Tuesday, 04 August 2026
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क्या सुक्खू सरकार उसी शिक्षा मॉडल को अपना रही है, जिसका कांग्रेस देशभर में विरोध करती रही है?

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में सरकारी स्कूलों को चरणबद्ध तरीके से सीबीएसई बोर्ड से जोड़ने के फैसले ने एक नई राजनीतिक और वैचारिक बहस छेड़ दी है। सरकार का कहना है कि इससे प्रदेश के छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर अवसर मिलेंगे और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा। लेकिन शिक्षा के क्षेत्रा से जुड़े लोग इसे केवल शिक्षा सुधार का फैसला नहीं मान रहे हैं। उनका सवाल है कि क्या कांग्रेस सरकार उसी शिक्षा व्यवस्था को अपना रही है, जिसे लेकर वह केंद्र की भाजपा सरकार पर लगातार निशाना साधती रही है?
असल विवाद केवल सीबीएसई बोर्ड को लेकर नहीं है। विवाद उस एनसीईआरटी पाठयक्रम को लेकर है, जो सीबीएसई स्कूलों में पढ़ाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में एनसीईआरटी की इतिहास, राजनीति विज्ञान और समाज विज्ञान की किताबों में कई बदलाव किए गए हैं। इन बदलावों पर देशभर में बहस हुई। कई इतिहासकारों, शिक्षाविदों और विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि किताबों से कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं और व्यक्तित्वों को कम महत्व दिया गया या हटाया गया।
आलोचकों का कहना है कि नई किताबों में मुगल काल, दिल्ली सल्तनत, महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगों और भारतीय मुसलमानों के इतिहास से जुड़े कुछ हिस्सों में बदलाव किए गए हैं। वहीं भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन भारत, सांस्कृतिक विरासत और कुछ आध्यात्मिक विषयों को पहले की तुलना में अधिक जगह दी गई है। इन बदलावों का कई शिक्षाविदों ने विरोध किया और कहा कि इतिहास को संतुलित रूप में पढ़ाया जाना चाहिए, न कि किसी एक दृष्टिकोण से।
दूसरी ओर केंद्र सरकार और एनसीईआरटी का पक्ष अलग है। उनका कहना है कि यह बदलाव नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति और नए पाठयक्रम के तहत किए गए हैं। उनका दावा है कि पाठयक्रम को छात्रों के लिए सरल बनाया गया है और भारतीय संस्कृति, परंपरा तथा ज्ञान प्रणाली को उचित स्थान दिया गया है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि पाठयक्रम को अधिक प्रासंगिक बनाना है।
यहीं से हिमाचल की राजनीति में सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर कई बार केंद्र सरकार की शिक्षा नीति और पाठयक्रम में किए गए बदलावों का विरोध करती रही है। ऐसे में अब जब हिमाचल की कांग्रेस सरकार सरकारी स्कूलों में सीबीएसई लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, तो अब यह सवाल उठ रहा है कि यदि पाठयक्रम पर आपत्ति थी, तो उसी बोर्ड को अपनाने की जरूरत क्यों पड़ी?
हालांकि सरकार तर्क दे रही है कि आज देश की लगभग सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाएं-जेईई, नीट और सीयूईटी-एनसीईआरटी आधारित होती हैं। निजी स्कूलों और केंद्रीय विद्यालयों के अधिकांश छात्रा सीबीएसई से पढ़ते हैं। ऐसे में सरकार का मानना है कि यदि हिमाचल के सरकारी स्कूलों के छात्रों को समान अवसर देने हैं, तो उन्हें भी उसी बोर्ड से जोड़ना जरूरी है।
लेकिन उसका दूसरा पक्ष यह है कि क्या हिमाचल के अपने इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन में प्रदेश के योगदान, पहाड़ी संस्कृति, लोक परंपराओं और स्थानीय नायकों को नई व्यवस्था में पर्याप्त स्थान मिलेगा। यदि पूरा ध्यान केवल राष्ट्रीय पाठयक्रम पर रहेगा, तो प्रदेश की स्थानीय पहचान और इतिहास कमजोर पड़ने का खतरा भी जताया जा रहा है।
राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला आने वाले समय में बड़ा मुद्दा बन सकता है। इसे भाजपा को मौका मिल गया है कि जिस शिक्षा नीति और पाठयक्रम में किए गए बदलावों पर कांग्रेस ने केन्द्र में सवाल खडे किये थे प्रदेश कि कांग्रेस सरकार ने उसे अपना कर कांग्रेस केे उस विरोध् पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। अब प्रदेश को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वह केवल सीबीएसई की परीक्षा प्रणाली अपना रही है या पाठयक्रम में मौजूद विवादित बदलावों से भी पूरी तरह सहमत है। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि नई पीढ़ी की सोच और इतिहास की समझ तैयार करने का आधार भी होती है।
