Wednesday, 30 September 2026
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राजभवन पहुंचा विमल नेगी प्रकरण दोषियों के खिलाफ कारवाई की मांग

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश पावर कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (एचपीपीसीएल) के पूर्व चीफ इंजीनियर विमल नेगी की मौत का मामला एक बार फिर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन के केंद्र में आ गया है। इस बार विमल नेगी की पत्नी किरण नेगी ने प्रेस वार्ता में बताया कि जांच एजेंसी ने पेखुबेला सौर ऊर्जा परियोजना में कथित अनियमितताओं, वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव और विमल नेगी के मानसिक उत्पीड़न के बीच संबंधों की पुष्टि की है। उन्होंने हिमाचल जनजातीय लोक अधिकार महासंघ के प्रतिनिधियों के साथ राज्यपाल से मुलाकात कर निष्पक्ष जांच, दोषी अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कारवाई करने और विमल नेगी प्रकरण मे न्याय दिलवाने के लिये आवश्यक हस्तक्षेप की मांग की है।
प्रेस वार्ता के दौरान किरण नेगी ने कहा कि उनके पति पर सरकारी परियोजना में भ्रष्टाचार से जुड़े निर्णयों को मंजूरी देने का लगातार दबाव बनाया जा रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब विमल नेगी ने नियमों के विपरीत प्रस्तावों का समर्थन करने से इन्कार किया तो उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनके अनुसार, घंटों कार्यालय में खड़ा रखा जाता था, लगातार दबाव में रखा जाता था और कार्यस्थल का माहौल इतना तनावपूर्ण बना दिया गया था कि उनकी तबीयत लगातार बिगड़ने लगी। उन्होंने दावा किया कि कॉर्पाेरेट कार्यालय में स्थानांतरण के बाद ही उनके पति को उच्च रक्तचाप सहित कई स्वास्थ्य समस्याएं होने लगी थीं।
जांच दस्तावेज़ में जांच के दौरान विमल नेगी के मामले में "systematic pattern of mental torture, professional harassment and criminal conspiracy" पैटर्न सामने आया। जांच में यह पाया गया है कि वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कथित रूप से परियोजना संबंधी मंजूरियों और भुगतानों को सुविधाजनक बनाने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। हालांकि यह उल्लेखनीय है कि इन दस्तावेज़ों में दर्ज निष्कर्षों की अंतिम कानूनी पुष्टि न्यायालय में होना अभी बाकी है।
जांच के अनुसार विमल नेगी ने 15 जून 2024 को शोंगटोंग परियोजना से स्थानांतरित होकर एचपीपीसीएल के कॉर्पाेरेट कार्यालय में कार्यभार संभाला था। इसके बाद 10 मार्च 2025 को उनके लापता होने और 18 मार्च 2025 को सतलुज नदी से उनका शव बरामद होने का उल्लेख है। मल्टी इंस्टीटयूशनल मेडिकल बोर्ड ने मौत का कारण "Ante Mortem Drowning" अर्थात जीवित अवस्था में डूबने से मृत्यु बताया। लेकिन परिवार का कहना है कि यह रिपोर्ट केवल मृत्यु का चिकित्सकीय कारण बताती है, यह नहीं बताती कि वह किन परिस्थितियों में नदी तक पहुंचे और मौत से पहले उनके साथ क्या हुआ।
सीबीआई जांच में पेखुबेला सौर ऊर्जा परियोजना को प्रमुख आधार बताया गया है। दस्तावेज़ के अनुसार मई 2023 में इस परियोजना का ठेका एक निजी कंपनी को दिया गया था और इसे 180 दिनों के भीतर पूरा किया जाना था। लेकिन तय समय में परियोजना पूरी नहीं हो सकी और ठेकेदार को पांच बार अस्थायी समय-विस्तार दिया गया। जांच में इसी प्रक्रिया की समीक्षा की गई।
