ओर से की गई थी, जो कथित लाभार्थियों में भी शामिल बताए गए हैं। प्रारंभिक जांच में बैंक रिकॉर्ड, सरकारी दस्तावेज और लाभार्थियों के बयान दर्ज किए गए। जांच में यह सामने आने का दावा किया गया कि वर्ष 2023 और 2024 के दौरान विधायक ऐच्छिक निधि से कुछ लोगों के नाम पर आर्थिक सहायता स्वीकृत हुई, जबकि संबंधित व्यक्तियों ने कथित रूप से कभी आवेदन ही नहीं किया था।
जांच एजेंसी का दावा है कि लाभार्थियों ने बयान में कहा कि उनके खातों में राशि आने के बाद उसे नकद निकालकर पूर्व विधायक के निर्देश पर उन्हें वापस सौंप दिया गया। इन्हीं तथ्यों के आधार पर सरकारी धन के कथित दुरुपयोग, आपराधिक न्यासभंग और धोखाधड़ी के प्रथम दृष्टया साक्ष्य मिलने की बात कहते हुए एफआईआर दर्ज की गई है। ब्यूरो ने यह भी स्पष्ट किया है कि जांच के दौरान यदि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम या अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत किसी और अपराध के संकेत मिलते हैं तो उनकी भी जांच की जाएगी।
हालांकि अभी तक यह केवल एफआईआर का चरण है और आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया तथा जांच पूरी होने के बाद ही होगी। होशियार सिंह की ओर से इस मामले में विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है।
लेकिन इस कारवाई की राजनीतिक टाइमिंग ने विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का अवसर भी दे दिया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि विजिलेंस और गृह विभाग दोनों मुख्यमंत्री के पास हैं, इसलिए निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे। वहीं सरकार और विजिलेंस का कहना है कि शिकायत मिलने के बाद दस्तावेजी जांच के आधार पर कारवाई की गई है और कानून सभी के लिए समान है।
होशियार सिंह पिछले एक दशक से देहरा की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे हैं। वर्ष 2017 और 2022 में उन्होंने निर्दलीय चुनाव जीतकर अपनी मजबूत पकड़ साबित की। राजनीतिक गलियारों में उन्हें भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के करीबी नेताओं में माना जाता रहा। 2024 के राज्यसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा उम्मीदवार हर्ष महाजन के पक्ष में मतदान किया था। उसी चुनाव में कांग्रेस के छह विधायकों ने भी क्रॉस वोटिंग की थी, जिसके बाद सभी छह कांग्रेस विधायक और तीनों निर्दलीय विधायक अयोग्य घोषित कर दिए गए थे।
इसके बाद हुए उपचुनाव में भाजपा ने होशियार सिंह को आधिकारिक उम्मीदवार बनाया। उनके सामने मुख्यमंत्री सुक्खू की पत्नी कमलेश ठाकुर थीं। इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले में कमलेश ठाकुर को 32,737 वोट मिले जबकि होशियार सिंह को 28,823 वोट प्राप्त हुए और वे लगभग 3,900 मतों के अंतर से चुनाव हार गए। चुनाव के दौरान होशियार सिंह और भाजपा ने कांग्रेस सरकार पर सरकारी मशीनरी और महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से चुनाव प्रभावित करने जैसे आरोप लगाए थे, जिन्हें कांग्रेस ने खारिज किया था।
अब लगभग दो वर्ष बाद उन्हीं होशियार सिंह के खिलाफ विजिलेंस की एफआईआर ने राजनीतिक माहौल को फिर गर्म कर दिया है। भाजपा इसे राजनीतिक प्रतिशोध का मुद्दा बना सकती है, जबकि कांग्रेस इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कारवाई के रूप में पेश कर सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रहेगा। इसके असर भाजपा के भीतर जयराम ठाकुर और प्रेम कुमार धूमल समर्थक माने जाने वाले नेताओं की रणनीति पर भी पड़ सकते हैं। होशियार सिंह लंबे समय तक जयराम खेमे के करीबी माने जाते रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री सुक्खू और पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के व्यक्तिगत संबंधों की चर्चा भी समय-समय पर होती रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस मुद्दे पर किस तरह की राजनीतिक रणनीति अपनाती है और पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस मामले को किस स्वर में उठाता है।
