Sunday, 21 June 2026
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कांग्रेस की खेमेबाजी किसी बड़ी बगावत का संकेत तो नही

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस खेमों में बंटती जा रही है यह अब खुलकर सामने आ गया है। यह खेमेबाजी पिछले दिनों पूर्वमन्त्री ठाकुर कौल सिंह के घर हुए पार्टी नेताओं के भोज से शुरू होकर अब पूर्व मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह के आवास पर हुए लंच आयोजन पर इसका पहला दौर पूरा हो गया है। कौल सिंह के घर सभी नेताओं को आमन्त्रण नही था और जितनों को था वह लगभग सभी थे लेकिन वीरभद्र के घर सभी बड़ों और पूर्व विधायकों को आमन्त्रण था। लेकिन यहां नौ विधायकों समेत करीब तीस नेता इसमें शामिल नही हुए यह हकीकत है। कौल सिंह के घर पर हुए भोज में पार्टी को लेकर कोई घोषित एजैण्डा नही था। लेकिन इस भोज के बाद हाईकमान को एक पत्र गया और उस पत्र में पार्टी की राज्य में स्थिति को लेकर चिन्ता व्यक्त की गयी थी। हाईकमान से आग्रह किया गया था। प्रदेश में संगठन की स्थिति को लेकर गंभीर चिन्तन की आवश्यकता है। यह पत्र मीडिया में वायरल हो गया और इसे पार्टी विरोधी गतिविधि करार दे दिया गया। पार्टी की अनुशासन समिति ने इसका संज्ञान लेकर संवद्ध नेताओं से जवाब तलबी कर ली और इस पर नेताओं ने अपने पदों से त्यागपत्र तक दे दिये। इस पत्र लिखने को संगठन के नेतृत्व के खिलाफ खुली बगावत मान लिया गया। कौल सिंह के घर हुई बैठक में कौल सिंह और सुखविन्दर सिंह दो ऐसे पूर्व अध्यक्ष रहे हैं जिन्हे हटाने के लिये वीरभद्र सिंह बहुत दूर तक चले गये थे सुक्खु के वक्त में तो वीरभद्र ब्रिगेड तक का गठन हो गया था और यह ब्रिगेड वाकायदा एक पंजीकृत एनजीओ तर्ज पर गठित किया गया था। जब इसका संगठन ने संज्ञान लिया तब इसे भंग कर दिया गया। इसके अध्यक्ष ने सुक्खु के खिलाफ मानहानि का दावा तक कर दिया। फिर अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में विधायकों के मुकाबले में समानान्तर सत्ता केन्द्र खड़े कर दिये। इसका परिणाम यह हुआ कि विधानसभा चुनावों में भी इनमें आपसी तालमेल का अभाव रहा और पार्टी चुनाव हार गयी। चुनाव परिणाम आने के बाद कौल सिंह जैसे नेताओं ने इस तरह के आरोप खुलेआम लगाये हैं।
ऐसे में विधानसभा चुनावों के बाद वीरभद्र सिंह ने सुक्खु को हटवाने के लिये पूरी ताकत लगा दी और सुक्खु हट गये। लेकिन सुक्खु का विकल्प कुलदीप राठौर बनाये गये। राठौर कभी विधायक नही रहे हैं इसलिये उन्हे संगठन के सारे खेमों मे तालमेल बिठाना एक बड़ी चुनौती थी। इसके लिये राठौर ने सबसे पहले पुरानी कार्यकारिणी में ही विस्तार करके उसका साईज़ बढ़ा दिया। लेकिन लोकसभा चुनावों में भी जब वीरभद्र सिंह ने मण्डी को लेकर यह ब्यान दिया कि कोई भी मकरझण्डू चुनाव लड़ लेगा तो उसी से स्पष्ट हो गया था कि