शिमला/शैल। जयराम सरकार अटल आशीर्वाद योजना के तहत नवजात शिशुओं और उनकी माताओं के लिये एक बेबी किट दे रही है। इस किट मेंं कुल 15 चीजें रखी गई हैं जो नवजात जच्चा-बच्चा दोनों के लिए उपयोगी मानी गयी है। 2019 से यह योजना लागू है। अभी कोविड कॉल में 01-04-2020 से 31-01-2021 तक 104738 किट खरीदी गयी है। इसके लिये ई- टेंडर के माध्यम से निविदायें मांगी गयी और इसमें 8 फर्मां ने भाग लिया। यह किट प्रदेश के स्वास्थय संस्थानों को दिए गए हैं। यह खरीद 1074.98 रुपए प्रति किट के हिसाब से हुई है। इस पर आम चर्चा है कि जो किट सरकार ने 1074.98 में खरीदी है उसकी बाजार में कीमत 500 से 600 के बीच है। उप चुनावों के दौरान सोलन से कांग्रेस नेता कुशल जेठी ने एक पत्रकार वार्ता में यह मुद्दा उठाया था और इस पर जांच की मांग की थी। लेकिन अभी तक सरकार की ओर से ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया है।
स्मरणीय है की 24 मार्च 2020 को कोरोना के कारण पूरे देश में लाकडाउन लग गया था। उस दौरान अस्पतालों की वर्किंग भी प्रभावित हुई थी । लोगों ने अस्पताल जाना छोड़ दिया था। इस दौरान कैसे यह किट प्रदेश के स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचे होंगे यह अपने में एक सवाल बनकर खड़ा है और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी अधिकारी इस पर कुछ भी नही कह पा रहे हैं। इसी कारण से करोड़ों की इस खरीद पर सवाल उठ रहे हैं।
चारों सीटें हारने से शैल के आकलन पर लगी जनता की मोहर
शिमला/शैल। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने उपचुनाव में मिली हार के लिये महंगाई को जिम्मेदार ठहरा कर गेंद केंद्र के पाले में डाल दी है। जयराम के ब्यान के बाद केंद्र के निर्देशों पर भाजपा शासित राज्यों में राज्य सरकारों द्वारा पेट्रोल-डीजल पर लगाये अपने करों में कटौती करके उपभोक्तओं को कुछ राहत भी प्रदान की है। इससे यह प्रमाणित हो जाता है की जनता में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से भारी आक्रोश है। यह आक्रोश इस हार के रूप में सामने आया और इसके परिणाम स्वरूप कीमतों में कमी आ गयी। बल्कि अब जनता में यह चर्चा चल पड़ी है कि यदि इतनी सी हार से कीमतों में इतनी कटौती हो सकती है तो इसमें और कमी का प्रयोग किया जाना चाहिये। यह सही है कि जयराम के ब्यान के बाद ही यह सब कुछ घटा है। लेकिन क्या जयराम इसी से अपनी जिम्मेदारी से भाग सकते हैं? क्या राज्य सरकारों को उपचुनाव से पहले यह समझ ही नही आया कि महंगाई बर्दाश्त से बाहर हो रही है? उप चुनाव की घोषणा के साथ ही खाद्य तेलों की कीमतें बढ़ाकर क्या जयराम सरकार ने जनता के विवेक को चुनौती नहीं दी? प्रदेश की जनता ने चार नगर निगमों में से तीन में भाजपा को हराकर सुधरने की चुनौती दी थी और सरकार ने इस चुनौती का जवाब धर्मशाला नगर निगम में तोड़फोड़ करके दिया। तोड़-फोड़ की राजनीति को सफलता मान लिया गया। लेकिन जमीन पर काम नही कर पायी। हर काम केवल घोषणा तक सीमित होकर रह गया। जैसा कि केंद्र द्वारा घोषित 69 फोरलेन सड़कों की हकीकत आज भी सै(ांतिक संस्कृति से आगे नही सरक पायी है। युवाओं के लिये जब भी किसी विभाग में कोई नौकरियों की घोषणाएं की गई और प्रक्रिया शुरू की गयी तो ऐसी घोषणाएं भी एक ही बारी में अमली शक्ल नही ले पायी है। अधिकांश ऐसी घोषणाओं में कभी अदालत तो कभी किसी और कारण से व्यवधान आते ही रहे हैं। केंद्र की तर्ज पर राज्य सरकार भी घोषणाओं की सरकार बनकर रह गयी है। इन्हीं घोषणाओं के सिर पर सर्वश्रेष्ठता के कई पदक भी हासिल कर लिये हैं। इन्हीं कोरी घोषणाओं का परिणाम है कि आज 20 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान हुआ और हर एक में नोटा का प्रयोग हुआ। उपचुनावों में नोटा का प्रयोग होना सीधे सरकार से अप्रसन्नता का प्रमाण होता है। आने वाले विधानसभा चुनाव में यदि 68 विधानसभा क्षेत्रों में ही नोटा का प्रयोग हुआ तो परिणाम क्या हो सकते हैं इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं होगा।