फिलहाल इतना तय है कि देहरा की चुनावी प्रतिद्वंद्विता अब अदालत, जांच एजेंसियों और राजनीतिक मंचों तक पहुंच चुकी है। आने वाले दिनों में जांच की दिशा, होशियार सिंह का पक्ष और भाजपा की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम की राजनीतिक तस्वीर को और स्पष्ट करेंगे।

कांग्रेस सरकार के साढ़े तीन साल के कार्यकाल की बनेगी चार्जशीटःबिंदल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार के साढ़े तीन वर्ष पूरे होने पर भाजपा ने सरकार के खिलाफ बड़ा राजनीतिक अभियान छेड़ने का ऐलान किया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने कहा कि पार्टी सरकार के कार्यकाल की विस्तृत चार्जशीट तैयार कर गांव-गांव और शहर-शहर जनता के बीच जाएगी। इस चार्जशीट में चुनावी गारंटियों, अधूरे वादों, आर्थिक स्थिति, कानून- व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास कार्यों से जुड़े मुद्दों को शामिल किया जाएगा।
डॉ. बिंदल ने आरोप लगाया कि विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने महिलाओं, युवाओं, किसानों, बागवानों, कर्मचारियों और बेरोजगारों से कई बड़े वादे किए थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद अधिकांश गारंटियां अधूरी रह गईं। उन्होंने कहा कि अब जनता सरकार से जवाब मांग रही है और भाजपा इन सवालों को जन-जन तक पहुंचाएगी।
उन्होंने कहा कि भाजपा की चार्जशीट में महिलाओं को आर्थिक सहायता, युवाओं को रोजगार, किसानों और बागवानों से जुड़े वादे, कर्मचारियों को दिए गए आश्वासन, प्रदेश की आर्थिक स्थिति, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार के आरोप और विकास कार्यों की रफ्तार जैसे सभी प्रमुख मुद्दों को तथ्यात्मक रूप से शामिल किया जाएगा।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार ने विकास को गति देने के बजाय जनता पर करों और विभिन्न शुल्कों का बोझ बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि कई विकास परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं और प्रदेश में आर्थिक अनिश्चितता का माहौल बना है। पार्टी इन सभी मुद्दों को प्रमाण सहित जनता के सामने रखेगी।
डॉ. बिंदल ने बताया कि चार्जशीट को केवल एक राजनीतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि सरकार की कथनी और करनी का लेखा-जोखा बनाकर प्रदेशभर में जनसंपर्क अभियान चलाया जाएगा। भाजपा कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को सरकार के प्रदर्शन और चुनावी वादों की वास्तविक स्थिति से अवगत कराएंगे।

हर मॉनसून से पहले तैयारी के दावे क्या इस बार बदलेगा सिस्टम?

शिमला/शैल। मॉनसून शुरू होने से पहले लोक निर्माण विभाग ने एक बार फिर बड़े स्तर पर तैयारियों का दावा किया है। लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह के अनुसार प्रदेश में भारी बारिश और भूस्खलन से निपटने के लिए करीब 15,365 कर्मचारी जिसमें 11,137 बेलदार और 4,228 मल्टी टास्क वर्कर तथा 1,156 मशीनें तैनात की गई हैं। छह बेली ब्रिज भी तैयार रखे गए हैं और संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी के निर्देश दिए गए हैं।
सरकार का कहना है कि बारिश से पहले 155.95 किलोमीटर सड़कों पर नई परत, 924.94 किलोमीटर पैचवर्क, 8,893 किलोमीटर ड्रेनेज की सफाई और 9,414 किलोमीटर कलवर्ट की सफाई पूरी कर ली गई है। अधिकारियों को 24×7 कंट्रोल रूम, अतिरिक्त निजी मशीनों की व्यवस्था और अस्पतालों, स्कूलों तथा अन्य जरूरी संस्थानों तक संपर्क बनाए रखने के निर्देश भी दिए गए हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि हर साल मॉनसून से पहले ऐसी व्यापक तैयारियां होती हैं, तो पहली ही भारी बारिश में सैकड़ों सड़कें बंद क्यों हो जाती हैं?
