Wednesday, 30 September 2026
Blue Red Green
Home देश

चुनावी साल में खुलेंगी भ्रष्टाचार की फाइलें या फिर चार्जशीटों तक सिमट जाएगी सियासत?

सुधीर शर्मा और जनक राज पर विजिलेंस कारवाई से गरमाया माहौल,
पुराने आरोपों पर कारवाई की परीक्षा, भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले सियासत का तापमान बढ़ने लगा है। धर्मशाला से विधायक सुधीर शर्मा और भरमौर विधायक जनक राज से जुड़े विजिलेंस मामलों ने उस राजनीतिक लड़ाई को नया मुद्दा दे दिया है, जिसकी जमीन पिछले कई वर्षों से भ्रष्टाचार, जमीन सौदों, भर्ती और सरकारी फैसलों में कथित अनियमितताओं के आरोपों से तैयार होती रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन किस पर आरोप लगा रहा है, बल्कि यह है कि क्या चुनावी वर्ष में आरोपों की फाइलें वास्तव में जांच और कारवाई के अगले चरण तक पहुंचेंगी या हिमाचल की राजनीति एक बार फिर चार्जशीटों और प्रेस कांफ्रेंसों के घेरे में ही घूमती रहेगी?
सुधीर शर्मा के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति से जुड़े मामले में विजिलेंस कारवाई ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दिया है। क्या आने वाले दिनों में सरकार पुराने मामलों में जांच आगे बढ़ाती है? सत्ता में आने से पहले कांग्रेस ने तत्कालीन भाजपा सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और कथित अनियमितताओं को लेकर चार्जशीट जारी की थी। चुनावी मंचों पर इन आरोपों को बड़ा मुद्दा बनाया गया और सत्ता में आने के बाद कारवाई का भरोसा भी दिया गया।
चार साल के कार्यकाल पुरा होने को है अब जनता जानना चाहती है कि उन आरोपों में कितने मामलों में जांच हुई, कितने मामलों में एफआईआर हुई और कितने मामले अदालत तक पहुंचे? यहीं से कांग्रेस सरकार की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है। चार्जशीट में लगाए गए आरोप यदि सही थे तो उन पर अब तक क्या कारवाई हुई है? और यदि कारवाई नहीं हुई तो क्या वे आरोप केवल चुनावी राजनीति का हिस्सा थे?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमाचल में सरकार बदलने के साथ आरोपों की दिशा भी बदलती रही है। विपक्ष में रहते हुए हर पार्टी सत्ता पक्ष पर गंभीर आरोप लगाती है, सत्ता में आने के बाद जांच का भरोसा देती है और फिर अगला चुनाव आते-आते वही मुद्दे राजनीतिक भाषणों में दोबारा लौट आते हैं।
दूसरी ओर विपक्ष अधूरी गारंटियां, बढ़ता वित्तीय दबाव, रोजगार, भर्ती प्रक्रियाएं और भ्रष्टाचार पर कांग्रेस सरकार को घेरने की तैयारी में है। लेकिन भाजपा के सामने भी यह सवाल रहेगा कि वह केवल आरोप लगाएगी या जिन मामलों को गंभीर बता रही है, उन्हें दस्तावेजों के साथ जनता के सामने रखकर कानूनी कारवाई की मांग भी करेगी?
विपक्ष के लिए आने वाला वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल सरकार की आलोचना से चुनावी माहौल नहीं बनेगा। उसे यह बताना होगा कि किस मामले में क्या अनियमितता हुई, किसके खिलाफ क्या दस्तावेज हैं और सरकार से किस कारवाई की मांग की जा रही है। भाजपा को भ्रष्टाचार के आरोपों पर ब्यानबाजी कर इसका फायदा आने वाले चुनाव में तभी मिल पायेगा जब वह दस्तावेजी प्रमाण जनता के सामने रख पायेगी।
