Saturday, 20 June 2026
Blue Red Green

ShareThis for Joomla!

बजट अनुमानों में 30% का अन्तर आना शुभ संकेत नहीं अनुपूरक मांगों से उठे सवाल

  • 17000 करोड़ से अधिक की अनुपूरक मांगों को कैसे पूरा किया गया?
  • बढ़ा हुआ खर्च पूरा करने के लिये जनता पर कितना बोझ डाला गया और कितना कर्ज लिया गया?

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने वर्ष 2024-25 के लिए 17053.78 करोड़ का अनुपूरक बजट पेश किया है। इस वित्तीय वर्ष के लिये सरकार ने 58444 करोड़ के अनुमान का बजट पेश किया था। इस बजट में 46667 करोड़ का राजस्व व्यय और 42153 करोड़ की राजस्व प्राप्तियां दिखायी गयी थी। बजट अनुमानों के अनुसार यह वर्ष 10784 करोड़ के घाटे पर बन्द होना था। लेकिन अनुपूरक बजट ने सरकार की वित्तीय स्थिति पर कुछ गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। अनुपूरक बजट में यह विवरण दिया गया है कि बढ़ा हुआ खर्च किन मदो पर खर्च हुआ है। सत्रह हजार करोड़ से अधिक के अनुपूरक बजट से यह सामने आया है कि सरकार के मूल अनुमानों में करीब 30% की वृद्धि हुई है। यह वृद्धि क्यों हुई है और इसका आने वाले समय सरकार की राजस्व आय पर भी कोई असर पड़ेगा या यह बढ़ौतरी नियमित राजस्व व्यय का ही हिस्सा बनकर रह जायेगी। क्योंकि सामान्यतः हर वर्ष खर्चों में दस प्रतिश्त की मानक वृद्धि लेकर अगले बजट अनुमान तैयार किये जाते हैं। ऐसे में वर्ष 2025-26 का बजट अनुमान 80,000 करोड़ लगभग रहने का अनुमान है। वर्ष 2024-25 के 58444 करोड़ के बजट अनुमानों में वर्ष 10784 करोड़ के घाटे पर बन्द हो रहा था। अब जब अनुपूरक मांगों को मिलाकर बजट का कुल आकार ही 75000 करोड़ पहुंच जाता है तब आगे का यह बजट निश्चित रूप से 80000 तक पहुंचेगा ही।
वर्ष 2024-25 में राजस्व आय 42153 करोड़ की अनुमानित थी। तब इस वर्ष 10% की वृद्धि के साथ क्या यह 65000 करोड़ हो पायेगी यह देखना बड़ा सवाल होगा। क्योंकि इसी वित्तीय वर्ष में सरकार द्वारा वित्तीय संसाधन बढ़ाने के लिये किये गये उपायों से राजस्व आय में कितनी वृद्धि हुई है इसका आंकड़ा तो अगले बजट के अनुमानों में ही सामने आयेगा। लेकिन अनुपूरक बजट से जो खर्च बढ़ा है उसका आंकड़ा तो सामने आ गया है। परन्तु इस खर्च को पूरा करने के लिये कितने टैक्स लगाये जायेंगे और कितना कर्ज लिया जायेगा तो आगे ही सामने आयेगा। क्योंकि आगे चलकर सरकार को गारंटीयां भी पूरी करनी है। अभी तो राज्यपाल के अभिभाषण में यह गारंटीयां लागू हो गयी हैं। परन्तु आगे चलकर इनको व्यवहारिक रूप में भी पूरा करना होगा। चालू वित्त वर्ष में 17000 करोड़ से अधिक का खर्च बढ़ने पर इसको पूरा करने के लिये कितना कर्ज लिया गया है और भविष्य में और कितना कर्ज लिया जायेगा यह अभी सामने आना बाकी है। विपक्ष के मुताबिक सरकार 30000 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। लेकिन अनुपूरक बजट में जब खर्च ही करीब 17000 करोड़ बढ़ा है तो इससे अधिक कर्ज लेने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये।
ऐसे में अब यह विपक्ष की जिम्मेदारी हो जाती है कि वह इस बढ़े हुये खर्च का विवरण लेकर उस प्रदेश की जनता के सामने रखे। इसमें यह भी सामने आना चाहिये कि सही में कौन सी तत्कालिक आवश्यकताओं पर यह खर्च किया गया। इस खर्च को पूरा करने के लिये जनता पर कितना बोझ डाला गया और कितना कर्ज लिया गया। क्योंकि किसी सरकार के बजट अनुमानों में 30% तक का अन्तर आना कोई शुभ संकेत नहीं है। इतना बड़ा अन्तर किसी प्राकृतिक आपदा के बिना जायज नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि अनुपूरक बजट वर्ष के अन्त में विभिन्न मांगों में हुये खर्च के सर प्लस या सरन्डर से प्रभावित नहीं होता है। बजट आवंटनों की समीक्षा वित्त विभाग वर्ष में तीन चार बार करता है। इसलिये यह अब माननीय के विवेक और ईमानदारी पर सीधा सवाल आ जाता है कि बजट अनुमानों में आये इस अन्तर का पूरा ब्योरा कारणों सहित प्रदेश की जनता के सामने रखे।

