Wednesday, 30 September 2026
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घोषणाओं से आगे कब बढ़ेगा रोजगार का मुद्दा?

शिमला/शैल। हिमाचल में बेरोजगार युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों की जरूरत लगातार बनी हुई है। ऐसे समय में मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने घुमारवीं में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी कई घोषणाएं की हैं। इनमें जल शक्ति विभाग के 4,000 पद भरने के साथ आने वाले समय में 4,000 शिक्षकों की भर्ती की घोषणा प्रमुख है। सवाल यह है कि इन घोषणाओं का लाभ युवाओं को कब तक मिलेगा।
सरकार की ओर से बताया गया कि अब तक 6,000 से अधिक शिक्षकों की नियुक्तियां की जा चुकी हैं और 4,000 और शिक्षकों की भर्ती की जाएगी। लेकिन प्रदेश में बड़ी संख्या में युवा लंबे समय से सरकारी भर्ती का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में नई भर्तियों की घोषणा के साथ उनकी नजर अब भर्ती प्रक्रिया शुरू होने और नियुक्तियां मिलने पर है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार युवाओं को रोजगार देने के लिए लगातार काम कर रही है। घुमारवीं में राजकीय महाविद्यालय में एमबीए, एमसीए और एमटीए की कक्षाएं शुरू करने तथा घंडावली कॉलेज में बीबीए और बीसीए की कक्षाएं शुरू करने की घोषणा भी की गई। इन पाठयक्रमों से युवाओं को उच्च शिक्षा के नए विकल्प मिलेंगे, लेकिन शिक्षा के बाद रोजगार की गारंटी अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
सरकार प्राकृतिक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को रोजगार का आधार बनाने की बात भी कर रही है। मुख्यमंत्री के अनुसार प्राकृतिक खेती से हल्दी की खेती करने वाला किसान एक बीघा जमीन से सालाना एक लाख रुपये तक कमा सकता है। इसके अलावा ई-टैक्सियों और बसों के लिए सब्सिडी जैसी योजनाओं के जरिए स्वरोजगार को बढ़ावा देने का दावा किया गया है।
लेकिन हिमाचल के युवाओं की सबसे बड़ी मांग नियमित और स्थायी रोजगार की है। आउटसोर्स और अस्थायी रोजगार के साथ युवाओं को लंबे समय तक भविष्य की सुरक्षा नहीं मिलती। सरकार ने खुद कई मौकों पर आउटसोर्स और मल्टी-टास्क कर्मचारियों से जुड़े मामलों पर नीति बनाने की बात कही है। ऐसे में नई भर्तियों की घोषणाओं को जमीन पर उतारना सरकार के लिए बड़ी परीक्षा होगी।
मुख्यमंत्री ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार के तहत प्रदेश में 156 से अधिक सीबीएसई स्कूल खोलने और राजीव गांधी डे-बोर्डिंग स्कूल बनाने की बात भी कही। शिक्षा में निवेश जरूरी है, लेकिन इसका वास्तविक असर तभी दिखाई देगा जब युवाओं को बेहतर शिक्षा के साथ रोजगार के पर्याप्त अवसर भी मिलें।
घुमारवीं में वन मित्रों का मानदेय 10 हजार से बढ़ाकर 12 हजार रुपये करने की घोषणा भी की गई। यह राहत जरूर है, लेकिन यह नियमित सरकारी नौकरी का विकल्प नहीं है। इसी तरह स्वरोजगार योजनाएं युवाओं को कुछ अवसर दे सकती हैं, लेकिन हर बेरोजगार युवा के लिए स्थायी समाधान नहीं बन सकती।
सरकार का दावा है कि वह रोजगार और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार कर रही है। दूसरी ओर युवाओं के सामने सवाल वही है घोषित पदों पर भर्ती कब शुरू होगी, परीक्षा कब होगी और नियुक्ति कब मिलेगी? हजारों युवाओं के लिए रोजगार केवल घोषणा नहीं, बल्कि समयबद्ध भर्ती और नियुक्ति का विषय है।
इसलिए सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती नई घोषणाएं करना नहीं, बल्कि पहले से घोषित भर्तियों को तय समय में पूरा करना है। 4,000 शिक्षकों और 4,000 जल शक्ति विभाग के पदों की भर्ती यदि पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरी होती है तो इससे बेरोजगार युवाओं को वास्तविक राहत मिल सकती है। वरना रोजगार की घोषणाएं भी सरकारी घोषणाओं की लंबी सूची में जुड़कर रह जाएंगी।

