Sunday, 21 June 2026
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घातक होगी कांग्रेस में अध्यक्ष पद को लेकर छिडी खींचातान

भाजपा और आप से एक साथ लड़ने के लिए आपसी एकजुटता आवश्यक होगी

शिमला/शैल। जैसे-जैसे प्रदेश विधानसभा के चुनाव निकट आ रहे हैं उसी अनुपात में कांग्रेस के अंदर खिंचातान बढ़ती जा रही है। इस खींचातान में मुद्दा प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी बनती जा रही है। माना जा रहा है कि जिसके पास यह कुर्सी होगी विधानसभा चुनाव के लिये टिकट के आवंटन में उसी का दबदबा रहेगा। यदि इस धारणा को सही माना जाये तो इसका अर्थ फिर यही निकलता है कि प्रदेश को लेकर हाईकमान का अपना कोई स्वतंत्र आकलन नहीं है और वह केवल पार्टी नेतृत्व और प्रभारियों के फीडबैक पर ही निर्भर करेगी। इस संदर्भ में यदि राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश तक की बात की जाये तो 2014 में जब दिल्ली में सत्ता परिवर्तन हुआ था तब कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पर्याय करार देकर लोकपाल की नियुक्तियों को मुद्दा बनाया बताया गया था। इस परिदृश्य में जब 2017 में प्रदेश विधानसभा के लिए चुनाव हुये तब स्व. वीरभद्र सिंह आयकर ईडी और सीबीआई के मामले झेल रहे थे। जिन्हें 2017 और 2019 के चुनाव में भी खूब भुनाया गया। परिणाम स्वरुप दोनों बार पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। 2019 तक सुखविंदर सिंह सुक्खू प्रदेश अध्यक्ष थे। स्व. वीरभद्र सिंह ने सुक्खू को हटाने की मांग शुरू कर दी। सुक्खू को हटाकर कुलदीप राठौर को अध्यक्ष बनाया गया। 2019 के लोकसभा चुनावों में जब इस तरह के ब्यान आये की कोई भी मकरझंडू चुनाव लड़ लेगा तो उसका पूरे चुनावी परिदृश्य पर क्या असर पड़ेगा यह कोई भी अंदाजा लगा सकता है कुलदीप राठौर ने इस पृष्ठभूमि में शुरुआत की। पहले दो नगर निगमों और फिर चार उपचुनावों में जीत दर्ज की। इस दौरान कितने बड़े नेता चुनाव लड़ने से टलते रहे और कितनों को लेकर यह क्यास चलते रहे कि कौन-कौन भाजपा में जाने की तैयारी कर रहा है। आज भी यह चर्चाएं जारी है कि कांग्रेस के कई बड़े लोग नड्डा के संपर्क में चल रहे हैं।
आज जो प्रदेश की स्थिति बनी हुई है उसमें सरकार के खिलाफ फिजूलखर्ची के आरोप कैग रिपोर्टों तक में लग चुके हैं। प्रदेश कर्ज के चक्रव्यू में फंस चुका है। बेरोजगारी के मसले पर हिमाचल हरियाणा के बाद देश में दूसरे स्थान पर है। महंगाई के कारण हर आदमी परेशान है। इस समय सरकार को इन मुद्दों पर घेरने और जनता को जागरूक करने की जरूरत है। जनता को यह अपेक्षा कांग्रेस से है प्रदेश का राजनीतिक इतिहास इस बात का गवाह है कि यहां पर हर बार सत्ता परिवर्तन का कारण भ्रष्टाचार रहा है। भाजपा कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर कांग्रेस भाजपा आरोप लगाकर जांच की बात करती रही है। लेकिन इस बार कांग्रेस भाजपा के खिलाफ कोई बड़ा मुद्दा खड़ा नहीं कर पायी है। विधानसभा के अंदर नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री जितने माफियाओं को सरकार द्वारा संरक्षण देने के आरोप लगा चुके हैं उन्हीं आरोपों को संगठन जनता में आगे नहीं बड़ा पाया है। दूसरी ओर यह संभावना बनी हुई है कि चुनाव जल्द हो जायेंगे। ऐसे में यदि कांग्रेस इस समय सरकार पर एकजुटजा के साथ आक्रमकता बढ़ाने के बजाय नेतृत्व के मुद्दे पर ही उलझी रही तो उसके लिये कठिनाइयां बढ़ जायेंगी।
कांग्रेस को यह ध्यान में रखना होगा कि आप ने प्रदेश में चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। इस ऐलान के बाद कांग्रेस से ज्यादा लोग आप में गये हैं। यह सही है कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी में आप को भाजपा की बी टीम करार दिया गया है। लेकिन इसे फील्ड में प्रमाणित करने के लिए कुछ ठोस नहीं किया जा रहा है। आप ने पंजाब में कांग्रेस से सत्ता छीनी है यह याद रखना होगा। भाजपा और आप दोनों के साथ एक बराबर लड़ना होगा। इस लड़ाई के लिये संगठन के चुनावों तक अध्यक्ष के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालकर नहीं रखा जाता है तो पार्टी को नुकसान से कोई नहीं बचा पायेगा।

