Saturday, 20 June 2026
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घातक हो सकता है प्रशासन के शीर्ष अधिकारियो में उभरा टकराव

शिमला/बलदेव शर्मा
1983 बैच के आई ए एस अधिकारी वी सी फारखा को प्रदेश का मुख्य सचिव बना दिये जाने पर उनसे वरिष्ठ 1982 के अधिकारियों में रोष पनपना और सरकार की कारवाई को अन्याय करार देना स्वभाविक हैं क्योंकि इन वरिष्ठ अधिकारियों को बड़ी पोस्ट के लिये न कवेल नजर अन्दाज ही किया गया बल्कि इन्हें अपने कनिष्ठ के अधीन ही काम करने के लिये बाध्य किया गया। मुख्य सचिव मुख्यमन्त्री का विश्वस्त ही होना चाहिए यह सही है लेकिन इसमे यह भी उतना ही आवश्यक है कि एक वरिष्ठ अधिकारी को अपने से कनिष्ठ के नियन्त्रण में काम करने की भी स्थिति न खड़ी कर दी जाये जिससे की उनके आत्म सम्मान को ठेस न पहुंचे। वैसे भी प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिये यह आवश्वयक भी है इससे पहले भी प्रदेश में मुख्य सचिव की तैनाती के मौके पर दो बार वरिष्ठो को नजरअन्दाज किया गया है। पहली बार रेणु साहनीधर और दूसरी बार ओपी यादव और सीपी सुजाया नजर अन्दाज हुए थे परन्तु उन्हे मुख्य सचिव के साथ ही उसके नियन्त्रण से बाहर भी कर दिया गया था और इसी कारण वह लोग अदालत तक नही गये थे। लेकिन इस बार ऐसा नही हुआ और मामला अदालत तक जा पहुंच है। अदालत ने इन अधिकारियों को अन्तरिम राहत देते हुए अपने कनिष्ठ के नियन्त्रण में काम करने की स्थिति से बाहर रखने के निर्देश देते हुए सरकार को पोस्टिंग देने के आदेश दिये थे। सरकार ने इन आदेशों पर अमल करते हुए इन्हे निर्देशित पोस्टिंग भी दे दी है। अभी इस मामले में सरकार ने विस्तृत जवाब दायर करना है और उसके बाद इसमें उठाये गये कानूनी और प्रशासनिक सवालों पर फैसला आयेगा। यह भी तय है कि फैसला आयेगा इसका प्रभाव दूरगामी होगा।
कैट में गयी इस याचिका में कहा गया है कि 31.5.2016 को फारखा को सिविल सर्विस बोर्ड की बैठक बुलाये बिना ही मुख्य सचिव बना दिया गया है। यह भी कहा गया है कि फारखा 4.3.2014 को स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिश के बिना ही मुख्य सचिव को वेतन मान दे दिया गया है। जबकि उस समय अतिरिक्त मुख्य सचिव के नियमित काडर के सदस्य नही थे और इस नाते मुख्य सचिव के चयन के दायरे में ही नही आते है। इसके लिये आई ए एस काडर रूल्ज 1954 और 1955 के रेगुलेशनज के प्रावधानों का हवाला दिया गया है। इसमें एक महत्वपूर्ण तथ्य यह दिया गया है। कि हिमाचल प्रदेश में एक मुख्य सचिव और एक अतिरिक्त मुख्यसचिव के पद काडर में स्वीकृत है और इनके समकक्ष दो ही पद अतिरिक्त मुख्यसचिव के एकक्ष काडर सृजित किये जा सकते है इस आश्य का आदेश 20.8.2007 का पारित हुआ है और इसके मुताबिक प्रदेश में चार ही अधिकारी उच्चतम वेतन मान के अधिकारी हैं लेकिन 26.5.2016 को कार्मिक विभाग ने मुख्यमन्त्री के सामने जो सूची रखी है इसमें 16 अधिकारियों को उच्चतम वेतनमान में दिखाया गया जबकि इनमें से केन्द्र की प्रति नियुक्ति में तैनात चार अधिकारी तो वास्तव में 67000-79000 के एच ए जी स्केल में हैं याचिका में रखे गये तथ्यों और तर्कोे से यह स्पष्ट हो जाता है कि जितने अधिकारियों को उच्चतम वेतन मान में रखा गया है। उन सबको मुख्य सचिव के चयन के दायरे में नही लाया जा सकता। इनके मुताबिक इस दायरे में केवल वरिष्ठतम चार ही अधिकारी आ सकते है।
प्रदेश सरकार ने इस याचिका में जो अन्तरिम जवाब दायर किया है उसमें कहा गया है कि 4.3.2014 के जिस आदेश को चुनौती दी गयी है। उसे एक वर्ष के भीतर ही चुनौती दी जा सकती थी अब नही। लेकिन यह नही कहा गया हैं कि 4.3.2014 को वह आदेश वैध था। इससे यह भी प्रमाणित हो जाता है। आगे चलकर अतिरिक्त मुख्य सचिवों के इतने पद सृजित करने में भी तय नियमों की अवेहलना हुई है। सरकार के अन्तरिम जवाब में यह भी कहा गया है कि दीपक सानन के जांच दर्ज होने और 19.5.2014 को उसकी सूचना प्रदेश सरकार को भी दिये जाने का भी जिक्र किया गया है सरकार ने चार्जशीट किया हुआ है। विनित चैधरी के खिलाफ 1.5.2014 को सीबीआई में प्रारम्भिक जांच दर्ज होने और 19.5.2014 का उसकी सूचना प्रदेश सरकार को दिये जाने का भी जिक्र किया गया है। इस जांच पर आगे क्या हुआ है। इस बारे में कुछ नही कहा गया है। लेकिन इस जांच को चैधरी के खिलाफ आधार बनाया गया है।
सरकार के अन्तरिम जबाव में उठाये गये इन सवालों का यह अधिकारी क्या जबाव देते है यह तो आने वाले समय में स्पष्ट हो पायेगा लेकिन याचिका में मुख्य सचिव के चयन के दायरे में केवल वरिष्टतम चार लोगों को ही रखने का जो पक्ष रखा गया है। उससे भविष्य के लिये एक लाईन तय हो जायेगी यह माना जा रहा हैं बहरहाल यह अंदेशा हैं कि प्रशासन के शीर्ष पर बैठे अधिकारियों में उभरा यह टकराव कंही व्यक्तिगत न हो जायेे।