CM की पत्नी के चुनावी प्रतिद्वंद्वी पर FIR से देहरा की सियासत से सत्ता के गलियारों तक बढ़ा राजनीतिक तापमान

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर देहरा विधानसभा क्षेत्र चर्चा के केंद्र में है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू की पत्नी और देहरा से कांग्रेस विधायक कमलेश ठाकुर के खिलाफ 2024 के उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी रहे तथा दो बार निर्दलीय विधायक चुने गए होशियार सिंह चंब्याल के खिलाफ राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने भारतीय दंड संहिता की धारा 409 और 420 के तहत एफआईआर दर्ज की है। मामला विधायक ऐच्छिक निधि के कथित दुरुपयोग से जुड़ा है।
एफआईआर दर्ज होते ही यह मामला कानूनी दायरे से निकलकर राजनीतिक बहस का विषय बन गया है, क्योंकि होशियार सिंह वही नेता हैं जिन्होंने पहले निर्दलीय रहते हुए भाजपा का समर्थन किया, राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ मतदान किया और बाद में भाजपा के टिकट पर मुख्यमंत्री की पत्नी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा।
विजिलेंस ब्यूरो के अनुसार शिकायत होशियार सिंह की एक कंपनी के कर्मचारियों की ओर से की गई थी, जो कथित लाभार्थियों में भी शामिल बताए गए हैं। प्रारंभिक जांच में बैंक रिकॉर्ड, सरकारी दस्तावेज और लाभार्थियों के बयान दर्ज किए गए। जांच में यह सामने आने का दावा किया गया कि वर्ष 2023 और 2024 के दौरान विधायक ऐच्छिक निधि से कुछ लोगों के नाम पर आर्थिक सहायता स्वीकृत हुई, जबकि संबंधित व्यक्तियों ने कथित रूप से कभी आवेदन ही नहीं किया था।
जांच एजेंसी का दावा है कि लाभार्थियों ने बयान में कहा कि उनके खातों में राशि आने के बाद उसे नकद निकालकर पूर्व विधायक के निर्देश पर उन्हें वापस सौंप दिया गया। इन्हीं तथ्यों के आधार पर सरकारी धन के कथित दुरुपयोग, आपराधिक न्यासभंग और धोखाधड़ी के प्रथम दृष्टया साक्ष्य मिलने की बात कहते हुए एफआईआर दर्ज की गई है। ब्यूरो ने यह भी स्पष्ट किया है कि जांच के दौरान यदि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम या अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत किसी और अपराध के संकेत मिलते हैं तो उनकी भी जांच की जाएगी।
हालांकि अभी तक यह केवल एफआईआर का चरण है और आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया तथा जांच पूरी होने के बाद ही होगी। होशियार सिंह की ओर से इस मामले में विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है।
लेकिन इस कारवाई की राजनीतिक टाइमिंग ने विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का अवसर भी दे दिया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि विजिलेंस और गृह विभाग दोनों मुख्यमंत्री के पास हैं, इसलिए निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे। वहीं सरकार और विजिलेंस का कहना है कि शिकायत मिलने के बाद दस्तावेजी जांच के आधार पर कारवाई की गई है और कानून सभी के लिए समान है।
होशियार सिंह पिछले एक दशक से देहरा की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे हैं। वर्ष 2017 और 2022 में उन्होंने निर्दलीय चुनाव जीतकर अपनी मजबूत पकड़ साबित की। राजनीतिक गलियारों में उन्हें भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के करीबी नेताओं में माना जाता रहा। 2024 के राज्यसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा उम्मीदवार हर्ष महाजन के पक्ष में मतदान किया था। उसी चुनाव में कांग्रेस के छह विधायकों ने भी क्रॉस वोटिंग की थी, जिसके बाद सभी छह कांग्रेस विधायक और तीनों निर्दलीय विधायक अयोग्य घोषित कर दिए गए थे।
इसके बाद हुए उपचुनाव में भाजपा ने होशियार सिंह को आधिकारिक उम्मीदवार बनाया। उनके सामने मुख्यमंत्री सुक्खू की पत्नी कमलेश ठाकुर थीं। इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले में कमलेश ठाकुर को 32,737 वोट मिले जबकि होशियार सिंह को 28,823 वोट प्राप्त हुए और वे लगभग 3,900 मतों के अंतर से चुनाव हार गए। चुनाव के दौरान होशियार सिंह और भाजपा ने कांग्रेस सरकार पर सरकारी मशीनरी और महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से चुनाव प्रभावित करने जैसे आरोप लगाए थे, जिन्हें कांग्रेस ने खारिज किया था।
अब लगभग दो वर्ष बाद उन्हीं होशियार सिंह के खिलाफ विजिलेंस की एफआईआर ने राजनीतिक माहौल को फिर गर्म कर दिया है। भाजपा इसे राजनीतिक प्रतिशोध का मुद्दा बना सकती है, जबकि कांग्रेस इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कारवाई के रूप में पेश कर सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रहेगा। इसके असर भाजपा के भीतर जयराम ठाकुर और प्रेम कुमार धूमल समर्थक माने जाने वाले नेताओं की रणनीति पर भी पड़ सकते हैं। होशियार सिंह लंबे समय तक जयराम खेमे के करीबी माने जाते रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री सुक्खू और पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के व्यक्तिगत संबंधों की चर्चा भी समय-समय पर होती रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस मुद्दे पर किस तरह की राजनीतिक रणनीति अपनाती है और पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस मामले को किस स्वर में उठाता है।
फिलहाल इतना तय है कि देहरा की चुनावी प्रतिद्वंद्विता अब अदालत, जांच एजेंसियों और राजनीतिक मंचों तक पहुंच चुकी है। आने वाले दिनों में जांच की दिशा, होशियार सिंह का पक्ष और भाजपा की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम की राजनीतिक तस्वीर को और स्पष्ट करेंगे।

