Tuesday, 04 August 2026
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विकास के दावों के बीच नड्डा के आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में विकास की राजनीति एक बार फिर आंकड़ों के केंद्र में आ गई है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने शिमला में प्रेस वार्ता के दौरान जो आंकड़े सामने रखे, उन्होंने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर केंद्र से हजारों करोड़ रुपये की सहायता मिलने के बावजूद कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं तय गति से आगे क्यों नहीं बढ़ पा रही हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार की प्रशासनिक क्षमता और वित्तीय प्रबंधन पर आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने प्रदेश को हजारों करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाई, लेकिन राज्य सरकार उसका प्रभावी उपयोग करने में विफल रही। उन्होंने कहा कि समस्या धन की कमी नहीं, बल्कि सरकार की कार्यक्षमता और प्राथमिकताओं की है।
नड्डा के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में हिमाचल प्रदेश को विशेष सहायता योजना के तहत 2,381 करोड़ रुपये, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (एनडीआरएफ) से 2,006 करोड़ रुपये तथा बाह्य सहायता प्राप्त परियोजनाओं के लिए 2,150 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सहायता प्रदान की गई। यानी केवल एक वर्ष में ही प्रदेश को 6,500 करोड़ रुपये से अधिक की केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराई गई।
आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में भी निवेश का दावा कम नहीं है। प्रदेश में 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं प्रगति पर हैं, जबकि रेलवे क्षेत्र के लिए 2,911 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड आवंटन किया गया है। 13,168 करोड़ रुपये लागत की चार बड़ी रेल परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इसके अलावा रेणुका जी बांध, लुहरी जलविद्युत परियोजना, आईआईएम सिरमौर, आईआईआईटी ऊना और स्मार्ट सिटी मिशन जैसी परियोजनाओं को भी केंद्र की प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है।
लेकिन दूसरी ओर स्वास्थ्य क्षेत्र के आंकड़े कई सवाल खड़े करते हैं। प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन के तहत स्वीकृत 15 क्रिटिकल केयर ब्लॉकों में से केवल एक ही पूरा हो पाया है। 12 इंटीग्रेटेड पब्लिक हेल्थ लैब्स में भी केवल एक तैयार हुई है। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि 73 स्वीकृत ब्लॉक सार्वजनिक स्वास्थ्य इकाइयों में से एक भी पूरी तरह संचालित नहीं हो सकी। वहीं 15वें वित्त आयोग के तहत स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए स्वीकृत 521 करोड़ रुपये में से लगभग आधी राशि खर्च नहीं हो पाई।
औद्योगिक विकास की तस्वीर भी चिंता बढ़ाने वाली बताई गई। केंद्र सरकार ने अक्तूबर 2022 में बल्क ड्रग पार्क परियोजना को मंजूरी दी थी और इसके लिए 1,000 करोड़ रुपये की अनुदान सहायता स्वीकृत की गई। 225 करोड़ रुपये जारी भी किए गए, लेकिन प्रदेश सरकार केवल 102.13 करोड़ रुपये ही उपयोग कर सकी। पर्यावरणीय मंजूरी मिलने में लगभग तीन वर्ष लगने से परियोजना की गति प्रभावित हुई।
मेडिकल डिवाइस पार्क का मामला भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। 100 करोड़ रुपये लागत वाली यह परियोजना फरवरी 2022 में स्वीकृत हुई थी, लेकिन अक्तूबर 2024 में राज्य सरकार इसके क्रियान्वयन से पीछे हट गई। परिणामस्वरूप केंद्र द्वारा जारी 30 करोड़ रुपये की पहली किस्त भी वापस करनी पड़ी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परियोजनाएं न केवल निवेश लाती हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन का आधार भी बनती हैं।
राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर भी नड्डा ने गंभीर सवाल उठाए। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश पर कर्ज का बोझ एक लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि प्रदेश का पूंजीगत व्यय घटा है, जबकि ऋण और प्रतिबद्ध देनदारियां लगातार बढ़ रही हैं। उनके अनुसार राज्य का कर्ज सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के 41 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो वित्तीय अनुशासन पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने कहा कि परिसंपत्तियों के निर्माण की बजाय सरकार उधार लेकर नियमित खर्च चला रही है। ऐसे में सवाल केवल नई परियोजनाओं का नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों के प्रभावी उपयोग का भी है।
नड्डा ने कहा कि हाल के स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों के परिणामों ने भी जनता की नाराजगी के संकेत दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि जनता सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं है और विकास योजनाओं के धरातल पर क्रियान्वयन को लेकर सवाल लगातार बढ़ रहे हैं।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद केंद्र सरकार हिमाचल प्रदेश के विकास में कोई कमी नहीं आने देगी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में प्रदेश को आवश्यक वित्तीय सहायता और परियोजनाओं की स्वीकृति मिलती रहेगी, लेकिन राज्य सरकार को उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना होगा।
राजनीतिक दृष्टि से नड्डा का यह हमला ऐसे समय आया है जब प्रदेश की वित्तीय स्थिति, परियोजनाओं की प्रगति और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर कांग्रेस सरकार पहले से विपक्ष के निशाने पर है। भाजपा अब केंद्र द्वारा दी गई सहायता और उसके उपयोग के मुद्दे को प्रमुख राजनीतिक हथियार के रूप में सामने लाने की रणनीति पर काम करती दिख रही है।

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