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू से जुड़े जमीन संबंधी आरोप भी विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकते हैं। मुख्यमंत्री इन आरोपों को खारिज कर अपना पक्ष विधानसभा में रख चुके हैं। ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक ब्यानबाजी से नहीं निकलेगा बल्कि निष्पक्ष जांच एजैंसियों द्वारा करवाई गयी जांच के निर्णय से निकलेगा। चुनावी राजनीति में जमीन और संपत्ति से जुड़े आरोपों का असर गहरा होता है।
भ्रष्टाचार के अलावा कांग्रेस सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा रोजगार के मोर्चे पर होगी। चुनाव के समय किए गए रोजगार संबंधी वादे अब सरकार के चार साल पूरे होने के साथ विपक्ष के निशाने पर हैं। प्रदेश का युवा सरकारी भर्ती, परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों को लेकर स्पष्ट परिणाम चाहता है। यदि सरकार आने वाले एक साल में रोजगार और भर्ती के मोर्चे पर ठोस उपलब्धियां दिखाने में सफल रहती है तो वह विपक्ष के हमले की धार कम कर सकती है। लेकिन यदि रोजगार के सवाल पर चुनावी वर्ष में भी प्रदेश सरकार कुछ नया नही कर पायी तो भाजपा के लिए यह सबसे प्रभावी मुद्दों में से एक होगा।
हिमाचल की राजनीति में आरोपों का इतिहास लंबा है। सत्ता बदलती है, चार्जशीट बदलती है, आरोपी बदलते हैं और राजनीतिक बयान भी बदल जाते हैं। लेकिन जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल वही रहता है कि किस मामले में आखिर हुआ क्या?
एफआईआर हुई तो जांच कहां पहुंची? जांच पूरी हुई तो चार्जशीट दाखिल हुई या नहीं? चार्जशीट हुई तो अदालत में क्या हुआ? और यदि आरोप गलत निकले तो जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
आने वाला एक वर्ष इसी कसौटी पर कांग्रेस और भाजपा दोनों को परखेगा। कांग्रेस के पास सत्ता है और जांच एजेंसियों के माध्यम से पुराने मामलों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी। भाजपा के पास विपक्ष की भूमिका है और सरकार से जवाब मांगने का राजनीतिक अवसर भी।
लेकिन यदि कांग्रेस केवल भाजपा नेताओं पर कारवाई को उपलब्धि बताती रही और भाजपा केवल कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाती रही, तो जनता के सामने फिर वही पुराना सवाल खड़ा होगा कि चार्जशीट बहुत हुई, कारवाई कितनी हुई?
इसलिए अगले विधानसभा चुनाव से पहले हिमाचल की राजनीति में असली मुकाबला सिर्फ कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं होगा। मुकाबला यह भी होगा कि कौन आरोपों को सबूत, जांच और कानूनी परिणाम तक ले जाता है।
सुधीर शर्मा और जनक राज से जुड़े मामले इस बड़ी राजनीतिक लड़ाई की शुरुआत भर हैं। आने वाले दिनों में यदि पुरानी फाइलें खुलती हैं, नई जांचें शुरू होती हैं और जमीन, संपत्ति, भर्ती तथा भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों पर कारवाई तेज होती है, तो हिमाचल का चुनावी माहौल असाधारण रूप से गर्म हो सकता है। और यदि सब कुछ आरोप-प्रत्यारोप, चार्जशीट और राजनीतिक ब्यानबाजी तक सीमित रहा, तो चार साल की सत्ता और पांच साल की विपक्षी राजनीति के बीच जनता के सामने फिर वही सवाल रहेगा कि आखिर कारवाई हुई कहां?

