शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की वर्तमान सरकार औद्योगिक विकास को लेकर आक्रामक और सक्रिय रणनीति अपनाने का दावा कर रही है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में सरकार राज्य को वैश्विक निवेश के मानचित्र पर स्थापित करने की बात कर रही है। लेकिन इन दावों के समानान्तर विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि क्या यह औद्योगिक नीति वास्तव में रोजगार और आर्थिक मजबूती की दिशा में ठोस परिणाम दे पाएगी, या यह केवल आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित रह जाएगी।
सरकार द्वारा ‘इंडस्ट्री थ्रू इनविटेशन’ नीति को एक बड़े बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। दुबई, जापान और मुंबई जैसे निवेश केंद्रों में किए गए संवादों के बाद 5,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश और डव्न् साईन किये जाने का दावा है। आज डव्न् को वास्तविक निवेश मानकर प्रचारित करना भ्रामक हो सकता है। पूर्व की भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी हजारों करोड़ के डव्न् साईन किये गये थे, जिनमें से बहुत से कभी धरातल पर नहीं उतर सके। ऐसे में सवाल यह है कि वर्तमान सरकार इन प्रतिबद्धताओं को वास्तविक परियोजनाओं में बदलने के लिए क्या ठोस समय-सीमा और निगरानी व्यवस्था बना रही है।
सरकार ने 14,000 करोड़ रुपये की 683 औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी देने और 32,000 रोजगार अवसर सृजित होने का दावा किया है। परियोजनाओं कि मंजूरी और क्रियान्वयन के बीच की खाई हिमाचल में हमेशा बड़ी रही है। औद्योगिक भूमि की सीमित उपलब्धता, पर्यावरणीय मंजूरियां और आधारभूत ढांचे की कमी ऐसे कारक हैं, जो कई परियोजनाओं को कागज़ों तक सीमित कर देते हैं। यहां पर सवाल यह है कि इनमें से कितनी परियोजनाएं वास्तव में निर्माण या उत्पादन चरण में पहुंच चुकी हैं।
एमएसएमई और ग्रामीण उद्यमिता को लेकर सरकार के दावों पर भी विपक्ष ने सवाल उठाये हैं। केंद्र सरकार को भेजे गए 1,642 करोड़ रुपये के प्रस्ताव और 109.34 करोड़ रुपये की प्रारंभिक फंडिंग को लेकर विपक्ष का कहना है कि यह राशि राज्य की जरूरतों के मुकाबले बेहद सीमित है पर जब तक बिजली, कच्चा माल, परिवहन और बाजार तक पहुंच जैसी मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं किया जाएगा, तब तक छोटे उद्योग टिकाऊ नहीं बन पाएंगे।
स्टार्टअप और नवाचार नीति को लेकर भी कुछ सवाल है। 107 स्टार्टअप्स के संचालन और 407 स्टार्टअप्स के प्रक्रियाधीन होने के सरकारी दावे के बीच यह सवाल उठता है कि इनमें से कितने स्टार्टअप्स वास्तव में लाभ में हैं और कितने केवल अनुदान आधारित प्रयोग बनकर रह गए हैं। हिमाचल प्रदेश में स्टार्टअप संस्कृति तभी सार्थक होगी जब उन्हें दीर्घकालिक बाजार समर्थन और वित्तीय स्थिरता मिलेगी।
मुख्यमंत्री स्वावलंबन योजना के तहत स्वीकृत 1,607 स्वरोजगार इकाइयों और 3,500 से अधिक रोजगार के आंकड़े यह बताते हैं कि यह संख्या राज्य के बेरोजगार युवाओं की कुल संख्या के मुकाबले बहुत छोटी है। क्या इन स्वीकृत स्वरोजगार इकाइयों की निगरानी भी की जा रही है, ताकि वे कुछ वर्षों में बंद न हो जाएं।
निवेशक सुविधा के लिए किए गए सुधारों-जैसे सिंगल-विंडो पोर्टल और निर्माण नियमों में ढील-पर भी पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय हितों की अनदेखी के आरोप लग रहे है। आज अगर औद्योगिक विस्तार के नाम पर पर्यावरणीय मानकों से समझौता किया गया, तो इसके दीर्घकालिक सामाजिक और पारिस्थितिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
सरकार को मिले राष्ट्रीय पुरस्कार ‘प्रशासनिक रैंकिंग’ तक सीमित है। असली मूल्यांकन पुरस्कारों से नहीं, बल्कि यह देखकर होता है कि औद्योगिक विकास से ग्रामीण आय, स्थानीय रोजगार और पलायन पर कितना प्रभाव पड़ा है।
राजनीतिक रूप से देखें तो हिमाचल में औद्योगिक नीति अब केवल आर्थिक विषय नहीं रही, बल्कि सत्ता की विश्वसनीयता की लड़ाई बन चुकी है। सरकार इसे बेसक आर्थिक सुधार की दिशा में ऐतिहासिक पहल बताती है पर यह तो आने वाला समय ही बतायेगा कि इससे प्रदेश को कितना फायदा पहुंचता है।