क्या "असली भाजपा" व्यक्तिगत रोष का प्रतिफल है

  • क्या यह रोष समय आने पर स्वतः ही शांत हो जायेगा
प्रदेश भाजपा का अगला अध्यक्ष कौन होगा? क्या वर्तमान अध्यक्ष को ही फिर से जिम्मेदारी मिल जायेगी या कोई नया अध्यक्ष चुना जायेगा? नया अध्यक्ष महिला होगी या पुरुष? प्रदेश अध्यक्ष का चयन टलता क्यों जा रहा है? भाजपा को लेकर यह सवाल लम्बे समय से चर्चा में चल रहा है। इन सवालों का जवाब आने से पहले ही भाजपा में पनपता रोष मुखर होकर सामने आ गया है। भाजपा में इस मुखरता को आकार दिया है पूर्व मंत्री रमेश धवाला ने। उन्होंने रुष्ट भाजपाइयों को इकट्ठा करके इस रोष को "असली भाजपा" का नाम दिया है। "असली भाजपा" का नाम देने से ही यह सामने आ जाता है कि यह रोष भाजपा की विचारधारा से असहमति होने का परिणाम नहीं है। बल्कि कुछ नेताओं के साथ व्यक्तिगत मतभेदों का परिणाम है। तय है कि व्यक्तिगत मतभेद जितनी तीव्रता से आकार लेते हैं उसी तीव्रता के साथ समय आने पर शांत भी हो जाते हैं। इस रोष के आकार लेने से यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान में प्रदेश भारी गुटबन्दी का शिकार है। क्योंकि प्रदेश भाजपा में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हर्ष महाजन जब भाजपा में शामिल हुये थे तब भाजपा के किसी भी छोटे-बड़े नेता ने उनके विरोध में कुछ नहीं कहा था। लेकिन हर्ष महाजन जब भाजपा में राज्यसभा का उम्मीदवार बन गये और कांग्रेस में तोड़फोड़ करके जीत भी हासिल कर गये तब उनके विरोध में स्वर उभरने लगे। पूर्व मंत्री रमेश धवाला रमेश ने तब यह आरोप लगाकर अपना विरोध प्रकट किया कि जब वह भाजपा के समर्थन में आये थे तब महाजन ने उनकी गाड़ी तोड़ी थी।
राज्यसभा में भाजपा की जीत के बाद कांग्रेस के छः विधायक पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो गये तब इसका विरोध भाजपा के अन्दर कहीं से मुखर नहीं हुआ। जब दल बदल के कारण आये उपचुनावों में इन कांग्रेसियों को भाजपा से टिकट मिल गये तब यह विरोध थोड़ा सा व्यक्तिगत होकर सामने आया। बल्कि तब इन नये बने भाजपाइयों का जितना विरोध मुख्यमंत्री ने किया उतना भाजपा के भीतर नहीं उभरा। परन्तु लोकसभा चुनावों के बाद दिल्ली में बनी मोदी सरकार में प्रदेश को भागीदारी नहीं मिली अनुराग ठाकुर की जगह जे.पी. नड्डा गुजरात से राज्यसभा सांसद होने पर मंत्री बन गये। तब प्रदेश भाजपा के भीतरी समीकरणों का गणित बिगड़ा। इस बिगड़े गणित में कांग्रेस से भाजपायी बने नेताओं को मुख्यमंत्री और उनकी सरकार से सीधा भिड़ने की स्थिति बन गयी। आज कांग्रेस और मुख्यमंत्री के साथ नये बने भाजपायी सीधा टकराव में खड़े हैं। नादौन और हमीरपुर में हुई ई.डी. और आयकर की छापेमारी में विरोधी पक्ष की भूमिका यह नये भाजपायी निभा रहे हैं। मूल भाजपाइयों में से केवल नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ही सरकार पर हमलावर हो रहे हैं और बाकी भाजपायी तो विरोध की रस्म अदायगी भी नहीं कर पा रहे हैं। यह सही है कि इस समय सरकार अपने ही फैसलों से इस कदर जनता में बदनाम होती जा रही है कि भाजपा या किसी अन्य को सरकार का विरोध करने की आवश्यकता ही नहीं रही है। भाजपा इसी से खुश है कि उसे एक सुनियोजित विरोध करने की आवश्यकता ही नहीं है। लेकिन यदि कांग्रेस ने ही आने वाले दिनों में नेतृत्व में परिवर्तन करके किसी नये नेता को जिम्मेदारी सौंप दी तब भाजपा के पास सरकार के विरोध का कोई तार्किक आधार नहीं बचेगा।
इस समय प्रदेश की राजनीतिक स्थितियां जिस दौर से गुजर रही हैं और प्रदेश लगातार कर्ज के दलदल में फसता जा रहा है उसका सीधा कुप्रभाव रोजगार पर पड़ेगा। सरकार में रोजगार के अवसर लगातार कम होते जायेंगे। उद्योग पलायन करने के कगार पर पहुंच जायेंगे। इससे सीधा प्रदेश का नुकसान होगा और इसकी जिम्मेदारी सरकार के साथ ही विपक्ष पर भी आयेगी। यह प्रदेश का दुर्भाग्य है कि कांग्रेस के लोग सरकार होने के कारण विरोध में कुछ नहीं कर पा रहे हैं। भाजपा इसी नीति पर चल रही है कि कांग्रेस अपने ही भार के नीचे दबकर दम तोड़ देगी। इसलिये उसे कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। इससे प्रदेश का कितना नुकसान हो रहा है और इस ओर किसी का ध्यान नहीं है।