जांच रिपोर्ट में आरोप है कि तत्कालीन प्रबंध निदेशक हरिकेश मीणा और निदेशक ;(इलेक्ट्रिकल) देशराज ने कथित रूप से ठेकेदार के पक्ष में प्रस्ताव तैयार करवाने के लिए अधीनस्थ अधिकारियों पर दबाव बनाया। जांच में यह भी दर्ज है कि अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा ई-ऑफिस फाइलों में दर्ज टिप्पणियों और आपत्तियों को दबा दिया गया तथा उनके स्थान पर ठेकेदार के पक्ष में प्रस्ताव आगे बढ़ाए गए। दस्तावेज़ में इन अधिकारियों पर सार्वजनिक पद का दुरुपयोग करते हुए कथित आपराधिक साजिश के तहत ठेकेदार को लाभ पहुंचाने का आरोप भी दर्ज किया गया है। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा।
किरण नेगी का कहना है कि उनके पति इसी कथित दबाव का विरोध कर रहे थे। उनका दावा है कि विमल नेगी ने नियमों के विपरीत किसी भी फाइल को मंजूरी देने से इन्कार किया, जिसके बाद उन्हें लगातार मानसिक तनाव में रखा गया। उन्होंने कहा कि यदि जांच एजेंसी ने भी मानसिक प्रताड़ना और पेशेवर उत्पीड़न का उल्लेख किया है तो सरकार अब यह नहीं कह सकती कि मामला केवल व्यक्तिगत तनाव का था। उन्होंने मांग की कि जांच में जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आई है, उनके खिलाफ तत्काल कारवाई की जाए।
प्रेस वार्ता में किरण नेगी ने सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने इस पुरे प्रकरण के पीछे किसी नेता के होने की बात भी प्रेसवार्ता में कही। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने सच्चाई सामने लाने के बजाये उन्हीं लोगों से रिपोर्ट तैयार करवाई जिन पर सवाल उठ रहे थे। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता का दावा करने वाली सरकार को इस मामले में पूरी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि लोगों के सामने वास्तविक तथ्य आ सकें।
उन्होंने कहा कि घटना को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है लेकिन आज भी सबसे महत्वपूर्ण सवालों का जवाब नहीं मिला है। आखिर 10 मार्च से 18 मार्च के बीच विमल नेगी कहां थे? क्या उनका अपहरण किया गया था? उनके मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच में क्या सामने आया? यदि मौत आत्महत्या थी तो उसके पीछे परिस्थितियां क्या थीं और यदि कोई अन्य कारण था तो उसका खुलासा क्यों नहीं किया गया? उनका कहना है कि परिवार आज भी इन सवालों के जवाब का इंतजार कर रहा है।
किरण नेगी का कहना है कि उन्हें किसी राजनीतिक लाभ की नहीं बल्कि निष्पक्ष न्याय की अपेक्षा है। उनका कहना है कि यदि एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी भी कथित दबाव और प्रताड़ना से सुरक्षित नहीं है तो यह पूरे प्रशासनिक तंत्रा के लिए चिंता का विषय है।
विमल नेगी का मामला अब केवल एक अधिकारी की मौत का मामला नहीं रह गया है। कथित सीबीआई दस्तावेज़ों में परियोजना आवंटन, समय-विस्तार, फाइल प्रक्रिया, वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका और मानसिक प्रताड़ना जैसे कई गंभीर मुद्दों का उल्लेख होने के कारण यह मामला सरकारी परियोजनाओं में पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ गया है। यदि जांच एजेंसी के निष्कर्ष आगे न्यायिक परीक्षण में भी कायम रहते हैं तो इसके दूरगामी प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभाव हो सकते हैं।
फिलहाल सरकार या दस्तावेज़ों में जिन अधिकारियों का उल्लेख किया गया है, उनकी ओर से इन आरोपों पर विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में मामले का दूसरा पक्ष आना अभी बाकी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि परिवार द्वारा सार्वजनिक किए गए कथित सीबीआई दस्तावेज़ों ने इस पूरे प्रकरण को नया मोड़ दे दिया है। अब निगाहें सरकार की अगली कारवाई, संबंधित अधिकारियों के जवाब और सबसे महत्वपूर्ण, न्यायालय में होने वाली आगे की कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हैं, क्योंकि आरोप चाहे जितने गंभीर हों, उनकी अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

