Wednesday, 30 September 2026
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विकास के दावों के बीच नड्डा के आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में विकास की राजनीति एक बार फिर आंकड़ों के केंद्र में आ गई है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने शिमला में प्रेस वार्ता के दौरान जो आंकड़े सामने रखे, उन्होंने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर केंद्र से हजारों करोड़ रुपये की सहायता मिलने के बावजूद कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं तय गति से आगे क्यों नहीं बढ़ पा रही हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार की प्रशासनिक क्षमता और वित्तीय प्रबंधन पर आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने प्रदेश को हजारों करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाई, लेकिन राज्य सरकार उसका प्रभावी उपयोग करने में विफल रही। उन्होंने कहा कि समस्या धन की कमी नहीं, बल्कि सरकार की कार्यक्षमता और प्राथमिकताओं की है।
नड्डा के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में हिमाचल प्रदेश को विशेष सहायता योजना के तहत 2,381 करोड़ रुपये, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (एनडीआरएफ) से 2,006 करोड़ रुपये तथा बाह्य सहायता प्राप्त परियोजनाओं के लिए 2,150 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सहायता प्रदान की गई। यानी केवल एक वर्ष में ही प्रदेश को 6,500 करोड़ रुपये से अधिक की केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराई गई।
आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में भी निवेश का दावा कम नहीं है। प्रदेश में 40,000 करोड़ रुपये से अधिक की राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं प्रगति पर हैं, जबकि रेलवे क्षेत्र के लिए 2,911 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड आवंटन किया गया है। 13,168 करोड़ रुपये लागत की चार बड़ी रेल परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इसके अलावा रेणुका जी बांध, लुहरी जलविद्युत परियोजना, आईआईएम सिरमौर, आईआईआईटी ऊना और स्मार्ट सिटी मिशन जैसी परियोजनाओं को भी केंद्र की प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है।
लेकिन दूसरी ओर स्वास्थ्य क्षेत्र के आंकड़े कई सवाल खड़े करते हैं। प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन के तहत स्वीकृत 15 क्रिटिकल केयर ब्लॉकों में से केवल एक ही पूरा हो पाया है। 12 इंटीग्रेटेड पब्लिक हेल्थ लैब्स में भी केवल एक तैयार हुई है। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि 73 स्वीकृत ब्लॉक सार्वजनिक स्वास्थ्य इकाइयों में से एक भी पूरी तरह संचालित नहीं हो सकी। वहीं 15वें वित्त आयोग के तहत स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए स्वीकृत 521 करोड़ रुपये में से लगभग आधी राशि खर्च नहीं हो पाई।
औद्योगिक विकास की तस्वीर भी चिंता बढ़ाने वाली बताई गई। केंद्र सरकार ने अक्तूबर 2022 में बल्क ड्रग पार्क परियोजना को मंजूरी दी थी और इसके लिए 1,000 करोड़ रुपये की अनुदान सहायता स्वीकृत की गई। 225 करोड़ रुपये जारी भी किए गए, लेकिन प्रदेश सरकार केवल 102.13 करोड़ रुपये ही उपयोग कर सकी। पर्यावरणीय मंजूरी मिलने में लगभग तीन वर्ष लगने से परियोजना की गति प्रभावित हुई।
मेडिकल डिवाइस पार्क का मामला भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। 100 करोड़ रुपये लागत वाली यह परियोजना फरवरी 2022 में स्वीकृत हुई थी, लेकिन अक्तूबर 2024 में राज्य सरकार इसके क्रियान्वयन से पीछे हट गई। परिणामस्वरूप केंद्र द्वारा जारी 30 करोड़ रुपये की पहली किस्त भी वापस करनी पड़ी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परियोजनाएं न केवल निवेश लाती हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन का आधार भी बनती हैं।
राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर भी नड्डा ने गंभीर सवाल उठाए। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश पर कर्ज का बोझ एक लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि प्रदेश का पूंजीगत व्यय घटा है, जबकि ऋण और प्रतिबद्ध देनदारियां लगातार बढ़ रही हैं। उनके अनुसार राज्य का कर्ज सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के 41 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो वित्तीय अनुशासन पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने कहा कि परिसंपत्तियों के निर्माण की बजाय सरकार उधार लेकर नियमित खर्च चला रही है। ऐसे में सवाल केवल नई परियोजनाओं का नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों के प्रभावी उपयोग का भी है।
नड्डा ने कहा कि हाल के स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों के परिणामों ने भी जनता की नाराजगी के संकेत दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि जनता सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं है और विकास योजनाओं के धरातल पर क्रियान्वयन को लेकर सवाल लगातार बढ़ रहे हैं।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद केंद्र सरकार हिमाचल प्रदेश के विकास में कोई कमी नहीं आने देगी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में प्रदेश को आवश्यक वित्तीय सहायता और परियोजनाओं की स्वीकृति मिलती रहेगी, लेकिन राज्य सरकार को उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना होगा।
राजनीतिक दृष्टि से नड्डा का यह हमला ऐसे समय आया है जब प्रदेश की वित्तीय स्थिति, परियोजनाओं की प्रगति और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर कांग्रेस सरकार पहले से विपक्ष के निशाने पर है। भाजपा अब केंद्र द्वारा दी गई सहायता और उसके उपयोग के मुद्दे को प्रमुख राजनीतिक हथियार के रूप में सामने लाने की रणनीति पर काम करती दिख रही है।

