मरीज की मौत पर हिमकेयर फिर सवालों में
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Created on Tuesday, 01 September 2026 12:17
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। पालमपुर में पैसों के अभाव और समय पर इलाज न मिलने से एक मरीज की मौत के मामले पर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एवं सुलह विधायक विपिन सिंह परमार ने सुक्खू सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि मरीज को समय पर हिमकेयर योजना का लाभ मिलता और निजी अस्पताल में कैशलेस उपचार उपलब्ध होता तो उसकी जान बचाई जा सकती थी। परमार ने कहा, ‘यह मृत्यु नहीं, सरकार द्वारा की गई हत्या है।’
शिमला में मीडिया से बातचीत में परमार ने कहा कि 50 हजार या डेढ़ लाख रुपये जैसी राशि के अभाव में किसी व्यक्ति की मौत होना सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार ने गरीबों और जरूरतमंदों के लिए हिमकेयर और सहारा जैसी योजनाएं शुरू की थीं, लेकिन कांग्रेस सरकार ने राजनीतिक द्वेष के कारण इन्हें प्रभावी रूप से बंद कर दिया।
परमार ने कहा कि मुख्यमंत्री एक ओर स्वास्थ्य क्षेत्र में हाई-एंड सुविधाएं शुरू करने के दावे कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर गरीब मरीजों को इलाज के लिए पैसे जुटाने पड़ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि हिमकेयर का लाभ न मिलने से प्रदेश में अनेक परिवार परेशान हैं।
उन्होंने सरकार पर सरकारी रिकॉर्ड में जीवित लोगों को मृत घोषित किए जाने का भी गंभीर आरोप लगाया। परमार ने कहा कि यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है। उन्होंने मुख्यमंत्री से तत्काल हिमकेयर और सहारा योजनाओं को प्रभावी रूप से बहाल करने की मांग की।
परमार ने चेतावनी दी कि भाजपा इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाएगी। उन्होंने कहा कि भाजपा की सरकार बनने पर हिमकेयर योजना पूरी प्रतिबद्धता के साथ फिर शुरू की जाएगी, ताकि आर्थिक तंगी के कारण किसी जरूरतमंद की इलाज के अभाव में मौत न हो।
सुधीर शर्मा और जनक राज पर विजिलेंस की कारवाई से गरमाई हिमाचल की सियासत
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Created on Tuesday, 25 August 2026 05:07
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होते ही कांग्रेस सरकार और भाजपा के बीच टकराव का एक नया मोर्चा खुल गया है। एक ओर धर्मशाला से भाजपा विधायक एवं पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा आय से अधिक संपत्ति से जुड़े मामले में विजिलेंस जांच का सामना कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भरमौर से भाजपा विधायक डॉ. जनक राज भी हिमकेयर योजना में कथित अनियमितताओं की जांच के दायरे में हैं। दोनों मामलों में भाजपा राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप लगा रही है, जबकि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू का कहना है कि सरकार बदले की भावना से नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग के खिलाफ कारवाई कर रही है।
सुधीर शर्मा से शुक्रवार को राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के शिमला मुख्यालय में करीब दो घंटे पूछताछ की गई। उनके साथ विपिन सिंह परमार, सतपाल सिंह सत्ती, बलबीर वर्मा, डॉ. जनक राज, इंद्रदत्त लखनपाल, राकेश जम्वाल और त्रिलोक जम्वाल समेत कई भाजपा विधायक भी विजिलेंस मुख्यालय पहुंचे।
सुधीर शर्मा का कहना है कि वह जांच से नहीं डरते और विजिलेंस द्वारा मांगे जा रहे बैंक खातों, डीमैट खातों, निवेश, संपत्तियों, वाहनों, ऋण और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड दस्तावेजों के साथ उपलब्ध करा रहे हैं। उनका दावा है कि न कोई संपत्ति छिपाई गई है और न कोई वित्तीय लेन-देन। उन्होंने बैजनाथ की पैतृक भूमि के दो हिस्सों की कुल 74.07 लाख रूपये की पंजीकृत बिक्री और बीड़ निवासी अनुराग शर्मा को 14.50 लाख रूपये में हुई एक अन्य संपत्ति बिक्री का भी उल्लेख किया है।
लेकिन सुधीर शर्मा का सवाल जांच से ज्यादा जांच के समय को लेकर है। उनका कहना है कि मामला धर्मशाला से संबंधित है और दस्तावेज भी वहीं उपलब्ध हैं, फिर उन्हें विधानसभा सत्र के बीच शिमला मुख्यालय क्यों बुलाया गया।