चुनाव परिणाम क्या रहने वाले हैं। पार्टी का यही भीतरी बिखराव विधानसभा उपचुनावों तक जारी रहा है और करारी हार का सामना करना पड़ा। विधानसभा उपचुनावों की हार कुलदीप राठौर की राजनीतिक असफलता बन गयी क्योंकि उसका व्यक्तिगत आकलन भी इसमें फेल हो गया। अभी तक कुलदीप राठौर कार्यकर्ताओं को भाजपा और जयराम सरकार के खिलाफ कोई ठोस ऐजैण्डा नही दे पाये हैं। उनका कोई भी प्रवक्ता सरकार के खिलाफ कोई  बड़ा मुद्दा नही उछाल पाये हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को अपनी ही पार्टी की आर्थिक और सामाजिक सोच के बारे में पूरी और सही जानकारी ही नही हैं जबकि आज भाजपा ने केन्द्र से लेकर राज्यों तक जो वातावरण खड़ा कर दिया है उसे सबसे पहले विचारधारा के स्तर पर जनता में चुनौती देनी होगी। लेकिन दुर्भाग्य से आज कांग्रेस इसी पक्ष पर सबसे कमजो़र है। यदि यही स्थिति आगे भी बनी रहती है तो कांग्रेस के लिये आने वाला समय और भी कठिन हो जायेगा।
 लेकिन कांग्रेस इस पक्ष की ओर ध्यान देने की बजाये अभी से अगले नेता को लेकर आपस में झगड़ने लग पड़ी है। यह सही है कि वीरभद्र सिंह आज उम्र के जिस पडा़व पर पहुंच चुके हैं वहां से वह अगले चुनावों में पार्टी का नेतृत्व नही कर पायेंगे। ऐसे में पार्टी का अगला नेता कौन होगा इस बारे में भी शायद खुलेआम किसी एक नेता का नाम वीरभद्र सिंह नही लेंगे और यही उनकी सबसे बड़ी कमजा़ेरी भी है। जबकि इस समय यदि किसी को अगला नेता प्रौजैक्ट कर दिया जाता है तो वह नेता चुनावों तक अपने को संगठन और जनता में प्रमाणित कर पायेगा तथा सबको साथ लेने में सफल भी हो सकता है। लेकिन अभी पार्टी में इस लाईन पर कोई सोच ही नही बन पायी है। पार्टी नये लोगों को जोड़ ही नही पा रही है। भाजपा ने संपर्क से समर्थन  कार्यक्रम चलाकर बहुत सारे लोगों को अपना आलोचक होने से रोक दिया था। लेकिन कांग्रेस अभी तक भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आये सुरेश चन्देल को भी पूरा सक्रिय नही कर पायी है। आज जब वीरभद्र के लंच पर सभी आमन्त्रित नही पहुंचे हैं तो इससे स्पष्ट हो जाना चाहिये कि पार्टी के अन्दर एक बड़ा वर्ग अब नेतृत्व में बदलाव चाहता है। आज नेतृत्व को भाजपा सरकार के खिलाफ वैसी ही आक्रामकता लानी होगी जैसी वीरभद्र सिंह ने अपने समय में दिखायी है।
आज जयराम सरकार बहुत सारे अन्तःविरोधों में घिरी हुई है लेकिन कांग्रेस की ओर से सरकार को घेरने के लिये कोई कारगर प्रयास नही किये जा रहे हैं। बल्कि यह संदेश जा रहा है कि वीरभद्र नहीं चाहते कि जयराम सरकार के खिलाफ सही में ही कोई बड़ा मुद्दा खड़ा किया जाये। यदि कांग्रेस समय रहते इस ओर ध्यान नही देती है तो आने वाले दिनों में संगठन के भीतर एक बड़ी बगावत को रोक पाना संभव नही होगा। क्योंकि अब ‘‘मै नही तो कोई भी नही’’ की नीति पर चलकर सत्ता पा लेना संभव नही होगा।

