गारंटीयों से ‘सुखी परिवार’ तक सवालों के घेरे में सुक्खू सरकार
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Created on Thursday, 16 July 2026 13:47
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की राजनीति अब नए दौर में पहुंच चुकी है। विपक्ष ने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू सरकार के खिलाफ कई मुद्दों को एक साथ जोड़कर बड़ा राजनीतिक अभियान शुरू कर दिया है। चुनावी गारंटियां, घटता बजट, बढ़ता कर्ज, सरकारी योजनाओं की रफ्रतार, एचआरटीसी की बदहाल स्थिति और प्रशासनिक फैसले अब भाजपा के प्रमुख हमले का आधार बन गए हैं। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर लगातार इन मुद्दों को उठाकर सरकार को घेर रहे हैं। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को ‘गारंटी बनाम हकीकत’ के मुद्दे पर लड़ने की तैयारी कर रही है।
सबसे ज्यादा विवाद मुख्यमंत्री की प्रस्तावित ‘सुखी परिवार योजना’ को लेकर है। भाजपा का आरोप है कि सरकार नई योजनाओं की घोषणा तो कर रही है, लेकिन उनके लिए बजट की व्यवस्था नहीं है। विपक्ष का कहना है कि समाज कल्याण विभाग का बजट पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 63 प्रतिशत घटकर 1618 करोड़ रुपये से 604 करोड़ रुपये रह गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नई योजना का खर्च सरकार कैसे उठाएगी। भाजपा का दावा है कि जब पुरानी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का भुगतान समय पर नहीं हो पा रहा, तब नई योजनाएं केवल घोषणा बनकर रह सकती हैं।
विपक्ष का हमला केवल बजट तक सीमित नहीं है। जयराम ठाकुर ने मुख्यमंत्री की कई योजनाओं को ‘चाइनीज खिलौना’ बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार पहले बड़ी घोषणा करती है, लेकिन बाद में योजनाएं ठंडी पड़ जाती हैं। भाजपा का कहना है कि सरकार जमीन पर काम करने की बजाय प्रचार पर ज्यादा ध्यान दे रही है। विपक्ष दावा कर रहा है कि विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार फ्रलैगशिप योजनाओं पर खर्च कम हुआ, जबकि प्रचार-प्रसार पर ज्यादा पैसा खर्च किया गया।
भाजपा अब कांग्रेस की चुनावी गारंटियों को सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रही है। विपक्ष लगातार पूछ रहा है कि पांच लाख रोजगार, महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये, 300 यूनिट मुफ्त बिजली, दूध के बढ़े हुए समर्थन मूल्य और अन्य चुनावी वादों की स्थिति क्या है। भाजपा का कहना है कि जनता अब घोषणाएं नहीं, बल्कि उनका परिणाम देखना चाहती है।
सरकार की कार्यशैली भी विपक्ष के निशाने पर है। जयराम ठाकुर का आरोप है कि फैसले संस्थागत व्यवस्था के बजाय कुछ चुनिंदा लोगों के प्रभाव में लिए जा रहे हैं। भाजपा का दावा है कि सरकार के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है और कई मंत्री अपनी बात प्रभावी ढंग से नहीं रख पा रहे हैं। हालांकि सरकार इन आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बताती रही है।
आर्थिक मोर्चे पर बढ़ते कर्ज को लेकर भी भाजपा लगातार सवाल उठा रही है। जयराम ठाकुर का कहना है कि मौजूदा सरकार ने साढ़े तीन साल में लगभग 45 हजार करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया है और राज्य की कुल देनदारी 1.15 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच गई है। भाजपा पूछ रही है कि यदि इतना बड़ा कर्ज लिया गया है तो उसका असर विकास कार्यों और जनता को मिलने वाली सुविधाओं में क्यों दिखाई नहीं दे रहा।
एचआरटीसी की हालत भी अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। बसों में टायर और स्पेयर पार्ट्स की कमी, कई रूटों पर सेवाओं का प्रभावित होना, कर्मचारियों के वेतन और पेंशन से जुड़े मुद्दों को विपक्ष सरकार की आर्थिक स्थिति से जोड़ रहा है। भाजपा का आरोप है कि परिवहन निगम की बिगड़ती व्यवस्था का सीधा असर आम यात्रियों पर पड़ रहा है।
इसके अलावा भाजपा सरकार पर आपदा राहत, संस्थानों को बंद करने, कॉलेजों के फैसलों और विभिन्न परियोजनाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर भी सवाल उठा रही है। विपक्ष इन सभी मुद्दों को जोड़कर यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि सरकार प्रशासनिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर दबाव में है।
यदि सरकार की चुनावी गारंटियां और घोषणाएं कागजों तक सीमित रहीं, तो भाजपा का ‘वादे बनाम हकीकत’ अभियान 2027 के विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। ऐसे में हिमाचल की राजनीति का अगला अध्याय अब सरकार के दावों से ज्यादा उसके प्रदर्शन पर तय होगा।
क्या सुक्खू सरकार उसी शिक्षा मॉडल को अपना रही है, जिसका कांग्रेस देशभर में विरोध करती रही है?