यहीं से मामला राजनीतिक रूप से अधिक संवेदनशील हो जाता है। मानसून सत्र 21 अगस्त से शुरू होकर 3 सितंबर तक चलेगा और इस दौरान भाजपा सरकार को आर्थिक स्थिति, रोजगार, विकास, भ्रष्टाचार तथा कानून-व्यवस्था सहित कई मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। ऐसे में विपक्ष के दो विधायकों का अलग-अलग मामलों में विजिलेंस जांच के दायरे में आना भाजपा को सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने का अवसर भी देता है।
डॉ. जनक राज की विजिलेंस पूछताछ ने भी राजनीतिक तापमान बढ़ाया है। 20 अगस्त को डॉ. जनक राज से विजिलेंस कार्यालय में करीब चार घंटे पूछताछ हुई। मामला हिमकेयर योजना में कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है और पूछताछ मुख्य रूप से उस अवधि से संबंधित बताई गई है जब डॉ.जनक राज आईजीएमसी शिमला में मेडिकल सुपरिंटेंडेंट थे।
रिपोर्टों के अनुसार, विजिलेंस ने उनके कार्यकाल के दौरान हिमकेयर के तहत हुए भुगतान, आय-व्यय तथा प्रशासनिक और वित्तीय फैसलों से संबंधित जानकारी मांगी। डॉ. जनक राज ने बताया कि उनके कार्यकाल में हिमकेयर के तहत करीब 95 करोड़ रूपये के बिल पास हुए और उनके कार्यकाल में कोई अनियमितता नहीं हुई। उन्होंने जांच में की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए मामले की जांच सिटिंग जज से कराने की मांग की।
राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि विधानसभा सत्र के ठीक पहले दो भाजपा विधायकों से जुड़ी जांचें चर्चा के केंद्र में आ गई हैं। इससे भाजपा को यह कहने का आधार मिल गया है कि सरकार विपक्षी नेताओं को जांच में उलझाकर सदन के मुद्दों से ध्यान हटाना चाहती है।
सुधीर शर्मा के साथ विजिलेंस मुख्यालय पहुंचे भाजपा विधायकों की संख्या बताती है कि पार्टी इस कारवाई को व्यक्तिगत मामला मानकर नहीं चल रही। भाजपा इसे राजनीतिक प्रतिशोध का मुद्दा बनाकर सरकार को घेरेगी।
सुधीर शर्मा और जनक राज के मामले अब केवल जांच एजेंसियों की फाइलों तक सीमित नहीं रहे हैं, वे हिमाचल की सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ते राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन चुके हैं। आने वाले दिनों में जांच से निकलने वाले तथ्य ही तय करेंगे कि यह मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहता है या सरकार और विपक्ष के बीच टकराव को और गहरा करता है।
अंदरूनी नाराजगी बन सकती है हिमाचल में कांग्रेस के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती
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Created on Tuesday, 25 August 2026 05:04
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस में संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर शुरू हुई अंदरूनी नाराजगी अब सार्वजनिक ब्यानबाजी और एक-दूसरे पर राजनीतिक हमलों के दौर में पहुंचती दिखाई दे रही है। पिछले कुछ दिनों में राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी, वन विकास निगम के उपाध्यक्ष केहर सिंह खाची, लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के बयानों ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को एक बार फिर सामने ला दिया है। स्थिति यह है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता अब सार्वजनिक मंचों से संगठन में निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, बाहरी लोगों को महत्व देने और पार्टी के भीतर ही विरोधी ताकतों के सक्रिय होने जैसे गंभीर आरोप लगा रहे हैं।
इस विवाद की सबसे तीखी शुरुआत राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी के बयान से हुई। कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में नेगी ने पार्टी के भीतर बैठे लोगों पर ही निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर ऐसे लोगों को संगठन में पद दिए जा रहे हैं जिन्हें उन्होंने ‘जयचंद’ और भाजपा के ‘स्लीपर सेल’ तक बताया। उन्होंने यहां तक कहा कि जब तक पार्टी अपने भीतर के दुश्मन को खत्म नहीं करेगी, तब तक भाजपा और आरएसएस से प्रभावी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती।
नेगी का यह बयान सामान्य राजनीतिक आलोचना से आगे इसलिए माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने सवाल सीधे पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और नियुक्तियों पर उठाया है। इसका अर्थ यह निकाला जा रहा है कि सरकार और संगठन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। खासकर उन नियुक्तियों को लेकर असंतोष बढ़ रहा है, जिनमें पुराने और सक्रिय कार्यकर्ताओं की जगह अपेक्षाकृत नए चेहरों को जिम्मेदारी मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