सीबीआई के पत्र के बाद भी सरकार निलिट के फर्जीवाडे़ पर कारवाई क्यों नही कर रही

निलिट के माध्यम से आऊटसोर्स पर अब तक जारी है भर्तीयां

शिमला/शैल।  हिमाचल सरकार ने अक्तूबर 2015 से प्रदेश के 1131 वरिष्ठ माध्यामिक स्कूलों में सूचना प्रौद्योगिकी के शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्यक्रम शुरू कर रखा है। इसके लिये सरकार के अपने पास शिक्षक नही थे। यह शिक्षक उपलब्ध करवाने के लिये सरकार ने भारत सरकार के इलैक्ट्रानिक्स एवम् सूचना प्रौद्योगिकी मन्त्रालय से संवद्ध संस्थान निलिट से एक एमओयू साईन किया। यह संस्थान शिमला में ही स्थित था और 1995 में तत्कालीन मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह ने ही इसका उद्घाटन किया था। इस संस्थान ने मार्च 2016 तक एमओयू के तहत सूचना प्रौद्योगिकी के लिये 1300 अध्यापक उपलब्ध करवाने थे। लेकिन यह अध्यापक उपलब्ध करवाने से पहले ही सरकार ने पूरे प्रदेश में इसके संचालन की जिम्मेदारी इसी संस्थान निलिट को सौंप दी। इसके साथ जून 2020 तक का अनुबन्ध कर लिया गया क्योंकि यह संस्थान भारत सरकार के इलैक्ट्रानिक मन्त्रालय से संवद्ध था। बल्कि स्कूलों के अतिरिक्त विभिन्न विभागों में आउटसोर्स पर कम्पयूटर आप्रेटर आदि भी निलिट के माध्यम से भरने के आदेश कर रखे हैं जो आज तक चल रहे हैं। माना जा रहा है कि इस समय 50ः से भी अधिक आउटसोर्स पर भर्ती हुये कर्मचारी निलिट के इन्ही संस्थानों से हैं।
जब सरकार के स्कूलों में यह कार्यक्रम शुरू हो गया और सरकार ने यह शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त करने करने वाले छात्र-छात्राओं को स्कालरशिप आदि के रूप में प्रोत्साहित करना शुरू किया तब निलिट ने भी सरकार के कार्यक्रम का संचालन संभालने के साथ ही अपने यहां भी यह शिक्षण-प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। भारत सरकार के इलाक्ट्रानिक्स मंत्रालय से संवद्ध होने के कारण इनके यहां पढ़ने वाले छात्र भी उन सारी सुविधाओं के पात्र बन गये जो इनके समकक्ष सरकारी स्कूलों में ले रहे थे। इसका यह भी असर हुआ कि प्रदेश के ऊना, कांगड़ा, चम्बा और नाहन में भी निलिट के नाम से संस्थान खुल गये। यहां भी शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्यक्रम शुरू हो गया। इनके यहां पढ़ने वाले छात्रों को भी वही सुविधाएं सरकार से मिल गयी जो दूसरे स्थानों पर मिल रही थी।
जब छात्रवृति के आबंटन में घोटला होने के आरोप लगे और तब यह मामला जांच के लिये सीबीआई के पास पहुंच गया। सीबीआई अपनी जांच में जब इन संस्थानों तक पहुंची तब यह सामने आया कि ऊना, कांगडा़, चम्बा और नाहन में निलिट के नाम से चल रहे संस्थानों के पास भारत सरकार के इलैक्ट्रानिक  मन्त्रालय से कोई संवद्धता ही नही थी। संवद्धता न होने का अर्थ है कि यह संस्थान गैर कानूनी तरीके से आप्रेट कर रहे थे और सरकार से मिलने वाली सुविधाओं के भी पात्र नहीं थे। सीबीआई ने  28-8-2019 को इस संबंध में उच्च शिक्षा निदेशक को पत्र लिख कर सूचित भी कर दिया है। सीबीआई ने स्पष्ट कहा है कि ऊना, कांगड़ा, चम्बा और नाहन के इन संस्थानों के पास भारत सरकार के मन्त्रालय से कोई संवद्धता नही है। सीबीआई ने जब इन संस्थानों के यहां दबिश दी तब यह सामने आया कि इनका प्रोपराईटर कोई कृष्णा पुनिया है और उसमंे इनसे जुड़ा सारा 2013-14 से 2016-17 का सारा रिकार्ड नष्ट कर दिया है। रिकार्ड नष्ट किये जाने से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह संस्थान गैर कानूनी तरीके से कार्य कर रहे थे।
