हिमाचल में कचरा और सीवेज प्रबंधन की खुली पोल, एनजीटी ने सरकार को 32 मोर्चों पर लगाई फटकार
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Created on Wednesday, 22 July 2026 12:22
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में कचरा और सीवेज के प्रबंधन को लेकर एनजीटी ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। एनजीटी ने साफ कहा है कि राज्य में ठोस कचरे और सीवेज के वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था अभी भी गंभीर रूप से कमजोर है। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि नदियां, खडडें और भूजल भी प्रदूषित हो रहे हैं। इसी कारण अधिकरण ने राज्य सरकार, शहरी विकास विभाग, जल शक्ति विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सभी स्थानीय निकायों को 32 बिंदुओं पर समयबद्ध कारवाई के निर्देश दिए हैं।
एनजीटी के सामने पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश के शहरी क्षेत्रों से हर दिन लगभग 420.82 टन ठोस कचरा निकलता है। हालांकि अधिकांश कचरा एकत्र किया जा रहा है, लेकिन करीब 20.48 टन कचरा आज भी लोगों के घरों और बाजारों से नहीं उठाया जा रहा है। यह कचरा खुले स्थानों, नालों और खाली जमीन पर पड़ा रहता है, जिससे गंदगी और प्रदूषण फैलता है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि करीब 20.87 टन कचरे का निस्तारण अब भी वैज्ञानिक तरीके से नहीं हो रहा। इसे अस्थायी डंपिंग स्थलों पर फेंक दिया जाता है, जहां न तो उसका सही उपचार होता है और न ही पर्यावरण सुरक्षा के मानकों का पालन किया जाता है। बरसात के दौरान ऐसे डंपिंग स्थलों से निकलने वाला दूषित पानी आसपास की जमीन और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकता है।
सबसे गंभीर चिंता सीवेज प्रबंधन को लेकर जताई गई। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में प्रतिदिन 159.12 मिलियन लीटर गंदा पानी निकलता है, लेकिन उपचार संयंत्रों में केवल 88.29 मिलियन लीटर सीवेज का ही शोधन हो रहा है। इसका मतलब है कि करीब 71 मिलियन लीटर, यानी लगभग 45 प्रतिशत गंदा पानी बिना किसी उपचार के सीधे नदियों, खड्डों और अन्य जल स्रोतों में पहुंच रहा है।
हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य में, जहां अधिकांश पेयजल स्रोत प्राकृतिक जलधाराओं पर निर्भर हैं, यह स्थिति और भी गंभीर मानी जा रही है। एनजीटी ने कहा कि यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो पर्यावरण के साथ-साथ लोगों के स्वास्थ्य पर भी इसका बड़ा असर पड़ेगा।
अधिकरण ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सभी शहरों और कस्बों में घर-घर से कचरा संग्रहण की व्यवस्था पूरी तरह सुनिश्चित की जाए। हर स्तर पर गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग एकत्र करने की व्यवस्था लागू की जाए ताकि रीसाइक्लिंग और खाद बनाने की प्रक्रिया बेहतर हो सके।
एनजीटी ने पुराने डंपिंग स्थलों पर वर्षों से जमा लीगेसी वेस्ट को प्राथमिकता के आधार पर हटाने के निर्देश भी दिए हैं। कई स्थानों पर वर्षों से जमा हजारों टन कचरा पर्यावरण के लिए खतरा बना हुआ है। इसे वैज्ञानिक तरीके से साफ कर जमीन को दोबारा उपयोग योग्य बनाने के लिए कहा गया है।
अधिकरण ने यह भी निर्देश दिए कि सभी शहरी निकायों में मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी, कंपोस्ट प्लांट और आधुनिक कचरा प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना की जाए। जहां संभव हो वहां बायो-सीएनजी और वेस्ट-टू -एनर्जी जैसी परियोजनाओं को भी बढ़ावा दिया जाए ताकि कचरे को संसाधन में बदला जा सके।
ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति पर भी एनजीटी ने चिंता जताई। अधिकरण ने सरकार को निर्देश दिया कि चार सप्ताह के भीतर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग और प्रभावी ठोस कचरा प्रबंधन योजना तैयार की जाए। पंचायतों में भी कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था विकसित करने के लिए कहा गया है।
सीवेज प्रबंधन में सुधार के लिए एनजीटी ने नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने, पुराने संयंत्रों की क्षमता बढ़ाने और जहां सीवर नेटवर्क नहीं है वहां जल्द पाइपलाइन बिछाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही उपचारित पानी का सिंचाई और अन्य कार्यों में दोबारा उपयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।
अधिकरण ने सभी स्थानीय निकायों को खुले में कचरा जलाने पर पूरी तरह रोक लगाने, प्लास्टिक कचरे के बेहतर प्रबंधन, निर्माण एवं ध्वस्तीकरण कचरे के अलग निस्तारण, इलेक्ट्रॉनिक कचरे और जैव-चिकित्सा कचरे के लिए अलग व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं।
इसके अलावा जिला प्रशासन को प्रत्येक नगर निकाय में कचरा प्रबंधन के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध कराने, वर्षा जल निकासी नालों के किनारे पौधारोपण करने और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सभी सीवेज संयंत्रों की नियमित निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं। नियमों का उल्लंघन करने वाले निकायों और एजेंसियों के खिलाफ कारवाई करने को भी कहा गया है।
एनजीटी ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल योजनाएं बनाने से काम नहीं चलेगा। सभी विभागों को तय समय सीमा के भीतर कारवाई कर उसकी प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। अधिकरण ने संकेत दिए हैं कि यदि निर्देशों का पालन नहीं हुआ तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमाचल प्रदेश पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों के लिए जाना जाता है। यदि कचरा और सीवेज प्रबंधन में सुधार नहीं हुआ तो राज्य की नदियों, जंगलों, पर्यटन स्थलों और लोगों के स्वास्थ्य पर इसका सीधा असर पड़ेगा। एनजीटी ने अब राज्य सरकार को स्पष्ट संदेश दिया है कि पर्यावरण संरक्षण के मामलों में लापरवाही किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी और अगली सुनवाई में सभी 32 निर्देशों के अनुपालन की विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी होगी।
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