क्या देहरा उपचुनाव के दौरान कांगड़ा बैंक ने क्षेत्र के महिलाओं मण्डलों को पचास-पचास हजार की सहायता दी है?

शिमला/शैल। कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक युद्ध चन्द बैंस के ऋण प्रकरण के बाद चर्चाओं के केंद्र में आ गया है। बैंस के ऋण प्रकरण की जांच प्रदेश की विजिलैन्स कर रही है। बैंस के खिलाफ ऊना में विजिलैन्स ने जनवरी में मामला दर्ज किया था। बैंस ने विजिलैन्स कार्यालय ऊना में ई.डी. और आयकर ने जो छापेमारी हमीरपुर और नादौन में की थी उस प्रकरण का शिकायतकर्त्ता वही था। स्मरणीय है कि इस छापेमारी में जो मामला ई.डी ने दर्ज किया है उसमें दो लोगों की गिरफ्तारी भी ई.डी कर चुकी है। यह छापेमारी चार लोगों पर हुई थी। बैंस द्वारा ऊना में खुलासा करने के बाद बैंस प्रकरण की जांच को विजिलैन्स मुख्यालय यिामला में ही चल रही है। अभी तक इस जांच को विजिलैन्स पुरा नही कर पायी है बल्कि बैंस के अतिरिक्त विजिलैन्स द्वारा कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक के तत्कालीन चेयरमैन और प्रबन्ध निदेशक या किसी अन्य अधिकारी को बुलाकर पूछताछ करने का कोई प्रकरण सामने नहीं आया है। बैंस उच्च न्यायालय द्वारा अन्तरिम जमानत पर चल रहा है। अब उच्च न्यायालय में अगली पेशी 17 मार्च की है। अभी तक ई.डी. ज्ञानचंद और धर्मेन्द्र की गिरफ्तारी से आगे नहीं बढ़ पायी है और विजिलैन्स भी बैंस से आगे नहीं गयी है।
बैंस का मामला कांगड़ा केंद्रीय बैंक से संबंधित है और वह ई.डी. में शिकायतकर्त्ता भी है इसलिए ई.डी. की जांच शायद इस बैंक तक भी जा पहुंची है। ई.डी. के सूत्रों के मुताबिक इसी कांगड़ा बैंक द्वारा देहरा विधानसभा के उपचुनाव के दौरान मतदान से कुछ दिन पूर्व देहरा क्षेत्र के 68 महिला मण्डलों को पचास-पचास हजार रुपए की सहायता दिये जाने का मामला सामने आया है। इस बारे में जब बैंक के चेयरमैन कुलदीप पठानिया से शैल ने बात की तो उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें इस मामले की जानकारी आज ही मिली है। ऐसे मामले चेयरमैन के सामने नहीं आते हैं प्रबन्ध निदेशक के स्तर पर ही निपट जाते हैं। मैं कल धर्मशाला जा रहा हूं और इसकी पूरी जानकारी हासिल करूंगा। चेयरमैन के जवाब से स्पष्ट था कि इस तरह का फैसला प्रबन्ध निदेशक के स्तर पर हुआ है। इसमें यह महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या इन महिला मण्डलों ने ऐसी सहायता के लिये कब आवेदन किया था? किस कार्य के लिये यह पैसा दिया गया और मतदान के कुछ दिन पूर्व ही क्यों दिया गया? क्या यह चुनाव आचार संहिता के दायरे में नहीं आता है? यदि इस तरह से पैसे का आवंटन हुआ है तो इसके परिणाम काफी गंभीर हो सकते हैं। यह जानकारी ई.डी. के सूत्रों के माध्यम से बाहर आयी है इसलिये इस हलके से नहीं लिया जा सकता। इस बजट सत्र में भी इस संबंध में प्रश्न पूछे जाने की संभावना है।