पिछले तीन वर्षों में प्रदेश ने बार-बार देखा है कि बारिश शुरू होते ही कई राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग घंटों या कई बार दिनों तक बंद रहते हैं। दूरदराज के गांवों का संपर्क टूट जाता है, मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते, पर्यटक फंस जाते हैं और स्थानीय लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल मशीनों और कर्मचारियों की संख्या की नहीं, बल्कि संवेदनशील स्थानों की वैज्ञानिक पहचान, ढलानों के स्थायी उपचार, जल निकासी व्यवस्था और समय पर रखरखाव की भी है। कई स्थानों पर हर साल एक ही जगह भूस्खलन होता है, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या स्थायी समाधान पर पर्याप्त काम हो रहा है।
सरकार ने इस बार अधिकारियों को भू-स्खलन संभावित क्षेत्रों की सूची तैयार करने, ड्रेनेज की नियमित सफाई, महत्वपूर्ण संस्थानों तक सड़क संपर्क बनाए रखने और नुकसान का तत्काल आकलन करने के निर्देश दिए हैं। अब इन निर्देशों की असली परीक्षा मॉनसून के दौरान होगी।
प्रदेश के लोग इस बार केवल तैयारियों के दावे नहीं, बल्कि यह देखना चाहेंगे कि क्या 15 हजार से अधिक कर्मचारियों और 1,156 मशीनों की तैनाती वास्तव में सड़कों को खुला रखने, राहत कार्यों को तेज करने और जनजीवन को सामान्य बनाए रखने में सफल होती है या फिर हर साल की तरह पहली तेज बारिश के साथ व्यवस्था की पोल खुल जाएगी।

क्या युवाओं के मुद्दों पर भाजपा को घेरकर 2027 की सियासी पटकथा लिख रही है कांग्रेस?

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने यूथ कांग्रेस के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान की शुरुआत के दौरान जिस तरह NEET पेपर लीक, अग्निवीर योजना, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और शिक्षा सुधार को एक ही मंच से जोड़ा, उससे यह संकेत मिला कि कांग्रेस अब भाजपा के खिलाफ सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार ‘युवाओं का भविष्य’ बनाने की तैयारी में है। यह महज एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के खिलाफ राजनीतिक अभियान का उद्घोष था।
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार के कार्यकाल में हुए छम्म्ज् पेपर लीक ने लाखों विद्यार्थियों के सपनों को चकनाचूर कर दिया। उनका कहना था कि जब देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो जाएं तो यह केवल परीक्षा प्रणाली की विफलता नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न है। यह मुद्दा कांग्रेस के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि NEET विवाद ने राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं के बीच असंतोष पैदा किया था और विपक्ष लगातार इसे केंद्र सरकार की प्रशासनिक विफलता के रूप में पेश करता रहा है।
लेकिन मुख्यमंत्री का हमला केवल NEET तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अग्निवीर योजना को हिमाचल के युवाओं के साथ ‘अन्याय’ करार देते हुए कहा कि प्रदेश के हजारों युवाओं का सपना सेना में नियमित भर्ती का होता था, जिसे चार वर्ष की सेवा वाली नई व्यवस्था ने प्रभावित किया है। हिमाचल की सामाजिक और आर्थिक संरचना में सेना का विशेष स्थान रहा है। लगभग हर जिले से बड़ी संख्या में युवा सशस्त्र बलों में भर्ती होते रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस इस मुद्दे को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर भुनाने की कोशिश कर रही है।
दिलचस्प यह भी है कि कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर हमला करते हुए हिमाचल में पूर्व भाजपा सरकार के दौरान हुए पुलिस भर्ती और अधीनस्थ चयन आयोग के पेपर लीक मामलों को भी याद दिलाया। मुख्यमंत्री ने दावा किया कि उनकी सरकार ने राज्य चयन आयोग का गठन कर भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया है और नियमित भर्तियों को मेरिट के आधार पर आगे बढ़ाया है। कांग्रेस का प्रयास यह संदेश देने का है कि जहां भाजपा के शासनकाल में भर्ती परीक्षाएं विवादों में रहीं, वहीं वर्तमान सरकार व्यवस्था सुधार का दावा कर रही है। हालांकि भाजपा इन दावों को राजनीतिक प्रचार बताती रही है और कहती है कि रोजगार के मोर्चे पर कांग्रेस अपने चुनावी वादों को पूरा करने में विफल रही है।
