Tuesday, 04 August 2026
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आरएसएस कानून से ऊपर नहीं’ खड़गे के सवालों पर संघ-भाजपा-वीएचपी एकजुट

शिमला/शैल। कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियंक खड़गे के एक पत्र ने आरएसएस, भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद को सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। खड़गे ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर संगठन के कानूनी दर्जे, रजिस्ट्रेशन, फंडिंग, खर्च, टैक्स और सार्वजनिक गतिविधियों पर जवाब मांगा है। इसके बाद मोहन भागवत ने साफ कहा कि उन्हें इस पर जवाब देने की जरूरत नहीं लगती। भाजपा ने इसे कांग्रेस की राजनीति बताया, जबकि विश्व हिन्दू परिषद ने भी खड़गे के सवालों को संघ पर हमला करार दिया। अब यह मामला सिर्फ एक पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि आरएसएस की जवाबदेही बनाम कांग्रेस के राजनीतिक हमले की बड़ी लड़ाई बन गया है।
प्रियंक खड़गे ने अपने पत्र में कहा कि आरएसएस कोई छोटा संगठन नहीं है। उन्होंने लिखा कि संघ खुद दावा करता है कि देशभर में उसकी 60 हजार से ज्यादा शाखाएं और करोड़ों स्वयंसेवक हैं। खड़गे ने एबीपीएस की 2025-26 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा इतने बड़े पैमाने पर काम करने वाले संगठन को सिर्फ ‘सांस्कृतिक’ या ‘अनौपचारिक’ कहकर नहीं छोड़ा जा सकता।
खड़गे ने अपने पत्र में आरएसएस से कई सीधे सवाल पूछे। उन्होंने जानना चाहा कि आरएसएस का कानूनी दर्जा क्या है, वह किस कानून या ढांचे के तहत काम करता है, उसका रजिस्ट्रेशन किस रूप में है, उसके पदाधिकारी कौन हैं, संगठन के पास पैसा कहां से आता है, वह कहां खर्च होता है, क्या आरएसएस टैक्स देता है, और अगर वह रजिस्टर्ड नहीं है तो इतनी बड़ी गतिविधियां किस कानूनी आधार पर चल रही हैं।
खड़गे ने इस मुद्दे को केवल राजनीति नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता का सवाल बताया। उनका कहना है कि जब आम नागरिक, एनजीओ, ट्रस्ट, कंपनियां, धार्मिक संस्थाएं और दूसरे संगठन कानून के तहत रजिस्ट्रेशन, ऑडिट और टैक्स जैसे नियमों का पालन करते हैं, तो आरएसएस को इससे बाहर क्यों रखा जाये। उन्होंने कहा कि आरएसएसअपने 100 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है, ऐसे में यह समय सिर्फ उत्सव का नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी होना चाहिए। खड़गे का सीधा संदेश है कि अगर आरएसएस खुद को अनुशासन, राष्ट्रवाद और सेवा का प्रतीक बताता है, तो उसे पारदर्शिता भी दिखानी चाहिए।
लेकिन इन सवालों पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, ‘मुझे इसका जवाब देने की जरूरत नहीं है।’ भागवत ने कहा कि आरएसएस कोई गुप्त संगठन नहीं है। संघ खुले मैदानों में शाखाएं लगाता है, सार्वजनिक रूप से काम करता है और समाज के बीच सक्रिय रहता है।
भागवत ने यह भी कहा कि रजिस्ट्रेशन आमतौर पर उन संस्थाओं के लिए जरूरी होता है जो सरकार से पैसा लेती हैं या किसी विशेष कानूनी लाभ के लिए औपचारिक ढांचा चाहती हैं। उनके मुताबिक आरएसएस ऐसा संगठन नहीं है। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि देश में कई चीजें बिना रजिस्ट्रेशन के चलती हैं और आरएसएस भी उसी तरह एक सामाजिक - सांस्कृतिक संगठन है। भागवत का यह बयान भी चर्चा में है कि ‘हिंदू धर्म भी रजिस्टर्ड नहीं है।’ इस बयान के जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि आरएसएस को किसी कंपनी या संस्था की तरह देखने की कोशिश गलत है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सरकारें आरएसएस को अच्छी तरह जानती हैं, क्योंकि संघ पर पहले तीन बार प्रतिबंध लग चुका है। भागवत के मुताबिक अगर सरकारों ने कभी आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया और बाद में हटाया, तो इसका मतलब यह है कि संघ कोई छिपा हुआ संगठन नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस ने 1950 के दशक में अपना लिखित संविधान सरकार को सौंप दिया था, और तब उससे कभी यह नहीं कहा गया कि उसे अलग से रजिस्ट्रेशन कराना होगा।
