Tuesday, 04 August 2026
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जंतर-मंतर से उठी चिंगारी से संसद तक सियासी संग्राम

शिमला/शैल। दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया है। युवाओं और छात्रों का आंदोलन अब केवल धरना-प्रदर्शन नहीं रहा, बल्कि यह सरकार और विपक्ष के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई में बदलता नजर आ रहा है। संसद का मानसून सत्र चल रहा है, बाहर हजारों प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर डटे हैं और भीतर विपक्ष सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। इस पूरे घटनाक्रम ने सरकार की कार्यशैली, विपक्ष की राजनीति और युवाओं की नाराजगी पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रदर्शनकारी साफ कह रहे हैं कि उनकी लड़ाई किसी दल के लिए नहीं, बल्कि अपने भविष्य के लिए है। उनका आरोप है कि भर्ती परीक्षाओं में लगातार विवाद, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और जवाबदेही की कमी ने लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर लगा दिया है। उनका कहना है कि सरकार बार-बार जांच और सुधार का भरोसा देती है, लेकिन जमीन पर हालात नहीं बदलते। यही कारण है कि आंदोलन दिल्ली की सड़कों तक पहुंच गया।
केंद्र सरकार का दावा है कि युवाओं के मुद्दों को गंभीरता से लिया जा रहा है और सुधार की प्रक्रिया जारी है। सरकार का कहना है कि कुछ राजनीतिक दल इस आंदोलन को हवा देकर राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं। सरकार यह भी कह रही है कि विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन संसद की सुरक्षा और कानून- व्यवस्था से समझौता नहीं किया जा सकता। यही वजह रही कि संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया और कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
यहीं से विपक्ष को सरकार पर हमला करने का बड़ा अवसर मिल गया। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी सहित कई विपक्षी दलों ने आंदोलनकारियों के समर्थन में खुलकर आवाज उठाई। विपक्ष का आरोप है कि सरकार युवाओं की समस्याओं का समाधान करने के बजाये पुलिस बल का इस्तेमाल कर रही है। संसद के भीतर भी विपक्ष ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और सरकार से जवाब मांगा।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष भी इस आंदोलन को केवल जनहित के मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि सरकार को घेरने के प्रभावी हथियार के रूप में देख रहा है। विपक्षी दलों के नेताओं की जंतर-मंतर पर लगातार मौजूदगी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। दूसरी तरफ भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष युवाओं की भावनाओं का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है।
इस आंदोलन ने जनता को भी दो हिस्सों में बांट दिया है। बड़ी संख्या में छात्र, अभिभावक और सामाजिक संगठन प्रदर्शनकारियों की मांगों को जायज बता रहे हैं। उनका कहना है कि यदि युवाओं को समय पर रोजगार और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया नहीं मिलेगी तो उनका आक्रोश स्वाभाविक है। वहीं समाज का एक वर्ग यह भी मानता है कि विरोध का अधिकार लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन संसद और संवेदनशील क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
