शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के चुनावों में कांग्रेस की ओर से उम्मीदवारो की कोई अधिकारिक सूची जारी नही की गयी है। जबकि भाजपा और माकपा ने वाकायदा अपने-अपने उम्मीदवारों की सूचियां जारी की है। उम्मीदवारों की अधिकारिक सूची जारी न करने को लेकर कांग्रेस का तर्क है कि जब पार्टी के चुनाव चिन्ह पर यह चुनाव लड़े ही नही जा रहे हैं तो फिर पार्टी की ओर से सूची क्यों जारी की जाये। पार्टी चिन्ह की स्थिति तो सारी पार्टियों के लिये एक बराबर है लेकिन अन्य किसी भी पार्टी ने कांगे्रस का अनुसरण नहीं किया है। कांग्रेस का तर्क पार्टी के अपने ही कार्यकर्ताओं के गले नही उतर रहा है क्योंकि एक वार्ड में कांग्रेस के ही एक से अधिक सदस्य चुनाव में उम्मीदवार हो सकते है। ऐसे में पार्टी की ओर से न तो इन चुनावोें के लिये उम्मीदवारों को कोई चुनाव सामग्री उपलब्ध करवाई जायेगी न ही कोई आर्थिक सहायता दी जायेगी। इसी कारण से इन चुनावों के लिये पार्टी कोई अपना ऐजैन्डा भी घोषित नहीं कर पायेगी। चुनावों में यदि भाजपा और माकपा की ओर से सरकार और संगठन से कोई सवाल पूछे जाते हैं या कोई आरोप लगाये जाते हैं तो उनका उम्मीदवारो की ओर से कोई अधिकारिक जवाब तक भी नही जा पायेगा। पार्टी का कोई भी नेता चुनाव प्रचार के लिये नही आ पायेगा क्योंकि संगठन की ओर से किसी की भी अधिकारिक जिम्मेदारी रहेगी ही नही। चुनाव जीतने के बाद यदि यह लोग कोई पासा बदल लेते हैं तो उन्हे पार्टी की ओर से रोकना या उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कारवाई कर पाना संभव नहीं होगा। अधिकारिक तौर पर निगम चुनावों में पार्टी एकदम लावारिस रहेगी।
शिमला नगर निगम के चुनाव राजनीतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं बल्कि इन चुनावों को एक तरह से विधानसभा के मिनी चुनाव माना जाता है। इन चुनावों के थोड़े समय बाद ही विधानसभा के चुनाव आने है। पार्टी वीरभद्र के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ कर पुनः सत्ता में वापसी के दावे कर रही है। वीरभद्र को सातवीं बार मुख्यमन्त्री बनाने के सपने संजोये जा रहे हैं लेकिन जो पार्टी राजधानी नगर की निगम के चुनाव सीधे लड़ने का साहस नही कर पायी है वह विधानसभा चुनावों में अपनी क्या एकजुटता दिखा पायेगी। मजे की बात तो यह है कि हाईकमान की ओर से प्रदेश का प्रभार संभाल रही महामन्त्री अंबिका सोनी भी इन चुनावों की राजनीतिक गंभीरता का आकलन नही कर सकी है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुक्खु और मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह जैसा अनुभवी राजनेता भी इस स्थिति का आकलन नहीं कर पाया है।
पार्टी की इस स्थिति के लिये आज मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और पार्टी अध्यक्ष सुक्खु के बीच जो छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है उसे जिम्मेदार माना जा रहा है। इन चुनावों में सरकार और संगठन के ऊपर सारा विपक्ष खुलकर हमला करेगा। सीधी चुनौती दी जायेगी कि जो पार्टी निगम चुनावों का सामना नही कर पायी है वह विधानसभा चुनावों में क्या मुंह लेकर उतरेगी। निगम चुनावों से इस तरह भागकर सुक्खु ने 18 विधायकों का समर्थन जुटा कर जो अपनी स्थिति को सुरक्षित किया था इस रणनीति से उस सुरक्षा पर नये सिरे से प्रश्नचिन्ह लगने की नौबत आ जायेगी। कांग्रेस के इस बिखराव और शीर्ष नेतृत्व की कलह से निश्चित रूप से पार्टी के कार्यकर्ताओं के मनोबल पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है। यदि इन निगम चुनावों के बाद पार्टी के इस फैसले की समीक्षा की जायेगी तो तय है कि