हालांकि प्रियंक खड़गे ने कहा कि यह कोई निजी चिट्ठी नहीं है, बल्कि कर्नाटक सरकार की ओर से लिखा गया आधिकारिक पत्र है। इसलिए आरएसएस यह नहीं कह सकता कि जवाब देने की जरूरत नहीं है। खड़गे ने कहा कि जब राज्य सरकार को आरएसएस के कार्यक्रमों और बड़े आयोजनों के लिए सुरक्षा और प्रशासनिक इंतजाम करने पड़ते हैं, तो सरकार को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वह किस संगठन के लिए यह सब कर रही है। खड़गे ने साफ कहा कि यह सवाल वैचारिक लड़ाई का नहीं, बल्कि कानूनी और प्रशासनिक जिम्मेदारी का है।
इस बीच भाजपा ने खड़गे के पत्र को कांग्रेस का राजनीतिक एजेंडा बताया। पार्टी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस अपनी सरकार की नाकामियों और असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए आरएसएस को निशाना बना रही है।
विवाद तब और बढ़ गया जब भाजपा सांसद रमेश जिगाजिनगी ने प्रियंक खड़गे पर हमला करते हुए सवाल किया कि ‘एक दलित को आरएसएस की चिंता क्यों होनी चाहिए? इस बयान ने नई बहस छेड़ दी। खड़गे ने इसका तीखा जवाब दिया और कहा कि वे डरने वालों में नहीं हैं और संविधान के दायरे में सवाल पूछना उनका अधिकार है। खड़गे ने कहा कि किसी भी जनप्रतिनिधि या मंत्री का काम सवाल पूछना और जवाबदेही तय करना है, चाहे सामने कोई भी संगठन हो। जिगाजिनगी के बयान के बाद यह विवाद राजनीतिक और सामाजिक टकराव का रूप भी लेने लगा।
विश्व हिंदू परिषद भी इस विवाद में खुलकर आरएसएस के साथ खड़ी नजर आयी। वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार और संघ परिवार से जुड़े नेताओं का कहना है कि आरएसएस कोई गुप्त संगठन नहीं, बल्कि खुला सामाजिक -सांस्कृतिक संगठन है। वीएचपी का मानना है कि कांग्रेस का यह अभियान दरअसल संघ और हिंदू संगठनों पर राजनीतिक हमला है।
यही वजह है कि यह पूरा विवाद अब केवल एक पत्र या एक जवाब तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस की कोशिश है कि आरएसएस को वैचारिक बहस से निकालकर कानूनी और वित्तीय जवाबदेही के घेरे में लाया जाये। कांग्रेस यह सवाल खड़ा करना चाहती है कि अगर कोई संगठन लाखों लोगों को जोड़ता है, समाज और राजनीति पर असर डालता है, तो उससे पारदर्शिता और कानून के पालन पर सवाल क्यों न पूछे जायें। दूसरी तरफ आरएसएस, भाजपा और वीएचपी इस पूरी कवायद को राजनीतिक बदले की कारवाई या ‘संघ को बदनाम करने की कोशिश’ बता रहे हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आरएसएस प्रियंक खड़गे के पत्र का औपचारिक लिखित जवाब देगा या नहीं। मोहन भागवत ने अभी तक साफ कर दिया है कि उन्हें जवाब देने की जरूरत नहीं लगती। लेकिन खड़गे इस मामले को छोड़ने के मूड में नहीं दिखते। उन्होंने साफ कहा है कि जब राज्य सरकार को संघ के कार्यक्रमों के लिए सुरक्षा और व्यवस्था करनी पड़ती है, तो आरएसएस की कानूनी पहचान और जवाबदेही जानना जरूरी है।
कुल मिलाकर, प्रियंक खड़गे के इस पत्र ने आरएसएस की कानूनी स्थिति, फंडिंग, टैक्स और जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है। अब देखना यह होगा कि यह विवाद सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहता है या आगे चलकर कानूनी, प्रशासनिक या राजनीतिक कारवाई की दिशा भी लेता है। फिलहाल इतना तय है कि आरएसएस पर खड़े हुए ये सवाल जल्दी शांत होते नहीं दिख रहे।
 

नड्डा के हिमाचल दौरे ने बढ़ाई राजनीतिक सरगर्मियां, क्या 2027 की तैयारी शुरू?