 

आय माननीयों की और आयकर जनता भरे को मिली उच्च न्यायालय में चुनौती

विधायक महेंद्र सिंह, मुकेश अग्निहोत्री, राकेश सिंह और होशियार सिंह भी बनाये गये प्रतिवादी
आने वाले दिनों में ‘एक विधायक एक पैंशन’ के भी मुद्दा बनने की संभावना बढ़ी

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश सरकार अपने विधायकों और मंत्रियों को मिलने वाले वेतन भत्तों के माध्यम से उनको हो रही आय पर दिये जाने वाले आयकर की अदायगी सरकारी कोष से करती है। आमदनी माननीयों की होती है और उस पर आयकर सरकार अदा करती है। जबकि आयकर अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार आयकर उसी व्यक्ति द्वारा अदा किया जाता है जो उसके दायरे में आता है। फिर आयकर को लेकर कोई नियम कानून बनाना भी संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है राज्यों की विधानसभाओं के दायरे में नही आता है। संविधान में पूरी तरह परिभाषित है और बाकायदा इसकी अलग-अलग सूचियां बनी हुयी हैं कि केंद्र के दायरे में कौन से विषय आते हैं और राज्य कौन से विषय पर कानून बनाने का अधिकार रखता है। बल्कि कई ऐसे विषय भी हैं जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। ऐसे विषय सांझी सूची में रखे जाते हैं और इनमें यदि कभी केंद्र और राज्य में विरोधाभास की स्थिति आ जाये तो उसमें राज्य की बजाये केंद्र के प्रावधान को अधिमान दिया जाता है। इस व्यवस्था में भी आयकर किसी भी गणित से राज्य के पाले में नहीं आता है। इसी वैधानिक स्थिति के कारण प्रदेश उच्च न्यायालय के कुछ अधिवक्ताओं ने प्रदेश सरकार के इस आचरण को अदालत में चुनौती दी है। जिस पर उच्च न्यायालय ने जवाब तलब कर लिया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता रजनीश मनिकटाला और उनकी टीम के सदस्य यशपाल राणा, सुरेश कुमार, कपिल भारद्वाज तथा राकेश कुमार ने संविधान की धारा 226 के तहत याचिका दायर करके भाजपा विधायक महेंद्र सिंह कांग्रेस विधायक मुकेश अग्निहोत्री सीपीएम विधायक राकेश सिंह निर्दलीय विधायक होशियार सिंह तथा विधानसभा को भी इसमें प्रतिवादी बनाया गया है। स्मरणीय है कि वर्ष 2017-18 से लेकर 19-20 तक सरकार ने माननीयांे का 4 6931407 रुपए का आयकर अदा किया है। यह प्रावधान वर्ष 2000 में माननीयों के वेतन भत्तों और पेंशन से जुड़े अधिनियम 1971 में संशोधन करके किया गया तथा इस आशय की धारा 12 जोड़ी गयी। याचिकाकर्ताओं ने इसे राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुये असंवैधानिक करार देकर निरस्त करने की मांग की है। यह याचिका उस समय आयी है जब प्रदेश के कर्मचारी पुरानी पैंशन योजना की बहाली की मांग कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने उन्हें चुनाव लड़ने की चुनौती दी है। राष्ट्रीय स्तर पर माननीयों की पैंशन मिलने के विरोध की याचिका सर्वाेच्च न्यायालय तक पहुंची हुई है।
उधर माननीयों ने हर टर्म में जीतने पर अतिरिक्त पैंशन मिलने तक का प्रावधान कर रखा है। आम आदमी पार्टी ने ‘एक विधायक एक पैंशन’ के सिद्धांत की वकालत करते हुये पंजाब में इसे लागू करने की घोषणा भी कर दी है। ऐसे में यह तय है कि आने वाले दिनों में यह एक बड़ा और राष्ट्रीय मुद्दा बन जायेगा। इस परिपेक्ष में यह देखना रोचक होगा की आयकर वाले मामले में सरकार और प्रतिवादी बनाये गये विधायक क्या जवाब देते हैं। क्योंकि पार्टी बनाये गये सभी विधायकों को अपना-अपना जवाब दायर करना होगा। राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका एक प्रभाव पड़ना तय है। क्योंकि बहुत संभव है कि हिमाचल की तरह अन्य भी कई राज्यों ने ऐसा प्रावधान कर रखा हो। यह भी तय है कि इसके बाद प्रदेश में ‘एक विधायक एक पैंशन’ पर भी आवाजें उठना शुरू हो जायेंगी जो चुनाव आते-आते एक बड़ा मुद्दा बन जायेगा।