इसी बीच 15 अगस्त को केहर सिंह खाची की ओर से दिए गए बयान ने विवाद को और हवा दी। खाची ने पार्टी और संगठन में अपनी भूमिका तथा मौजूदा राजनीतिक स्थिति को लेकर जिस अंदाज में बात रखी, उसे पार्टी के भीतर कुछ नेताओं ने पसंद नहीं किया। उनके बयान के बाद संगठन में उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे। कांग्रेस के भीतर यह चर्चा चल पडी कि जिन लोगों की सक्रिय राजनीतिक पहचान चुनावों से पहले बहुत सीमित थी, वे आज पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर कैसे पहुंच गए।
खाची के बयान पर विवाद बढ़ने के बाद उन्हें अपने बयान पर स्पष्टीकरण देने के लिए नोटिस जारी किया जाना भी इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर बनाता है। किसी पदाधिकारी को सार्वजनिक बयान के लिए जवाब देना पड़े, यह संकेत देता है कि पार्टी नेतृत्व अब खुले तौर पर होने वाली बयानबाजी को लेकर असहज है। इससे यह सवाल भी उठता है कि पार्टी में नेताओं और पदाधिकारियों को सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने की सीमा आखिर तय कौन कर रहा है।
विवाद के बीच लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह की सक्रियता ने भी राजनीतिक चर्चा को तेज किया। उन्होंने खाची से जुड़े विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी और इसी दौरान भाजपा सांसद कंगना रनौत को लेकर भी तीखी राजनीतिक टिप्पणी की। इससे कांग्रेस और भाजपा के बीच चलने वाली बयानबाजी के साथ-साथ कांग्रेस के भीतर की राजनीति भी चर्चा में आ गई। इससे पहले कंगना रनौत द्वारा युवाओं को लेकर दिए गए विवादित बयान पर भी विक्रमादित्य सिंह ने तीखा पलटवार किया था और सवाल उठाया था कि युवाओं को देश का भविष्य माना जाए या उन्हें अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाए। लेकिन कंगना रनौत पर बाबा रामदेव द्वारा दिये गये ब्यान पर उन्होने कंगना रनौत का पक्ष लेते हुये कहा कि वह अपने शब्द वापिस ले और सार्वजनिक रूप से माफी मांगे।
दूसरी ओर पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह का बयान इस पूरे विवाद को पार्टी के भीतर के पुराने असंतोष से जोड़ता है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि महत्वपूर्ण नियुक्तियों में सरकार और संगठन के बीच विचार-विमर्श होना चाहिए। उन्होंने ऐसे लोगों को पद दिए जाने पर भी सवाल उठाया, जिनका पार्टी को मजबूत करने या चुनाव जिताने में अपेक्षित योगदान नहीं रहा है।
यही बिंदु इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू है। कांग्रेस में एक तरफ वे नेता हैं जो लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं को महत्व देने की मांग कर रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ संगठन में नए चेहरों को जिम्मेदारी देने की प्रक्रिया चल रही है। समस्या नए चेहरों को जिम्मेदारी देने से नहीं, बल्कि पुराने नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता और योगदान की अनदेखी के आरोपों से पैदा हो रही है।
जगत सिंह नेगी का ‘जयचंद’ और ‘भाजपा के स्लीपर सेल’ वाला हमला, खाची का विवादित बयान, उसके बाद नोटिस, प्रतिभा सिंह की नाराजगी ये घटनाएं अलग-अलग दिखाई दे सकती हैं, लेकिन इनके बीच एक साझा राजनीतिक धागा नजर आता है। वह है संगठन में अधिकार, नियुक्तियों में हिस्सेदारी और पुराने बनाम नए नेताओं की लड़ाई।
कांग्रेस के लिए यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि पार्टी सत्ता में है और उसे अगले चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने की जरूरत है। यदि वरिष्ठ नेता ही सार्वजनिक मंचों पर संगठनात्मक फैसलों पर सवाल उठाने लगें और पार्टी के भीतर ‘जयचंद’ तथा ‘भाजपा एजेंट’ जैसे शब्द इस्तेमाल होने लगें, तो इसका सीधा असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा।
फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस अंदरूनी असंतोष को सार्वजनिक विवाद बनने से रोकने की है। यदि समय रहते वरिष्ठ नेताओं, सरकार और संगठन के बीच संवाद स्थापित नहीं हुआ तो आज की बयानबाजी आने वाले समय में बड़े राजनीतिक गुटों की लड़ाई में बदल सकती है। हिमाचल कांग्रेस के लिए असली सवाल अब यह नहीं है कि किस नेता ने किस पर हमला किया, बल्कि यह है कि क्या पार्टी अपने भीतर बढ़ रही नाराजगी को चुनावी चुनौती बनने से पहले नियंत्रित कर पाएगी?