निलिट के साथ प्रदेश सरकार ने अक्तूबर 2015 में एमओयू साईन किया था। यह एमओयू शिमला स्थित संस्थान से साईन किया गया और 2016 में इसे 30 जून 2020 तक बढ़ा दिया गया। ऊना, कांगड़ा, चम्बा और नाहन के संस्थानों की 2017 तक की जांच चल रही है। छात्रवृति घोटाला 2018 में चर्चा में आया था और तब इसकी जांच राज्य परियोजना अधिकारी शक्ति भूषण से करवाई गयी थी। शक्ति भूषण की पांच पन्नो की रिपोर्ट के आधार पर 16-11-18 को थाना छोटा शिमला में मामला दर्ज किया गया था जिसे बाद में सरकार ने सीबीआई को सौंप दिया। प्रदेश के 266 प्राईवेट स्कूलों में यह छात्रवृतियां मिल रही हैं लेकिन जांच केवल तीन दर्जन संस्थानों तक ही  रखी गयी थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि 2018 में ही सरकार के संज्ञान में छात्रवृति घोटाला आ गया था। लेकिन किसी को भी यह सन्देह नही हुआ कि  निलिट के ऊना, कांगड़ा, चम्बा और नाहन के संस्थान फ्राड हैं। भारत सरकार में भी किसी को यह जानकारी नही हो सकी कि उसके नाम से कोई फर्जी संस्थान चल रहे हैं। यहां तक की शिमला में जो संस्थान वाकायदा संवद्धता लेकर चल रहा था उसे भी यह पता नही चला कि प्रदेश में चार संस्थान उसी नाम से बिना  संवद्धता चल रहे हैं। अब जब सीबीआई ने 28-8-2019 को इस संबंध में निदेशक को लिखित में सूचित कर दिया है उसके बाद भी सरकार की ओर से इस बारे में कोई कारवाई न किया जाना कई सवाल खड़े करता है।
 सीबीआई की सूचना से पहले इन संस्थानों पर सन्देह शायद इसलिये नही हो सकता था कि ऐसे संस्थान खोलने के लिये राज्य सरकार से अनुमतियां लेने का कोई प्रावधान ही नही किया गया है। कोई भी किसी से भी संवद्धता का दावा करके संस्थान खोल सकता है। इसमें यह तो माना जा सकता है कि जब शिमला में निलिट ने एक संस्थान को संवद्धता दे रखी थी और उसने कुसुम्पटी में भी एक शाखा खोल रखी है तो स्वभाविक रूप से यह जानकारी रहना संभव है कि उसकी तरह  चार और स्थानों पर भी निलिट खोलने के लिये किसी ने संवद्धता ली है। ऐसे में यह स्वाल उठाना स्वभाविक है कि निलिट के इस फर्जी वाड़े पर सरकार कारवाई क्यों नही कर रही है। सरकार ने शायद अभी तक भारत सरकार के इलैक्ट्रानिक्स मन्त्रालय को भी इस फर्जी वाडे की सूचना नही दी है। क्योंकि भारत सरकार द्वारा भी ऐसा कोई मामला दर्ज नही करवाया गया है कि कैसे कोई उसके नाम का फर्जी तरीके से प्रयोग कर रहा था। वैसे भी कंम्प्यूटर प्रशिक्षण के सैंकड़ो संस्थान प्रदेश में चल रहे हैं लेकिन उनके बारे में कोई विशेष नियम या प्रक्रिया अभी तक तय नही है। निलिट भारत सरकार का उपक्रम है उसके नाम पर शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त करके इन चारों संस्थानों के कई छात्र सरकार के विभिन्न विभागों में भी कार्यरत हो सकते है जबकि उनके प्रमाणपत्रों की कोई मान्यता ही अब नही रह गयी है। हो सकता है कि सरकार के स्कूलों में इन संस्थानों से निकले लोग सेवायें दे रहे हों।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सीबीआई का पत्र