कांग्रेस सरकार के साढ़े तीन साल के कार्यकाल की बनेगी चार्जशीटःबिंदल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार के साढ़े तीन वर्ष पूरे होने पर भाजपा ने सरकार के खिलाफ बड़ा राजनीतिक अभियान छेड़ने का ऐलान किया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने कहा कि पार्टी सरकार के कार्यकाल की विस्तृत चार्जशीट तैयार कर गांव-गांव और शहर-शहर जनता के बीच जाएगी। इस चार्जशीट में चुनावी गारंटियों, अधूरे वादों, आर्थिक स्थिति, कानून- व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास कार्यों से जुड़े मुद्दों को शामिल किया जाएगा।
डॉ. बिंदल ने आरोप लगाया कि विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने महिलाओं, युवाओं, किसानों, बागवानों, कर्मचारियों और बेरोजगारों से कई बड़े वादे किए थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद अधिकांश गारंटियां अधूरी रह गईं। उन्होंने कहा कि अब जनता सरकार से जवाब मांग रही है और भाजपा इन सवालों को जन-जन तक पहुंचाएगी।
उन्होंने कहा कि भाजपा की चार्जशीट में महिलाओं को आर्थिक सहायता, युवाओं को रोजगार, किसानों और बागवानों से जुड़े वादे, कर्मचारियों को दिए गए आश्वासन, प्रदेश की आर्थिक स्थिति, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार के आरोप और विकास कार्यों की रफ्तार जैसे सभी प्रमुख मुद्दों को तथ्यात्मक रूप से शामिल किया जाएगा।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार ने विकास को गति देने के बजाय जनता पर करों और विभिन्न शुल्कों का बोझ बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि कई विकास परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं और प्रदेश में आर्थिक अनिश्चितता का माहौल बना है। पार्टी इन सभी मुद्दों को प्रमाण सहित जनता के सामने रखेगी।
डॉ. बिंदल ने बताया कि चार्जशीट को केवल एक राजनीतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि सरकार की कथनी और करनी का लेखा-जोखा बनाकर प्रदेशभर में जनसंपर्क अभियान चलाया जाएगा। भाजपा कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को सरकार के प्रदर्शन और चुनावी वादों की वास्तविक स्थिति से अवगत कराएंगे।

हर मॉनसून से पहले तैयारी के दावे क्या इस बार बदलेगा सिस्टम?