क्या रेरा अध्यक्ष पद की नियुक्ति में केन्द्र के दिशा निर्देशों को नजरअन्दाज किया जा सकेगा

  • कार्मिक विभाग ने आपराधिक मामले की जानकारी प्रधान सचिव हाऊसिंग को भेजी
  • अनूप दत्ता की शिकायत से मामला और गंभीर हुआ।
  • धारा 118 की अवैध अनुमति पर प्रशासन की चुप्पी सवालों में

शिमला/शैल। क्या सुक्खू सरकार रेरा अध्यक्ष पद की नियुक्ति में केन्द्र सरकार के क्रामिक विभाग द्वारा जारी दिशा निर्देशों को अनदेखा कर पायेगी? यह सवाल इसलिये चर्चा में आया है क्योंकि इस पद के लिये जिन लोगों ने आवेदन कर रखा है उनमें एक नाम प्रदेश में कार्यरत मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना का भी कहा जा रहा हैै। प्रबोध सक्सेना इसी मार्च माह में सेवानिवृत होने जा रहे हैं। इसलिये चर्चाओं के मुताबिक सरकार सेवा निवृत्ति के बाद भी इस अधिकारी की सेवाएं लेना चाहती है। इससे पहले भी इस पद पर सेवा निवृत मुख्य सचिव अपनी सेवाएं देते रहे हैं। लेकिन वर्तमान मुख्य सचिव के खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित चल रहा है। आई एन एक्स मीडिया प्रकरण में सक्सेना पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम के साथ सह अभियुक्त हैं। यह मामला 2017 में सीबीआई में पंजीकृत हुआ था और सीबीआई की अदालत में लंबित चल रहा है। इसकी जानकारी प्रदेश के क्रामिक विभाग ने 20-2-2025 को प्रदेश के प्रधान सचिव हाऊसिंग को दे रखी है। क्योंकि रेरा का प्रशासनिक नियंत्रण हाऊसिंग के तहत है।
भारत सरकार के क्रामिक की अक्तूबर 2024 में जारी अधिसूचना के अनुसार यदि किसी अधिकारी के खिलाफ कोई आपराधिक मामला अदालत में लंबित चल रहा हो तो उस स्थिति में ऐसे अधिकारी को किसी संवेदनशील पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता। न ही ऐसे अधिकारी को सरकार में किसी दूसरे पद पर सेवानिवृत्ति के बाद भी नियुक्त किया जा सकता है। केंद्र सरकार ने 2024 में अपने नियमों में किये संशोधन में स्पष्ट कर दिया है कि अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामले का दायर होना ही पर्याप्त है चाहे उसकी स्टेज कोई भी क्यों न रही हो। ऐसे में इस मामले के लंबित चलते इस अधिकारी को विजिलैन्स क्लीयरैन्स ही जारी नहीं हो सकता था और उसके अभाव में अधिकारी इस आवेदन के लिये पात्र ही नहीं हो पाता। अब जब यह सब कुछ संज्ञान में होने के बावजूद भी विजिलैन्स क्लीयरैन्स जारी हुआ है तो माना जा रहा है कि सरकार अपने निहित कारणों से नियुक्ति तक भी चली जाये।
यही नहीं धर्मशाला के योल निवासी अनूप दत्ता ने 2002 में जब सक्सेना शायद कांगड़ा के जिलाधीश थे तब भू-सुधार अधिनियम की धारा 118 के तहत दी गयी जमीन खरीद की अनुमति में की गयी हेराफेरी में एक दर्जन के करीब अधिकारियों के खिलाफ लोकायुक्त और अब सीबीआई जांच की मांग कर सरकार के सामने एक गंभीर स्थिति पैदा कर दी है। क्योंकि इस मामले में यह मान लिया गया है की धारा 118 के तहत दी गयी अनुमति अवैध है। लेकिन यह अवैधता करने वालों के खिलाफ आज तक कोई कारवाई न हो पाना अपने में एक बड़ा सवाल बन जाता है। अनूप दत्ता का आरोप है कि संबद्ध अधिकारियों ने उच्च न्यायालय को भी अंधेरे में रखने का प्रयास किया है। अनूप दत्ता का सबसे बड़ा आरोप तो यह है कि उसे ही रास्ते से हटाने के प्रयास किये गये और यह संबद्ध अधिकारी मौन बैठकर इसमें योगदान करते रहे। अनूप दत्ता ने मुख्यमंत्री कार्यालय को भी इस बारे में अवगत कराया है परन्तु कोई जवाब नहीं मिला है। इस मामले की जब भी जांच होगी तब इसमें कई विस्फोट होंगे।
ऐसे में अनूप दत्ता के आरोपों और केंद्र की अक्तूबर 2024 की अधिसूचना तथा इस सबका सरकार को संज्ञान होने से स्थिति बहुत रोचक हो गयी है।