2014 की लोकसभा 2017 की विधानसभा और 2019 के लोकसभा के चुनाव सभी केंद्र की सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़े और जीते गये हैं। इन सभी चुनाव में वीरभद्र और उनके परिजनों के खिलाफ बने आयकर ईडी और सीबीआई के मामलों को खूब उछाला गया। इस बार यह पहला उपचुनाव है जो राज्य सरकार के कामकाज और मुख्यमंत्री के चेहरे पर लड़ा गया। इस उपचुनाव में कांग्रेस के किसी नेता के खिलाफ कोई मामला मुद्दा नहीं बन पाया। बल्कि भाजपा के हर छोटे-बड़े नेता ने कांग्रेस को नेता वहीन संगठन करार दिया। कोविड में कांग्रेस द्वारा बारह करोड़ के खरीद बिल अपनी हाईकमान को भेजने के मामले को मुख्यमंत्री ने इन चुनावों में भी उछालने का प्रयास किया और जनता ने इसे हवा-हवाई मानकर नजरअंदाज कर दिया। ऐसे में यदि भाजपा की भाषा में नेता वहीन कांग्रेस ने जयराम सरकार को चार-शून्य पर उपचुनावों में ही पहुंचा दिया तो आम चुनाव में क्या 68-शून्य हो जाना किसी को हैरान कर पायेगा। इन उपचुनावों की पूरी जिम्मेदारी मुख्यमंत्रा और उनकी टीम पर थी। इस उपचुनाव में महंगाई और बेरोजगारी ही केंद्रीय मुद्दे रहे हैं। जो सरकार मंत्रिमंडल की हर बैठक में नौकरियों का पिटारा खोलती रही और मीडिया इसको बिना कोई सवाल पूछे प्रचारित करता रहा है उसका सच भी इन परिणामों से सामने आ जाता है। यह परिणाम मुख्यमंत्री और उनकी टीम के अतिरिक्त भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा पर भी सवाल खड़े करते हैं क्योंकि वह हिमाचल से ताल्लुक रखते हैं और दो बार प्रदेश में मंत्री भी रहे हैं।
इससे हटकर यदि शुद्ध व्यवहारिक राजनीति के आईने से आकलन करें तो पहला सवाल ये उठता है कि इस उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल दोनों स्टार प्रचारकों की सूची में थे। लेकिन प्रेम कुमार धूमल एक दिन भी प्रचार पर नहीं निकले। शांता कुमार ने मंडी और अपने गृह जिला कांगड़ा की फतेहपुर सीट पर प्रचार किया। परिणाम दोनों जगह हार रहा। जनता ने शांता कुमार पर भी भरोसा नहीं किया। जनता ने शांता पर क्यों भरोसा नहीं किया और धूमल क्यों प्रचार पर नहीं निकले? इस पर जब नजर दौड़ायें तो सबसे पहले शांता की आत्मकथा सामने आती है। शांता ने भ्रष्टाचार को सरंक्षण देने के जो आरोप अपनी ही सरकार पर लगाये हैं क्या उनके बाद भी कोई आदमी भाजपा पर विश्वास कर पायेगा इन्हीं शांता कुमार ने इन उप चुनावों की पूर्व संध्या पर जब मानव भारती विश्वविद्यालय का फर्जी डिग्री कांड उठाया और आरोप लगाया कि डिग्रियां बिकती रही और सरकार सोयी रही। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और डीजीपी संजय कुंडू ने इस बारे में बात करके यहां तक कह दिया कि जिनको जेल में होना चाहिये वह खुले घूम रहे हैं। क्या यह इशारा धूमल की ओर नहीं था। इस मामले में जब शैल ने दस्तावेज जनता के सामने रखते हुए यह पूछा कि जयराम सरकार ने इस मामले में एफ आई आर दर्ज करने में 2 साल की देरी क्यों कर दी। इस सवाल से सारा परिदृश्य बदल गया और सभी शांत हो गये। ऐसे में यदि धूमल प्रचार पर निकलते तो क्या इस हार को उनके सिर लगाया जाता?