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

क्या कांग्रेस भी राजधर्म भूल रही है

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में भी प्रतिदिन कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं। हिमाचल सरकार ने इस बढ़ौत्तरी के कारण बाहर से प्रदेश में आने वालों पर रोक लगा दी थी। लेकिन केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार के फैसले को खारिज करते हुए प्रदेश की सीमाएं बाहरी राज्यों के लिये खोल दी है। यह फैसला कोरोना की हकीकत को समझने में कारगर भूमिका निभायेगा यह तय है। सत्तारूढ़ भाजपा का संगठन और सरकार दोनों ही इस पर सवाल उठाने का जोखिम नही ले सकते हैं। फ्रन्टलाईन मीडिया में सवाल पूछने का दम नही है भले ही कोरोना से प्रदेशभर में उसका भारी नुकसान हुआ हो क्योंकि अधिकांश के शिमला से बाहर स्थित कार्यालय बन्द हो गये हैं। सरकार की वित्तिय स्थिति कहां खड़ी है और उसका प्रदेश की सेहत पर कितना असर पड़ेगा इसका अन्दाजा वित्त विभाग द्वारा जारी हुए पत्रा से लगाया जा सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के सारे दावों की पोल सीबीआई 28-8-2019 को निदेशक उच्च शिक्षा के नाम लिखा पत्र खोल देता है। इस पत्र के बाद स्वास्थ्य विभाग में हुए घपले पर प्रदेश के ही विजिलैन्स द्वारा की गयी कारवाई इस दिशा में एक और प्रमाण बन जाती है।
लोकतन्त्र में सरकार से सवाल पूछना एक स्वस्थ पंरम्परा मानी जाती है क्योंकि यह हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन वर्तमान में इस अधिकार के प्रयोग का क्या अर्थ है इसका अन्दाजा शिमला में पूर्व सीपीएस नीरज भारती और कुमारसेन में दिल्ली के पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ दर्ज हुए देशद्रोह के मामले से लगाया जा सकता है। इन दोनांे मामलों में जमानतें मिल चुकी हैं। अब इनमें यह देखना दिलचस्प होगा कि कैसे इनमें लगाये गये देशद्रोह के आरोपों को पुलिस अपनी जांच में पुख्ता कर पाती है। यह सारे मामले सीधे व्यापक जनहित से जुड़े हुए है क्योंकि इनका असर परोक्ष/ अपरोक्ष में हर आदमी पर पड़ रहा है। भाजपा सत्ता पक्ष होने के नाते यह सवाल उठाने का नैतिक बल खो चुका है।
ऐसे में आम आदमी से जुड़े इन मुद्दों को उठाने और इन पर जवाब देने के लिये सरकार को बाध्य करने की जिम्मेदारी मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पर आती है। फिर आज की तारीख में किसी भी सरकार के खिलाफ इससे बड़े जन मुद्दे क्या हो सकते हैं। लेकिन प्रदेश कांग्रेस इस समय इन मुद्दों को भूलाकर जिस तरह से आपस में ही एक दूसरे के खिलाफ स्कोर सैटल करने में  उलझ रहे हैं उससे लगता है कि वह भी अपना राजधर्म भूल गयी है। राजधर्म सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की एक बराबर जिम्मेदारी होती है। जनता दोनों पर बराबर नज़रे बनाये हुए हैं। वह देख रही है कि कौन जनता की कीमत पर राजधर्म की जगह मित्र धर्म निभा रहा है। मीडिया और शीर्ष न्यायपालिका दोनों की ओर से जन विश्वास को गहरा आघात पहुंचा है। यदि विपक्ष भी उसी पंक्ति में जा खड़ा होता है तो यह अराजकता को खुला न्योता होगा यह तय है।

 

सरकार से सवाल पूछा तो बनेगा देशद्रोह का मुकद्दमा नीरज भारती की गिरफ्तारी से उठी चर्चा

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस के नेता पूर्व विधायक और मुख्य सचिव नीरज भारती को सीआईडी ने देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। भारती के खिलाफ शिमला के एक अधिवक्ता नरेन्द्र गुलेरिया ने शिकायत दी थी। गुलेरिया ने 20 जून को शिकायत देकर यह आरोप लगाया था कि पिछले 24 घन्टों में भारती ने सोशल मीडिया पर जो पोस्ट डाले थे उनसे देशद्रोह परिलक्षित होता है। इस पर भारती के खिलाफ अपराध दण्डसंहिता की धाराओं 124A ,153A, 504 और 505 के तहत एफआईआर दर्ज की गयी। एफआईआर दर्ज होने के बाद उन्हे 24 जून को जांच में शामिल होने का नोटिस दिया गया। जब नोटिस की अनुपालना करते हुए वह जांच में शामिल हुए तो उसके दूसरे दिन गिरफ्तार  करके सोमवार तक पुलिस रिमांड हासिल कर लिया गया है। 