आरएसएस कानून से ऊपर नहीं’ खड़गे के सवालों पर संघ-भाजपा-वीएचपी एकजुट

शिमला/शैल। कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियंक खड़गे के एक पत्र ने आरएसएस, भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद को सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। खड़गे ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर संगठन के कानूनी दर्जे, रजिस्ट्रेशन, फंडिंग, खर्च, टैक्स और सार्वजनिक गतिविधियों पर जवाब मांगा है। इसके बाद मोहन भागवत ने साफ कहा कि उन्हें इस पर जवाब देने की जरूरत नहीं लगती। भाजपा ने इसे कांग्रेस की राजनीति बताया, जबकि विश्व हिन्दू परिषद ने भी खड़गे के सवालों को संघ पर हमला करार दिया। अब यह मामला सिर्फ एक पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि आरएसएस की जवाबदेही बनाम कांग्रेस के राजनीतिक हमले की बड़ी लड़ाई बन गया है।
प्रियंक खड़गे ने अपने पत्र में कहा कि आरएसएस कोई छोटा संगठन नहीं है। उन्होंने लिखा कि संघ खुद दावा करता है कि देशभर में उसकी 60 हजार से ज्यादा शाखाएं और करोड़ों स्वयंसेवक हैं। खड़गे ने एबीपीएस की 2025-26 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा इतने बड़े पैमाने पर काम करने वाले संगठन को सिर्फ ‘सांस्कृतिक’ या ‘अनौपचारिक’ कहकर नहीं छोड़ा जा सकता।
खड़गे ने अपने पत्र में आरएसएस से कई सीधे सवाल पूछे। उन्होंने जानना चाहा कि आरएसएस का कानूनी दर्जा क्या है, वह किस कानून या ढांचे के तहत काम करता है, उसका रजिस्ट्रेशन किस रूप में है, उसके पदाधिकारी कौन हैं, संगठन के पास पैसा कहां से आता है, वह कहां खर्च होता है, क्या आरएसएस टैक्स देता है, और अगर वह रजिस्टर्ड नहीं है तो इतनी बड़ी गतिविधियां किस कानूनी आधार पर चल रही हैं।
खड़गे ने इस मुद्दे को केवल राजनीति नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता का सवाल बताया। उनका कहना है कि जब आम नागरिक, एनजीओ, ट्रस्ट, कंपनियां, धार्मिक संस्थाएं और दूसरे संगठन कानून के तहत रजिस्ट्रेशन, ऑडिट और टैक्स जैसे नियमों का पालन करते हैं, तो आरएसएस को इससे बाहर क्यों रखा जाये। उन्होंने कहा कि आरएसएसअपने 100 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है, ऐसे में यह समय सिर्फ उत्सव का नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी होना चाहिए। खड़गे का सीधा संदेश है कि अगर आरएसएस खुद को अनुशासन, राष्ट्रवाद और सेवा का प्रतीक बताता है, तो उसे पारदर्शिता भी दिखानी चाहिए।
लेकिन इन सवालों पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, ‘मुझे इसका जवाब देने की जरूरत नहीं है।’ भागवत ने कहा कि आरएसएस कोई गुप्त संगठन नहीं है। संघ खुले मैदानों में शाखाएं लगाता है, सार्वजनिक रूप से काम करता है और समाज के बीच सक्रिय रहता है।
भागवत ने यह भी कहा कि रजिस्ट्रेशन आमतौर पर उन संस्थाओं के लिए जरूरी होता है जो सरकार से पैसा लेती हैं या किसी विशेष कानूनी लाभ के लिए औपचारिक ढांचा चाहती हैं। उनके मुताबिक आरएसएस ऐसा संगठन नहीं है। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि देश में कई चीजें बिना रजिस्ट्रेशन के चलती हैं और आरएसएस भी उसी तरह एक सामाजिक - सांस्कृतिक संगठन है। भागवत का यह बयान भी चर्चा में है कि ‘हिंदू धर्म भी रजिस्टर्ड नहीं है।’ इस बयान के जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि आरएसएस को किसी कंपनी या संस्था की तरह देखने की कोशिश गलत है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सरकारें आरएसएस को अच्छी तरह जानती हैं, क्योंकि संघ पर पहले तीन बार प्रतिबंध लग चुका है। भागवत के मुताबिक अगर सरकारों ने कभी आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया और बाद में हटाया, तो इसका मतलब यह है कि संघ कोई छिपा हुआ संगठन नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस ने 1950 के दशक में अपना लिखित संविधान सरकार को सौंप दिया था, और तब उससे कभी यह नहीं कहा गया कि उसे अलग से रजिस्ट्रेशन कराना होगा।