शीर्ष नेतृत्व में से किसी एक की बलि चढ़ जायेगी क्योंकि निगम चुनावों की गंभीरता का आकलन करके ही भाजपा ने प्रधानमन्त्री मोदी की शिमला में रैली तक करवा दी, लेकिन कांग्रेस अधिकारिक रूप से चुनाव लड़ने का साहस ही नही जुटा पायी। ऐसे में बहुत संभव है कि कांग्रेस का प्रतिबद्ध वोटर इस स्थिति को देखकर माकपा को समर्थन देने का फैसला लेने पर मजबूर हो जाये, यदि ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस की इस भीतरी अराजकता का पूरा-पूरा लाभ भाजपा को मिल जायेगा।
18 विधायकों ने किया सुक्खु का समर्थन
शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह एक लम्बे अरसे से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ठाकुर सुखविन्दर सिंह सुक्खु को हटवाने का प्रयास करते आ रहे हैं। संगठन की कार्य प्रणाली से लेकर पदाधिकारियों तक वीरभद्र सिंह के निशाने पर रहते आ रहें है। कभी पिछले दिनों विधायक दल की विशेष बैठक में भी जहां विधायकों ने वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में विश्वास दिखाकर अगला विधानसभा चुनाव भी उन्ही के नेतृत्व में लड़ने का संकल्प लिया वहीं पर कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर
भी कुछ लोगों ने सवाल उठाये। इसके बाद जब जीएसटी विधेयक पारित करने के लिये विधानसभा का दो दिन के लिये विशेष सत्र बुलाया गया था तब भी विधायकों के हस्ताक्षर करवाये गये थे। इस बार भी मुख्यमन्त्री पर विश्वास के नाम पर ही यह हस्ताक्षर वाई सरकुलेेशन करवाये गये और 31 विधायकों ने हस्ताक्षर कर दिये।
लेकिन जब यह हस्ताक्षरित प्रस्ताव कांग्रेस हाईकमान के पास प्रभारी के माध्यम से पहुंचाया गया तब इसका मसौदा बदलकर यह प्रस्ताव सुक्खु को बदलने का मांगपत्र बन गया। इस तरह प्रस्ताव का मसौदा बदलने से फिर विधायकों में रोष फैल गया। यह रोष इतना बढ़ा कि एक बार भी कुछ विधायकों में समर्थन का प्रस्ताव तैयार कर दिया और इस प्रस्ताव पर 18 विधायको ने अपने हस्ताक्षर कर दिये। सूत्रों की माने तो इस प्रस्ताव में स्पष्ट कहा गया कि पहले प्रस्ताव की उन्हे सही जानकारी नही दी गयी थी। यदि सही जानाकरी होती तो वह ऐसे प्रस्ताव पर कतई हस्ताक्षर न करते। सुक्खु के समर्थन में 18 विधायकों के आ जाने से एक बार फिर वीरभद्र सिंह की रणनीति की करारी हार हुई है।
इस परिदृश्य में यह सवाल उभरना स्वाभाविक है कि वीरभद्र और उनके कुछ विश्वस्त लोग बार- बार सुक्खु को हटवाने क्यों प्रयास कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि वीरभद्र के इस कार्यकाल में विभिन्न निगमो/वार्डोे में जितनी राजनीतिक ताजपोशीयां हुई है उनके कारण करीब चालीस विधानसभा हल्कों में समानान्तर सत्ता केन्द्र बन गये हैं। इनमें ताजपोशीयां पाये सभी लोग आने वाला विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। यह भी सार्वजनिक हो चुका है कि ताजपोशीयां पाने वाले अधिकांश लोग विक्रमादित्य सिंह के समर्थन से इस मुकाम तक पहुंचे है। यह भी जगजाहिर है कि इन्ही लोगों ने वीरभद्र बिग्रेड का गठन किया था जिसे भंग करके अब एक एनजीओ की शक्ल दी गयी है। यह एनजीओ भी एक प्रकार से समानान्तर राजनीतिक मंच है। इसके लोग भी विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन इसी एनजीओ के अध्यक्ष ने कुल्लु में सूक्खु के खिलाफ मानहानि का मामला दायर कर रखा है। जिसका सीधा अर्थ है कि सुक्खु तो बतौर कांग्रेस अध्यक्ष टिकट के लिये ऐेसे लोगों के नाम का अनुमोदन करेगा नही। संभवतः इसी स्थिति को भांपते हुए विक्रमादित्य भी कई बार यह ब्यान दे चुके हैं कि केवल जीतने की संभावना रखने वालो को ही टिकट दिया जाना