2047 तक विकसित भारत, क्या आसान होगी राह?

शिमला/शैल। 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक विकसित भारत बनाने का बड़ा लक्ष्य सामने रखा, लेकिन इस लक्ष्य के साथ सरकार ने देश के सामने आत्मनिर्भरता, रोजगार, तकनीक, रक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की कठिन चुनौतियां भी रख दी हैं। करीब डेढ़ घंटे से अधिक लंबे संबोधन में प्रधानमंत्री ने पिछले 12 वर्षों की उपलब्धियां गिनाईं और आने वाले 5 से 7 वर्षों के लिए ‘शक्ति की सप्त धारा’ के जरिए भारत की आर्थिक और रणनीतिक दिशा तय करने का संकेत दिया।
प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि आने वाले दौर में भारत केवल विदेशी कंपनियों के लिए बड़ा बाजार नहीं रह सकता। देश को डिजाइन से लेकर उत्पादन और छोटे पुर्जों से लेकर तैयार उत्पाद तक पूरी वैल्यू चेन अपने यहां विकसित करनी होगी। मैन्युफैक्चरिंग को पहली प्राथमिकता बताते हुए उन्होंने ‘जीरो डिफेक्ट’ और गुणवत्ता को वैश्विक पहचान बनाने की जरूरत बताई। इसका सीधा संदेश घरेलू उद्योग और एमएसएमई के लिए है कि अब संरक्षण से ज्यादा प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता पर टिकना होगा।
सेमीकंडक्टर को लेकर प्रधानमंत्री ने दावा किया कि तीन प्लांट शुरू हो चुके हैं और आने वाले वर्षों में 5 से 8 और प्लांट शुरू किए जाएंगे। क्रिटिकल मिनरल्स और ऊर्जा सुरक्षा को भी राष्ट्रीय प्राथमिकता बताया गया। 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा का लक्ष्य सामने रखकर सरकार ने संकेत दिया कि एआई, डाटा सेंटर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और आधुनिक उद्योगों की बढ़ती बिजली जरूरत को पूरा करने के लिए पारंपरिक ऊर्जा व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी।
प्रधानमंत्री के भाषण में वैश्विक व्यापार को लेकर भी आक्रामक रणनीति दिखाई दी। करीब 40 देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने एमएसएमई, किसानों और उद्योगों से वैश्विक बाजार में उतरने का आहवान किया। लेकिन इसके साथ गुणवत्ता और वैश्विक मानकों को पूरा करने की चुनौती भी सामने रखी। यानी भारतीय उत्पादों के लिए बाजार खुलने के साथ विदेशी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार भी खुलेंगे। ऐसे में घरेलू उद्योगों की वास्तविक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
कृषि को दूसरी ‘शक्ति धारा’ बताते हुए प्रधानमंत्री ने खेत से सीधे वैश्विक बाजार तक पहुंच बनाने की बात कही। रसायन मुक्त खेती और फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा गया। इससे किसानों के लिए निर्यात के अवसर बढ़ाने की कोशिश दिखाई देती है, लेकिन इसके लिए भंडारण, प्रसंस्करण, गुणवत्ता प्रमाणन, परिवहन और निर्यात ढांचे को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी होगा।
युवाओं के लिए प्रधानमंत्री ने अगले एक साल में एक करोड़ युवाओं को एआई स्किल देने की घोषणा की। देश में ढाई लाख से अधिक पंजीकृत स्टार्टअप और एक लाख करोड़ रुपये के इनोवेशन फंड का उल्लेख करते हुए उन्होंने युवाओं को नई अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने का आहवान किया। शिक्षा, रिसर्च और रोजगार के बीच मौजूद दूरी को पाटना अब सरकार के सामने बड़ी चुनौती होगी।
महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर प्रधानमंत्री ने तीन करोड़ लखपति दीदियों का लक्ष्य पूरा होने और छह करोड़ लखपति दीदियां बनाने का नया लक्ष्य रखा। साथ ही सभी राजनीतिक दलों से लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने के लिए महिला आरक्षण लागू करने की अपील की। यह घोषणा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे महिला प्रतिनिधित्व का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रधानमंत्री का रुख और ज्यादा सख्त रहा। ड्रोन, काउंटर-ड्रोन, हाइपरसोनिक तकनीक और साइबर सुरक्षा में भारत को वैश्विक नेतृत्व की दिशा में ले जाने की बात कही गई। उन्होंने ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ का उल्लेख करते हुए कहा कि युद्ध का स्वरूप बदल रहा है और खतरे केवल सीमा तक सीमित नहीं हैं। रक्षा निर्यात बढ़ने और करीब 100 देशों तक भारतीय हथियार पहुंचने का दावा भी किया गया।
भाषण का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ को लेकर रहा। प्रधानमंत्री ने कहा कि केंद्र के साथ राज्यों और स्थानीय निकायों को भी पुराने नियम-कायदों से बाहर निकलना होगा। 2047 के लक्ष्य के अनुरूप नीतियां बनाने की जरूरत बताकर उन्होंने प्रशासनिक सुधारों को विकास की अगली बड़ी शर्त के रूप में पेश किया।
प्रधानमंत्री ने नशे के खिलाफ लड़ाई और नक्सलवाद पर भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने नक्सली हिंसा में सुरक्षाबलों की बड़ी संख्या में हुई मौतों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि नक्सली हिंसा अब अंतिम चरण में है। हालांकि उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल कर वैचारिक स्तर पर भी एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।
कुल मिलाकर, लाल किले का भाषण उपलब्धियों के दावों से ज्यादा भविष्य के बड़े लक्ष्यों की घोषणा का भाषण रहा। 2047 का विकसित भारत अब केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि सरकार की दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक दिशा के रूप में पेश किया गया है। मगर इस लक्ष्य की असली परीक्षा घोषणाओं में नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करने, किसानों की आय बढ़ाने, उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाने, युवाओं को कौशल देने, ऊर्जा सुरक्षित करने और वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की वास्तविक हिस्सेदारी बढ़ाने में होगी। अगले पांच से सात वर्ष यह तय करेंगे कि ‘सप्त धारा’ वास्तव में भारत की विकासधारा बनती है या फिर बड़े लक्ष्यों और जमीनी परिणामों के बीच की दूरी बनी रहती है।