फिलहाल इतना तय है कि हिमाचल में सीबीएसई स्कूलों की शुरुआत केवल शिक्षा सुधार का विषय नहीं रह गई है। यह अब शिक्षा, राजनीति और विचारधारा-तीनों के केंद्र में आ चुकी है। आने वाले दिनों में सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने के साथ-साथ इतिहास की संतुलित समझ और हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत को कैसे सुरक्षित रखेगी। यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होगा।

कांग्रेस का नेता प्रतिपक्ष पर पलटवार मुकद्दमों का फैसला अदालत करेगी, भाजपा नहीं

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में अधिकारियों और कर्मचारियों को लेकर सियासी टकराव और तेज हो गया है। नेता प्रतिपक्ष जय राम ठाकुर और भाजपा नेताओं के बयानों के बाद अब कांग्रेस सरकार के दो वरिष्ठ मंत्री ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह और तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी ने भाजपा पर तीखा हमला बोला है। दोनों मंत्रियों ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों पर राजनीतिक दबाव बनाने तथा उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश कर रही है, जिससे उसका कर्मचारी विरोधी चेहरा एक बार फिर सामने आ गया है।
मंत्रियों ने कहा कि किसी भी मामले में दर्ज मुकद्दमे सही हैं या गलत, इसका फैसला अदालतों को करना है, न कि राजनीतिक नेताओं को। उन्होंने कहा कि यदि किसी मामले में जांच चल रही है तो उसे कानून के अनुसार पूरा होने देना चाहिए। सार्वजनिक मंचों से यह कहना कि मुकद्दमे गलत हैं या अधिकारियों को भविष्य में परिणाम भुगतने होंगे, न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों पर दबाव बनाने जैसा है।
कांग्रेस के दोनों मंत्रियों ने नेता प्रतिपक्ष जय राम ठाकुर से सवाल किया कि क्या उनके मुख्यमंत्री रहते हुए मुकद्दमे दर्ज नहीं होते थे। यदि उस समय कानून के तहत दर्ज मामलों को सही माना जाता था तो अब वही प्रक्रिया गलत कैसे हो गई। उन्होंने कहा कि भाजपा का यह रुख उसकी दोहरी राजनीति और अवसरवादी सोच को दर्शाता है।
अनिरुद्ध सिंह और राजेश धर्माणी ने आरोप लगाया कि भाजपा का रिकॉर्ड कर्मचारियों और अधिकारियों के हितों के प्रति कभी सकारात्मक नहीं रहा। उन्होंने कहा कि पुरानी पेंशन योजना का विरोध हो या कर्मचारियों के अन्य अधिकारों का मामला, भाजपा ने हमेशा कर्मचारी हितों की अनदेखी की। इसके विपरीत वर्तमान कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के बाद पुरानी पेंशन योजना लागू कर कर्मचारियों से किया गया बड़ा वादा पूरा किया।
मंत्रियों ने भाजपा पर आंतरिक संकट का भी आरोप लगाया। उनका कहना था कि पार्टी इस समय गुटबाजी और नेतृत्व संकट से जूझ रही है। ऐसे में जनता का ध्यान इन समस्याओं से हटाने के लिए भाजपा सरकार और प्रशासन के खिलाफ विवाद खड़े कर रही है तथा अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।
दोनों मंत्रियों ने कहा कि प्रदेश सरकार प्रशासनिक निष्पक्षता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है और किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को राजनीतिक दबाव में काम करने की जरूरत नहीं है। सरकार ऐसे सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ खड़ी है जो कानून के दायरे में रहकर अपने दायित्व निभा रहे हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि निष्पक्ष तरीके से काम करने वाले अधिकारियों को सरकार पूरा संरक्षण देगी।
वित्तीय मामलों को लेकर भी कांग्रेस ने भाजपा सरकार को घेरा। मंत्रियों का दावा है कि पूर्व भाजपा सरकार को आरडीजी और जीएसटी क्षतिपूर्ति के रूप में केंद्र से लगभग 60 हजार करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता मिली थी, लेकिन इसके बावजूद कर्मचारियों को वेतन आयोग के एरियर और अन्य वित्तीय लाभ नहीं दिए गए। उनका कहना है कि मौजूदा कांग्रेस सरकार कर्मचारियों और अधिकारियों के हितों की रक्षा के लिए लगातार कदम उठा रही है।