हिमाचल की जनता के लिए निर्णायक प्रश्न यही है कि क्या यह औद्योगिक रणनीति राज्य को स्थायी रोजगार, संतुलित विकास और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की ओर ले जाएगी, या यह भी पूर्ववर्ती योजनाओं की तरह राजनीतिक बयानबाज़ी में सिमटकर रह जाएगी। इसका उत्तर आने वाले वर्षों में नीतियों के क्रियान्वयन और उनके वास्तविक परिणाम ही देंगे।
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में आपदाओं के बाद केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) के तहत 601.92 करोड रूपये़ की वित्तीय सहायता को लेकर एक बार फिर राजनीति तेज हो गई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और हमीरपुर से सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने इस सहायता को ‘आपदा पीड़ित हिमाचल के ज़ख्मों पर मरहम’ बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का आभार जताया है। भाजपा इसे केंद्र सरकार की संवेदनशीलता और हिमाचल के प्रति विशेष लगाव का प्रमाण मान रही है, जबकि विपक्ष इस मुद्दे पर अलग दृष्टिकोण रखता है।
भाजपा का तर्क है कि मोदी सरकार ने संकट की घड़ी में हिमाचल को अकेला नहीं छोड़ा। अनुराग सिंह ठाकुर के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में आई बाढ़, बादल फटने और भूस्खलन जैसी घटनाओं से प्रदेश की सड़कों, पुलों, ग्रामीण ढांचे और जल स्रोतों को भारी नुकसान पहुंचा। ऐसे समय में 601.92 करोड़ रूपये की NDRF सहायता राहत एवं पुनर्निर्माण कार्यों को गति देने में अहम भूमिका निभाएगी। भाजपा यह भी रेखांकित करती है कि तटीयकरण और नदी चैनलाइजेशन जैसे कार्यों के लिए केंद्र सरकार द्वारा अब तक 8,625 करोड रूपये़ का आवंटन किया जा चुका है, जो दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन की दिशा में बड़ा निवेश है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि यह सहायता केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ज़मीनी स्तर पर पुनर्निर्माण, सुरक्षा कार्य और भविष्य की आपदाओं से बचाव संभव होगा। अवैध खनन और जंगल कटान से नदियों के स्वरूप में आये बदलाव को भी आपदा की तीव्रता का एक कारण बताया जा रहा है, और केंद्र की मदद को इन प्रभावों को संतुलित करने की दिशा में आवश्यक बताया जा रहा है।
वहीं कांग्रेस का कहना है कि NDRF के तहत मिलने वाली सहायता कोई राजनीतिक अनुदान नहीं, बल्कि संवैधानिक और वैधानिक अधिकार है, जिसे किसी राज्य को उसकी आपदा की तीव्रता के आधार पर दिया जाता है। कांग्रेस का तर्क है कि केंद्र द्वारा दी गई राशि पर राजनीतिक श्रेय लेने के बजाये यह देखा जाना चाहिए कि क्या यह सहायता समय पर, पर्याप्त मात्रा में और बिना प्रशासनिक बाधाओं के ज़मीनी स्तर तक पहुंच रही है या नहीं।
कांग्रेस यह भी सवाल उठा रही है कि 601.92 करोड़ रूपये की राशि हिमाचल में हुए कुल नुकसान के मुकाबले कितनी पर्याप्त है। पिछले वर्षों में हुए जान-माल के नुकसान, ढांचागत तबाही और पुनर्वास की व्यापक जरूरतों को देखते हुये कांग्रेस का कहना है कि राहत राशि कई बार वास्तविक जरूरतों से कम पड़ जाती है और राज्य को अतिरिक्त संसाधनों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
भाजपा इसे मोदी सरकार की मानवीय सोच और त्वरित निर्णय क्षमता का उदाहरण बता रही है, जबकि विपक्ष इसे केंद्र-राज्य संबंधों में राजनीतिक प्रचार का हिस्सा मानता है। कांग्रेस का आरोप है कि जब भी कोई आपदा आती है, राहत राशि को राजनीतिक मंच से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि असली चुनौती पुनर्वास और दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन की होती है।