       लोकतन्त्र में

भारती की गिरफ्तारी  से राजनीतिक क्षेत्रों में एक बहस खड़ी हो गयी है। कांग्रेस इस गिरफ्तारी  को राजनीतिक प्रतिशोध करार दे रही है तो भाजपा इसे जायज़ ठहरा रही है। कांग्रेस ने राज्यपाल को भी इस आश्य का एक ज्ञापन सौंपकर भारती की रिहाई की मांग की है। भारती ओबीसी वर्ग से आते हैं और प्रदेश के सबसे बड़े ज़िले कांगड़ा से ताल्लुक रखते हैं। कांगड़ा का हर छोटा बड़ा कांग्रेस नेता भारती के साथ खड़ा हो गया है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस को भारती की गिरफ्तारी से एक बड़ा मुद्दा हाथ लग गया है और आने वाले दिनों में सरकार के लिये यह एक बड़ी परेशानी का कारण बनेगा। क्योंकि भाजपा में जिस तरह से पिछले दिनों ओबीसी से ताल्लुक रखने वाले ज्वालामुखी के विधायक रमेश धवाला को विधायक दल की बैठक में घटे घटनाक्रम के लिये खेद प्रकट करने के कगार तक धकेल दिया गया था उस पर ओबीसी वर्ग ने जिस तर्ज पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है उससे कांगड़ा का संभावित ध्रुवीकरण स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है। लेकिन इस गिरफ्तारी  का प्रभाव कांगड़ा से बाहर पूरे प्रदेश पर भी होगा और राष्ट्रीय स्तर पर भी। यह ऐ बड़ा सवाल रहेगा। क्योंकि आने वाले समय में बहुत सारे मुद्दों पर बहुत लोगों के मतभेद सत्ता से सामने आयेंगे यह पूछा जायेगा कि क्या सत्ता से मतभेद राष्ट्रद्रोह होता है।
इस परिदृश्य में अपराध दण्डसंहिता की धारा 124Aको समझना आवश्यक हो जाता है क्योंकि इसमें सुनवाई का अधिकार क्षेत्र केवल सत्र न्यायालय से शुरू होता है और आसानी से ज़मानत मिलना भी कठिन हो जाता है। धारा 124A में कहा गया है कि Whoever by worlds, either spoken or written on by sings, or by visible represention, or otherwise brigns or attempts to bring into hatred or contempt , or excites or attemps to excite disaffection towards, the Government established by law in india, shall be punished with imprisonment which may extend to three years, to which fine may be added , or with fine.

Explanation-1 The Expression " disaffection" includes disloyalty and all fellings of enmity,
Explanation-2 Comments expressing disapprobation of the measures of the Government with a view to obtain their alteration by lawful means, without exciting or attempting to excite hatred , contempt or disaffection, do not constitute an offence under this section.
Explanation-3 Comments expressing disapprobation of the administrative or other action of the Government without exciting or attempting to excite hatred, contempt or disaffection, do not constitute an offence under this section. समें चयनित सरकार के प्रति किसी भी माध्यम से असन्तुष्टि व्यक्त करना राजद्रोह श्रेणी में आता है। इसके मुताबिक चयनित सरकार के किसी भी फैसले और कृत्य पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है। इसमें मत भिन्नता के लिये कोई स्थान नही है और इस परिपेक्ष में संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के साथ इसका सीधा टकराव हो जाता है। लेकिन लोकतन्त्र में मतभिन्नता और सवाल पूछना तो आवश्यक है। इसीलिये सर्वोच्च न्यायालय ने मतभिन्नता को आवश्यक करार दिया है। आज जिस तरह का राजनीतिक और सामाजिक वातावरण बनता जा रहा है उसमें इस तरह की  गिरफ्तारीयों से बुनियादी सवालों पर जन बहस का वातावरण अपने आप खड़ा हो जायेगा यह तय है। लेकिन इसी के साथ यह भी स्पष्ट है कि मतभिन्नता के नाम पर अभद्र भाषा का प्रयोग भी नही किया जा सकता। परन्तु अभद्र भाषा के खिलाफ मानहानि का मामला दायर करने का भी पूरा अधिकार और प्रावधान है। ऐसें में मानहानि की बजाये देशद्रोह के तहत कारवाई करना निश्चित रूप से सरकार की नीयत और नीति पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