यह है कार्मिक विभाग का पत्र

 

 यह है अनूप दत्ता की शिकायत

 

क्या सरकार कर्ज लेकर घी पीने को चरितार्थ कर रही है?

  • सरकार के फैसलों और कार्यप्रणाली से उठा यह सवाल
  • संकट के समय खर्चों पर नियंत्रण किया जाता है न कि बढ़ाया

शिमला/शैल। क्या सुक्खू सरकार कर्ज लेकर घी पीने के चार्वाक दर्शन का अनुसरण कर रही है या रोम जल रहा था नीरो बांसुरी बजा रहा था को दोहरा रही है। यह सवाल इसलिये प्रासंगिक हो रहे हैं क्योंकि सरकार हर माह कर्ज लेकर काम चला रही है। लेकिन सरकार अपने अनावश्यक खर्चों पर रोक नहीं लगा पा रही है। अभी सरकार ने वाइल्ड फ्लावर हॉल होटल को लीज पर देने के लिये एक कंसल्टेंट की सेवाएं लेने का फैसला लिया है। यह कंसलटेंट लीज की शर्तें तय करेगा। जब सरकार के दिल्ली के हिमाचल भवन को एक देनदारी अदा न कर पाने की एवज में उच्च न्यायालय ने अटैच कर दिया था तब पूरे पर्यटन विभाग की कारगुजारी चर्चा में आ गयी थी। उच्च न्यायालय ने अठारह होटलों को बन्द करने के आदेश जारी कर दिये थे। तब भारत सरकार से सेवानिवृत सचिव तरूण श्रीधर ने सरकार और पर्यटन विभाग को इस संकट से उभारने के लिये निःशुल्क अपनी सेवाएं प्रदान करने का प्रस्ताव दिया था। क्योंकि वह एक समय पर्यटन विकास निगम के प्रबंध निदेशक रह चुके थे। तरुण श्रीधर की सेवाएं लेकर पर्यटन निगम और विभाग की कार्य प्रणाली में कुछ सुधार आया है जबकि सरकार श्रीधर की पूरी रिपोर्ट पर अमल नहीं कर पायी है। आज सरकार के पास श्रीधर की सेवाएं उपलब्ध हैं। सरकार में वरिष्ठ आईएएस अफसर की एक लम्बी लाइन उपलब्ध है। वित्तीय निवेश पर राय देने के लिये सलाहकार उपलब्ध है यह सारा कुछ उपलब्ध होते हुए भी जब सरकार एक लीज की शर्त तय करने के लिये कंसल्टेंट की सेवाएं लेने पर आ जाये तो उसे क्या कहा जायेगा? क्या सरकार को अपनी अफसरसाही पर विश्वास नहीं रहा है या फिर किसी व्यक्ति विशेष को लाभ देने के लिये यह रास्ता अपनाया जा रहा है।
सरकार पर केंद्रीय धन के दुरुपयोग के आरोप विपक्ष लम्बे अरसे से लगाता आ रहा है जब रामपुर में आपदा राहत के नाम पर प्रधानमंत्री आवास योजना में आया पैसा उन लोगों को बांट दिया गया जिन्होंने कभी इसके लिये आवेदन ही नहीं किया था। जब यह चर्चा में आया तो उन लोगों को रिकवरी नोटिस भेज दिये और अब यह मामला उच्च न्यायालय में पहुंच गया है। केन्द्रीय योजनाओं के पैसे से कर्मचारियों का वेतन दिया जा रहा है। यह आरोप समग्र शिक्षा अभियान के संद्धर्भ में सरकार द्वारा जारी निर्देशों का पत्र विपक्ष द्वारा सार्वजनिक करने से प्रमाणित हो चुका है। प्रदेश वित्तीय संकट से गुजर रहा है और कभी भी श्री लंका जैसे हालात हो सकते हैं यह चेतावनी सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री ने दे दी थी। यह चेतावनी देने के बाद भी सी.