इसी तरह इस उपचुनाव में उछले परिवारवाद के मुद्दे पर भी भाजपा अपने ही जाल में उलझ गयी। मण्डी और जुब्बल कोटखाई में परिवारवाद की परिभाषा बदल गयी। यही नहीं चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह का ब्यान सुरेश भारद्वाज और प्रदेश प्रभारी अविनाश खन्ना का सामने आया उसे सीधे इन नेताओं की नीयत ही सवालों में आ गयी। इन उपचुनावों में वह मामले तो उछले ही नहीं जो इनके ही लोगों द्वारा करवाई गई एफ.आई.आर. से उठे हैं। यदि कल को उन मामलों को लेकर कोई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा देता है तो उसके परिणाम कितने भयानक होंगे उसका अंदाजा लगाना आसान नहीं होगा। क्योंकि उससे 68-शून्य होना कोई हैरानी नहीं होगी। आज उपचुनावों में मिली हार आने वाले समय में पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर भी घातक प्रमाणित होगी यह तह है। इस परिदृश्य में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन होता है या नहीं। कांग्रेस के लिए जयराम सबसे आसान टारगेट होंगे। क्योंकि जिस तरह के सलाहकारों और चाटुकारों से मुख्यमंत्री घिर गये है उनसे बाहर निकलना शायद अब संभव नहीं रह गया है। जितने मुद्दे जयराम ने अपने लिये खड़े कर लिये हैं वह स्वाभाविक रूप से आने वाले दिनों में एक-एक करके जनता के सामने आयेंगे। अब शायद अधिकारी भी मुख्यमंत्री या उनकी मित्र मंडली के आगे मूकबघिर बनकर डांस करने से परहेज करेंगे। क्योंकि यदि मुख्यमंत्री परिणामों के तुरंत बाद हार की नैतिक जिम्मेदारी लेकर पद त्यागने की पेशकश कर देते तो शायद उनके राजनीतिक कद में सुधार हो जाता। लेकिन सलाहकारों ने महंगाई पर ब्यान दिलाकर स्थिति को और बिगाड़ दिया है।
कुलदीप राठौर की अध्यक्षता में दूसरी बड़ी सफलता है यह जीत
इस जीत से बडे़ नेताओं में नेतृत्व को लेकर टकराव की संभावना भी बढ़ी
शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 2019 के चुनावों तक जिस तरह की हार का सामना करना पड़ा है उस परिदृश्य में यह चारों उपचुनाव जीतकर उस हार की काफी हद तक भरपायी कर ली है । जीत की जो शुरुआत कांग्रेस ने दो नगर निगमें जीतकर की थी उसे टूटने नहीं दिया है यह प्रदेश नेतृत्व की एक बड़ी सफलता है। कांग्रेस इस जीत की कड़ी को कैसे आगे बढ़ाये रखती है यह नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती होगी और इसकी अगली परीक्षा नगर निगम शिमला के चुनाव होंगे। इस समय प्रदेश में कांग्रेस के अतिरिक्त भाजपा का और कोई कारगर विकल्प नहीं है इसलिए जनता की नाराजगी का स्वभाविक लाभ कांग्रेस को मिला है। कांग्रेस की इस जीत के लिए उसके अपने प्रयासों की बजाये जनता की नाराजगी का योगदान ज्यादा रहा है। क्योंकि जयराम सरकार के चार वर्ष के कार्यकाल