Sunday, 21 June 2026
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17 करोड़ की मुख्यमन्त्री राहत से सिराज को मिले 3 करोड़

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री राहत कोष एक ऐसा साधन है जिससे किसी भी व्यक्ति की सहायता की जा सकती है। इसकी सहायता की पात्रता के लिये कोई बडे़ कडे़ नियम नही है जैसा की अन्य योजनाओं में होता है। इसके तहत दी गयी सहायता को किसी भी तरह से किसी अदालत में चुनौती नही दी जा सकती है। इसमें केवल यही देखा जाता है कि जिस दिन यह सहायता मांगी जाती है उस दिन मुख्यमन्त्री राहत कोष में धन उपलब्ध होना चाहिये और सहायता मांगने वाले के पास उस समय और कोई साधन उपलब्ध नही था। मुख्यमन्त्री राहत कोष से सामान्यतः आवदेन संबंधित एसडीएम कार्यालय के माध्यम से भेजे जाते हैं ताकि वह यह सुनिश्चित कर सके की सहायता मांगने वाला सही में इसका पात्र है। वैसे नियमों में ऐसी कोई बंदिश नही है क्योंकि यह सहायता मुख्यमन्त्री के अपने विवके पर निर्भर करती है और मुख्यमंत्री किसी भी ऐसे आग्रह को अस्वीकार भी कर सकते हैं।
मुख्यमंत्री राहत कोष शुद्ध रूप से केवल सरकारी धन ही नही होता है। इसमें कोई भी व्यक्ति मुख्यमंत्री को इसमें योगदान दे सकता है और मुख्यमंत्री अपने विवके से इसमें से कोई भी आंवटन कर सकते हैं। इस वित्तिय वर्ष में मुख्यमंत्री राहत कोष से 27 दिसम्बर 2017 से 15 जनवरी 2019 तक प्रदेश के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में 17,34,51,949 रूपये की सहायता दी गयी है। इसमें मुख्यमंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्र सिराज में 3,03,17,140 रूपये की सहायता दी गयी है।































 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रदेश का कर्जभार पंहुचा 52000 करोड़

शिमला/शैल। इस बार बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री और कांग्रेस के ही विधायक पूर्व मंत्री राम लाल ठाकुर का सवाल था कि 15 जनवरी 2019 तक जयराम सरकार ने कितना कर्ज लिया है। इस सवाल के जवाब में बताया गया कि 3451 करोड़ का कर्ज लिया गया और इसमें 3000 करोड़ खुले बाजार से लेना पड़ा है। इसी के साथ यह भी बताया गया कि इसमें सरकार ने कुछ कर्ज वापिस भी कर दिया है और इस तरह शुद्ध रूप से केवल 1838.75 करोड़ का ही ऋण लिया गया है। मुकश अग्निहोत्री के सवाल के जवाब में बताया गया कि सरकार की कर्ज लेने की सीमा 4524 करोड़ है और सरकार का कुल कर्ज 4975.45 करोड़ है। लेकिन मुख्यमन्त्री ने अपने बजट भाषण में सदन को बताया है कि इस वर्ष 5068 करोड़ का ऋण लेना पडे़गा। मुख्यमन्त्री के बजट भाषण के आंकड़ों को सही मानते हुए कुल कर्ज 52000 करोड़ से ऊपर चला जाता है। कर्ज का दस्तावेज 2003 से 2017-18 तक का शैल के पिछले अंक में पाठकों के सामने रखा जा चुका है।