संसद में सवालों से बचाव और सड़क पर लाठीचार्ज

शिमला/शैल। संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त 2026 को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। यह सत्र विधायी कामकाज से ज्यादा हंगामे, विरोध और सरकार-विपक्ष के बीच टकराव का रहा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश के गंभीर मुद्दों पर संसद में खुलकर चर्चा नहीं हो सकती, तो आखिर लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था की उपयोगिता क्या रह जाती है?
मानसून सत्र की शुरुआत ही छात्रों के आंदोलन से जुड़े विवाद के साथ हुई। 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च कर रहे छात्रों और युवाओं पर पुलिस कारवाई हुई। प्रदर्शनकारियों ने परीक्षा में कथित अनियमितताओं और युवाओं से जुड़े सवालों को लेकर संसद तक मार्च का आहवान किया था। पुलिस ने बैरिकेडिंग की और मार्च को रोकने के लिए लाठीचार्ज तथा आंसू गैस का इस्तेमाल किया। कई प्रदर्शनकारियों के घायल होने की खबरें सामने आईं।
यहां से एक बड़ा सवाल पैदा हुआ। अगर देश के युवा अपनी समस्याएं लेकर संसद तक पहुंचना चाहते हैं और वहां उन्हें रोक दिया जाता है, तो उनकी आवाज आखिर कहां सुनी जाएगी? सड़क पर आंदोलन करने वालों पर कारवाई हो सकती है, लेकिन संसद तो वह जगह है जहां जनता के सवालों का जवाब सरकार को देना होता है।
छात्र आंदोलन का मुद्दा संसद में उठा। विपक्ष लगातार पुलिस कारवाई और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की मांग करता रहा। गृह मंत्री अमित शाह से जवाब की मांग की गई। विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पूरे सत्र के दौरान सदन से नदारद रहे। सत्र के दौरान प्रधानमंत्री 20 जुलाई को सत्र की शुरुआत के अवसर पर और 13 अगस्त को अंतिम दिन लोकसभा में मौजूद थे। गृह मंत्री अमित शाह की स्थिति इससे भी अधिक राजनीतिक विवाद का विषय बनी। विपक्ष ने आरोप लगाया कि गृह मंत्री 13 अगस्त को पहली बार इस मानसून सत्र में लोकसभा पहुंचे, यानी सत्र के 18 दिन बीत जाने के बाद सदन में पहंुचे। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि वह सत्र की शुरुआत से ही नियमित रूप से संसद आ रहे थे। विपक्ष लगातार उनसे 20 जुलाई को छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्यवाही और कथित बल प्रयोग को लेकर जवाब मांगता रहा। अमित शाह ने 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर कहा कि वे छात्रों के प्रदर्शन से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार हैं और विपक्ष के सभी सवालों का जवाब देने के लिए सदन में मौजूद रहेंगे। लेकिन सवाल यह है कि यह प्रस्ताव पहले क्यों नहीं आया? यदि सरकार को विश्वास था कि गृह मंत्री हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं तो विपक्ष की लगातार मांग के बीच इस मुद्दे पर शुरुआती दिनों में ही चर्चा क्यों नहीं कराई गई? अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों सदन में मौजूद रहे, लेकिन उस दिन भी चर्चा नहीं हो सकी।