क्यों नहीं आ पाया कांग्रेस का आरोप पत्र उठने लगा है सवाल

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस में चार उपचुनाव जीतकर जो जोश का माहौल खड़ा हुआ था उसकी हवा पांच राज्यों में मिली हार से पूरी तरह निकल गयी है यहां एक कड़वा सच है। इसमें पंजाब में आप की जीत ने प्रदेश कांग्रेस के सारे पुराने समीकरण बिगाड़ कर रख दिये हैं। क्योंकि अभी कांग्रेस से ही ज्यादा लोग निकलकर आप में जा रहे हैं। जो कांग्रेस चारों उपचुनाव जीतकर अति उत्साहित होकर चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री कौन होगा की अंदरूनी लड़ाई में व्यस्त हो गयी थी आज उसमें अपने ही कुनवेे को संभाल कर रखने वाला कोई बड़ा चेहरा सामने नहीं है। आज कांग्रेस में स्व. वीरभद्र की कमी को पूरा करने वाला कोई नहीं दिख रहा है। आज कांग्रेस में इस सवाल का जवाब देने वाला कोई नहीं है कि उसने जयराम सरकार के खिलाफ इन चार वर्षों में कौन सा बड़ा मुद्दा खड़ा किया है। यहां तक कि इस वर्ष ही पार्टी ने सरकार के खिलाफ एक आरोप पत्र लाने की घोषणा की थी। इसके लिये एक कमेटी का गठन भी कर दिया गया था। माना जा रहा था कि यह आरोप पत्र इस बजट सत्र से पहले जारी हो जायेगा और सत्र में चर्चा में ला दिया जायेगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया है। जयराम सरकार के कार्यकाल में आयी दो कैग रिपोर्टों में ही सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठे हैं। लेकिन कांग्रेस इन रिपोर्टों पर भी कुछ नहीं कर पायी है। 2014 में कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पर्याय बताकर उससे सत्ता छीनी गयी थी। हिमाचल के हर चुनाव में भाजपा के सभी छोटे-बड़े नेताओं ने स्व. वीरभद्र के खिलाफ बने मामलों को खूब भुनाया था। लेकिन यह प्रदेश कांग्रेस भाजपा के ही वरिष्ठ नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार उन्ही की आत्मकथा में केंद्र की भाजपा सरकारों के खिलाफ लगाये गये भ्रष्टाचार के आरोपों पर जुबान नहीं खोल पाये हैं। जबकि इन आरोपों के माध्यम से भाजपा को शिमला से लेकर दिल्ली तक घेरा जा सकता था। इससे यह सवाल उठने लग पडा है कि प्रदेश का कांग्रेस नेतृत्व भाजपा से डरकर चल रहा है या इसका कोई और बड़ा कारण है। आज प्रदेश की राजनीति जिस मोड़ पर आकर खड़ी हो गयी है वहां यदि कांग्रेस इस स्थिति से बाहर नहीं निकलती है तो उसका भविष्य प्रश्नित ही रहेगा। इस समय कांग्रेस को प्रदेश हित में इस दुविधा की स्थिति से बाहर निकलने के लिये नया नेतृत्व तलाशना आवश्यक हो जायेगा।

क्या सरकार कर्ज लेकर घी पीने पर अमल कर रही है?