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Created on Wednesday, 08 July 2026 13:03
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में सरकारी स्कूलों को चरणबद्ध तरीके से सीबीएसई बोर्ड से जोड़ने के फैसले ने एक नई राजनीतिक और वैचारिक बहस छेड़ दी है। सरकार का कहना है कि इससे प्रदेश के छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर अवसर मिलेंगे और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा। लेकिन शिक्षा के क्षेत्रा से जुड़े लोग इसे केवल शिक्षा सुधार का फैसला नहीं मान रहे हैं। उनका सवाल है कि क्या कांग्रेस सरकार उसी शिक्षा व्यवस्था को अपना रही है, जिसे लेकर वह केंद्र की भाजपा सरकार पर लगातार निशाना साधती रही है?
असल विवाद केवल सीबीएसई बोर्ड को लेकर नहीं है। विवाद उस एनसीईआरटी पाठयक्रम को लेकर है, जो सीबीएसई स्कूलों में पढ़ाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में एनसीईआरटी की इतिहास, राजनीति विज्ञान और समाज विज्ञान की किताबों में कई बदलाव किए गए हैं। इन बदलावों पर देशभर में बहस हुई। कई इतिहासकारों, शिक्षाविदों और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि किताबों से कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं और व्यक्तित्वों को कम महत्व दिया गया या हटाया गया।
आलोचकों का कहना है कि नई किताबों में मुगल काल, दिल्ली सल्तनत, महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगों और भारतीय मुसलमानों के इतिहास से जुड़े कुछ हिस्सों में बदलाव किए गए हैं। वहीं भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन भारत, सांस्कृतिक विरासत और कुछ आध्यात्मिक विषयों को पहले की तुलना में अधिक जगह दी गई है। इन बदलावों का कई शिक्षाविदों ने विरोध किया और कहा कि इतिहास को संतुलित रूप में पढ़ाया जाना चाहिए, न कि किसी एक दृष्टिकोण से।
दूसरी ओर केंद्र सरकार और एनसीईआरटी का पक्ष अलग है। उनका कहना है कि यह बदलाव नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति और नए पाठयक्रम के तहत किए गए हैं। उनका दावा है कि पाठयक्रम को छात्रों के लिए सरल बनाया गया है और भारतीय संस्कृति, परंपरा तथा ज्ञान प्रणाली को उचित स्थान दिया गया है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि पाठयक्रम को अधिक प्रासंगिक बनाना है।
यहीं से हिमाचल की राजनीति में सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर कई बार केंद्र सरकार की शिक्षा नीति और पाठयक्रम में किए गए बदलावों का विरोध करती रही है। ऐसे में अब जब हिमाचल की कांग्रेस सरकार सरकारी स्कूलों में सीबीएसई लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, तो अब यह सवाल उठ रहा है कि यदि पाठयक्रम पर आपत्ति थी, तो उसी बोर्ड को अपनाने की जरूरत क्यों पड़ी?
हालांकि सरकार तर्क दे रही है कि आज देश की लगभग सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाएं-जेईई, नीट और सीयूईटी-एनसीईआरटी आधारित होती हैं। निजी स्कूलों और केंद्रीय विद्यालयों के अधिकांश छात्रा सीबीएसई से पढ़ते हैं। ऐसे में सरकार का मानना है कि यदि हिमाचल के सरकारी स्कूलों के छात्रों को समान अवसर देने हैं, तो उन्हें भी उसी बोर्ड से जोड़ना जरूरी है।
लेकिन उसका दूसरा पक्ष यह है कि क्या हिमाचल के अपने इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन में प्रदेश के योगदान, पहाड़ी संस्कृति, लोक परंपराओं और स्थानीय नायकों को नई व्यवस्था में पर्याप्त स्थान मिलेगा। यदि पूरा ध्यान केवल राष्ट्रीय पाठयक्रम पर रहेगा, तो प्रदेश की स्थानीय पहचान और इतिहास कमजोर पड़ने का खतरा भी जताया जा रहा है।
राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला आने वाले समय में बड़ा मुद्दा बन सकता है। इसे भाजपा को मौका मिल गया है कि जिस शिक्षा नीति और पाठयक्रम में किए गए बदलावों पर कांग्रेस ने केन्द्र में सवाल खडे किये थे प्रदेश कि कांग्रेस सरकार ने उसे अपना कर कांग्रेस केे उस विरोध् पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। अब प्रदेश को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वह केवल सीबीएसई की परीक्षा प्रणाली अपना रही है या पाठयक्रम में मौजूद विवादित बदलावों से भी पूरी तरह सहमत है। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि नई पीढ़ी की सोच और इतिहास की समझ तैयार करने का आधार भी होती है।
फिलहाल इतना तय है कि हिमाचल में सीबीएसई स्कूलों की शुरुआत केवल शिक्षा सुधार का विषय नहीं रह गई है। यह अब शिक्षा, राजनीति और विचारधारा-तीनों के केंद्र में आ चुकी है। आने वाले दिनों में सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने के साथ-साथ इतिहास की संतुलित समझ और हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत को कैसे सुरक्षित रखेगी। यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होगा।