मुख्यमंत्री ने शिक्षा क्षेत्र में हिमाचल को देश का नंबर एक राज्य बनाने का लक्ष्य भी दोहराया। उन्होंने कहा कि सरकार आधुनिक सुविधाओं वाले सीबीएसई स्कूल स्थापित कर रही है, शिक्षकों की नियुक्तियां की जा रही हैं और शिक्षा की गुणवत्ता में प्रदेश की रैंकिंग में सुधार हुआ है। यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य में स्कूलों के युक्तिकरण, शिक्षकों की कमी और कई सरकारी स्कूलों के विलय या बंद होने को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेरता रहा है। इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में किए गए दावे भी आने वाले समय में राजनीतिक बहस का विषय बनने तय हैं।
युवाओं के साथ-साथ मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य, प्राकृतिक खेती, सामाजिक सुरक्षा और शिक्षा ऋण जैसी योजनाओं का उल्लेख कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि राज्य सरकार केवल राजनीतिक आरोप नहीं लगा रही, बल्कि समानांतर रूप से विकास और कल्याणकारी योजनाओं पर भी काम कर रही है। लेकिन भाषण का सबसे राजनीतिक हिस्सा वह था, जब उन्होंने भाजपा पर पुरानी पेंशन योजना का विरोध करने, राज्य के अधिकारों की अनदेखी करने और 2027 में सत्ता परिवर्तन की बात कही। इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस अब राष्ट्रीय मुद्दों और राज्य सरकार की योजनाओं को जोड़कर संयुक्त चुनावी नैरेटिव तैयार कर रही है।
यूथ कांग्रेस के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान की घोषणा भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। संगठन ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में धरना-प्रदर्शन कर छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को उठाने की घोषणा की है। इसका सीधा अर्थ है कि आने वाले दिनों में NEET, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, अग्निवीर और शिक्षा जैसे विषय प्रदेश की राजनीतिक बहस के केंद्र में रहेंगे। कांग्रेस की कोशिश है कि इन मुद्दों के जरिए वह पहली बार वोट डालने वाले युवाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों अभ्यर्थियों तक सीधी पहुंच बनाए।
दूसरी ओर भाजपा का तर्क अलग है। भाजपा का कहना है कि NEET मामले में जांच एजेंसियों ने कारवाई की, दोषियों की गिरफ्तारी हुई और परीक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए कदम उठाए गए। अग्निवीर योजना को भाजपा सैन्य सुधार और युवाओं को नए अवसर देने वाली योजना बताती है। प्रदेश भाजपा यह भी आरोप लगाती रही है कि कांग्रेस सरकार रोजगार, आर्थिक प्रबंधन और चुनावी गारंटियों को पूरा करने में असफल रही है और राष्ट्रीय मुद्दों के सहारे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो मुख्यमंत्री का यह कार्यक्रम केवल NEET पेपर लीक के विरोध तक सीमित नहीं था। यह भाजपा के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की शुरुआत थी, जिसमें युवाओं का भविष्य, रोजगार, शिक्षा, सेना में भर्ती, सामाजिक सुरक्षा और केंद्र-राज्य संबंध जैसे कई मुद्दों को एक सूत्र में पिरोया गया। कांग्रेस का लक्ष्य स्पष्ट दिखता है-2027 के चुनाव को केवल राज्य सरकार के प्रदर्शन पर नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की नीतियों के मूल्यांकन पर भी केंद्रित करना।
अब यह देखना होगा कि क्या युवाओं के मुद्दों पर कांग्रेस की यह आक्रामक रणनीति चुनावी समर्थन में बदलती हैै। इतना तय है कि हिमाचल की राजनीति में आने वाले दिनों में कांग्रेस सबसे बड़ी लड़ाई सड़कों पर नहीं, बल्कि युवाओं के भरोसे और उनके भविष्य के सवाल पर लड़ेगी।

तीन साल बाद कांग्रेस का आत्ममंथन या बढ़ती बेचैनी?