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में इन दिनों केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा का दो दिवसीय शिमला दौरा चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। आधिकारिक तौर पर यह दौरा संगठनात्मक और विभिन्न कार्यक्रमों में भागीदारी तक सीमित बताया गया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसके अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। भाजपा नेताओं, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और विभिन्न वर्गों के लोगों से उनकी मुलाकातों ने इस चर्चा को और हवा दी है कि कहीं न कहीं 2027 के विधानसभा चुनावों की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है।
शिमला में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान जब उनसे यह सवाल पूछा गया कि क्या वह भविष्य में दिल्ली की राजनीति छोड़कर हिमाचल की सक्रिय राजनीति में आने की तैयारी कर रहे हैं, तो उन्होंने इस संभावना को पूरी तरह खारिज कर दिया। नड्डा ने स्पष्ट कहा कि उनका वर्तमान दायित्व राष्ट्रीय स्तर पर है और वह दिल्ली में ही अपनी भूमिका निभाते रहेंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हिमाचल में भाजपा के पास जयराम ठाकुर जैसा नेतृत्व मौजूद है और भविष्य की परिस्थितियां समय के साथ तय होंगी।
दौरे के दौरान एक और दिलचस्प सवाल उनके परिवार की राजनीतिक भूमिका को लेकर उठा। उनसे पूछा गया कि क्या उनकी पत्नी या पुत्र भविष्य में राजनीति में प्रवेश करेंगे। इस पर नड्डा ने कहा कि फिलहाल वह स्वयं ही पर्याप्त हैं और परिवार के किसी अन्य सदस्य को राजनीति में लाने का कोई विचार नहीं है। उनके इस बयान को भी राजनीतिक संकेतों के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि उन्होंने परिवारवाद की राजनीति से दूरी का संदेश देने का प्रयास किया।
नड्डा के इस दौरे में कई वरिष्ठ भाजपा नेता उनके साथ दिखाई दिए। हालांकि सबसे अधिक चर्चा पूर्व मंत्री सुरेश भारद्वाज की अनुपस्थिति को लेकर रही। शिमला भाजपा की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले सुरेश भारद्वाज इस दौरे में नजर नहीं आये। राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे सामान्य संयोग मानने के बजाय स्थानीय नेतृत्व की अंदरूनी रणनीतियों से जोड़कर देख रहे हैं।
दरअसल, सुरेश भारद्वाज पिछले कुछ समय से शिमला में लगातार सक्रिय हैं और माना जा रहा है कि वह आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करने में जुटे हैं। भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री पद की संभावित दावेदारी को लेकर मंडी, हमीरपुर, कांगड़ा और शिमला सहित विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं की सक्रियता बढ़ती दिखाई दे रही है।
ऐसे में जगत प्रकाश नड्डा का यह दौरा केवल एक औपचारिक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि भाजपा के भीतर भविष्य के नेतृत्व, संगठनात्मक समीकरणों और 2027 की चुनावी रणनीति को लेकर नए संकेत छोड़ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नड्डा भले ही हिमाचल की राजनीति में सीधे आने से इन्कार कर रहे हों, लेकिन उनके दौरे ने यह संदेश अवश्य दिया है कि भाजपा आगामी चुनावों की तैयारी समय से पहले शुरू कर चुकी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में हिमाचल भाजपा की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है और मुख्यमंत्री पद की संभावित दौड़ में कौन-कौन से चेहरे उभरकर सामने आते हैं।

विकास के दावों के बीच नड्डा के आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में विकास की राजनीति एक बार फिर आंकड़ों के केंद्र में आ गई है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने शिमला में प्रेस वार्ता के दौरान जो आंकड़े सामने रखे, उन्होंने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर केंद्र से हजारों करोड़ रुपये की सहायता मिलने के बावजूद कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं तय गति से आगे क्यों नहीं बढ़ पा रही हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार की प्रशासनिक क्षमता और वित्तीय प्रबंधन पर आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने प्रदेश को हजारों करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाई, लेकिन राज्य सरकार उसका प्रभावी उपयोग करने में विफल रही। उन्होंने कहा कि समस्या धन की कमी नहीं, बल्कि सरकार की कार्यक्षमता और प्राथमिकताओं की है।