सोशल मीडिया पर भी आंदोलन को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है। एक ओर सरकार के समर्थन में अभियान चल रहे हैं तो दूसरी ओर आंदोलनकारियों के समर्थन में लाखों पोस्ट साझा की जा रही हैं। इससे साफ है कि यह मुद्दा अब केवल दिल्ली का नहीं, बल्कि पूरे देश की चर्चा का विषय बन चुका है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस आंदोलन का सबसे बड़ा असर संसद की कार्यवाही पर पडे़गा । विपक्ष लगातार इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहा है, जबकि सरकार इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश का आरोप लगा रही है। ऐसे में वास्तविक मुद्दे-युवाओं की समस्याएं, भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और रोजगार-सियासी आरोप-प्रत्यारोप के बीच दबते हुए भी दिखाई दे रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह आंदोलन केवल कुछ दिनों का विरोध बनकर रह जाएगा या फिर सरकार को नीतिगत बदलाव करने के लिए मजबूर करेगा। फिलहाल जंतर-मंतर पर बैठे प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, सरकार अपने रुख पर कायम है और विपक्ष इस मुद्दे को संसद से लेकर सड़क तक उठाने में जुटा है।
स्पष्ट है कि जंतर-मंतर का यह आंदोलन अब केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि देश की राजनीति की नई परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि सरकार संवाद का रास्ता चुनती है या टकराव का, विपक्ष जनहित की राजनीति करता है या केवल सियासी अवसर तलाशता है, और सबसे महत्वपूर्ण-क्या देश के युवाओं की आवाज वास्तव में नीति निर्माण तक पहुंच पाती है या फिर यह मुद्दा भी राजनीतिक शोर में दबकर रह जाता है।

हिमाचल में कचरा और सीवेज प्रबंधन की खुली पोल, एनजीटी ने सरकार को 32 मोर्चों पर लगाई फटकार

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में कचरा और सीवेज के प्रबंधन को लेकर एनजीटी ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। एनजीटी ने साफ कहा है कि राज्य में ठोस कचरे और सीवेज के वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था अभी भी गंभीर रूप से कमजोर है। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि नदियां, खडडें और भूजल भी प्रदूषित हो रहे हैं। इसी कारण अधिकरण ने राज्य सरकार, शहरी विकास विभाग, जल शक्ति विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सभी स्थानीय निकायों को 32 बिंदुओं पर समयबद्ध कारवाई के निर्देश दिए हैं।
एनजीटी के सामने पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश के शहरी क्षेत्रों से हर दिन लगभग 420.82 टन ठोस कचरा निकलता है। हालांकि अधिकांश कचरा एकत्र किया जा रहा है, लेकिन करीब 20.48 टन कचरा आज भी लोगों के घरों और बाजारों से नहीं उठाया जा रहा है। यह कचरा खुले स्थानों, नालों और खाली जमीन पर पड़ा रहता है, जिससे गंदगी और प्रदूषण फैलता है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि करीब 20.87 टन कचरे का निस्तारण अब भी वैज्ञानिक तरीके से नहीं हो रहा। इसे अस्थायी डंपिंग स्थलों पर फेंक दिया जाता है, जहां न तो उसका सही उपचार होता है और न ही पर्यावरण सुरक्षा के मानकों का पालन किया जाता है। बरसात के दौरान ऐसे डंपिंग स्थलों से निकलने वाला दूषित पानी आसपास की जमीन और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकता है।
सबसे गंभीर चिंता सीवेज प्रबंधन को लेकर जताई गई। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में प्रतिदिन 159.12 मिलियन लीटर गंदा पानी निकलता है, लेकिन उपचार संयंत्रों में केवल 88.29 मिलियन लीटर सीवेज का ही शोधन हो रहा है। इसका मतलब है कि करीब 71 मिलियन लीटर, यानी लगभग 45 प्रतिशत गंदा पानी बिना किसी उपचार के सीधे नदियों, खड्डों और अन्य जल स्रोतों में पहुंच रहा है।
हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य में, जहां अधिकांश पेयजल स्रोत प्राकृतिक जलधाराओं पर निर्भर हैं, यह स्थिति और भी गंभीर मानी जा रही है। एनजीटी ने कहा कि यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो पर्यावरण के साथ-साथ लोगों के स्वास्थ्य पर भी इसका बड़ा असर पड़ेगा।
अधिकरण ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सभी शहरों और कस्बों में घर-घर से कचरा संग्रहण की व्यवस्था पूरी तरह सुनिश्चित की जाए। हर स्तर पर गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग एकत्र करने की व्यवस्था लागू की जाए ताकि रीसाइक्लिंग और खाद बनाने की प्रक्रिया बेहतर हो सके।