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने संगठन की आम सभा के जरिए वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी का बिगुल तो बजा दिया, लेकिन बैठक के भीतर और बाहर जो घटनाक्रम सामने आये, उन्होंने यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या कांग्रेस वास्तव में संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल का दावा कर सकती है? तीन साल के कार्यकाल को उपलब्धियों से भरा बताने वाली कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही सरकार की कार्यशैली, संगठन की नाराजगी और जनता के बदलते मूड को लेकर दिखाई दे रही है।
बैठक में मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू, प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विनय कुमार, उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री, मंत्रिमंडल के सदस्य, सांसद, विधायक तथा जिला और ब्लॉक कांग्रेस के पदाधिकारी मौजूद रहे। मंच से सरकार की तीन वर्षों की उपलब्धियों को गिनाया गया और कार्यकर्ताओं से इन्हें घर-घर पहुंचाने का आहवान किया गया। लेकिन इसी बैठक ने कई ऐसे सवाल भी छोड़ दिए जिनका जवाब कांग्रेस नेतृत्व को देना होगा।
बैठक में कुछ मंत्री और कई महत्वपूर्ण पदाधिकारी मौजूद नहीं थे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा है कि अनुपस्थित रहने वालों को नोटिस जारी किए जाएंगे और जरूरत पड़ी तो कारवाई भी होगी। यह बयान केवल अनुशासन का संदेश नहीं था, बल्कि यह भी दिखाता है कि संगठन के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। यदि पार्टी को अपने ही नेताओं को बैठक में लाने के लिए नोटिस की चेतावनी देनी पड़े तो यह संगठनात्मक मजबूती नहीं, बल्कि अंदरूनी असहजता का संकेत माना जा सकता है।
बैठक में बार-बार कहा गया कि सरकार और संगठन मिलकर काम कर रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों की घटनाएं इस दावे पर सवाल खड़े करती हैं। कई कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता लगातार यह शिकायत करते रहे हैं कि सरकार के फैसलों में संगठन की भागीदारी सीमित है। दूसरी ओर संगठन को भी कई बार सरकार के निर्णयों की जानकारी बाद में मिलती है। ऐसे में ‘बेहतर तालमेल’ का दावा राजनीतिक संदेश तो हो सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग दिखाई देती है।
कांग्रेस के भीतर सबसे बड़ा अनकहा मुद्दा आज भी स्व. राजा वीरभद्र सिंह की राजनीतिक विरासत है। प्रदेश के अनेक कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार बनने के बाद वीरभद्र सिंह के कई पुराने समर्थकों को अपेक्षित महत्व नहीं मिला। नियुक्तियों से लेकर संगठन और सरकार में प्रतिनिधित्व तक, यह असंतोष समय-समय पर सामने आता रहा है।
निगम और बोर्डों में नियुक्तियों को लेकर भी विवाद हुए। हाल ही में निगम भंडारी की ताजपोशी को लेकर कांग्रेस के भीतर सार्वजनिक बयानबाजी हुई। एक मंत्री द्वारा लगातार आपत्ति जताने के बाद प्रदेश प्रभारी रजनी पाटिल को यह कहना पड़ा कि वह संबंधित पक्षों से बात करने की कोशिश कर रही हैं। यह बयान बताता है कि मामला केवल व्यक्तिगत असहमति का नहीं, बल्कि संगठनात्मक समन्वय की चुनौती का भी है।