कांग्रेस ने भाजपा पर धमकी और दबाव की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदेश की जनता सब देख रही है और समय आने पर इसका जवाब देगी।
यह बयान ऐसे समय आया है जब प्रदेश में प्रशासनिक फैसलों, दर्ज मुकद्दमों और अधिकारियों की भूमिका को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। भाजपा जहां सरकार पर राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप लगा रही है, वहीं कांग्रेस इसे कानून के अनुसार चल रही प्रक्रिया बताते हुए भाजपा पर न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश का आरोप लगा रही है। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में अधिकारियों, कर्मचारियों और कानून व्यवस्था से जुड़े मुद्दे हिमाचल की राजनीति के प्रमुख चुनावी और राजनीतिक विषय बने रह सकते हैं।

राजभवन पहुंचा विमल नेगी प्रकरण दोषियों के खिलाफ कारवाई की मांग

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश पावर कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (एचपीपीसीएल) के पूर्व चीफ इंजीनियर विमल नेगी की मौत का मामला एक बार फिर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन के केंद्र में आ गया है। इस बार विमल नेगी की पत्नी किरण नेगी ने प्रेस वार्ता में बताया कि जांच एजेंसी ने पेखुबेला सौर ऊर्जा परियोजना में कथित अनियमितताओं, वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव और विमल नेगी के मानसिक उत्पीड़न के बीच संबंधों की पुष्टि की है। उन्होंने हिमाचल जनजातीय लोक अधिकार महासंघ के प्रतिनिधियों के साथ राज्यपाल से मुलाकात कर निष्पक्ष जांच, दोषी अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कारवाई करने और विमल नेगी प्रकरण मे न्याय दिलवाने के लिये आवश्यक हस्तक्षेप की मांग की है।
प्रेस वार्ता के दौरान किरण नेगी ने कहा कि उनके पति पर सरकारी परियोजना में भ्रष्टाचार से जुड़े निर्णयों को मंजूरी देने का लगातार दबाव बनाया जा रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब विमल नेगी ने नियमों के विपरीत प्रस्तावों का समर्थन करने से इन्कार किया तो उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनके अनुसार, घंटों कार्यालय में खड़ा रखा जाता था, लगातार दबाव में रखा जाता था और कार्यस्थल का माहौल इतना तनावपूर्ण बना दिया गया था कि उनकी तबीयत लगातार बिगड़ने लगी। उन्होंने दावा किया कि कॉर्पाेरेट कार्यालय में स्थानांतरण के बाद ही उनके पति को उच्च रक्तचाप सहित कई स्वास्थ्य समस्याएं होने लगी थीं।
जांच दस्तावेज़ में जांच के दौरान विमल नेगी के मामले में "systematic pattern of mental torture, professional harassment and criminal conspiracy" पैटर्न सामने आया। जांच में यह पाया गया है कि वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कथित रूप से परियोजना संबंधी मंजूरियों और भुगतानों को सुविधाजनक बनाने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। हालांकि यह उल्लेखनीय है कि इन दस्तावेज़ों में दर्ज निष्कर्षों की अंतिम कानूनी पुष्टि न्यायालय में होना अभी बाकी है।
जांच के अनुसार विमल नेगी ने 15 जून 2024 को शोंगटोंग परियोजना से स्थानांतरित होकर एचपीपीसीएल के कॉर्पाेरेट कार्यालय में कार्यभार संभाला था। इसके बाद 10 मार्च 2025 को उनके लापता होने और 18 मार्च 2025 को सतलुज नदी से उनका शव बरामद होने का उल्लेख है। मल्टी इंस्टीटयूशनल मेडिकल बोर्ड ने मौत का कारण "Ante Mortem Drowning" अर्थात जीवित अवस्था में डूबने से मृत्यु बताया। लेकिन परिवार का कहना है कि यह रिपोर्ट केवल मृत्यु का चिकित्सकीय कारण बताती है, यह नहीं बताती कि वह किन परिस्थितियों में नदी तक पहुंचे और मौत से पहले उनके साथ क्या हुआ।
सीबीआई जांच में पेखुबेला सौर ऊर्जा परियोजना को प्रमुख आधार बताया गया है। दस्तावेज़ के अनुसार मई 2023 में इस परियोजना का ठेका एक निजी कंपनी को दिया गया था और इसे 180 दिनों के भीतर पूरा किया जाना था। लेकिन तय समय में परियोजना पूरी नहीं हो सकी और ठेकेदार को पांच बार अस्थायी समय-विस्तार दिया गया। जांच में इसी प्रक्रिया की समीक्षा की गई।