कर्ज को लेकर सदन में आये राम लाल ठाकुर और मुकेश अग्निहोत्री के प्रश्नों पर चर्चा नही हो पायी है और इस तरह यह सरकार का लिखित जवाब ही रह गया है। लेकिन बजट भाषण पर हुई चर्चा में कर्ज  की स्थिति पर चिन्ता व्यक्त की गयी है। मुख्यमन्त्री ने इस चर्चा का जवाब देते हुए यहां तक कह दिया कि पूर्व में कर्ज लेकर मौज मस्ती होती रही है। मुख्यमन्त्री का यह आरोप कितना सही है इससे ज्यादा महत्वपूर्ण  यह है कि क्या जयराम सरकार इस बढ़ते कर्जभार का रोकने का कोई ठोस उपाय कर रही है? जयराम पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं इस नाते उनका दामन कर्ज करने के दाग से साफ था। ऐसे में यदि वह प्रदेश की वित्तिय स्थिति पर कोई श्वेतपत्र ले आते तो प्रदेश की जनता उनके कथन पर आसानी से विश्वास कर लेती। लेकिन वह कर्ज के लिये जिम्मेदार अफरशाही के हाथों में ऐसे खेल गये कि यह श्वेत पत्र नही ला सके। जबकि 1998 में धूमल यह श्वेतपत्र लेकर आये थे और इसी कारण से वह वीरभद्र शासन पर लगातार भारी पड़ते रहे।

अभी जो आंकड़े अफसरशाही ने मुख्यमन्त्री के सामने परोसे हैं उनमें अपने में अन्त विरोध है। सवाल के जवाब में कुछ है और बजट भाषण में कुछ। फिर बजट की विवरणिका में जो पूंजीगत प्राप्तियों का सकल ऋण कहा गया है वह क्या है इस पर कोई स्पष्टीकरण नही आ पाया है। भारत सरकार मार्च 2016 में भी कर्ज को लेकर चेतावनी पत्र भेज चुकी है। लेकिन इस पत्र पर कोई अमल नही हुआ है। क्योंकि एफआरबीएम अधिनियम की धारा दस के तहत अधिकारियों को यह छूट हासिल है कि उनके खिलाफ किसी भी तरह की कोई कानूनी कारवाई नही की जा सकती है।No suit, prosecution or other legal proceedings shall lie against the state government or any of its officers, for anything which is in good faith done or intended to be done under this Act or the rules made there under. लेकिन इसी अधिनियम की धारा 7(2) में सरकार की यह भी जिम्मेदारी है कि वह अपने संसाधन बढ़ाये

Whenever there is a prospect of either shortfall in revenue or excess of expenditure over pre-specified levels for a given year on account of any new policy decision of the state Government that affects either the State Government or its public sector undertakings, the State Government, prior to taking such policy decision, shall take measure to fully offset the fiscal impact for the current and future years by curtailing the sums authorized to be paid and applied from and out of the consolidated Fund of the State under any Act enacted by Legislative Assembly to provide for the appropriation of such sums , or by taking interim measure fro revenue augmentation, or by taking up a combination of both.

लेकिन एफआरवीएम के इन प्रावधानों के तहत क्या संसाधन बढ़ाने की ओर कोई ध्यान दिया जा रहा है शायद नही। केवल हर बार हर मुख्यमन्त्री के नाम से हर बजट में ऐसी घोषणाएं कर दी जाती हैं जिनको पूरा करने के लिये केवल कर्ज लेना ही एकमात्र विकल्प रह जाता है। इसी का परिणाम है कि आज प्रदेश 52000 करोड़ के कर्ज तले डूबा है। इसी कारण से आज हर काम आऊटसोर्से पर किया जा रहा है।

 

दस्तावेजों के आईने में प्रदेश का बजट 16 नयी योजनाओं के साथ आया 44384 करोड़ का बजट

