शिमला/शैल। दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया है। युवाओं और छात्रों का आंदोलन अब केवल धरना-प्रदर्शन नहीं रहा, बल्कि यह सरकार और विपक्ष के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई में बदलता नजर आ रहा है। संसद का मानसून सत्र चल रहा है, बाहर हजारों प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर डटे हैं और भीतर विपक्ष सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। इस पूरे घटनाक्रम ने सरकार की कार्यशैली, विपक्ष की राजनीति और युवाओं की नाराजगी पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रदर्शनकारी साफ कह रहे हैं कि उनकी लड़ाई किसी दल के लिए नहीं, बल्कि अपने भविष्य के लिए है। उनका आरोप है कि भर्ती परीक्षाओं में लगातार विवाद, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और जवाबदेही की कमी ने लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर लगा दिया है। उनका कहना है कि सरकार बार-बार जांच और सुधार का भरोसा देती है, लेकिन जमीन पर हालात नहीं बदलते। यही कारण है कि आंदोलन दिल्ली की सड़कों तक पहुंच गया।
केंद्र सरकार का दावा है कि युवाओं के मुद्दों को गंभीरता से लिया जा रहा है और सुधार की प्रक्रिया जारी है। सरकार का कहना है कि कुछ राजनीतिक दल इस आंदोलन को हवा देकर राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं। सरकार यह भी कह रही है कि विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन संसद की सुरक्षा और कानून- व्यवस्था से समझौता नहीं किया जा सकता। यही वजह रही कि संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया और कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
यहीं से विपक्ष को सरकार पर हमला करने का बड़ा अवसर मिल गया। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी सहित कई विपक्षी दलों ने आंदोलनकारियों के समर्थन में खुलकर आवाज उठाई। विपक्ष का आरोप है कि सरकार युवाओं की समस्याओं का समाधान करने के बजाये पुलिस बल का इस्तेमाल कर रही है। संसद के भीतर भी विपक्ष ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और सरकार से जवाब मांगा।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष भी इस आंदोलन को केवल जनहित के मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि सरकार को घेरने के प्रभावी हथियार के रूप में देख रहा है। विपक्षी दलों के नेताओं की जंतर-मंतर पर लगातार मौजूदगी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। दूसरी तरफ भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष युवाओं की भावनाओं का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है।
इस आंदोलन ने जनता को भी दो हिस्सों में बांट दिया है। बड़ी संख्या में छात्र, अभिभावक और सामाजिक संगठन प्रदर्शनकारियों की मांगों को जायज बता रहे हैं। उनका कहना है कि यदि युवाओं को समय पर रोजगार और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया नहीं मिलेगी तो उनका आक्रोश स्वाभाविक है। वहीं समाज का एक वर्ग यह भी मानता है कि विरोध का अधिकार लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन संसद और संवेदनशील क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
सोशल मीडिया पर भी आंदोलन को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है। एक ओर सरकार के समर्थन में अभियान चल रहे हैं तो दूसरी ओर आंदोलनकारियों के समर्थन में लाखों पोस्ट साझा की जा रही हैं। इससे साफ है कि यह मुद्दा अब केवल दिल्ली का नहीं, बल्कि पूरे देश की चर्चा का विषय बन चुका है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस आंदोलन का सबसे बड़ा असर संसद की कार्यवाही पर पडे़गा । विपक्ष लगातार इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहा है, जबकि सरकार इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश का आरोप लगा रही है। ऐसे में वास्तविक मुद्दे-युवाओं की समस्याएं, भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और रोजगार-सियासी आरोप-प्रत्यारोप के बीच दबते हुए भी दिखाई दे रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह आंदोलन केवल कुछ दिनों का विरोध बनकर रह जाएगा या फिर सरकार को नीतिगत बदलाव करने के लिए मजबूर करेगा। फिलहाल जंतर-मंतर पर बैठे प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, सरकार अपने रुख पर कायम है और विपक्ष इस मुद्दे को संसद से लेकर सड़क तक उठाने में जुटा है।
स्पष्ट है कि जंतर-मंतर का यह आंदोलन अब केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि देश की राजनीति की नई परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि सरकार संवाद का रास्ता चुनती है या टकराव का, विपक्ष जनहित की राजनीति करता है या केवल सियासी अवसर तलाशता है, और सबसे महत्वपूर्ण-क्या देश के युवाओं की आवाज वास्तव में नीति निर्माण तक पहुंच पाती है या फिर यह मुद्दा भी राजनीतिक शोर में दबकर रह जाता है।