चाहिये लेकिन जीत की संभावना की क्या परिभाषा है इसका कोई खुलासा नही किया गया है। ऐसे में केवल व्यक्तिगत वफादारी ही इसकी कसौटी रह जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक वीरभद्र की रक्षा की मंशा से ही बार-बार सुक्खु को हटवाने का प्रयास करते आ रहे हैं। क्योंकि केवल पार्टी अध्यक्ष बनकर ही इन लोगों का टिकट के लिये अनुमोदन किया जा सकता है और यदि ऐसा न हो पाया तो संगठन में एक बड़ा विघटन भी शक्ल ले सकता है लेकिन इस समय वीरभद्र सिंह का यह सुक्खु विरोध ही सुक्खु की राजनीतिक ताकत बन गया है। क्योंकि वीरभद्र के विरोध का दम रखने वाला ही दूसरों की रक्षा कर पायेगा।
शिमला/शैल। नगर शिमला के चुनाव हो रहे हैं इसके लिये 16 जून को मतदान होगा। इस चुनाव में वामदल, भाजपा और कांग्रेस में त्रिकोणीय मुकाबला होने जा रहा है। यह सभी दल सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। चुनाव उम्मीदवारों की सूची जारी करने में वामदलों ने पहल करके अपने विरोधीयों को इस संद्धर्भ में तो निश्चित रूप से पीछे छोड़ दिया है। नगर निगम में जीत का सेहरा किसके सिर सजता है यह तो 17 जून को चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा लेकिन यह तय है कि इन चुनावों का असर विधानसभा चुनावों पर भी पडे़गा। अभी जब मतदाता सूचियों को लेकर विवाद खड़ा हुआ और राज्य चुनाव आयोग द्वारा इन सूचियों को संशोधित करने के आदेश जारी करने पडे़ तब चुनाव आयोग के इस कदम को भाजपा ने प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी तथा साथ ही राज्यपाल को एक आरोप पत्र भी सौंपा। इस आरोप पत्र में भाजपा ने वामदलों और प्रदेश की कांग्रेस सरकार को खूब घेरा है। अब उच्च न्यायालय के फैसले के बाद यह चुनाव घोषित हो गये है। ऐसे में भाजपा को अपने आरोप पत्र पर जांच और कारवाई करने की मांग का तो शायद ज्यादा समय नही है लेकिन अब अपने ही आरोप पत्र के मुद्दों पर कारवाई करने का भरोसा इसे शिमला की जनता को देना पडे़गा।
पानी शिमला शहर की सबसे बड़ी समस्या है जिसके चलते निगम प्रशासन पूरे शहर को हर रोज एक साथ पानी देने की स्थिति में कभी भी किसी भी सीजन में नहीं रहा है, बल्कि भाजपा शासन के दौरान भी शिमला को पानी लाने के प्रयास में एक बड़ी पाईप लाईन बिछाई थी जिसे आशियाना रेस्तरां के पास से रिज के टैंक से जोड़ा गया था। जिसमें कभी पानी आया ही नहीं। पानी के संद्धर्भ में कांग्रेस और भाजपा दोनों सरकारों की स्थिति एक जैसी ही रही है। पानी के बाद शहर की दूसरी बड़ी समस्या अवैध निमार्णों की है। शहर में 7000 से भी अधिक अवैध निर्माण है। हर सरकार में अवैध निर्माण होते रहे हैं। जिन्हें नियमित करने के लिये हर बार रिटैन्शन पाॅलिसीयां लायी जाती रही है। नौ बार ऐसा हो चुका है इस बार यह मामला प्रदेश उच्च न्यायालय में लंबित चल रहा है। शहर में फैले पीलिया को लेकर संवद्ध अधिकारियों के खिलाफ कारवाई किये जाने को लेकर भी आज तक मामला उच्च न्यायालय में लंबित चल रहा है। सरकार और निगम प्रशासन इन लोगों के खिलाफ अदालत से हटकर अपने स्तर पर विभागीय कारवाई को अंजाम दे सकते थे लेकिन ऐसा नहीं किया गया है। शहर मे सीवरेज के लिये भी एक समय बड़ा मास्टर प्लान तैयार किया गया था। आऊट सोर्स के नाम पर यह सर्वे एक दिल्ली की कंपनी से करवाया गया था, लेकिन यह सीवरेज प्लान आज तक अमली जामा नही ले पायी है। भाजपा ने निगम क्षेत्र मे हुए भ्रष्टाचार की जांच के लिये राज्यपाल को एक आरोप पत्र सौंप कर नगर की जनता का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है। ऐसे में उजागर किये गये इस भ्रष्टाचार पर सख्त कारवाई की वचनबद्धता क्या भाजपा शिमला की जनता को देगी या यह आरोप पत्र मात्र चुनावी प्रचार का मुद्दा होकर ही रह जायेगा इस पर शिमला की जनता की निगाहें लगी हुई है।