हालांकि प्रियंक खड़गे ने कहा कि यह कोई निजी चिट्ठी नहीं है, बल्कि कर्नाटक सरकार की ओर से लिखा गया आधिकारिक पत्र है। इसलिए आरएसएस यह नहीं कह सकता कि जवाब देने की जरूरत नहीं है। खड़गे ने कहा कि जब राज्य सरकार को आरएसएस के कार्यक्रमों और बड़े आयोजनों के लिए सुरक्षा और प्रशासनिक इंतजाम करने पड़ते हैं, तो सरकार को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वह किस संगठन के लिए यह सब कर रही है। खड़गे ने साफ कहा कि यह सवाल वैचारिक लड़ाई का नहीं, बल्कि कानूनी और प्रशासनिक जिम्मेदारी का है।
इस बीच भाजपा ने खड़गे के पत्र को कांग्रेस का राजनीतिक एजेंडा बताया। पार्टी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस अपनी सरकार की नाकामियों और असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए आरएसएस को निशाना बना रही है।
विवाद तब और बढ़ गया जब भाजपा सांसद रमेश जिगाजिनगी ने प्रियंक खड़गे पर हमला करते हुए सवाल किया कि ‘एक दलित को आरएसएस की चिंता क्यों होनी चाहिए? इस बयान ने नई बहस छेड़ दी। खड़गे ने इसका तीखा जवाब दिया और कहा कि वे डरने वालों में नहीं हैं और संविधान के दायरे में सवाल पूछना उनका अधिकार है। खड़गे ने कहा कि किसी भी जनप्रतिनिधि या मंत्री का काम सवाल पूछना और जवाबदेही तय करना है, चाहे सामने कोई भी संगठन हो। जिगाजिनगी के बयान के बाद यह विवाद राजनीतिक और सामाजिक टकराव का रूप भी लेने लगा।
विश्व हिंदू परिषद भी इस विवाद में खुलकर आरएसएस के साथ खड़ी नजर आयी। वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार और संघ परिवार से जुड़े नेताओं का कहना है कि आरएसएस कोई गुप्त संगठन नहीं, बल्कि खुला सामाजिक -सांस्कृतिक संगठन है। वीएचपी का मानना है कि कांग्रेस का यह अभियान दरअसल संघ और हिंदू संगठनों पर राजनीतिक हमला है।
यही वजह है कि यह पूरा विवाद अब केवल एक पत्र या एक जवाब तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस की कोशिश है कि आरएसएस को वैचारिक बहस से निकालकर कानूनी और वित्तीय जवाबदेही के घेरे में लाया जाये। कांग्रेस यह सवाल खड़ा करना चाहती है कि अगर कोई संगठन लाखों लोगों को जोड़ता है, समाज और राजनीति पर असर डालता है, तो उससे पारदर्शिता और कानून के पालन पर सवाल क्यों न पूछे जायें। दूसरी तरफ आरएसएस, भाजपा और वीएचपी इस पूरी कवायद को राजनीतिक बदले की कारवाई या ‘संघ को बदनाम करने की कोशिश’ बता रहे हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आरएसएस प्रियंक खड़गे के पत्र का औपचारिक लिखित जवाब देगा या नहीं। मोहन भागवत ने अभी तक साफ कर दिया है कि उन्हें जवाब देने की जरूरत नहीं लगती। लेकिन खड़गे इस मामले को छोड़ने के मूड में नहीं दिखते। उन्होंने साफ कहा है कि जब राज्य सरकार को संघ के कार्यक्रमों के लिए सुरक्षा और व्यवस्था करनी पड़ती है, तो आरएसएस की कानूनी पहचान और जवाबदेही जानना जरूरी है।
कुल मिलाकर, प्रियंक खड़गे के इस पत्र ने आरएसएस की कानूनी स्थिति, फंडिंग, टैक्स और जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है। अब देखना यह होगा कि यह विवाद सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहता है या आगे चलकर कानूनी, प्रशासनिक या राजनीतिक कारवाई की दिशा भी लेता है। फिलहाल इतना तय है कि आरएसएस पर खड़े हुए ये सवाल जल्दी शांत होते नहीं दिख रहे।
 

नड्डा के हिमाचल दौरे ने बढ़ाई राजनीतिक सरगर्मियां, क्या 2027 की तैयारी शुरू?