हिमाचल के आपदा पीड़ितों के लिए यह बहस कम मायने रखती है कि श्रेय किसे मिले। उनके लिए असली सवाल यह है कि राहत राशि कितनी जल्दी ज़मीनी स्तर तक पहुंचती है, पुनर्निर्माण कितनी पारदर्शिता से होता है और भविष्य में ऐसी आपदाओं से बचाव के लिये ठोस कदम उठाये जाते हैं या नहीं। केंद्र और राज्य-दोनों सरकारों की जिम्मेदारी है कि राजनीतिक बयानबाज़ी से आगे बढ़कर राहत और पुनर्निर्माण को प्राथमिकता दी जाए।
आपदा के समय सहयोग राजनीति का विषय नहीं, बल्कि मानवता की कसौटी होता है। हिमाचल के संदर्भ में केंद्र की सहायता महत्वपूर्ण है, लेकिन उसका वास्तविक मूल्यांकन तभी होगा जब यह सहायता लोगों के जीवन में सुरक्षा, भरोसा और स्थायित्व लेकर आएगी।
शिमला/शैल। क्या औद्योगिक विकास हिमाचल के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता का सूत्र बन सकता है? यह प्रश्न सुक्खू सरकार के दावे के बाद प्रासंगिक हो जाता है। हिमाचल में 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार शान्ता कुमार के नेतृत्व में बनी थी तब प्रदेश में औद्योगिक विकास का रास्ता अपनाया गया था। औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना हुई और उसके बाद आज तक आने वाली हर सरकार ने उद्योगों की स्थापना और उनको बढ़ावा देने की नीति अपनायी है। हिमाचल में 1977 के बाद दो बार शान्ता कुमार मुख्यमंत्री बने दो बार ही प्रेम कुमार धूमल और एक बार जयराम ठाकुर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं। करीब 20 वर्षों तक प्रदेश में संघ पोषित विचारधारा के मुख्यमंत्री रहे हैं। संघ पोषित विचारधारा उद्योगों में प्राइवेट सैक्टर की पक्षधर रही है। जो आज केंद्र सरकार के इस दिशा में आचरण से स्पष्ट हो जाता है। 1977 से आज तक करीब तीस वर्ष कांग्रेस की सरकार स्व.रामलाल ठाकुर, स्व. वीरभद्र सिंह और सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में कार्यरत है। लेकिन कांग्रेस की सरकारें भी निजी क्षेत्र की भागीदारी का विकल्प नहीं खोज पायी हैं। 1977 से आज तक उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये भारत सरकार ने अपनी सोच के मुताबिक सुविधा प्रदान की नीतियां अपनायी। पर्यटन को भी उद्योग का दर्जा दिया गया। शान्ता कुमार स्वयं होटल उद्योग में आये प्रोत्साहन देने के लिये सरकारी जमीन पर बने होटल यामिनी को प्राइवेट जमीन के साथ तबादले की सुविधा प्रदान की गयी। कुल मिलाकर उद्योगों के लिये सरकार ने सारे दरवाजे खोल दिये। बिजली की उपलब्धता के नाम पर उद्योगों को आमंत्रित किया गया। लेकिन इसी औद्योगीकरण से प्रदेश को हासिल क्या हुआ जो सार्वजनिक उपक्रम इन उद्योगों की सुविधा के लिये स्थापित किये गये थे उनमें से वित्त निगम जैसे कितने संस्थान लगभग खत्म हो चुके हैं। 90% सार्वजनिक उपक्रम घाटे में चल रहे हैं और प्रदेश का कर्ज एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर गया है। रोजगार के नाम पर आउटसोर्स, मल्टी टास्क और मित्र योजना तक प्रदेश पहुंच गया है। आज प्रदेश नये संस्थान खोलने के नाम पर पुराने संस्थाओं को बन्द करने के कगार पर पहुंच गया है। सरकार ने जब भी कर्ज लिया है तो हमेशा विकास योजनाओं के नाम पर लिया है। विकास से परिणामतः आय होना स्वाभाविक है चाहे सरकार को हुई हो या आम आदमी को। यदि सही में विकास पर किये गये निवेश से आय हुई होती तो प्रदेश को कर्ज का ब्याज चुकाने के लिये भी कर्ज लेने की स्थिति न खड़ी होती। आज कर्ज के जिस आंकड़े पर प्रदेश पहुंच चुका है उससे भविष्य लगातार प्रश्नित होता जा रहा है। आज सरकारें चुनाव जीतने के लिये समाज को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर आर्थिक प्रलोभनों के सहारे चल रही है यह भूल रही है कि जिस छोटे से वर्ग को आर्थिक सहायता प्रदान करने का भरोसा दिलाया जाता है उसकी भरपाई तो प्रदेश को करनी पड़ती है। आज समय आ गया है जब पार्टियों के चुनाव घोषणा पत्रों पर यह शर्त लगानी पड़ेगी की क्या आप यह सुविधा कर्ज और शुल्क के रूप में तो नहीं वसूल करेंगे। हिमाचल पहाड़ी प्रदेश है यहां कृषि और बागवानी विश्वविद्यालय के शोध को यहां के गांव तक ले जाने की आवश्यकता है। क्योंकि एक बड़े औद्योगिक निवेश से जीडीपी का आंकड़ा बढ़कर सरकार के कर्ज लेने की सीमा और बढ़ जाती है परन्तु उससे आम आदमी को व्यवहारिक लाभ नहीं पहुंचता है।