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर का 2019-20 का कुल बजट 44384 करोड़ का होगा यह खुलासा मुख्यमन्त्री ने सदन में अपने बजट भाषण में रखा है। इस बजट में मुख्यमन्त्री ने अगले वित्त वर्ष के लिये 16 नयी योजनाओं की घोषणा की है। पिछले वित्त वर्ष में ऐसी ही 30 योजनाओं की घोषणा की गयी थी। अब यह पिछली ओर अगली दोनों योजनाएं एक साथ चलेंगीं। लेकिन पिछली 30 योजनाओं में से अधिकांश अभी तक अमली शक्ल नही ले पायी हैं। ऐसे में 31 मार्च को समाप्त होने वाले वित्त वर्ष में यह बची हुई योजनाएं आकार ले पाती है या नही इसका पता आने वाले दिनों में लगेगा। इन सारी योजनाओं के लिये धन का प्रावधान कैसे हो पायेगा यह एक गंभीर सवाल है। प्रदेश का बजट योजना और गैर योजना दो भागों में बंटा रहता है। इसमें योजना के लिये 90ः की सहायता केन्द्र से मिलती है और 10% योगदान राज्य सरकार का होता है। यह योजना 2019-20 के लिये 7100 करोड़ की है। लेकिन गैर योजना का सारा खर्च राज्य को अपने ही संसाधनों से पूरा करना होता है चाहे उसके लिय कर्ज ही क्यों न लेना पड़े। वर्ष 2019-20 में प्रदेश का गैर योजना खर्च 36089.03 करोड़ होगा जबकि राजस्व आय केवल 33746.95 करोड़ रहने वाली है। इस तरह राजस्व आय से राजस्व व्यय 2342.08 करोड़ बढ़ जाता है। योजना और गैर योजना दोनों का मिलाकर राज्य की समेकित निधि बनती है।

राजस्व आय और व्यय के साथ ही बजट में पूंजीगत प्राप्तियों  का ब्योरा भी रहता है। इसके मुताबिक वर्ष 2019-20 में सरकार 8330.75 करोड़ ऋणों के माध्यम से जुटायेगी। ऐसे में सवाल उठता है कि जब राजस्व आय और व्यय में केवल 2342.08 करोड़ का घाटा है तब 8330.75 करोड़ का पूंजीगत ऋण क्यों? जब योजना का आकार 7100 करोड़ है और उसमें से 90% केन्द्र देगा फिर राजस्व व्यय में योजना के नाम पर 2822.24 करोड़़ का खर्च क्यों? फिर पूंजीगत प्राप्तियों में भी योजना के नाम पर केवल 3661.30 करोड़ का खर्च क्यों जबकि योजना तो 7100 करोड़ की है। बजट के आंकड़ो की इस जादूगरी से यह आंशका होना स्वभाविक है कि क्या योजना के तहत किये जा रहे कार्यों को पूरा होने के बाद भी गैर योजना में ट्रांसफर नही किया जा रहा है। क्या इसी कारण से कई कई वर्षों तक कार्यों के उपयोगिता प्रमाण पत्र जारी नहीं किये जाते हैं और हर वर्ष सीएजी की रिपोर्ट में समेकित निधि से अधिक खर्च होने का पैरा बनता है। इस आने वाले वित्त वर्ष में एफआरबीएम के तहत केवल 4524 करोड़ की ही ऋण लिया जा सकता है। ऐसे में कर्ज की सीमा 4524 करोड़ ही हो सकती है तो फिर पूंजीगत प्राप्तियों के तहत 8330.75 करोड़ का ऋण क्यों और कैसे?
प्रदेश का 2003 में कुल कर्ज 13209.47 करोड़ था जो कि बढ़कर 2017-18 में 4790.21 करोड़ हो गया है। मुख्यमन्त्री के बजट भाषण के अनुसार 2018-19 में 4546 करोड़ का ऋण लिया जायेगा। इस तरह 2018-19 में यह कर्जभार 52 हजार करोड़ से ऊपर चला जायेगा। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या वित्तिय प्रबन्धन केवल कर्ज का जुगाड़ करना ही रह गया है? यदि इसी तरह लोक लुभावन घोषणओं को पूरा करने के लिये कर्ज लिया जाता रहा तो मुख्यमन्त्री के इस कार्यकाल में ही यह कहां तक पहुंच जायेगा इसका अनुमान आंकड़ों और दस्तावेजों से लगाया जा सकता है।

