एनजीटी ने पुराने डंपिंग स्थलों पर वर्षों से जमा लीगेसी वेस्ट को प्राथमिकता के आधार पर हटाने के निर्देश भी दिए हैं। कई स्थानों पर वर्षों से जमा हजारों टन कचरा पर्यावरण के लिए खतरा बना हुआ है। इसे वैज्ञानिक तरीके से साफ कर जमीन को दोबारा उपयोग योग्य बनाने के लिए कहा गया है।
अधिकरण ने यह भी निर्देश दिए कि सभी शहरी निकायों में मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी, कंपोस्ट प्लांट और आधुनिक कचरा प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना की जाए। जहां संभव हो वहां बायो-सीएनजी और वेस्ट-टू -एनर्जी जैसी परियोजनाओं को भी बढ़ावा दिया जाए ताकि कचरे को संसाधन में बदला जा सके।
ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति पर भी एनजीटी ने चिंता जताई। अधिकरण ने सरकार को निर्देश दिया कि चार सप्ताह के भीतर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग और प्रभावी ठोस कचरा प्रबंधन योजना तैयार की जाए। पंचायतों में भी कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था विकसित करने के लिए कहा गया है।
सीवेज प्रबंधन में सुधार के लिए एनजीटी ने नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने, पुराने संयंत्रों की क्षमता बढ़ाने और जहां सीवर नेटवर्क नहीं है वहां जल्द पाइपलाइन बिछाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही उपचारित पानी का सिंचाई और अन्य कार्यों में दोबारा उपयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।
अधिकरण ने सभी स्थानीय निकायों को खुले में कचरा जलाने पर पूरी तरह रोक लगाने, प्लास्टिक कचरे के बेहतर प्रबंधन, निर्माण एवं ध्वस्तीकरण कचरे के अलग निस्तारण, इलेक्ट्रॉनिक कचरे और जैव-चिकित्सा कचरे के लिए अलग व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं।
इसके अलावा जिला प्रशासन को प्रत्येक नगर निकाय में कचरा प्रबंधन के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध कराने, वर्षा जल निकासी नालों के किनारे पौधारोपण करने और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सभी सीवेज संयंत्रों की नियमित निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं। नियमों का उल्लंघन करने वाले निकायों और एजेंसियों के खिलाफ कारवाई करने को भी कहा गया है।
एनजीटी ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल योजनाएं बनाने से काम नहीं चलेगा। सभी विभागों को तय समय सीमा के भीतर कारवाई कर उसकी प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। अधिकरण ने संकेत दिए हैं कि यदि निर्देशों का पालन नहीं हुआ तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमाचल प्रदेश पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों के लिए जाना जाता है। यदि कचरा और सीवेज प्रबंधन में सुधार नहीं हुआ तो राज्य की नदियों, जंगलों, पर्यटन स्थलों और लोगों के स्वास्थ्य पर इसका सीधा असर पड़ेगा। एनजीटी ने अब राज्य सरकार को स्पष्ट संदेश दिया है कि पर्यावरण संरक्षण के मामलों में लापरवाही किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी और अगली सुनवाई में सभी 32 निर्देशों के अनुपालन की विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी होगी।

गारंटीयों से ‘सुखी परिवार’ तक सवालों के घेरे में सुक्खू सरकार

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की राजनीति अब नए दौर में पहुंच चुकी है। विपक्ष ने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू सरकार के खिलाफ कई मुद्दों को एक साथ जोड़कर बड़ा राजनीतिक अभियान शुरू कर दिया है। चुनावी गारंटियां, घटता बजट, बढ़ता कर्ज, सरकारी योजनाओं की रफ्रतार, एचआरटीसी की बदहाल स्थिति और प्रशासनिक फैसले अब भाजपा के प्रमुख हमले का आधार बन गए हैं। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर लगातार इन मुद्दों को उठाकर सरकार को घेर रहे हैं। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को ‘गारंटी बनाम हकीकत’ के मुद्दे पर लड़ने की तैयारी कर रही है।