कांग्रेस का नेता प्रतिपक्ष पर पलटवार मुकद्दमों का फैसला अदालत करेगी, भाजपा नहीं
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Created on Thursday, 02 July 2026 08:29
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में अधिकारियों और कर्मचारियों को लेकर सियासी टकराव और तेज हो गया है। नेता प्रतिपक्ष जय राम ठाकुर और भाजपा नेताओं के बयानों के बाद अब कांग्रेस सरकार के दो वरिष्ठ मंत्री ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह और तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी ने भाजपा पर तीखा हमला बोला है। दोनों मंत्रियों ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों पर राजनीतिक दबाव बनाने तथा उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश कर रही है, जिससे उसका कर्मचारी विरोधी चेहरा एक बार फिर सामने आ गया है।
मंत्रियों ने कहा कि किसी भी मामले में दर्ज मुकद्दमे सही हैं या गलत, इसका फैसला अदालतों को करना है, न कि राजनीतिक नेताओं को। उन्होंने कहा कि यदि किसी मामले में जांच चल रही है तो उसे कानून के अनुसार पूरा होने देना चाहिए। सार्वजनिक मंचों से यह कहना कि मुकद्दमे गलत हैं या अधिकारियों को भविष्य में परिणाम भुगतने होंगे, न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों पर दबाव बनाने जैसा है।
कांग्रेस के दोनों मंत्रियों ने नेता प्रतिपक्ष जय राम ठाकुर से सवाल किया कि क्या उनके मुख्यमंत्री रहते हुए मुकद्दमे दर्ज नहीं होते थे। यदि उस समय कानून के तहत दर्ज मामलों को सही माना जाता था तो अब वही प्रक्रिया गलत कैसे हो गई। उन्होंने कहा कि भाजपा का यह रुख उसकी दोहरी राजनीति और अवसरवादी सोच को दर्शाता है।
अनिरुद्ध सिंह और राजेश धर्माणी ने आरोप लगाया कि भाजपा का रिकॉर्ड कर्मचारियों और अधिकारियों के हितों के प्रति कभी सकारात्मक नहीं रहा। उन्होंने कहा कि पुरानी पेंशन योजना का विरोध हो या कर्मचारियों के अन्य अधिकारों का मामला, भाजपा ने हमेशा कर्मचारी हितों की अनदेखी की। इसके विपरीत वर्तमान कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के बाद पुरानी पेंशन योजना लागू कर कर्मचारियों से किया गया बड़ा वादा पूरा किया।
मंत्रियों ने भाजपा पर आंतरिक संकट का भी आरोप लगाया। उनका कहना था कि पार्टी इस समय गुटबाजी और नेतृत्व संकट से जूझ रही है। ऐसे में जनता का ध्यान इन समस्याओं से हटाने के लिए भाजपा सरकार और प्रशासन के खिलाफ विवाद खड़े कर रही है तथा अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।
दोनों मंत्रियों ने कहा कि प्रदेश सरकार प्रशासनिक निष्पक्षता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है और किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को राजनीतिक दबाव में काम करने की जरूरत नहीं है। सरकार ऐसे सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ खड़ी है जो कानून के दायरे में रहकर अपने दायित्व निभा रहे हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि निष्पक्ष तरीके से काम करने वाले अधिकारियों को सरकार पूरा संरक्षण देगी।
वित्तीय मामलों को लेकर भी कांग्रेस ने भाजपा सरकार को घेरा। मंत्रियों का दावा है कि पूर्व भाजपा सरकार को आरडीजी और जीएसटी क्षतिपूर्ति के रूप में केंद्र से लगभग 60 हजार करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता मिली थी, लेकिन इसके बावजूद कर्मचारियों को वेतन आयोग के एरियर और अन्य वित्तीय लाभ नहीं दिए गए। उनका कहना है कि मौजूदा कांग्रेस सरकार कर्मचारियों और अधिकारियों के हितों की रक्षा के लिए लगातार कदम उठा रही है।
कांग्रेस ने भाजपा पर धमकी और दबाव की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदेश की जनता सब देख रही है और समय आने पर इसका जवाब देगी।
यह बयान ऐसे समय आया है जब प्रदेश में प्रशासनिक फैसलों, दर्ज मुकद्दमों और अधिकारियों की भूमिका को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। भाजपा जहां सरकार पर राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप लगा रही है, वहीं कांग्रेस इसे कानून के अनुसार चल रही प्रक्रिया बताते हुए भाजपा पर न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश का आरोप लगा रही है। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में अधिकारियों, कर्मचारियों और कानून व्यवस्था से जुड़े मुद्दे हिमाचल की राजनीति के प्रमुख चुनावी और राजनीतिक विषय बने रह सकते हैं।