                                 मुख्यमन्त्री के भाषण के अंश

अध्यक्ष महोदय, अब मैं 2018-19 के संशोधित अनुमानों तथा 2019-20 के बजट अनुमानों पर आता हूँ।
वर्ष 2018-19 के संशोधित अनुमानों के अनुसार कुल राजस्व प्राप्तियां 31 हजार, 189 करोड़ रुपये हैं, जबकि 2018-19 के बजट में यह प्राप्तियां 30 हजार, 400 करोड़ रुपये अनुमानित थीं। इसी प्रकार 2018-19 के संशोधित अनुमानों के अनुसार कुल राजस्व व्यय 33 हजार, 408 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जबकि बजट में 33 हजार 568 करोड़ रुपये अनुमानित था। इस प्रकार संशोधित अनुमानों के अनुसार कुल राजस्व घाटा 2 हजार, 219 करोड़ रुपये रहेगा जो कि 2018-19 के बजट अनुमान से 949 करोड़ रुपये कम है। संशोधित अनुमानों के अनुसार वर्ष 2018-19 के दौरान कुल राजकोषीय घाटा 7 हजार, 786 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जो कि राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का 5.14 प्रतिशत है। 2018-19 के बजट अनुमानों के अनुसार कुल राजकोषीय घाटा राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का 5.16 प्रतिशत आँका गया था।
वित्तीय वर्ष 2018-19 में इस घाटे को पूरा करने के लिये 4 हजार, 546 करोड़ रुपये का शुद्ध ऋण लेने का अनुमान है, जो कि Fiscal Responsibility and Budget Management Act (FRBM) के प्रावधानों के अनुसार है।
वर्ष 2019-20 के दौरान कुल राजस्व प्राप्तियां 33 हजार, 747 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है तथा कुल राजस्व व्यय 36 हजार, 089 करोड़ रुपये अनुमानित है। इस प्रकार कुल राजस्व घाटा 2 हजार, 342 करोड़ रुपये अनुमानित है। राजकोषीय घाटा 7 हजार, 352 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जो कि प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद का 4.35 प्रतिशत होगा। प्राप्तियों एवं व्यय के बीच के अन्तर को ऋण के माध्यम से पोषित किया जाएगा तथा यह शुद्ध ऋण 5 हजार, 068 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यह ऋण FRBM अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप ही लिये जाएंगे।

जब पूंजीगत प्राप्तियां सकल ऋण है तो क्या इस वर्ष राजस्व व्यय पूरा करने के लिये 14000 करोड़ का कर्ज लिया गया?