सबसे ज्यादा विवाद मुख्यमंत्री की प्रस्तावित ‘सुखी परिवार योजना’ को लेकर है। भाजपा का आरोप है कि सरकार नई योजनाओं की घोषणा तो कर रही है, लेकिन उनके लिए बजट की व्यवस्था नहीं है। विपक्ष का कहना है कि समाज कल्याण विभाग का बजट पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 63 प्रतिशत घटकर 1618 करोड़ रुपये से 604 करोड़ रुपये रह गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नई योजना का खर्च सरकार कैसे उठाएगी। भाजपा का दावा है कि जब पुरानी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का भुगतान समय पर नहीं हो पा रहा, तब नई योजनाएं केवल घोषणा बनकर रह सकती हैं।
विपक्ष का हमला केवल बजट तक सीमित नहीं है। जयराम ठाकुर ने मुख्यमंत्री की कई योजनाओं को ‘चाइनीज खिलौना’ बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार पहले बड़ी घोषणा करती है, लेकिन बाद में योजनाएं ठंडी पड़ जाती हैं। भाजपा का कहना है कि सरकार जमीन पर काम करने की बजाय प्रचार पर ज्यादा ध्यान दे रही है। विपक्ष दावा कर रहा है कि विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार फ्रलैगशिप योजनाओं पर खर्च कम हुआ, जबकि प्रचार-प्रसार पर ज्यादा पैसा खर्च किया गया।
भाजपा अब कांग्रेस की चुनावी गारंटियों को सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रही है। विपक्ष लगातार पूछ रहा है कि पांच लाख रोजगार, महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये, 300 यूनिट मुफ्त बिजली, दूध के बढ़े हुए समर्थन मूल्य और अन्य चुनावी वादों की स्थिति क्या है। भाजपा का कहना है कि जनता अब घोषणाएं नहीं, बल्कि उनका परिणाम देखना चाहती है।
सरकार की कार्यशैली भी विपक्ष के निशाने पर है। जयराम ठाकुर का आरोप है कि फैसले संस्थागत व्यवस्था के बजाय कुछ चुनिंदा लोगों के प्रभाव में लिए जा रहे हैं। भाजपा का दावा है कि सरकार के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है और कई मंत्री अपनी बात प्रभावी ढंग से नहीं रख पा रहे हैं। हालांकि सरकार इन आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बताती रही है।
आर्थिक मोर्चे पर बढ़ते कर्ज को लेकर भी भाजपा लगातार सवाल उठा रही है। जयराम ठाकुर का कहना है कि मौजूदा सरकार ने साढ़े तीन साल में लगभग 45 हजार करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया है और राज्य की कुल देनदारी 1.15 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच गई है। भाजपा पूछ रही है कि यदि इतना बड़ा कर्ज लिया गया है तो उसका असर विकास कार्यों और जनता को मिलने वाली सुविधाओं में क्यों दिखाई नहीं दे रहा।
एचआरटीसी की हालत भी अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। बसों में टायर और स्पेयर पार्ट्स की कमी, कई रूटों पर सेवाओं का प्रभावित होना, कर्मचारियों के वेतन और पेंशन से जुड़े मुद्दों को विपक्ष सरकार की आर्थिक स्थिति से जोड़ रहा है। भाजपा का आरोप है कि परिवहन निगम की बिगड़ती व्यवस्था का सीधा असर आम यात्रियों पर पड़ रहा है।
इसके अलावा भाजपा सरकार पर आपदा राहत, संस्थानों को बंद करने, कॉलेजों के फैसलों और विभिन्न परियोजनाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर भी सवाल उठा रही है। विपक्ष इन सभी मुद्दों को जोड़कर यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि सरकार प्रशासनिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर दबाव में है।
यदि सरकार की चुनावी गारंटियां और घोषणाएं कागजों तक सीमित रहीं, तो भाजपा का ‘वादे बनाम हकीकत’ अभियान 2027 के विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। ऐसे में हिमाचल की राजनीति का अगला अध्याय अब सरकार के दावों से ज्यादा उसके प्रदर्शन पर तय होगा।

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