शिमला/शैल। संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त 2026 को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। यह सत्र विधायी कामकाज से ज्यादा हंगामे, विरोध और सरकार-विपक्ष के बीच टकराव का रहा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश के गंभीर मुद्दों पर संसद में खुलकर चर्चा नहीं हो सकती, तो आखिर लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था की उपयोगिता क्या रह जाती है?
मानसून सत्र की शुरुआत ही छात्रों के आंदोलन से जुड़े विवाद के साथ हुई। 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च कर रहे छात्रों और युवाओं पर पुलिस कारवाई हुई। प्रदर्शनकारियों ने परीक्षा में कथित अनियमितताओं और युवाओं से जुड़े सवालों को लेकर संसद तक मार्च का आहवान किया था। पुलिस ने बैरिकेडिंग की और मार्च को रोकने के लिए लाठीचार्ज तथा आंसू गैस का इस्तेमाल किया। कई प्रदर्शनकारियों के घायल होने की खबरें सामने आईं।
यहां से एक बड़ा सवाल पैदा हुआ। अगर देश के युवा अपनी समस्याएं लेकर संसद तक पहुंचना चाहते हैं और वहां उन्हें रोक दिया जाता है, तो उनकी आवाज आखिर कहां सुनी जाएगी? सड़क पर आंदोलन करने वालों पर कारवाई हो सकती है, लेकिन संसद तो वह जगह है जहां जनता के सवालों का जवाब सरकार को देना होता है।
छात्र आंदोलन का मुद्दा संसद में उठा। विपक्ष लगातार पुलिस कारवाई और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की मांग करता रहा। गृह मंत्री अमित शाह से जवाब की मांग की गई। विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पूरे सत्र के दौरान सदन से नदारद रहे। सत्र के दौरान प्रधानमंत्री 20 जुलाई को सत्र की शुरुआत के अवसर पर और 13 अगस्त को अंतिम दिन लोकसभा में मौजूद थे। गृह मंत्री अमित शाह की स्थिति इससे भी अधिक राजनीतिक विवाद का विषय बनी। विपक्ष ने आरोप लगाया कि गृह मंत्री 13 अगस्त को पहली बार इस मानसून सत्र में लोकसभा पहुंचे, यानी सत्र के 18 दिन बीत जाने के बाद सदन में पहंुचे। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि वह सत्र की शुरुआत से ही नियमित रूप से संसद आ रहे थे। विपक्ष लगातार उनसे 20 जुलाई को छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्यवाही और कथित बल प्रयोग को लेकर जवाब मांगता रहा। अमित शाह ने 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर कहा कि वे छात्रों के प्रदर्शन से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार हैं और विपक्ष के सभी सवालों का जवाब देने के लिए सदन में मौजूद रहेंगे। लेकिन सवाल यह है कि यह प्रस्ताव पहले क्यों नहीं आया? यदि सरकार को विश्वास था कि गृह मंत्री हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं तो विपक्ष की लगातार मांग के बीच इस मुद्दे पर शुरुआती दिनों में ही चर्चा क्यों नहीं कराई गई? अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों सदन में मौजूद रहे, लेकिन उस दिन भी चर्चा नहीं हो सकी।
सबसे गंभीर सवाल संसद के कामकाज को लेकर है। सरकार कह रही है कि विधायी कामकाज हुआ और कई विधेयक पारित हुए। लेकिन सवाल यह है कि विधेयक कितनी गंभीर चर्चा के बाद पारित हुए? उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मानसून सत्र में 12 विधेयक पारित हुए, जबकि लोकसभा में कामकाज केवल करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा का करीब 39 प्रतिशत रहा।
इस पूरे सत्र की सबसे बड़ी चिंता यह है कि एक तरफ विधेयक पारित हो रहे हैं, दूसरी तरफ सदन का बहुत कम समय काम कर रहा है। यदि संसद में विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा नहीं होगी, विपक्ष को सवाल पूछने का पूरा अवसर नहीं मिलेगा और सरकार से जवाब नहीं मांगा जाएगा, तो कानून बनाने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी मानी जाएगी?
संसद केवल विधेयक पास करने की जगह नहीं है। संसद का मूल काम सरकार से सवाल पूछना, नीतियों पर चर्चा करना, जनता की समस्याओं को उठाना और सरकार को जवाबदेह बनाना है। विपक्ष का काम केवल सरकार का विरोध करना भी नहीं है और सरकार का काम केवल बहुमत के आधार पर विधेयक पारित कराना भी नहीं है। लोकतंत्र में दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है कि सदन चले और जनता के मुद्दों पर चर्चा हो।
यहां सरकार और विपक्ष दोनों को अपनी भूमिका पर गंभीरता से विचार करना होगा। विपक्ष को भी यह समझना होगा कि लगातार हंगामा और सदन की कार्यवाही रोकना जनता के हित में नहीं है। वहीं सरकार को भी यह स्वीकार करना होगा कि बहुमत के आधार पर हर महत्वपूर्ण सवाल को चर्चा से बाहर नहीं किया जा सकता। यदि विपक्ष किसी मुद्दे पर जवाब मांग रहा है, तो सरकार को सदन में उसका जवाब देना चाहिए। संसद में बहस की जगह यदि टकराव ले लेता है, तो नुकसान किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का होता है।
आज देश के युवाओं के सामने रोजगार और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल हैं। किसानों के सामने खेती और आय के सवाल हैं। महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे लगातार जनता के सामने हैं। इन सवालों पर संसद में चर्चा नहीं होगी तो फिर कहां होगी?
लोकतंत्र में सड़क का आंदोलन भी जरूरी है, लेकिन सड़क संसद का विकल्प नहीं हो सकती। संसद वह स्थान है जहां आंदोलन से उठे सवालों को नीति और कानून में बदलने की जिम्मेदारी सांसदों की होती है। यदि सड़क पर उठे सवाल संसद तक पहुंचने के बाद भी चर्चा से बाहर रह जाते हैं, तो लोकतंत्र के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है।
इसलिए अब सवाल केवल यह नहीं है कि मानसून सत्र में कितने विधेयक पारित हुए। असली सवाल यह है कि उन विधेयकों और देश के ज्वलंत मुद्दों पर कितनी गंभीर चर्चा हुई?
अगर संसद में जनता के सवालों पर बहस नहीं होगी, तो सवाल उठेंगे ही। कभी जंतर-मंतर पर, कभी सड़कों पर और कभी गली-मोहल्लों में। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि जनता के सवाल सड़क पर उठने से पहले संसद में सुने जाएं और सड़क पर उठे सवाल संसद में पहुंचने के बाद दबाए नहीं, बल्कि उनका जवाब दिया जाए।
मानसून सत्र ने इसी बुनियादी सवाल को फिर सामने खड़ा कर दिया है जब संसद में सवाल पूछने और जवाब देने का समय ही नहीं बचेगा, तो जनता अपने सवाल आखिर किससे पूछेगी?