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने जब सदन में 2018 के लिये 41440 करोड़ रूपये के कुल खर्च का बजट रखा था तब उन्होने वीरभद्र शासन पर यह आरोप लगाया था कि इस शासनकाल में 18787 करोड़ का अतिरिक्त कर्ज लिया गया है। जयराम ने सदन में आंकड़ेे रखते हुए खुलासा किया था कि जब भाजपा ने 2007 में सत्ता संभाली थी तब प्रदेश पर 19977 करोड़ का कर्ज था। 31 दिसम्बर 2012 को सत्ता छोड़ते समय यह कर्ज 27598 करोड़ हो गया था। लेकिन अब 18 दिसम्बर को यह बढ़कर 46,385 करोड़ हो गया है। जयराम ठाकुर को 46385 करोड़ का कर्ज विरासत में मिला है। इस विरासत के साथ जयराम ने 41440 करोड़ के कुल खर्च का बजट पेश किया था जो अब 3142.65 करोड़ की अनुपूरक मांगेे आने के बाद कुल 44582.65 करोड़ पर पहुंच गया है।
मुख्यमन्त्री जयराम ने जब 41440 करोड़ के कुल खर्च का बजट सदन में रखा था उसमें सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियां 30400.21 करोड़ दिखाई गयी थी और राजस्व व्यय 33567.97 करोड़ दिखाया गया था। इस तरह राजस्व व्यय और आय में 3167.76 करोड़ का अन्तर था। राजस्व आय के बाद सरकार पूंजीगत प्राप्तियों के माध्यम से पैसा जुटाती है। सरकार की यह पूंजीगत प्राप्तियां 7764.75 करोड़ रही है। जिनमें 7730.20 करोड़ की प्राप्तियां कर्ज के रूप में है। यह बजट दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से दर्ज है। इस तरह पूंजीगत प्राप्तियों और राजस्व प्राप्तियों को मिलाकर सरकार के पास कुल 38164.96 करोड़ आता है और राजस्व व्यय और पूंजीगत व्यय को मिलाकर कुल खर्च 41439.94 करोड़ हो जाता है। इस तरह सरकार के पास 3274.98 करोड़ का ऐसा खर्च बच जाता है जिसके लिये कोई साधन बजट में नही दिखाया गया है। जिसका सीधा सा अर्थ यह रहता है कि इस खर्च को पूरा करने के लिये पूंजीगत प्राप्तियों के अतिरिक्त और कर्ज लेना पड़ेगा।
अब सरकार 3142.65 करोड़ की अनुपूरक मांगे लेकर आयी है। यह मांगे आने का अर्थ है कि सरकार का इस वर्ष का कुल खर्च बढ़ कर 44582.65 करोड़ का हो गया है। इन खर्चो को पूरा करने क लिये क्या अतिरिक्त उपाय किये गये हैं इसका कोई उल्लेख अनुपूरक मांगों में नही है। स्वभाविक है कि इस खर्च को पूरा करने के लिये या तो सरकार को और कर्ज लेना पड़़ेगा या फिर और टैक्स जनता पर परोक्ष/अपरोक्ष रूप से लगाने पड़ेंगे। इस तरह यदि पूंजीगत प्राप्तियों के नाम पर जुटाये गये ऋण और उसके बाद भी खुले छोड़ेे गये खर्चो और अब आयी अनुपूरक मांगो को मिलाकर देखा जाये तो जो आरोप मुख्यमन्त्री ने वीरभद्र शासन पर अतिरिक्त कर्ज लेने का लगाया था आज यह सरकार स्वयं भी उसी चक्रव्यूह में फंसती नज़र आ रही है। अब अनुपूरक मांगे आने के बाद सरकार का इस वित्तिय वर्ष का कुल राजस्व व्यय बढ़कर 44582.65 करोड़ को पहुंच गया है लेकिन राजस्व की आय तो पूराने 30400.21 करोड़ के आंकड़े पर ही खड़ी है। इससे यह सामने आता है कि इस राजस्व व्यय को पूरा करने के लिये सरकार को 14000 करोड़ का ऋण लेना पड़ा है। यह खुलासा एफआरवीएम अधिनियम के तहत सदन में पेश बजट दस्तावेजों में सामने आता है। इस अधिनियम के तहत बजट दस्तावेजों में व्याख्यात्मक विवरणिका सदन में रखना अनिवार्य है। इस विवरणिका में वित्तिय वर्ष में होने वाला कुल राजस्व व्यय और कुल राजस्व आय के आंकड़े रखे जाते हैं। इसी में पूंजीगत प्राप्तियों का आंकड़ा भी दिखाया जाता है। यह सारी विवरणिका पहले पन्ने पर ही दर्ज रहती है। इस विवरणिका को देखने से सामने आ जाता है कि पूंजीगत प्राप्तियों को सकल ऋण माना जाता है। वर्ष 2018 -19 में यह पूंजीगत प्राप्तियां सकल ऋणों के रूप में 7730.20 करोड़ दिखायी गयी हैं। इन आंकड़ो को देखने के बाद स्पष्ट हो जाता है कि कुल खर्च को पूरा करने के लिये 14000 करोड़ के ऋण की आवश्यकता है क्योंकि कुल आय तो 30400 करोड़ से बढ़ नही पायी है। इस तरह यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यह स्थिति कब तक और कितनी देर तक ऐसे चल पायेगी? यह स्थिति सबसे अधिक चिन्ता और चर्चा का विषय बनती है और एक लम्बे समय से ऐसे ही चली आ रही है। लेकिन आज तक इस पर न तो कभी माननीयों ने सदन में कोई चर्चा उठायी है और न ही प्रदेश के मीडिया ने इसे जनता के सामने रखा है।