जांच रिपोर्ट में आरोप है कि तत्कालीन प्रबंध निदेशक हरिकेश मीणा और निदेशक ;(इलेक्ट्रिकल) देशराज ने कथित रूप से ठेकेदार के पक्ष में प्रस्ताव तैयार करवाने के लिए अधीनस्थ अधिकारियों पर दबाव बनाया। जांच में यह भी दर्ज है कि अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा ई-ऑफिस फाइलों में दर्ज टिप्पणियों और आपत्तियों को दबा दिया गया तथा उनके स्थान पर ठेकेदार के पक्ष में प्रस्ताव आगे बढ़ाए गए। दस्तावेज़ में इन अधिकारियों पर सार्वजनिक पद का दुरुपयोग करते हुए कथित आपराधिक साजिश के तहत ठेकेदार को लाभ पहुंचाने का आरोप भी दर्ज किया गया है। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा।
किरण नेगी का कहना है कि उनके पति इसी कथित दबाव का विरोध कर रहे थे। उनका दावा है कि विमल नेगी ने नियमों के विपरीत किसी भी फाइल को मंजूरी देने से इन्कार किया, जिसके बाद उन्हें लगातार मानसिक तनाव में रखा गया। उन्होंने कहा कि यदि जांच एजेंसी ने भी मानसिक प्रताड़ना और पेशेवर उत्पीड़न का उल्लेख किया है तो सरकार अब यह नहीं कह सकती कि मामला केवल व्यक्तिगत तनाव का था। उन्होंने मांग की कि जांच में जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आई है, उनके खिलाफ तत्काल कारवाई की जाए।
प्रेस वार्ता में किरण नेगी ने सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने इस पुरे प्रकरण के पीछे किसी नेता के होने की बात भी प्रेसवार्ता में कही। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने सच्चाई सामने लाने के बजाये उन्हीं लोगों से रिपोर्ट तैयार करवाई जिन पर सवाल उठ रहे थे। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता का दावा करने वाली सरकार को इस मामले में पूरी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि लोगों के सामने वास्तविक तथ्य आ सकें।
उन्होंने कहा कि घटना को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है लेकिन आज भी सबसे महत्वपूर्ण सवालों का जवाब नहीं मिला है। आखिर 10 मार्च से 18 मार्च के बीच विमल नेगी कहां थे? क्या उनका अपहरण किया गया था? उनके मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच में क्या सामने आया? यदि मौत आत्महत्या थी तो उसके पीछे परिस्थितियां क्या थीं और यदि कोई अन्य कारण था तो उसका खुलासा क्यों नहीं किया गया? उनका कहना है कि परिवार आज भी इन सवालों के जवाब का इंतजार कर रहा है।
किरण नेगी का कहना है कि उन्हें किसी राजनीतिक लाभ की नहीं बल्कि निष्पक्ष न्याय की अपेक्षा है। उनका कहना है कि यदि एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी भी कथित दबाव और प्रताड़ना से सुरक्षित नहीं है तो यह पूरे प्रशासनिक तंत्रा के लिए चिंता का विषय है।
विमल नेगी का मामला अब केवल एक अधिकारी की मौत का मामला नहीं रह गया है। कथित सीबीआई दस्तावेज़ों में परियोजना आवंटन, समय-विस्तार, फाइल प्रक्रिया, वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका और मानसिक प्रताड़ना जैसे कई गंभीर मुद्दों का उल्लेख होने के कारण यह मामला सरकारी परियोजनाओं में पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ गया है। यदि जांच एजेंसी के निष्कर्ष आगे न्यायिक परीक्षण में भी कायम रहते हैं तो इसके दूरगामी प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभाव हो सकते हैं।
फिलहाल सरकार या दस्तावेज़ों में जिन अधिकारियों का उल्लेख किया गया है, उनकी ओर से इन आरोपों पर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में मामले का दूसरा पक्ष आना अभी बाकी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि परिवार द्वारा सार्वजनिक किए गए कथित सीबीआई दस्तावेज़ों ने इस पूरे प्रकरण को नया मोड़ दे दिया है। अब निगाहें सरकार की अगली कारवाई, संबंधित अधिकारियों के जवाब और सबसे महत्वपूर्ण, न्यायालय में होने वाली आगे की कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हैं, क्योंकि आरोप चाहे जितने गंभीर हों, उनकी अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

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