35 दिन चली हिमाचल विधानसभा, 70 फीसदी से अधिक बजट बिना चर्चा के पास

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने वर्ष 2025 में कुल 35 दिन बैठक की। यह संख्या विधानसभा नियमों में तय न्यूनतम बैठक दिनों के बराबर है। यह जानकारी पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की वार्षिक रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल विधानसभा ने इस दौरान 21 विधेयक ;बिलद्ध पारित किए, लेकिन इनमें से आधे से ज्यादा बिल एक ही दिन में मंजूर हो गये और बजट का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बिना चर्चा के पारित कर दिया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में देश की सभी राज्य विधानसभाओं का औसत बैठक समय 24 दिन रहा, जबकि हिमाचल विधानसभा 35 दिन चली। ओडिशा विधानसभा सबसे ज्यादा 43 दिन और नागालैंड विधानसभा सबसे कम सात दिन चली। हिमाचल विधानसभा की एक बैठक औसतन पांच घंटे तक चली।
हिमाचल विधानसभा ने वर्ष 2025 में 21 बिल पास किये। इनमें से करीब 57 प्रतिशत बिल ऐसे थे जिन्हें सदन में पेश करने के एक दिन के भीतर ही मंजूरी मिल गई। केवल चार प्रतिशत बिलों को ही विस्तार से जांच और चर्चा के लिए विधानसभा समितियों के पास भेजा गया। विशेषज्ञों का मानना है कि समितियों में बिलों की गहराई से समीक्षा होती है, इसलिए अधिक बिलों को समिति के पास भेजना कानूनों को बेहतर बनाने में मदद करता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हिमाचल प्रदेश और झारखंड में करीब आधे बिलों को राज्यपाल की मंजूरी मिलने में तीन महीने से अधिक समय लगा। यानी विधानसभा से पास होने के बाद भी कई कानूनों को लागू होने में काफी समय लगा।
वर्ष 2025 में हिमाचल प्रदेश ने कई महत्वपूर्ण कानून बनाये। इनमें संगठित अपराध पर नियंत्राण के लिए नया कानून शामिल है। इस कानून में गंभीर अपराधों के लिए कड़ी सजा, यहां तक कि आजीवन कारावास का भी प्रावधान किया गया है। राज्य ने सार्वजनिक संपत्तियों और सुविधाओं जैसे सड़क, रास्ते और नहरों को नुकसान पहुंचाने या उनमें अवैध बदलाव रोकने के लिए भी कानून बनाया।
इसके अलावा पंचायत राज अधिनियम में संशोधन कर पंचायतों के अधिकार बढ़ाए गए और ग्राम सभा से जुड़े नियमों में बदलाव किए गए। सार्वजनिक परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए भी नया कानून बनाया गया। राज्य सरकार ने नशे की समस्या से निपटने और नशे के शिकार लोगों के पुनर्वास के लिए भी कानून पारित किया।
महिलाओं को रोजगार के अधिक अवसर देने के लिए हिमाचल प्रदेश ने दुकानदार एवं वाणिज्यिक प्रतिष्ठान कानून में संशोधन किया। इसके तहत महिलाओं को रात्रिकालीन शिफ्रट में काम करने की अनुमति दी गई और ओवरटाइम की सीमा भी बढ़ाई गई। ऐसे बदलाव करने वाले राज्यों में हिमाचल प्रदेश भी शामिल रहा।
बजट पर चर्चा के मामले में रिपोर्ट ने कुछ महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखे हैं। राज्यों ने औसतन अपने बजट पर आठ दिन चर्चा की, जबकि हिमाचल प्रदेश में बजट पर सात दिन चर्चा हुई। हालांकि इसके बावजूद राज्य का 70 प्रतिशत से अधिक बजट बिना किसी चर्चा के पारित हो गया। इस मामले में हिमाचल प्रदेश, असम और झारखंड उन राज्यों में शामिल रहे जहां बजट का बड़ा हिस्सा बिना बहस के मंजूर किया गया। वहीं तमिलनाडु ऐसा राज्य रहा जहां पूरे बजट पर चर्चा की गई।
पीआरएस की रिपोर्ट से साफ है कि हिमाचल विधानसभा ने तय बैठक दिवस पूरे किए और कई महत्वपूर्ण कानून बनाए। लेकिन बड़ी संख्या में बिलों का जल्दी पास होना और बजट के बड़े हिस्से का बिना चर्चा पारित होना इस बात की ओर भी संकेत करता है कि विधानसभा में महत्वपूर्ण मुद्दों पर और अधिक विस्तृत चर्चा की गुंजाइश बनी हुई है।