शिमला/शैल।पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने शिमला में आयोजित प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाये। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश की राजनीति परंपरागत रूप से विकास और सहयोग पर आधारित रही है, लेकिन वर्तमान सरकार राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से काम कर रही है जिसके दूरगामी परिणाम प्रदेश हित में नहीं होंगे।
जयराम ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों, जिन्होंने सरकार का समर्थन नहीं किया, उनके खिलाफ प्रशासनिक दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस और विभागों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिए किया जा रहा है जो लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता स्थायी नहीं होती और लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे कदमों का परिणाम अंततः सरकार को भुगतना पड़ता है।
नेता प्रतिपक्ष ने हमीरपुर के विधायक आशीष शर्मा का उदाहरण देते हुए कहा कि अवैध खनन से जुड़े मामले में पुलिस स्वयं शिकायतकर्ता बनी, जबकि संबंधित विभाग की ओर से कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि जमानत से वंचित रखने के लिए गंभीर धाराएं जोड़ी गईं और विधायक को बार-बार थाने बुलाया गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ पूर्व कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों, तथा भाजपा नेताओं के परिवारों को प्रताड़ित किया जा रहा है, जबकि संबंधित विभागों को निष्पक्ष एवं कानूनी प्रक्रिया अपनानी चाहिए। जयराम ठाकुर ने आपदा प्रभावित परिवारों से जुड़े मामलों में भी मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस कारवाई संवेदनशीलता के अनुरूप होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि उन अन्य विधायकों और नेताओं पर भी दबाव बनाया जा रहा है, जिन्होंने सरकार का विरोध किया या उसका साथ छोड़ दिया।
जयराम ठाकुर ने कांगड़ा कार्निवल के आयोजन को लेकर जारी पत्र पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह एक सरकारी अधिसूचित कार्यक्रम है, ऐसे में इसके आयोजन का खर्च आम जनता से वसूला जाना उचित नहीं है। उन्होंने पूछा कि पत्र जिला प्रशासन के बजाये किसी अन्य स्तर से क्यों जारी किया गया और उसमें आधिकारिक बैंक खाता विवरण क्यों नहीं दिया गया।
उन्होंने आशंका जताई कि यदि दान या सहयोग लिया जा रहा है तो उसकी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और दाताओं को आयकर नियमों के तहत लाभ की जानकारी भी स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए।
नेता प्रतिपक्ष ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की कार्यप्रणाली पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि विभाग को राजनीतिक प्रचार से दूर रहकर तथ्यात्मक और संतुलित सूचना प्रसारित करनी चाहिए। उन्होंने अधिकारियों को संवैधानिक सीमाओं में रहते हुए कार्य करने की सलाह दी।
जयराम ठाकुर ने आपदा राहत से जुड़े मामलों में भी सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आपदा के दौरान जिन परिवारों ने अपने परिजन खोए, उनके खिलाफ पुलिस कारवाई की खबरें सामने आई हैं, जो संवेदनशीलता के अभाव को दर्शाती हैं।
उन्होंने बंजार और धर्मपुर क्षेत्रों में कथित अवैध कटान और अवैध खनन के मामलों पर भी सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच और कारवाई की मांग की।
जयराम ठाकुर ने कहा कि प्रतिशोध आधारित राजनीति प्रदेश की संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि प्रशासनिक कारवाई पारदर्शिता, कानून सम्मत प्रक्रिया और तटस्थता के आधार पर की जाये तथा असहमति को अपराध की तरह न लिया जाये।