में कांग्रेस का ऐसा कोई बड़ा काम नहीं रहा जिसने जनता का ध्यान अपनी ओर खींचा हो। बल्कि सच तो यह है कि इन चार वर्षों में कांग्रेस जयराम सरकार के खिलाफ कोई बड़ा आरोप पत्रा तक नहीं ला पायी है। विधानसभा में उठे सवाल भी वॉक आउट से ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाये हैं। यदि बंगाल की हार से नरेंद्र मोदी के ग्राफ पर प्रश्न चिन्ह न लगता तो शायद कांग्रेस में बिखराव देखने को मिल जाता और हिमाचल भी उससे अछूता न रहता क्योंकि जी तेईस के ग्रुप में हिमाचल से भी कुछ बड़े नेता सक्रिय थे। बड़े-बड़े नाम चर्चा में आने लग गये थे। कई नेता चुनाव लड़ने से घबराने लग गये थे। लेकिन आज बंगाल की हार और बढ़ती महंगाई ने सारा राजनीतिक परिदृश्य बदल कर रख दिया है। यह परिस्थिति बहुत संवेदनशील है और इसमें भाजपा केंद्र से लेकर राज्यों तक कांग्रेस को कमजोर करने के लिए साम-दाम और दंड भेद के सारे खेल खेलने का प्रयास करेगी। इस प्रयास में सबसे पहला निशाना प्रदेश अध्यक्ष का पद होगा।
कुलदीप राठौर विधायक या सांसद नहीं रहे हैं क्योंकि उनके विधानसभा क्षेत्र में उनसे हर तरह से वरिष्ठ नेता मौजूद थे और चुनाव टिकट उनको मिलते रहे। लेकिन एनएसयूआई और युवा कांग्रेस से लेकर आज मुख्य संगठन के अध्यक्ष पद तक जो उनका राजनीतिक अनुभव है वह उनके किसी भी समकालिक से किसी भी तरह कम नहीं आंका जा सकता। बतौर प्रदेश अध्यक्ष हाईकमान उनकी राय को कम नहीं आंक सकता। क्योंकि इस समय उनकी अध्यक्षता में प्रदेश से लोकसभा में 8 वर्ष बाद कोई सदस्य जा रहा है। इन उप चुनावों से पहले दो नगर निगमों में भी उन्हीं की अध्यक्षता में सफलता मिली है। ऐसे में इस समय अध्यक्ष पद में बदलाव का कोई भी प्रयास कांग्रेस को कमजोर ही करेगा। इसलिए इस समय नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू और सीडब्ल्यूसी की सदस्य आशा कुमारी तथा वर्तमान अध्यक्ष कुलदीप राठौर जितनी एकजुटता का व्यवहारिक परिचय देंगे संगठन को उससे उतना ही लाभ मिलेगा।
इन उपचुनावों के लिए जिस तरह के चारों उम्मीदवारों का चयन किया गया और उसमें अर्की के अतिरिक्त कहीं भी बड़ा विरोध देखने को नहीं मिला तथा उस विरोध के खिलाफ पहले ही दिन कारवाई करके जो संदेश जनता में गया उससे भी संगठन को लाभ मिला। अन्यथा जब मंडी में कुलदीप राठौर ने प्रतिभा सिंह की उम्मीदवारी के संकेत दिए थे तब उस पर पंडित सुखराम की यह प्रतिक्रिया जब आयी की उम्मीदवारी तय करने वाला राठौर कौन होता है यह फैसला तो हाईकमान करता है। उससे नकारात्मक संकेत उभरने शुरू हो गए थे जिन पर दोनों प्रभारियों ने कंट्रोल कर लिया। लेकिन क्या आगे भी इसी सबसे काम चल जायेगा यह सवाल अब बड़ा होकर उभरने लगा है। क्योंकि केंद्र ने एक ही हार के बाद भाजपा