शिमला/शैल। मॉनसून शुरू होने से पहले लोक निर्माण विभाग ने एक बार फिर बड़े स्तर पर तैयारियों का दावा किया है। लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह के अनुसार प्रदेश में भारी बारिश और भूस्खलन से निपटने के लिए करीब 15,365 कर्मचारी जिसमें 11,137 बेलदार और 4,228 मल्टी टास्क वर्कर तथा 1,156 मशीनें तैनात की गई हैं। छह बेली ब्रिज भी तैयार रखे गए हैं और संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी के निर्देश दिए गए हैं।
सरकार का कहना है कि बारिश से पहले 155.95 किलोमीटर सड़कों पर नई परत, 924.94 किलोमीटर पैचवर्क, 8,893 किलोमीटर ड्रेनेज की सफाई और 9,414 किलोमीटर कलवर्ट की सफाई पूरी कर ली गई है। अधिकारियों को 24×7 कंट्रोल रूम, अतिरिक्त निजी मशीनों की व्यवस्था और अस्पतालों, स्कूलों तथा अन्य जरूरी संस्थानों तक संपर्क बनाए रखने के निर्देश भी दिए गए हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि हर साल मॉनसून से पहले ऐसी व्यापक तैयारियां होती हैं, तो पहली ही भारी बारिश में सैकड़ों सड़कें बंद क्यों हो जाती हैं?
पिछले तीन वर्षों में प्रदेश ने बार-बार देखा है कि बारिश शुरू होते ही कई राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग घंटों या कई बार दिनों तक बंद रहते हैं। दूरदराज के गांवों का संपर्क टूट जाता है, मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते, पर्यटक फंस जाते हैं और स्थानीय लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल मशीनों और कर्मचारियों की संख्या की नहीं, बल्कि संवेदनशील स्थानों की वैज्ञानिक पहचान, ढलानों के स्थायी उपचार, जल निकासी व्यवस्था और समय पर रखरखाव की भी है। कई स्थानों पर हर साल एक ही जगह भूस्खलन होता है, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या स्थायी समाधान पर पर्याप्त काम हो रहा है।
सरकार ने इस बार अधिकारियों को भू-स्खलन संभावित क्षेत्रों की सूची तैयार करने, ड्रेनेज की नियमित सफाई, महत्वपूर्ण संस्थानों तक सड़क संपर्क बनाए रखने और नुकसान का तत्काल आकलन करने के निर्देश दिए हैं। अब इन निर्देशों की असली परीक्षा मॉनसून के दौरान होगी।
प्रदेश के लोग इस बार केवल तैयारियों के दावे नहीं, बल्कि यह देखना चाहेंगे कि क्या 15 हजार से अधिक कर्मचारियों और 1,156 मशीनों की तैनाती वास्तव में सड़कों को खुला रखने, राहत कार्यों को तेज करने और जनजीवन को सामान्य बनाए रखने में सफल होती है या फिर हर साल की तरह पहली तेज बारिश के साथ व्यवस्था की पोल खुल जाएगी।

क्या युवाओं के मुद्दों पर भाजपा को घेरकर 2027 की सियासी पटकथा लिख रही है कांग्रेस?