45 लाख की कैमरी खरीद से उठी चर्चा
भ्रष्टाचार दबाने के लिए उसे उजागर करने वालों को ही डराने धमकाने पर आयी सरकार
चार मंजिला मकान की खरीद चर्चा में

शिमला/शैल। प्रदेश के मुख्य सचिव के लिये 45 लाख की कैमरी गाड़ी खरीदे जाने को लेकर चर्चाओं का दौर चल निकला है। यह चर्चा इसलिए उठनी शुरू हुई है कि जिस वक्त इस गाड़ी की जानकारी सार्वजनिक हुई उसी वक्त जनता को रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल और दवाइयां महंगी होने का तोहफा मिला। इससे पहले प्रदेश पर बढ़ते कर्ज तथा सरकार की फिजूल खर्ची की जानकारी कैग की रिपोर्टों के माध्यम से मिल चुकी है। कैग रिपोर्ट से यह खुलासा भी सामने आ चुका है कि 96 योजना पर इस सरकार ने एक पैसा भी खर्च नहीं किया है और न ही इसका कोई कारण बताया है। यही नहीं राजधानी शिमला में ही लक्कड़ बाजार बस स्टैंण्ड के पास कुछ दिन पहले कुछ दुकानें बनायी और अब उनको तोड़ दिया गया हैं। संजौली में महापौर के अपने वार्ड में कुछ दिन पहले एक रेन सैल्टर बनाया गया अब उसे वहां पर सीढ़ियां बनाने के लिये तोड़ दिया गया। सचिवालय में एनजीटी के आदेशों को नजरअंदाज करके निर्माण किया जा रहा था। एन जी टी के आदेश के खिलाफ सरकार प्रदेश उच्च न्यायालय में गयी थी लेकिन उच्च न्यायालय ने सरकार की याचिका को खारिज कर दिया है। अब या तो सरकार इस निर्माण को अदालती आदेशों की अवहेलना करके जारी रखें या उन अधिकारियों के खिलाफ कारवाई करें जिनके कारण यह स्थिति खड़ी हुई है। शिमला का टाउन हॉल पिछले चार वर्षों से उचित उपयोग में लाये जाने के लिये तरस रहा है जबकि कर्ज के पैसे से इसकी रिपेयर हुई है। ऐसे कई मामले हैं जिनके सामने यह तस्वीर उभरती है कि सरकार सिर्फ कर्ज लेकर घी पीने के सिद्धांत पर चल रही है। अभी गाड़ी की खरीद की चर्चा शांत नहीं हो पायी है कि मुख्यमंत्री के आवास पर इको पार्क आदि बनाये जाने की खबरें बाहर आने लग गयी है।