नड्डा के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में हिमाचल प्रदेश को विशेष सहायता योजना के तहत 2,381 करोड़ रुपये, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (एनडीआरएफ) से 2,006 करोड़ रुपये तथा बाह्य सहायता प्राप्त परियोजनाओं के लिए 2,150 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सहायता प्रदान की गई। यानी केवल एक वर्ष में ही प्रदेश को 6,500 करोड़ रुपये से अधिक की केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराई गई।
आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में भी निवेश का दावा कम नहीं है। प्रदेश में 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं प्रगति पर हैं, जबकि रेलवे क्षेत्र के लिए 2,911 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड आवंटन किया गया है। 13,168 करोड़ रुपये लागत की चार बड़ी रेल परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इसके अलावा रेणुका जी बांध, लुहरी जलविद्युत परियोजना, आईआईएम सिरमौर, आईआईआईटी ऊना और स्मार्ट सिटी मिशन जैसी परियोजनाओं को भी केंद्र की प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है।
लेकिन दूसरी ओर स्वास्थ्य क्षेत्र के आंकड़े कई सवाल खड़े करते हैं। प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन के तहत स्वीकृत 15 क्रिटिकल केयर ब्लॉकों में से केवल एक ही पूरा हो पाया है। 12 इंटीग्रेटेड पब्लिक हेल्थ लैब्स में भी केवल एक तैयार हुई है। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि 73 स्वीकृत ब्लॉक सार्वजनिक स्वास्थ्य इकाइयों में से एक भी पूरी तरह संचालित नहीं हो सकी। वहीं 15वें वित्त आयोग के तहत स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए स्वीकृत 521 करोड़ रुपये में से लगभग आधी राशि खर्च नहीं हो पाई।
औद्योगिक विकास की तस्वीर भी चिंता बढ़ाने वाली बताई गई। केंद्र सरकार ने अक्तूबर 2022 में बल्क ड्रग पार्क परियोजना को मंजूरी दी थी और इसके लिए 1,000 करोड़ रुपये की अनुदान सहायता स्वीकृत की गई। 225 करोड़ रुपये जारी भी किए गए, लेकिन प्रदेश सरकार केवल 102.13 करोड़ रुपये ही उपयोग कर सकी। पर्यावरणीय मंजूरी मिलने में लगभग तीन वर्ष लगने से परियोजना की गति प्रभावित हुई।
मेडिकल डिवाइस पार्क का मामला भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। 100 करोड़ रुपये लागत वाली यह परियोजना फरवरी 2022 में स्वीकृत हुई थी, लेकिन अक्तूबर 2024 में राज्य सरकार इसके क्रियान्वयन से पीछे हट गई। परिणामस्वरूप केंद्र द्वारा जारी 30 करोड़ रुपये की पहली किस्त भी वापस करनी पड़ी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परियोजनाएं न केवल निवेश लाती हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन का आधार भी बनती हैं।
राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर भी नड्डा ने गंभीर सवाल उठाए। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश पर कर्ज का बोझ एक लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि प्रदेश का पूंजीगत व्यय घटा है, जबकि ऋण और प्रतिबद्ध देनदारियां लगातार बढ़ रही हैं। उनके अनुसार राज्य का कर्ज सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के 41 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो वित्तीय अनुशासन पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने कहा कि परिसंपत्तियों के निर्माण की बजाय सरकार उधार लेकर नियमित खर्च चला रही है। ऐसे में सवाल केवल नई परियोजनाओं का नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों के प्रभावी उपयोग का भी है।
नड्डा ने कहा कि हाल के स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों के परिणामों ने भी जनता की नाराजगी के संकेत दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि जनता सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं है और विकास योजनाओं के धरातल पर क्रियान्वयन को लेकर सवाल लगातार बढ़ रहे हैं।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद केंद्र सरकार हिमाचल प्रदेश के विकास में कोई कमी नहीं आने देगी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में प्रदेश को आवश्यक वित्तीय सहायता और परियोजनाओं की स्वीकृति मिलती रहेगी, लेकिन राज्य सरकार को उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना होगा।
राजनीतिक दृष्टि से नड्डा का यह हमला ऐसे समय आया है जब प्रदेश की वित्तीय स्थिति, परियोजनाओं की प्रगति और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर कांग्रेस सरकार पहले से विपक्ष के निशाने पर है। भाजपा अब केंद्र द्वारा दी गई सहायता और उसके उपयोग के मुद्दे को प्रमुख राजनीतिक हथियार के रूप में सामने लाने की रणनीति पर काम करती दिख रही है।

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