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने यूथ कांग्रेस के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान की शुरुआत के दौरान जिस तरह NEET पेपर लीक, अग्निवीर योजना, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और शिक्षा सुधार को एक ही मंच से जोड़ा, उससे यह संकेत मिला कि कांग्रेस अब भाजपा के खिलाफ सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार ‘युवाओं का भविष्य’ बनाने की तैयारी में है। यह महज एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के खिलाफ राजनीतिक अभियान का उद्घोष था।
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार के कार्यकाल में हुए छम्म्ज् पेपर लीक ने लाखों विद्यार्थियों के सपनों को चकनाचूर कर दिया। उनका कहना था कि जब देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो जाएं तो यह केवल परीक्षा प्रणाली की विफलता नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न है। यह मुद्दा कांग्रेस के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि NEET विवाद ने राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं के बीच असंतोष पैदा किया था और विपक्ष लगातार इसे केंद्र सरकार की प्रशासनिक विफलता के रूप में पेश करता रहा है।
लेकिन मुख्यमंत्री का हमला केवल NEET तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अग्निवीर योजना को हिमाचल के युवाओं के साथ ‘अन्याय’ करार देते हुए कहा कि प्रदेश के हजारों युवाओं का सपना सेना में नियमित भर्ती का होता था, जिसे चार वर्ष की सेवा वाली नई व्यवस्था ने प्रभावित किया है। हिमाचल की सामाजिक और आर्थिक संरचना में सेना का विशेष स्थान रहा है। लगभग हर जिले से बड़ी संख्या में युवा सशस्त्र बलों में भर्ती होते रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस इस मुद्दे को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर भुनाने की कोशिश कर रही है।
दिलचस्प यह भी है कि कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर हमला करते हुए हिमाचल में पूर्व भाजपा सरकार के दौरान हुए पुलिस भर्ती और अधीनस्थ चयन आयोग के पेपर लीक मामलों को भी याद दिलाया। मुख्यमंत्री ने दावा किया कि उनकी सरकार ने राज्य चयन आयोग का गठन कर भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया है और नियमित भर्तियों को मेरिट के आधार पर आगे बढ़ाया है। कांग्रेस का प्रयास यह संदेश देने का है कि जहां भाजपा के शासनकाल में भर्ती परीक्षाएं विवादों में रहीं, वहीं वर्तमान सरकार व्यवस्था सुधार का दावा कर रही है। हालांकि भाजपा इन दावों को राजनीतिक प्रचार बताती रही है और कहती है कि रोजगार के मोर्चे पर कांग्रेस अपने चुनावी वादों को पूरा करने में विफल रही है।
मुख्यमंत्री ने शिक्षा क्षेत्र में हिमाचल को देश का नंबर एक राज्य बनाने का लक्ष्य भी दोहराया। उन्होंने कहा कि सरकार आधुनिक सुविधाओं वाले सीबीएसई स्कूल स्थापित कर रही है, शिक्षकों की नियुक्तियां की जा रही हैं और शिक्षा की गुणवत्ता में प्रदेश की रैंकिंग में सुधार हुआ है। यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य में स्कूलों के युक्तिकरण, शिक्षकों की कमी और कई सरकारी स्कूलों के विलय या बंद होने को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेरता रहा है। इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में किए गए दावे भी आने वाले समय में राजनीतिक बहस का विषय बनने तय हैं।
युवाओं के साथ-साथ मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य, प्राकृतिक खेती, सामाजिक सुरक्षा और शिक्षा ऋण जैसी योजनाओं का उल्लेख कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि राज्य सरकार केवल राजनीतिक आरोप नहीं लगा रही, बल्कि समानांतर रूप से विकास और कल्याणकारी योजनाओं पर भी काम कर रही है। लेकिन भाषण का सबसे राजनीतिक हिस्सा वह था, जब उन्होंने भाजपा पर पुरानी पेंशन योजना का विरोध करने, राज्य के अधिकारों की अनदेखी करने और 2027 में सत्ता परिवर्तन की बात कही। इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस अब राष्ट्रीय मुद्दों और राज्य सरकार की योजनाओं को जोड़कर संयुक्त चुनावी नैरेटिव तैयार कर रही है।
यूथ कांग्रेस के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान की घोषणा भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। संगठन ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में धरना-प्रदर्शन कर छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों को उठाने की घोषणा की है। इसका सीधा अर्थ है कि आने वाले दिनों में NEET, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, अग्निवीर और शिक्षा जैसे विषय प्रदेश की राजनीतिक बहस के केंद्र में रहेंगे। कांग्रेस की कोशिश है कि इन मुद्दों के जरिए वह पहली बार वोट डालने वाले युवाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों अभ्यर्थियों तक सीधी पहुंच बनाए।
दूसरी ओर भाजपा का तर्क अलग है। भाजपा का कहना है कि NEET मामले में जांच एजेंसियों ने कारवाई की, दोषियों की गिरफ्तारी हुई और परीक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए कदम उठाए गए। अग्निवीर योजना को भाजपा सैन्य सुधार और युवाओं को नए अवसर देने वाली योजना बताती है। प्रदेश भाजपा यह भी आरोप लगाती रही है कि कांग्रेस सरकार रोजगार, आर्थिक प्रबंधन और चुनावी गारंटियों को पूरा करने में असफल रही है और राष्ट्रीय मुद्दों के सहारे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो मुख्यमंत्री का यह कार्यक्रम केवल NEET पेपर लीक के विरोध तक सीमित नहीं था। यह भाजपा के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की शुरुआत थी, जिसमें युवाओं का भविष्य, रोजगार, शिक्षा, सेना में भर्ती, सामाजिक सुरक्षा और केंद्र-राज्य संबंध जैसे कई मुद्दों को एक सूत्र में पिरोया गया। कांग्रेस का लक्ष्य स्पष्ट दिखता है-2027 के चुनाव को केवल राज्य सरकार के प्रदर्शन पर नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की नीतियों के मूल्यांकन पर भी केंद्रित करना।
अब यह देखना होगा कि क्या युवाओं के मुद्दों पर कांग्रेस की यह आक्रामक रणनीति चुनावी समर्थन में बदलती हैै। इतना तय है कि हिमाचल की राजनीति में आने वाले दिनों में कांग्रेस सबसे बड़ी लड़ाई सड़कों पर नहीं, बल्कि युवाओं के भरोसे और उनके भविष्य के सवाल पर लड़ेगी।

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