सबसे गंभीर सवाल संसद के कामकाज को लेकर है। सरकार कह रही है कि विधायी कामकाज हुआ और कई विधेयक पारित हुए। लेकिन सवाल यह है कि विधेयक कितनी गंभीर चर्चा के बाद पारित हुए? उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मानसून सत्र में 12 विधेयक पारित हुए, जबकि लोकसभा में कामकाज केवल करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा का करीब 39 प्रतिशत रहा।
इस पूरे सत्र की सबसे बड़ी चिंता यह है कि एक तरफ विधेयक पारित हो रहे हैं, दूसरी तरफ सदन का बहुत कम समय काम कर रहा है। यदि संसद में विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा नहीं होगी, विपक्ष को सवाल पूछने का पूरा अवसर नहीं मिलेगा और सरकार से जवाब नहीं मांगा जाएगा, तो कानून बनाने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी मानी जाएगी?
संसद केवल विधेयक पास करने की जगह नहीं है। संसद का मूल काम सरकार से सवाल पूछना, नीतियों पर चर्चा करना, जनता की समस्याओं को उठाना और सरकार को जवाबदेह बनाना है। विपक्ष का काम केवल सरकार का विरोध करना भी नहीं है और सरकार का काम केवल बहुमत के आधार पर विधेयक पारित कराना भी नहीं है। लोकतंत्र में दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है कि सदन चले और जनता के मुद्दों पर चर्चा हो।
यहां सरकार और विपक्ष दोनों को अपनी भूमिका पर गंभीरता से विचार करना होगा। विपक्ष को भी यह समझना होगा कि लगातार हंगामा और सदन की कार्यवाही रोकना जनता के हित में नहीं है। वहीं सरकार को भी यह स्वीकार करना होगा कि बहुमत के आधार पर हर महत्वपूर्ण सवाल को चर्चा से बाहर नहीं किया जा सकता। यदि विपक्ष किसी मुद्दे पर जवाब मांग रहा है, तो सरकार को सदन में उसका जवाब देना चाहिए। संसद में बहस की जगह यदि टकराव ले लेता है, तो नुकसान किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का होता है।
आज देश के युवाओं के सामने रोजगार और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल हैं। किसानों के सामने खेती और आय के सवाल हैं। महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे लगातार जनता के सामने हैं। इन सवालों पर संसद में चर्चा नहीं होगी तो फिर कहां होगी?
लोकतंत्र में सड़क का आंदोलन भी जरूरी है, लेकिन सड़क संसद का विकल्प नहीं हो सकती। संसद वह स्थान है जहां आंदोलन से उठे सवालों को नीति और कानून में बदलने की जिम्मेदारी सांसदों की होती है। यदि सड़क पर उठे सवाल संसद तक पहुंचने के बाद भी चर्चा से बाहर रह जाते हैं, तो लोकतंत्र के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है।
इसलिए अब सवाल केवल यह नहीं है कि मानसून सत्र में कितने विधेयक पारित हुए। असली सवाल यह है कि उन विधेयकों और देश के ज्वलंत मुद्दों पर कितनी गंभीर चर्चा हुई?
अगर संसद में जनता के सवालों पर बहस नहीं होगी, तो सवाल उठेंगे ही। कभी जंतर-मंतर पर, कभी सड़कों पर और कभी गली-मोहल्लों में। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि जनता के सवाल सड़क पर उठने से पहले संसद में सुने जाएं और सड़क पर उठे सवाल संसद में पहुंचने के बाद दबाए नहीं, बल्कि उनका जवाब दिया जाए।
मानसून सत्र ने इसी बुनियादी सवाल को फिर सामने खड़ा कर दिया है जब संसद में सवाल पूछने और जवाब देने का समय ही नहीं बचेगा, तो जनता अपने सवाल आखिर किससे पूछेगी?