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की राजनीति अब नए दौर में पहुंच चुकी है। विपक्ष ने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू सरकार के खिलाफ कई मुद्दों को एक साथ जोड़कर बड़ा राजनीतिक अभियान शुरू कर दिया है। चुनावी गारंटियां, घटता बजट, बढ़ता कर्ज, सरकारी योजनाओं की रफ्रतार, एचआरटीसी की बदहाल स्थिति और प्रशासनिक फैसले अब भाजपा के प्रमुख हमले का आधार बन गए हैं। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर लगातार इन मुद्दों को उठाकर सरकार को घेर रहे हैं। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को ‘गारंटी बनाम हकीकत’ के मुद्दे पर लड़ने की तैयारी कर रही है।
सबसे ज्यादा विवाद मुख्यमंत्री की प्रस्तावित ‘सुखी परिवार योजना’ को लेकर है। भाजपा का आरोप है कि सरकार नई योजनाओं की घोषणा तो कर रही है, लेकिन उनके लिए बजट की व्यवस्था नहीं है। विपक्ष का कहना है कि समाज कल्याण विभाग का बजट पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 63 प्रतिशत घटकर 1618 करोड़ रुपये से 604 करोड़ रुपये रह गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नई योजना का खर्च सरकार कैसे उठाएगी। भाजपा का दावा है कि जब पुरानी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का भुगतान समय पर नहीं हो पा रहा, तब नई योजनाएं केवल घोषणा बनकर रह सकती हैं।
विपक्ष का हमला केवल बजट तक सीमित नहीं है। जयराम ठाकुर ने मुख्यमंत्री की कई योजनाओं को ‘चाइनीज खिलौना’ बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार पहले बड़ी घोषणा करती है, लेकिन बाद में योजनाएं ठंडी पड़ जाती हैं। भाजपा का कहना है कि सरकार जमीन पर काम करने की बजाय प्रचार पर ज्यादा ध्यान दे रही है। विपक्ष दावा कर रहा है कि विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार फ्रलैगशिप योजनाओं पर खर्च कम हुआ, जबकि प्रचार-प्रसार पर ज्यादा पैसा खर्च किया गया।
भाजपा अब कांग्रेस की चुनावी गारंटियों को सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रही है। विपक्ष लगातार पूछ रहा है कि पांच लाख रोजगार, महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये, 300 यूनिट मुफ्त बिजली, दूध के बढ़े हुए समर्थन मूल्य और अन्य चुनावी वादों की स्थिति क्या है। भाजपा का कहना है कि जनता अब घोषणाएं नहीं, बल्कि उनका परिणाम देखना चाहती है।
सरकार की कार्यशैली भी विपक्ष के निशाने पर है। जयराम ठाकुर का आरोप है कि फैसले संस्थागत व्यवस्था के बजाय कुछ चुनिंदा लोगों के प्रभाव में लिए जा रहे हैं। भाजपा का दावा है कि सरकार के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है और कई मंत्री अपनी बात प्रभावी ढंग से नहीं रख पा रहे हैं। हालांकि सरकार इन आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बताती रही है।
आर्थिक मोर्चे पर बढ़ते कर्ज को लेकर भी भाजपा लगातार सवाल उठा रही है। जयराम ठाकुर का कहना है कि मौजूदा सरकार ने साढ़े तीन साल में लगभग 45 हजार करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया है और राज्य की कुल देनदारी 1.15 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच गई है। भाजपा पूछ रही है कि यदि इतना बड़ा कर्ज लिया गया है तो उसका असर विकास कार्यों और जनता को मिलने वाली सुविधाओं में क्यों दिखाई नहीं दे रहा।
एचआरटीसी की हालत भी अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। बसों में टायर और स्पेयर पार्ट्स की कमी, कई रूटों पर सेवाओं का प्रभावित होना, कर्मचारियों के वेतन और पेंशन से जुड़े मुद्दों को विपक्ष सरकार की आर्थिक स्थिति से जोड़ रहा है। भाजपा का आरोप है कि परिवहन निगम की बिगड़ती व्यवस्था का सीधा असर आम यात्रियों पर पड़ रहा है।
इसके अलावा भाजपा सरकार पर आपदा राहत, संस्थानों को बंद करने, कॉलेजों के फैसलों और विभिन्न परियोजनाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर भी सवाल उठा रही है। विपक्ष इन सभी मुद्दों को जोड़कर यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि सरकार प्रशासनिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर दबाव में है।
यदि सरकार की चुनावी गारंटियां और घोषणाएं कागजों तक सीमित रहीं, तो भाजपा का ‘वादे बनाम हकीकत’ अभियान 2027 के विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। ऐसे में हिमाचल की राजनीति का अगला अध्याय अब सरकार के दावों से ज्यादा उसके प्रदर्शन पर तय होगा।
The Joomla! content management system lets you create webpages of various types using extensions. There are 5 basic types of extensions: components, modules, templates, languages, and plugins. Your website includes the extensions you need to create a basic website in English, but thousands of additional extensions of all types are available. The Joomla! Extensions Directory is the largest directory of Joomla! extensions.
We search the whole countryside for the best fruit growers.
You can let each supplier have a page that he or she can edit. To see this in action you will need to create a users who is in the suppliers group.
Create one page in the growers category for that user and make that supplier the author of the page. That user will be able to edit his or her page.
This illustrates the use of the Edit Own permission.