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में इन दिनों केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा का दो दिवसीय शिमला दौरा चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। आधिकारिक तौर पर यह दौरा संगठनात्मक और विभिन्न कार्यक्रमों में भागीदारी तक सीमित बताया गया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसके अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। भाजपा नेताओं, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और विभिन्न वर्गों के लोगों से उनकी मुलाकातों ने इस चर्चा को और हवा दी है कि कहीं न कहीं 2027 के विधानसभा चुनावों की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है।
शिमला में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान जब उनसे यह सवाल पूछा गया कि क्या वह भविष्य में दिल्ली की राजनीति छोड़कर हिमाचल की सक्रिय राजनीति में आने की तैयारी कर रहे हैं, तो उन्होंने इस संभावना को पूरी तरह खारिज कर दिया। नड्डा ने स्पष्ट कहा कि उनका वर्तमान दायित्व राष्ट्रीय स्तर पर है और वह दिल्ली में ही अपनी भूमिका निभाते रहेंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हिमाचल में भाजपा के पास जयराम ठाकुर जैसा नेतृत्व मौजूद है और भविष्य की परिस्थितियां समय के साथ तय होंगी।
दौरे के दौरान एक और दिलचस्प सवाल उनके परिवार की राजनीतिक भूमिका को लेकर उठा। उनसे पूछा गया कि क्या उनकी पत्नी या पुत्र भविष्य में राजनीति में प्रवेश करेंगे। इस पर नड्डा ने कहा कि फिलहाल वह स्वयं ही पर्याप्त हैं और परिवार के किसी अन्य सदस्य को राजनीति में लाने का कोई विचार नहीं है। उनके इस बयान को भी राजनीतिक संकेतों के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि उन्होंने परिवारवाद की राजनीति से दूरी का संदेश देने का प्रयास किया।
नड्डा के इस दौरे में कई वरिष्ठ भाजपा नेता उनके साथ दिखाई दिए। हालांकि सबसे अधिक चर्चा पूर्व मंत्री सुरेश भारद्वाज की अनुपस्थिति को लेकर रही। शिमला भाजपा की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले सुरेश भारद्वाज इस दौरे में नजर नहीं आये। राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे सामान्य संयोग मानने के बजाय स्थानीय नेतृत्व की अंदरूनी रणनीतियों से जोड़कर देख रहे हैं।
दरअसल, सुरेश भारद्वाज पिछले कुछ समय से शिमला में लगातार सक्रिय हैं और माना जा रहा है कि वह आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करने में जुटे हैं। भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री पद की संभावित दावेदारी को लेकर मंडी, हमीरपुर, कांगड़ा और शिमला सहित विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं की सक्रियता बढ़ती दिखाई दे रही है।
ऐसे में जगत प्रकाश नड्डा का यह दौरा केवल एक औपचारिक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि भाजपा के भीतर भविष्य के नेतृत्व, संगठनात्मक समीकरणों और 2027 की चुनावी रणनीति को लेकर नए संकेत छोड़ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नड्डा भले ही हिमाचल की राजनीति में सीधे आने से इन्कार कर रहे हों, लेकिन उनके दौरे ने यह संदेश अवश्य दिया है कि भाजपा आगामी चुनावों की तैयारी समय से पहले शुरू कर चुकी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में हिमाचल भाजपा की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है और मुख्यमंत्री पद की संभावित दौड़ में कौन-कौन से चेहरे उभरकर सामने आते हैं।

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