सरकारी कर्मचारियों का हर वर्ग मांगे लेकर खड़ा हो चुका है। आउट सोर्स के माध्यम से रखे गये कर्मचारियों को बार-बार यह भरोसा दिया जा रहा है कि सरकार उनके लिए स्थाई नीति बनाने जा रही है। यह व्यवहारिक सच्चाई कोई नहीं बता रहा है कि इन कर्मचारियों को लेकर सरकार कोई नीति बना ही नहीं सकती। क्योंकि यह लोग प्राइवेट कंपनियों/ठेकेदारों के नौकर हैं। सरकारी कर्मचारी बनने के लिये इन्हें पूरी सरकारी प्रक्रिया से गुजरना होगा। जिसमें आरक्षण, रोस्टर आदि सबकी अनुपालन सुनिश्चित करनी पड़ेगी। कुल मिलाकर कर्मचारियों के फ्रंट पर सरकार सुखद स्थिति में नहीं है। ऊपर से इस सबकी जिम्मेदारी पार्टी और सरकार का ही एक वर्ग पार्टी के ही दूसरे नेताओं पर डालने लग गया है। इससे पार्टी के अन्दर भी गुटबाजी को अनचाहे ही उभार मिल गया हैं। कर्मचारियों की पैंशन की मांग पर जब सदन में मुख्यमंत्री ने यह कह दिया कि इसके लिए चुनाव लड़ना पड़ता है। मुख्यमंत्री के इस बयान ने आग में घी का काम किया है। अब यह चर्चा चल पड़ी है कि क्या कोई मुख्यमंत्री चुनावी वर्ष में अपने कर्मचारियों के प्रति इस तरह का स्टैंड ले सकता है। जब उपचुनाव में हार मिली थी तब उस हार के लिए महंगाई को जिम्मेदार ठहरा दिया गया था। महंगाई तो अब फिर पहले से भी ज्यादा बढ़ गयी है और निकट भविष्य में इसके कम होने के आसार नहीं हैं।
पार्टी के अंदर और बाहर इस वस्तुस्थिति पर नजर रखने वालों के सामने यह सवाल बड़ा होता जा रहा है कि क्या इस परिदृश्य में पार्टी पुनः सत्ता में वापसी कर पायेगी? क्या मुख्यमंत्री का राजनीतिक आकलन गड़बड़ा रहा है? क्या मुख्यमंत्री को उसके सलाहकारों और विश्वस्त अधिकारियों से सही राय नहीं मिल रही है? क्योंकि जब प्रशासन अपने भ्रष्टाचार और नालायकी को ढकने के लिये उसे उजागर करने वालों को ही डराने धमकाने का प्रयास करने लग जाये तब यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सलाहकार अब नेतृत्व को डूबो कर ही दम लेंगे। क्योंकि ऐसे सलाहकार ऐसे हालात में अपने भ्रष्टाचार की कमाई को निवेश करने में लगा देते हैं। एक सलाहकार का ऐसा ही एक निवेश चार मंजिला मकान की खरीद के रूप में विशेष चर्चा में चल रहा है। चर्चा है कि दो करोड के इस निवेश की रजिस्ट्री केवल पच्चास लाख में करवायी गयी है। कहते हैं कि जिस परिजन के नाम पर यह खरीद दिखाई गयी है उसकी आयकर रिटर्न से यह निवेश मेल नहीं खाता है। चर्चा है कि यह सब कुछ दिल्ली दरबार तक भी पहुंच चुका है।