नगर-निगम अधिकारी का वायरल हुआ आडियो बना मुद्दा

शिमला/शैल। नगर निगम शिमला की कार्यप्रणाली को लेकर एक लम्बे अरसे से सवाल उठते आ रहे हैं क्योंकि नगर निगम जो सेवाएं लोगों को उपलब्ध करवाता है उनकी गुणवता को लेकर सवाल उठे हैं। पेयजल आपूर्ति को लेकर शहर में जनजीवन अस्तव्यस्त होने के साथ शहर में अवैध निर्माणों को लेकर प्रदेश उच्च न्यायालय से लेकर एनजीटी और सर्वोच्च न्यायालय तक इसका कड़ा संज्ञान ले चुके हैं। शहर के विकास कार्याें को लेकर कई मामलों में स्थिति यह है कि वर्षों से मामले अदालतों में अटके पड़े हैं। कई मामलों में निगम के अधिकारी अपनी अदालतो के फैसलों को नही मान रहे हैं। जो अधिकारी न्यायिक जिम्मेदारी निभाता हुआ एक फैसला देता है वही अधिकारी प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाता हुआ अपने ही फैसले पर अमल करने से पीछे हट जाता है। ऐसे दर्जनों मामले सामने आ चुके है जिनसे यह अराजकता की स्थिति सामने आती है। नगर निगम शिमला किसी समय एक बहुत अमीर संस्था हुआ करती थी लेकिन आज अपना काम करने के लिये इसके पास पर्याप्त साधन नही है लेकिन विडम्बना यह है कि निगम जब अपने साधन सुधारने का प्रयास करती है तभी बीच के ही लोग इन प्रयासों को तारपीडो कर देते हैं।
निगम की आय का एक स्थायी साधन उसकी संपतियों से मिलने वाला किराया है। लेकिन यह किराया कई जगह कई दशकों से पुरानी ही दरों पर चल रहा है। इन संपत्तियों का किराया बढ़ाये जाने को लेकर प्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका  CWPIL 17 of 2015 में दायर हुई है। इस याचिका की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने किरायों की स्थिति का कड़ा संज्ञान लेते हुए निगम प्रशासन को इसे बढ़ाने के निर्देश दिये थे। इन निर्देशों के तहत निगम को इसके लिये एक योजना तैयार करनी थी। निगम प्रशासन ने जब इस दिशा मे कदम उठाये तो शहर के व्यापारियों ने इसको लेकर एतराज उठाये। पूरे शहरे में कोहराम मच गया। इसको लेकर राजनीति शुरू हो गयी। संयोगवश शहर के विधायक भाजपा से हैं और वह सरकार में मन्त्री हैं। स्वभाविक है कि प्रभावित लोगों ने उन पर दबाव डालना शुरू किया कि सरकार किराया बढौतरी के प्रयासों को रोके। लेकिन इसी दौरान नगर निगम के अतिरिक्त आयुक्त विधि का कथित आडियो वायरल हो गया। इसमें यह अधिकारी एक प्रभावित व्यापारी से बात करते हुए उसे इस किराया बढ़ौत्तरी को रोकने के लिये कुछ सुझाव देते हुए सुनायी देते हैं। यह आडियो यदि सही है तो यह एकदम निगम के हितों के खिलाफ है। यही नही बतौर विधि आयुक्त न्यायिक शक्तियों से संपन्न होने के कारण यह और भी अवांच्छित और आपराधिक हो जाता है। लेकिन यह सब तब तक नही हो सकता जब तक कि इस आडियो की प्रमाणिकता की निष्पक्ष जांच न हो जाये।
यह कथित आडियो सरकार में सारे संवद्ध अधिकारियों के संज्ञान में आ चुका है लेकिन इस पर अभी तक कोई जांच आदेशित नही हुई है। यदि यह आडियो फर्जी है तो इसको लेकर इस अधिकारी को संवद्ध लोगों के खिलाफ कारवाई करनी चाहिये थी क्योंकि उसकी छवि पर इससे प्रश्नचिन्ह लगे है। लेकिन इस अधिकारी की ओर से भी कोई कदम नही उठाया गया है।




























 

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