भाजपा ने एशियन विकास बैंक के ऋण से किये जा रहे शिमला के सौंदर्यीकरण पर भी गंभीर सवाल उठाये हैं। निश्चित रूप से सौन्दर्यीकरण के नाम पर इस 260 करोड़ के ऋण का आपराधिक दुरूपयोग हो रहा है। शहर के दोनो चर्चों की रिपेयर के लिये ही 24 करोड़ का अनुबन्ध किया गया है। इस अनुबन्ध का दस्तावेज शैल बहुत पहले ही अपने पाठकों के सामने रख चुका है। भाजपा ने अपने आरोप पत्र में भी इस मुद्दे को उजागर किया है। सौन्दर्यीकरण के इस काम के एक बड़े भाग को जो ठेकेदार अंजाम दे रहा है उसने पिछले दिनों जब प्रधानमन्त्री मोदी शिमला आये थे। भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। उसकी पत्नी ने भी जो कभी शिमला की मेयर रह चुकी है भाजपा की सदस्य बन गयी है। बहुत संभव है कि महिला के नाम पर वह शिमला से विधान सभा के लिये भाजपा की उम्मीदवार हों। इन लोगों के सहयोग से शिमला में सौन्दर्यीकरण के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचर को इन लोगों के माध्यम से और भी विस्तार से जनता के सामने ला सकती है। इस परिदृश्य में क्या भाजपा अपने इस आरोप पत्र पर कारवाई करने की वचनबद्धता शिमला की जनता को दे पायेगी या नही इस पर सबकी निगाहें लगी हुई है।
शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के चुनाव टल गये हैं क्योंकि राज्य चुनाव आयोग ने निगम क्षेत्र की मतदाता सूचियों पर आयी आपत्तियों के बाद इन्हे नये सिरे से संशोधित करके तैयार करने के निर्देश दिये है जिलाधीश शिमला को। मतदाता सूचियों के संशोधन की प्रक्रिया 23 जून तक चलेगी। मतदाता सूचियों पर माकपा, भाजपा और कांग्रेस तीनो दलों के अपने-अपने आरोप रहे हैं बल्कि इन्ही आरोपों को लेकर मामला प्रदेश उच्च न्यायालय तक भी पहुंच गया था। माकपा ने तो अपने ज्ञापन में चुनावों को दो माह आगे करने की भी मांग की थी। अब आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के संशोधन के आदेश से चुनावों के टलने पर भाजपा प्रदेश उच्च न्यायालय पहुंच गयी है। उच्च न्यायालय ने इस पर फैसला सुरक्षित रख दिया है।
अब यह फैसला सुरक्षित हो जाने के बाद भाजपा ने नगर निगम क्षेत्र के कुछ मुद्दों को लेकर राज्यपाल को एक आरोप पत्र सौंपा है। इस आरोप पत्र में कांग्रेस सरकार, कांग्रेस पार्टी और माकपा पर तीखा हमला बोला है। आरोप पत्र में लगाये आरोपों को माकपा ने सिरे से खारिज करते हुये इन्हे झूठ का पुलिन्दा कहा है। यह आरोप पत्र अपने में गंभीर है और इन्हे माकपा के नकारने से ही नज़रअन्दाज नही किया जा सकता। लेकिन इन आरोपों को लेकर भाजपा की अपनी नीयत और नीति पर भी सवाल खड़े हो जाते हैं। वर्तमान निगम हाऊस में पार्षदों का बहुमत भाजपा के पास है यदि महापौर और उप-महापौर के लिये सीधे चुनाव न हुए होते तो निगम पर भाजपा का कब्जा होता। भाजपा का पार्षदों में बहुमत होने के साथ ही स्थानीय विधायक भी निगम हाऊस के पदेन सदस्य हैं और वह भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं। लेकिन आज आरोप पत्र में जो आरोप लगाये गये हैं उन पर अब तक भाजपा की चुप्पी ही रही है।
यदि निगम के चुनाव न टलते तो स्वभाविक है कि यह आरोप पत्र भी न आता। आरोप पत्र न आता तो यह आरोप अपनी जगह वैसे ही खत्म हो जाते। क्योंकि उस समय तो चुनाव के मुताबिक काम किया जाता है। ऐसे में आज यह स्वभाविक प्रश्न उठता है कि इन आरोपों को लेकर भाजपा आज तक खामोश क्यों रही है? क्या इनमे भाजपा के भी कुछ लोगों के हित जुड़े हुए थे।
शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सुक्खविन्दर सिंह सुक्खु पर हर संभव मंच से लगातार निशाना साधते आ रहें हैं। जो स्थिति सरकार बनने के समय विभिन्न निगमो/बार्डो में हुई ताजपोशीयों को लेकर हुई थी ठीक वैसा ही अब हो रही है। संगठन द्वारा की जा रही हर नियुक्ति पर वीरभद्र की तीखी प्रतिक्रियाएं आती हैं। मुख्यमन्त्री
और संगठन के मुखिया के बीच इस तरह की सार्वजनिक निशाने बाजी से सरकार व संगठन की कार्यप्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पडना स्वभाविक है। निष्पक्ष विश्लेषकों की नजर में इस समय सरकार और संगठन में एक बराबर अराजकता का वतातवरण बना हुआ है। सरकार में जो करीब एक दर्जन लोग सीधे लाभार्थी हैं उनको छोड़कर प्राय हर आदमी सरकार से हताश है संगठन तो आम आदमी के लिये मायने ही नहीं रखता है।
इस परिदृश्य में इन दिनों यह सवाल आम चर्चा में है कि वीरभद्र ऐसा कर क्यों रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि वींरभद्र को जो राय उनके गिर्द बैठे अधिकारियों से मिल रही है वह उसके अनुसार कार्य कर रहे हैं । कुछ लोगों का मानना है कि वीरभद्र पर उनके नाम से बनाये गये एनजीओ के दवाब के कारण ऐसा हो रहा है। चुनाव इसी वर्ष के अन्त तक होने हैं यदि स्थितियां सामान्य रही तो। अन्यथा कुछ भी हो सकता है। ऐसे जो लोग एनजीओ के नाम पर वीरभद्र से जुड़े है उनकी भी इच्छा चुनाव लड़ने की होना स्वभाविक है। लेकिन एनजीओ के सक्रिय कार्यकर्ता होने से ही कांग्रेस के टिकट के लिये उनका दावा पुख्ता नही हो जाता। यदि यह लोग इस बार किसी भी कारण से चुनाव नहीं लड़ पाते हैं तो उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा का अन्त हो जायेगा। बल्कि सूत्रों की माने तो एनजीओ से जुडे़ एक दर्जन नेता तो हर हालत में यह चुनाव लडना चाहते हैं । उनकी यह इच्छा तभी पूरी होती है यदि कांग्रेस उन्हें टिकट दे और यह तभी संभव है यदि पार्टी अध्यक्ष वीरभद्र स्वयं हो जायें या उनका कोई विश्वस्त इस पद पर कब्जा कर पाये। यदि ऐसा नही हो पाता है तो यह एनजीओ ही वीरभद्र के लिये एक बडी समस्या बन जायेगा। क्योंकि एनजीओ के साथ जुडे लोगों को वीरभद्र से ज्यादा विक्रमादित्य का सहारा है। विक्रमादित्य भी चुनाव टिकटों के आंवटन को लेकर समय-समय पर जीतने की संभावना’’ की जो शर्त लगा देते हैं उसके पीछे यही धारणा मानी जा रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि यहखेल कब तक चलता रहेगा।
इस समय संगठन चुनावों की प्रक्रिया से गुजर रहा है। संगठन को यह अपने चुनाव चुनाव आयोग के फरमान के कारण करवाने पड़ रहे हैं। यदि राष्ट्रीय स्तर पर यह चुनाव तय समय सीमा के भीतर पूरे नहीं होते हैं तो पार्टी की मान्यता पर संकट आ जायेगा। ऐसे में इस समय वीरभद्र के लिये राजनीतिक विवशता बन गयी है कि या तो वह चुनावों के माध्यम से संगठन पर कब्जा करें या फिर चुनाव टालकर सुक्खु को हटवाने में सफल हो जायें। यदि किन्ही कारणों से यह सब संभव नही हो सका तो वीरभद्र का एनजीओ ही प्रदेश में पार्टी के विघटन का कारण बन जायेगा। पार्टी के सारे वरिष्ठ नेता वीरभद्र की इस नीयत और नीति पर नजर रखे हुए हैं। लेकिन यह भी सब जानते हैं कि चुनावों को वक्त पर पार्टी पर कब्जा करने के लिये वीरभद्र किसी भी हद तक जा सकते हैं जैसा कि उन्होने 2012 के चुनावों से पहले किया था। सुक्ख पर साधे जा रहे निशानों को इसी परिप्रेक्ष में देखा जा रहा है। वैसे इस समय सुक्खु वीरभद्र पर भरी पड़ते जा रहे हैं । माना जा रहा है कि हाईकमान भी वीरभद्र की नीयत और नीति से परिचित हो चुकी है। संभवतः इसी कारण से अंबिका सोनी अब हिमाचल का प्रभार छोड़ने का प्रयास कर रही है।