शिमला/शैल। ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने और हिमाचल प्रदेश को ग्रीन एनर्जी स्टेट के रूप में स्थापित करने की दिशा में राज्य सरकार तेजी से आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा है कि प्रदेश सरकार ने मार्च 2026 तक राज्य की 90 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा आवश्यकता नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से पूरी करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान में हिमाचल प्रदेश की वार्षिक ऊर्जा खपत लगभग 13 हजार मिलियन यूनिट है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य सरकार की हरित नीतियों के परिणामस्वरूप सौर ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और आगामी दो वर्षों में 500 मेगावाट सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य तय किया गया है। ‘ग्रीन पंचायत कार्यक्रम’ के तहत प्रदेश की सभी पंचायतों में 500 किलोवाट क्षमता की ग्राउंड- माउंटेड सौर ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित की जाएंगी। पहले चरण में 24 ग्राम पंचायतों में ऐसी परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है, जिनमें से 16 पंचायतों में कार्य आरंभ हो चुका है। इस कार्यक्रम के माध्यम से 150 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इन परियोजनाओं से उत्पादित बिजली से अर्जित राजस्व का 20 प्रतिशत भाग राज्य सरकार द्वारा ग्राम पंचायतों के अनाथ बच्चों और विधवाओं के कल्याण के लिए उपयोग में लाया जाएगा।
उन्होंने बताया कि ऊना जिला स्थित पेखूबेला सौर ऊर्जा परियोजना ने 15 अप्रैल 2024 को वाणिज्यिक संचालन शुरू किया, जिससे अब तक 79.03 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ और 22.91 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया गया। ऊना की अघलौर सौर परियोजना से 21 मई 2025 से बिजली उत्पादन शुरू हुआ है, जिससे अब तक 5.89 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ है। वहीं, भंजाल सौर ऊर्जा परियोजना ने 30 नवंबर 2024 को व्यावसायिक संचालन शुरू कर अब तक 8.57 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन करते हुए 3.10 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्तमान में 31 मेगावाट की संयुक्त क्षमता वाली तीन सौर ऊर्जा परियोजनाएं निष्पादन चरण में हैं, जबकि 41 मेगावाट क्षमता की चार परियोजनाओं के लिए निविदाएं आमंत्रित की गयी हैं। इसके अतिरिक्त कांगड़ा जिला के डमटाल क्षेत्र में बंजर भूमि पर 200 मेगावाट क्षमता का सौर ऊर्जा संयंत्रा स्थापित किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि लाहौल -स्पीति के लांगजा, हिक्किम, मुद और कोमिक जैसे दुर्गम क्षेत्रों के 148 घरों में कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के तहत सोलर ऑफ-ग्रिड सिस्टम स्थापित किए गये हैं।
मुख्यमंत्री ने बताया कि ‘पहले आओ, पहले पाओ’ नीति के अंतर्गत 250 किलोवाट से 5 मेगावाट तक की सौर ऊर्जा परियोजनाएं आवंटित की जा रही हैं, जिनसे उत्पन्न बिजली को हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड द्वारा खरीदा जाएगा। अब तक 547 निवेशकों को लगभग 595.97 मेगावाट क्षमता की ग्राउंड-माउंटेड सौर परियोजनाएं आवंटित की जा चुकी हैं, जिनमें से 403.09 मेगावाट क्षमता की परियोजनाओं के लिए विद्युत खरीद समझौते पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं।
इसके अतिरिक्त, हिमऊर्जा द्वारा हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड को 728.4 मेगावाट क्षमता की सौर ऊर्जा परियोजनाएं आवंटित की गई हैं, जिनमें से 150.13 मेगावाट क्षमता की 120 माउंटिड सौर परियोजनाएं पहले ही आवंटित हो चुकी हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ग्रीन हाइड्रोजन, कंप्रेस्ड बायोगैस, भू-तापीय ऊर्जा और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए भी ठोस प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि इन निरंतर पहलों के माध्यम से वर्ष 2026 तक हिमाचल प्रदेश को देश के अग्रणी ग्रीन एनर्जी राज्यों में शामिल करने की दिशा में राज्य सरकार लगातार आगे बढ़ रही है।