यहां पर भारत की उन पोस्टों पर नज़र डालना भी आवश्यक हो जाता है जिन्हे राष्ट्रद्रोह की संज्ञा दी गयी है। भारती की भाषा से अधिकांश को आपत्ति हो सकती है और होनी भी चाहिये। लेकिन जो सवाल भारती ने उठाये हैं क्या उनकी राष्ट्रद्रोह के नाम पर जांच नही होनी चाहिये। पूरा देश जानता है कि जम्मू -कश्मीर के पुलिस इन्सपैक्टर देवेन्द्र सिंह को कितने गंभीर आरोपों में  गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ जम्मू-कश्मीर पुलिस और एनआईए दोनो ही जांच कर रहे थे। लेकिन उसे अब ज़मानत मिल गयी है क्या इसके लिये सवाल नहीं पूछा जाना चाहिये। इस समय भारत चीन सीमा विवाद चल रहा है। देश के बीस सैनिक मारे गये हैं। संसद में इसी वर्ष मार्च में डा. अमर सिंह ने सवाल पूछा था कि भारत की कितनी ज़मीन पर चीन का कब्जा है। सरकार ने इस सवाल के जवाब में बताया है कि 38 हज़ार किलो मीटर पर चीन का कब्ज़ा है लेकिन अब जून में सरकार ने कहा है कि 43 हज़ार कि. मी. चीन के पास है। जब मार्च में यह आंकड़ा 38 हज़ार था और अब जून में 43 हज़ार हो गया है तब क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिये कि तीन माह मे ही यह 5 हजार वर्ग कि. मी. का अन्तर क्यों और कैसे? इस मुद्दे पर रक्षा मन्त्री, विदेशमन्त्री और प्रधानमन्त्री तीनों के ही ब्यानों में भिन्नता है। क्या इस भिन्नता पर सवाल नही बनता है। भारती ने अपनी पोस्टों में जो कुछ कहा है क्या उसे बिना किसी जांच के ही अपराध मान लिया जायेगा। क्या अदालत इन पोस्टों में उठाये गये सवालों पर जांच के आदेश नही देगी।

यह हैं विवादित पोस्ट


क्या मरीजों को घटिया दवाईयां दी जा रही है कैग रिपोर्ट से उठा सवाल

कोरोना काल में भी डाक्टरों के 370 पद खाली

दो वर्षो में 128 करोड़ की दवा खरीद भी सवालों में

शिमला/शैल। जयराम सरकार का स्वास्थ्य विभाग उस समय से विवादों और चर्चाओं का केन्द्र चला आ रहा है जब से विभाग की कारगुज़ारीयों को लेकर शान्ता कुमार के नाम लिखा गया एक गुमनाम पत्र सोशल मीडिया में वायरल होकर सामने आया था। इस गुमनाम पत्र से चलकर हालात विभाग के निदेशक की गिरफतारी तक पहुंच गये। क्योंकि इस बार एक आडियो वायरल हुआ सरकार को इसका संज्ञान लेकर विजिलैन्स में केस दर्ज करवाना पड़ा। केस दर्ज होने के बाद निदेशक की गिरफतारी  हुई। निदेशक की ज़मानत के बाद आडियो संवाद के दूसरे पात्र पृथ्वी सिंह की गिरफतारी हुई। पृथ्वी सिंह की जमानत की सुनवाई के दौरान ही निदेशक की पत्नी ने अग्रिम जमानत की याचिका डाल दी। उसका आरोप था कि विभाग उसे भी गिरफतार कर सकता है। इस याचिका पर अदालत ने विजिलैन्स को निर्देश दिये हैं कि ऐसी किसी भी संभावना में इस महिला को पूर्व नोटिस दिया जाना होगा। पृथ्वी सिंह को राजीव बिन्दल का निकटस्थ प्रचारित किया गया और इस प्रचार के कारण बिन्दल को पार्टी अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना पड़ा। लेकिन यह सब होने के बाद यह मामला चर्चा से बाहर हो गया है। ऐसे माना जा रहा है कि इसी कारवाई से शायद विभाग पाक साफ हो गया है।
लेकिन विभाग के अन्दर की जानकारी रखने वालों के मुताबिक इस कोरोना काल में भी विभिन्न स्तरों पर डाक्टरों के 370 पद खाली हैं। इन खाली पदों से अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि इस कोरोना संकट में सरकार को लोगों के स्वास्थ्य की कितनी चिन्ता है जबकि इस समय कोरोना ही राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकता है। कोरोना के मरीज का ईलाज करने के लिये सात डाक्टरों की एक टीम गठित करने का मानक तय है। लेकिन राजधानी में ही कोविड अस्पताल नामज़द किये गये। दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में इसके लिये केवल चार डाक्टरों की ही टीम नामजद है। ऐसा इसलिये है कि सरकार डाक्टरों की भर्ती ही नहीं कर पा रही है। यही नहीं स्वास्थ्य के क्षेत्र में गुणवत्ता के साथ भी किस कदर समझौता किया जा रहा है इसका खुलासा 31 मार्च 2018 को आयी कैग रिपोर्ट से हो जाता है। इसमें कहा गया है कि  The system of quality control was practically non-existent as drug samples were not being taken at the time of supply, and drugs were being issued without  testing or waiting for test reports, resulting  in  distribution of substandard drugs.आम आदमी के स्वास्थ्य के साथ इससे बड़ा खिलवाड़ और कुछ नही हो सकता है। कैग की यह रिपोर्ट विधानसभा पटल पर भी रखी जा चुकी है लेकिन सरकार की ओर से इस पर आज तक कोई कारवाई नहीं की गयी है।
विभाग में भ्रष्टाचार किस कदर व्याप्त है इसका भी कैग ने कड़ा संज्ञान लिया है। कैग की रिपोर्ट में 2015 से लेकर 2018 तक विभाग की कारगुज़ारी की समीक्षा की गयी है। विभाग में दवाईयों और अन्य सामग्री तथा उपकरणों की खरीद नीति पर टिप्पणी करते हुए कहा गया है कि