शासित राज्यों में वैट में कटौती कराकर कीमतें कम करने का पहला कदम उठा लिया है। आने वाले दिनों में ऐसे और भी कई कदम देखने को मिलेंगे। इसलिए जिन मुद्दों को उठाकर 2014 में भाजपा ने सत्ता छिनी थी आज उन्हीं मुद्दों पर पलटकर भाजपा और नरेंद्र मोदी को घेरना होगा और इसके लिए प्रमाणिक तथ्यों के साथ हमलावर होना होगा। आज भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा हिमाचल से ताल्लुक रखते हैं प्रदेश में दो बार मंत्री रहे चुके हैं। क्या उनको घेरने की शुरुआत हिमाचल से नहीं होनी चाहिये? अनुराग ठाकुर को तो एक समय जयराम के मंत्री गोविन्द ठाकुर ने ही घेर दिया था। परंतु प्रदेश कांग्रेस इन बिन्दुओं पर आज तक खामोश है। पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ सदस्य पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने अपनी आत्मकथा में भ्रष्टाचार के मुद्दों पर जिस तरह से अपनी ही सरकार की कथनी और करनी को नंगा किया है उस पर भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर घेरा जा सकता है। लेकिन प्रदेश कांग्रेस के किसी भी नेता द्वारा इन मुद्दों को छुआ तक नहीं गया है। ऐसे अनेकों मामले हैं जिन पर भाजपा के पास कोई जवाब नहीं है। लेकिन प्रदेश कांग्रेस ऐसे मुद्दों को उठाने से जिस तरह से बचती आ रही है उससे प्रदेश कांग्रेस की नीयत और नीति दोनों पर शंकाएं भी उठना शुरू हो गयी हैं जो आगे चलकर नुकसान देह होगी।
क्योंकि आज वीरभद्र सिंह के निधन के बाद सही में कुछ नेताओं की महत्वकांक्षाएं जिस तरह से सामने आने लग गयी है उससे यही प्रमाणित हो रहा है कि निकट भविष्य में कांग्रेस के अंदर नेतृत्व का प्रश्न ही कहीं चुनाव से भी बड़ा ना हो जाये। क्योंकि कांगड़ा में स्व.जी.एस.बाली को श्रद्धांजलि देने के लिए रखी गयी सभा में कांगड़ा जिले के ही कई बड़े नेताओं का ना आना जनता की नजर से छुप नहीं पाया है। यही नहीं कुछ बड़े नेताओं का आनंद शर्मा के साथ ही इस सभा से चले जाना भी कई सवाल खड़े कर जाता है। यदि समय रहते इस सुलगने लगी चिंगारी को शांत नहीं किया गया तो यह कभी भी ज्वाला बन कर सबसे पहले अपने ही घर को जलाने से परहेज नहीं करेगी। इसमें प्रतिभा सिंह की जिम्मेदारी और भी बड़ी हो जाती है क्योंकि वह दो बार सांसद रह चुकी है और इस बार जिस तरह से उन्होंने ब्रिगेडियर खुशहाल सिंह और पूरी जयराम सरकार को मात दी है उससे जनता की उम्मीदें उनसे और बढ़ गई हैं। इस समय जो तीन नवनिर्वाचित विधायक रोहित ठाकुर, भवानी पठानिया और संजय अवस्थी पूरी सरकार की ताकत को मात देकर आये हैं जहां वह प्रशंसा और बधाई के पात्र हैं वहीं पर उनकी यह जिम्मेदारी भी होगी कि वह प्रदेश नेतृत्व से ऐसी परिस्थितियों में सवाल पूछने से भी गुरेज ना करें।