शपथ ग्रहण समारोह में परिजनों और मीडिया की रोक पर नेता प्रतिपक्ष ने उठाये सवाल

शिमला/शैल। नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू और प्रदेश सरकार पर स्थानीय निकाय चुनावों के बाद जनादेश और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के अपमान का आरोप लगाया है। शिमला से जारी बयान में जयराम ठाकुर ने कहा कि स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस को जनता ने नकार दिया है और भाजपा को समर्थन मिला है, लेकिन मुख्यमंत्री इस जनादेश को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि हार की बौखलाहट में सरकार लगातार ऐसे कदम उठा रही है जो लोकतांत्रिक परंपराओं और जनमत के सम्मान के खिलाफ हैं।
जयराम ठाकुर ने कहा कि हाल ही में मुख्यमंत्री द्वारा जिला परिषद और ब्लॉक समिति सदस्यों को लेकर दिया गया बयान जनादेश का अपमान था। इसके बाद जिला परिषद सदस्यों के शपथ ग्रहण समारोह में परिजनों और मीडिया को प्रवेश नहीं देने का निर्णय भी इसी मानसिकता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि शपथ ग्रहण किसी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि के जीवन का महत्वपूर्ण अवसर होता है और परंपरागत रूप से उनके परिवार के सदस्य भी इस समारोह का हिस्सा बनते रहे हैं। यह जनप्रतिनिधियों और उनके परिवारों के लिए सम्मान और गौरव का क्षण होता है, लेकिन सरकार ने इस परंपरा को तोड़कर निर्वाचित प्रतिनिधियों का अपमान किया है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि प्रदेश सरकार स्थानीय निकायों और पंचायत संस्थाओं में भाजपा समर्थित निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रभावित करने के लिए प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल कर रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री और सरकार का उद्देश्य जिला परिषद, ब्लॉक समिति तथा स्थानीय निकायों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों के चुनावों में राजनीतिक लाभ हासिल करना है। इसके लिए भाजपा समर्थित प्रतिनिधियों पर दबाव बनाने और उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की जा रही है।
जयराम ठाकुर ने कहा कि मुख्यमंत्री को प्रदेश के मुखिया के रूप में जनमत का सम्मान करना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय सरकार जनादेश को अपने पक्ष में मोड़ने के प्रयासों में लगी हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा समर्थित जनप्रतिनिधियों को प्रताड़ित करने के लिए अधिकारियों को लगाया गया है और विभिन्न माध्यमों से उन्हें प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि जनता ने जिस उद्देश्य से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव किया है, सरकार उसे कमजोर करने का प्रयास कर रही है।
नेता प्रतिपक्ष ने स्थानीय निकायों में अध्यक्ष पद के चुनाव की समयावधि बढ़ाने के निर्णय पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पहले नगर पंचायत और नगर परिषद के अध्यक्ष का चुनाव सभासदों के निर्वाचन के सात दिनों के भीतर कराने का प्रावधान था, लेकिन सरकार ने नियमों में बदलाव करते हुए इस अवधि को बढ़ा दिया है। उनके अनुसार यह निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रभावित करने के उद्देश्य से लिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार चुनावी हार को छिपाने और सत्ता का प्रभाव बनाए रखने के लिए नियमों में बदलाव कर रही है।
जयराम ठाकुर ने कहा कि स्थानीय निकायों में जनता ने जिस प्रकार भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को समर्थन दिया है, उससे कांग्रेस सरकार असहज है। उन्होंने दावा किया कि सरकार जनादेश को स्वीकार करने के बजाये निर्वाचित प्रतिनिधियों पर दबाव बनाकर सत्ता समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है। उन्होंने इसे लोकतंत्रा और संविधान की भावना के खिलाफ बताया।
पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि भाजपा जनादेश की ‘चोरी’ नहीं होने देगी और किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक दुरुपयोग का विरोध करेगी। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का निर्णय सर्वाेपरि होता है और सरकार को उसे स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से ऊपर उठकर जनादेश का सम्मान करें और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करें।
उन्होंने सरकार से पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने की मांग करते हुए कहा कि स्थानीय निकायों और पंचायत संस्थाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों को स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिलना चाहिए।

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