आप के चुनावी ऐलान ने बदले प्रदेश के राजनीतिक समीकरण कांग्रेस को बड़े नुकसान की संभावना बनी

शिमला/शैल। पांच राज्यों में कांग्रेस को मिली हार और उसके बाद पार्टी के अन्दर ही बने ग्रुप 28 के नेताओं द्वारा गांधी परिवार के नेतृत्व पर सवाल उठाये जाने से हिमाचल में भी पार्टी के चुनावी भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ा है। क्योंकि ग्रुप 28 का एक बड़ा चेहरा आनन्द शर्मा हिमाचल से ताल्लुक रखता है। इस ग्रुप में शुरू में कॉल सिंह ठाकुर के शामिल होने की भी बात सामने आयी थी। लेकिन उन्होंने उसी समय इससे किनारा कर लिया था। आज जो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर हैं उन्हें भी आनन्द शर्मा का ही प्रतिनिधि माना जाता है। क्योंकि स्व.वीरभद्र सिंह सुक्खू को हटाना चाहते थे इसलिए उन्होंने कुलदीप राठौर के नाम पर सहमति जता दी थी और मुकेश अग्निहोत्री तथा आशा कुमारी को भी राजी कर लिया था। इस पृष्ठभूमि में यह स्वभाविक है कि दिल्ली के घटनाक्रमों का प्रदेश पर असर पड़ेगा ही। वैसे भी यदि पार्टी की वर्किंग का आकलन किया जाये तो जो प्रभावी भूमिका पार्टी विधानसभा के अन्दर निभाती रही है विधानसभा के बाहर उससे आधा काम भी संगठन नहीं कर पाया है। आज पार्टी के अन्दर पदाधिकारियों की जितनी लंबी सूची है उससे यही समझ आता है कि पदों के माध्यम से ही नेताओं को इक्कठा रखा जा रहा है। कई बार यह चर्चायें सामने आती रही है कि कई नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में जाने के लिये तैयार बैठे हैं।
यह सही है कि पार्टी ने पिछले दिनों दो नगर निगमों और फिर विधानसभा तथा लोकसभा के उपचुनाव में जीत हासिल की है। लेकिन यह जीत कांग्रेस की वर्किंग के बजाय भाजपा के केंद्र से लेकर प्रदेश तक लिए गये गलत फैसलों से उपजे जन रोष का परिणाम ज्यादा था। परंतु कांग्रेस में इस जीत के बाद मुख्यमंत्री कौन होगा इसकी अघोषित लड़ाई शुरू हो गयी। इसके लिए वर्तमान अध्यक्ष को हटाकर स्वयं अध्यक्ष बनने को मुख्यमंत्री पद की पहली सीढ़ी मानकर गुट बंदी शुरू हो गयी। इसके लिये नेताओं ने दिल्ली आकर हाईकमान से मिलने के अपने अपने रास्ते तलाशने शुरू कर दिये। इस दिल्ली दौड़ का परिणाम यह हुआ कि पार्टी जयराम सरकार के खिलाफ अपना घोषित आरोप पत्र तक नहीं ला पायी। जयराम सरकार के पूरे कार्यकाल में कांग्रेस का इस संदर्भ में कोई भी बड़ा गंभीर प्रयास सामने नहीं आया है। बल्कि प्रदेश के स्वर्ण समाज ने क्षत्रिय देवभूमि संगठन के माध्यम से जो आंदोलन शुरू किया था उसे कांग्रेस के कुछ विधायकों ने विधानसभा के पटल से अपना समर्थन घोषित कर दिया था। यह समर्थन घोषणा से यह चर्चाएं भी चल पड़ी कि आंदोलन के नेता कांग्रेस के ही कुछ नेताओं के इशारे पर काम कर रहे हैं। लेकिन अब जब यह आंदोलनकारी सचिवालय का घेराव करने आ रहे थे और पुलिस प्रशासन ने इन्हें रोकने का प्रयास किया तो आंदोलन के नेतृत्व में अलग राजनीतिक दल बनाकर विधानसभा का चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी और इसी पर आंदोलनकारी दो फाड़ हो गये। आंदोलन वहीं समाप्त हो गया। बाद में कुछ नेताओं को पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया। ऐसा क्यों हुआ कैसे हुआ इस पर वह नेता कुछ नहीं कह पा रहे हैं जिन्होंने इनकी मांगों का समर्थन किया था। इससे इन नेताओं की राजनीतिक समझ का खुलासा हो जाता है।
अब आम आदमी पार्टी के प्रदेश का चुनाव लड़ने के ऐलान से पहला नुकसान कांग्रेस को ही होना शुरू हो गया है। इसके कई लोग आप में चले गये हैं। चर्चा है कि केजरीवाल के मंडी में प्रस्तावित रोड शो के मौके पर अनिल शर्मा और उनके पिता पंडित सुखराम केजरीवाल के साथ मंच साझा करेंगे। सुखराम के पोते आश्रय शर्मा कांग्रेस में हैं। मंडी में इस परिवार का अपना प्रभाव रहा है। लेकिन इस तरह से स्वतः विरोधी फैसलों से अपने साथ-साथ पार्टी का भी नुकसान कर रहे हैं। लोकसभा उपचुनाव के बाद प्रतिभा सिंह के बयान से दोनों परिवारों के रिश्ते पहले ही उलझे हुये हैं। ऐसे में अनिल शर्मा और सुखराम का केजरीवाल के साथ आना कांग्रेस पर क्या असर डालेगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इस तरह से पनपते राजनीतिक परिदृश्य में स्वभाविक है कि आम आदमी पार्टी के कारण कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा नुकसान होगा। यह एक खुला सच है कि कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग भाजपा सरकार के खिलाफ ठोस आक्रमकता नहीं अपना पाया है। शायद इसी धारणा पर चलता रहा है कि इस बार कांग्रेस की ही बारी है। परंतु पांच राज्यों की हार और आप के ऐलान ने प्रदेश में दोनों स्थापित दलों के समीकरणों को बिगाड़ दिया है यह तय है।

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