Assessment of demand for procurement of drugs & consumables and their distribution was neither scientific nor systematic, leading to instances of non-procurement, delay in procurement and non-availability of drugs; and non-issuing, short- issuing, excess issuing of drugs to health institutions. Drugs were purchased irregularly and without requirement resulting in their expiry. Ineffective quality control resulted in distribution of substandard drugs to patients. Procurement of machinery & equipment was not systematic in the absence of any inventory management system leading to cases of non-procurement and procurement without requirement, which resulted in items remaining unutilised/ idle and non-functional. Items were also found to be lying unutilised owing to non-posting of technical staff.

सरकार ने 1999 में ही जैनरिक औषधीयां खरीदने का फैसला ले लिया था और निदेशक स्वास्थ्य ने अक्तूबर 2016 में इस संबंध में फिर से निर्देश भी जारी किये थे। लेकिन इन निर्देशों को नज़रअन्दाज करते हुए सीएमओ मण्डी ने 2016 से 2018 के बीच 1.75 करोड़ की गैर जैनरिक दवाईयां लोकल सप्लायरों से खरीद लीं। जिनमें से 30.14 लाख की दवाईयां मार्च 2018 तक उपयोग में ही नही लायी गयी और 1.33 लाख की दवाई तो एक्सपायर भी कर गयी। रोगी कल्याण समितियों के माध्यम से वर्ष में अधिक से अधिक पचास हज़ार की ही खरीद की जा सकती है लेकिन चम्बा, कुल्लु और धर्मशाला में 2015 से 2018 बीच 5.27 करोड़ की नाॅन जैनरिक दवाई खरीद ली गयी। क्योंकि इसमें 10% से लेकर 83% तक कमीशन का मामला था। विभाग मे दवा खरीद को लेकर सरकार ने कई बार खरीद नीति में बदलाव किया है। इस बदलाव के कारण विभाग में भ्रष्टाचार के साथ ही मरीज़ो को सबस्टैण्र्ड दवाईयां तक दे दी गयी। इन नीतियों में बार-बार हुए बदलाव को लेकर विभाग में क्या कुछ घटा है इसका विस्तृत ब्योरा कैग रिपोर्ट में दर्ज है। यह सब कांग्रेस के शासनकाल में घटा है लेकिन इसमें हैरान करने वाला सच तो यह है कि जयराम सरकार ने भी इस सबको आंख बन्द करके जारी रखा। इसी का परिणाम है कि अब हालात गुमनाम पत्र से चलकर निदेशक की गिरफतारी तक पहुंच गये हैं। विपक्ष इसे भ्रष्टाचार का एक बड़ा मुद्दा बनाकर जनता में ले गया है। कांग्रेस के हर विधायक और दूसरे नेताओं ने इस पर पत्रकार वार्ताएं आयोजित की हैं अब इसमें जयराम सरकार के कार्यकाल में ही 1.4.2018 से 15.11.2019 के बीच हुई करीब 128 करोड़ की खरीद को लेकर भी सवाल उठने शुरू हो गये हैं। कहा जा रहा है कि इसमें बहुत कुछ नियमों के विरूद्ध हुआ है और कुछ चिहिन्त सप्लायरों को विशेष लाभ पहुंचाया गया है क्योंकि 10% से लेकर 83% कमीशन प्रभावी रहा है।

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