कांग्रेस सरकार लगातार प्राकृतिक खेती, दुग्ध खरीद, स्वास्थ्य, शिक्षा, हरित ऊर्जा, पर्यटन और वित्तीय सुधारों को अपनी उपलब्धि बता रही है। लेकिन प्रदेश में जनता का बड़ा वर्ग आज भी महंगाई, बेरोजगारी, कर्मचारियों की मांगें, विकास कार्यों की धीमी गति, सड़क, स्वास्थ्य और स्थानीय समस्याओं को लेकर सवाल पूछ रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों की रफ्तार और शहरी क्षेत्रों में रोजगार तथा बुनियादी सुविधाओं को लेकर असंतोष की चर्चा लगातार सुनाई देती है। यही कारण है कि सरकार की उपलब्धियों का प्रचार जितना मजबूत दिखता है, उतना ही चुनौतीपूर्ण उसका जनस्वीकार भी दिखाई देता है।
हाल के नगर निगम और नगर निकाय चुनावों के परिणामों को लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपनी-अपनी जीत का दावा किया। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को अपेक्षित बढ़त नहीं मिल सकी। कई शहरी क्षेत्रों में पार्टी को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। स्थानीय स्तर पर संगठन की कमजोरी और गुटबाजी की चर्चा भी चुनाव परिणामों के बाद तेज हुई।
यही वजह है कि अब 2027 की तैयारी की शुरुआत करते हुए कांग्रेस सबसे पहले अपने संगठन को मजबूत करने की बात कर रही है।
राजनीतिक गलियारों में पिछले कुछ समय से मंत्रिमंडल विस्तार और कुछ मंत्रियों के विभाग बदलने अथवा फेरबदल की चर्चाएं लगातार चल रही हैं। इन अटकलों ने भी कांग्रेस के भीतर राजनीतिक हलचल जरूर बढ़ाई है। जब सरकार के भीतर संभावित बदलावों की चर्चा सार्वजनिक होने लगे तो उसका असर संगठन और प्रशासन दोनों पर पड़ता है। यही कारण है कि कांग्रेस नेतृत्व लगातार एकजुटता का संदेश देने की कोशिश कर रहा है।
बैठक के दौरान पत्रकारों के साथ कथित अभद्र व्यवहार की खबरें और सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी है। यदि किसी राजनीतिक दल के कार्यालय में मीडिया के साथ ऐसा व्यवहार होता है तो यह पार्टी की सार्वजनिक छवि पर असर डालता है।
हालांकि इस मामले में आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है, लेकिन विपक्ष को सरकार और संगठन दोनों पर सवाल उठाने का अवसर जरूर मिल गया है।
कांग्रेस ने इस बैठक में कार्यकर्ताओं को सरकार की उपलब्धियां घर-घर पहुंचाने का संदेश दिया। लेकिन केवल उपलब्धियों का प्रचार चुनाव नहीं जिताता। जनता अपने रोजमर्रा के अनुभव के आधार पर सरकार का मूल्यांकन करती है।
यदि संगठन और सरकार के बीच तालमेल पर सवाल बने रहते हैं, यदि गुटबाजी समाप्त नहीं होती, यदि नियुक्तियों और राजनीतिक संतुलन को लेकर विवाद जारी रहते हैं और यदि जनता की स्थानीय समस्याओं का समाधान अपेक्षित गति से नहीं होता, तो 2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा।
यह भी सच है कि सरकार के पास अभी चुनाव से पहले पर्याप्त समय है। यदि आने वाले डेढ़ वर्ष में सरकार प्रशासनिक प्रदर्शन, विकास कार्यों और संगठनात्मक एकजुटता पर प्रभावी काम करती है तो राजनीतिक तस्वीर बदल भी सकती है।
शिमला के राजीव गांधी भवन की बैठक का घोषित उद्देश्य संगठन को मजबूत करना और चुनावी तैयारी शुरू करना था। लेकिन बैठक ने यह भी दिखाया कि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपनी ही सरकार की कार्यशैली, संगठन की अपेक्षाएं और जनता की बढ़ती उम्मीदें हैं।
तीन साल बाद कांग्रेस अपनी उपलब्धियों का लेखा-जोखा जनता के सामने रख रही है, लेकिन जनता अब केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से सरकार का मूल्यांकन कर रही है। आने वाले महीनों में यह तय होगा कि कांग्रेस संगठन की यह बैठक 2027 की जीत की रणनीति साबित होती है या फिर भीतर बढ़ती बेचैनी को संभालने की एक राजनीतिक कवायद।

Facebook



  Search