पी.एस. की नियुक्तियां करना और प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें अवैध करार देने के बाद उस मामले में सर्वाेच्च न्यायालय में उनके बचाव के लिये करोड़ों खर्च करने का आरोप विपक्ष लगा रहा है। फिर इस में वकालत कर रहे वकीलों के नाम से यह इंगित हो जाता है कि सही में करोड़ों खर्च किये जा रहे होंगे।
विधायक प्राथमिकता योजनाओं को लेकर विपक्ष अरसे से सरकार के खिलाफ लामबन्द है। इसी लामबन्दी के परिणाम स्वरुप विपक्ष ने बजट पूर्व होने वाली प्राथमिकता बैठकों का बहिष्कार किया। संभव है कि विपक्ष सर्वदलीय बैठक का भी बहिष्कार करें। सुक्खू सरकार वित्तीय संकट और कुप्रबंधन के लिये लगातार विपक्ष को कोसती आ रही है। सरकार के इस आरोप में कितना दम है यदि इस बहस और आंकड़ों में भी जायें तो सरकार के मंत्रियों के बयानों से ही यह स्पष्ट हो जाता है की प्रदेश में वित्तीय संकट है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब संकट है तो उसमें अनुत्पादक खर्चों से तो परहेज किया जाना चाहिए था। लेकिन सी.पी.एस. और सलाहकारों तथा विशेष कार्यधिकारियों की कैबिनेट रैंक में एक लम्बी फौज खड़ा करने की क्या आवश्यकता थी। मंत्रियों के दफ्तरों की रिपेयर और साज सजा के नाम पर करोड़ों खर्च करने की क्या आवश्यकता है। जब वित्तीय संकट हो और विधानसभा का बजट सत्र पन्द्रह दिन बाद आने वाला हो तो उस समय जो मुख्यमंत्री अपने परिवार और मित्रों के साथ छुटियां मनाने विदेश चला जाये उनकी प्रदेश और सरकार के बारे में गंभीरता को लेकर सवाल तो उठेंगे ही। यही कहा जायेगा कि जब रोम जल रहा था तब नीरो बांसरी बजा रहा था। कल कोई यदि आर.टी.आई. में यह जानकारी मांग ली जाये कि मुख्यमंत्री की इस यात्रा पर सरकार का कितना खर्च हुआ है तो शायद इसका उत्तर यह कहकर नहीं टाला जा सकेगा कि यह प्राइवेट और व्यक्तिगत जानकारी है। क्योंकि मुख्यमंत्री इस यात्रा पर न कोई अवकाश लेकर तथा न ही अपना चार्ज किसी दूसरे को देखकर गये थे। क्योंकि मुख्यमंत्री के छुटी पर जाने के लिये कोई निश्चित नियम नहीं है और इनके आभाव में वह हर समय कार्यशील मुखिया रहता है और आर.टी.आई. के दायरे में आता है। यह सवाल इसलिये प्रासंगिक हो जाते हैं कि वित्तीय संकट के कारण प्रदेश लगातार कर्ज की दलदल में धस्ता चला जा रहा है ।

Facebook



  Search