More Articles...

  1. सत्ता झुकी जनदबाव जीता छात्र आंदोलन ने बदल दी राजनीति की दिशा
  2. जंतर-मंतर से उठी चिंगारी से संसद तक सियासी संग्राम
  3. हिमाचल में कचरा और सीवेज प्रबंधन की खुली पोल, एनजीटी ने सरकार को 32 मोर्चों पर लगाई फटकार
  4. गारंटीयों से ‘सुखी परिवार’ तक सवालों के घेरे में सुक्खू सरकार
  5. क्या सुक्खू सरकार उसी शिक्षा मॉडल को अपना रही है, जिसका कांग्रेस देशभर में विरोध करती रही है?
  6. कांग्रेस का नेता प्रतिपक्ष पर पलटवार मुकद्दमों का फैसला अदालत करेगी, भाजपा नहीं
  7. राजभवन पहुंचा विमल नेगी प्रकरण दोषियों के खिलाफ कारवाई की मांग
  8. आरएसएस कानून से ऊपर नहीं’ खड़गे के सवालों पर संघ-भाजपा-वीएचपी एकजुट
  9. नड्डा के हिमाचल दौरे ने बढ़ाई राजनीतिक सरगर्मियां, क्या 2027 की तैयारी शुरू?
  10. विकास के दावों के बीच नड्डा के आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल
  11. 35 दिन चली हिमाचल विधानसभा, 70 फीसदी से अधिक बजट बिना चर्चा के पास
  12. शपथ ग्रहण समारोह में परिजनों और मीडिया की रोक पर नेता प्रतिपक्ष ने उठाये सवाल
  13. Online YouTube Movies Downloader Totally free and you may Prompt
  14. ऊना के तालाब प्रोजेक्ट में फर्जीवाड़े के आरोप, विजिलेंस जांच की मांग
  15. क्या भारत आर्थिक दबाव की नई चुनौती की ओर बढ़ रहा है?
  16. हिमाचल में 51 शहरी निकायों के चुनाव का ऐलान 17 मई को मतदान
  17. चेस्टर हिल्स: दो रेरा सर्टिफिकेट, एक प्रोजेक्ट और सवालों का जाल
  18. बजट घोषणाओं पर भाजपा सांसदों ने सरकार को घेरा
  19. विमल नेगी मौत प्रकरण में पूर्व एसपी संजीव गांधी को सीबीआई का समन
  20. स्मार्ट मीटर क्रांति या नया विवाद? बिजली क्षेत्र के बदलाव पर उठते सवाल

Subcategories

  • लीगल
  • सोशल मूवमेंट
  • आपदा
  • पोलिटिकल

    The Joomla! content management system lets you create webpages of various types using extensions. There are 5 basic types of extensions: components, modules, templates, languages, and plugins. Your website includes the extensions you need to create a basic website in English, but thousands of additional extensions of all types are available. The Joomla! Extensions Directory is the largest directory of Joomla! extensions.

  • शिक्षा

    We search the whole countryside for the best fruit growers.

    You can let each supplier have a page that he or she can edit. To see this in action you will need to create a users who is in the suppliers group.  
    Create one page in the growers category for that user and make that supplier the author of the page.  That user will be able to edit his or her page.

    This illustrates the use of the Edit Own permission.

  • पर्यावरण

Facebook



  Search