बेटे को स्थापित करने के लिये वीरभद्र ने चला दांव शिमला ग्रामीण से घोषित की उम्मीदवारी

शिमला/बलदेव शर्मा
बेटा अक्सर बाप की विरासत संभालता है और हर बाप बेटे को स्थापित करने का हर संभव प्रयास करता है। यह एक ऐसा स्वीकृति सच है। जिसमें अपवाद की गुंजाईश बहुत कम रहती है। इसी परम्परा को निभाते हुए वीरभद्र ने पहले विक्रमादित्य को प्रदेश युवा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया और अब शिमला ग्रामीण से विधायकी का एलान कर दिया है। प्रदेश की जनता और प्रशासनिक हल्कों के लिये यह ऐलान अप्रत्याशित नही है। लेकिन राजनीतिक दलों के भीतर इस ऐलान से कई समीकरणों में कई बदलाव देखने को मिलेंगे। इस समय कांग्रेस के भीतर ही जी एस बालीे और अनिल शर्मा के बेटे विधायकी की दावेदारी जताने लायक हो चुके है। चर्चा तो यह भी है। कि विद्यास्टोक्स भी अपनी राजनीतिक अपनी बेटी को सांैपने की ईच्छा रखती है और पिछले दिनों केहर सिंह खाची के साथ हुए झगड़े की पृष्ठभूमि में भी यही ईच्छा रही है। बहुत संभव है कि वीरभद्र सिंह के इस ऐलान के बाद पार्टी के कई और नेता भी ऐसा करने का प्रयास करें। वीरभद्र के इस ऐलान पर किस तरह की प्रतिक्रियाए उभरती है यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा ।
अब जब वीरभद्र ने शिमला ग्रामीण अपने बेटे के लिये छोड़ दिया है तो यह सवाल उठना स्वभाविक है। कि वीरभद्र स्वयं कहां से चुनाव लडेंगे। मुख्यमन्त्री ने यह भी ऐलान किया है कि वो ऐसे चुनाव क्षेत्र से लडे़ंगे जंहा से कांग्रेस लगातार हारती आ रही है। इस हार के गणित में जिला शिमला में शिमला ;शहरीद्ध सोलन में अर्की और ऊना में कुटलैहड़ ऐसे चुनाव क्षेत्र है जहां से लगातार कांग्रेस हार रही है। स्मरणीय हैं कि पिछले दिनों जब सुक्खु और वीरभद्र का वाक्युद्ध फिर सार्वजनिक हुआ था तब अपरोक्ष में सुक्खु ने ही वीरभद्र को यह चुनौती दी थी कि उन्हे अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर जाकर प्रदेश के किसी अन्य भाग से चुनाव लड़ना चाहिये। इस परिदृश्य में सोलन का अर्की और ऊना का कुटलैहड ही सबसे पहले नजर में आते है। अर्की के कुनिहार में जब वीरभद्र के पिता स्व0 पदम सिंह के नाम पर जब कुनिहार पंचायत ने क्रिकेट स्टेडियम बनाने का प्रस्ताव रखा था उस समय ही राजनीतिक हल्कों में यह संदेश चला गया था कि आने वाले विधानसभा चुनावों में वीरभद्र परिवार की यहां पर नजर रहेगी। उस समय यह कयास लगाये जाने लगे थे कि शायद प्रतिभा सिंह यहां से उम्मीदवार बने। अर्की में वीरभद्र पूर्व मन्त्री स्व0 हरिदास के एक बेटे को अपने साथ गले लगाये हुए है तोे इसी के साथ यहीं से डिप्टी स्पीकर रहे स्व0 धर्मपाल के बेटे की भी पीठ थपथपाते रहे है। यहीं से पूर्व मन्त्री स्व हीरा सिंह पाल के बेटे डा अमरचन्द पाल भी वीरभद्र के विश्वस्तों में रहे है यह भी यहां से चुनाव लड़ना चाहते है। इनके अतिरिक्त पिछली बार यहां से संजय अवस्थीे को और उससे पहले प्रकाश करड़ यहां से उम्मीदवार रह चुके है लेकिन इस सब मे जिस कदर के आपसी मतभेद है उसी के कारण कांग्रेस यहां से हारती रही है। फिर स्व. हरिदास ठाकुर का एक बेटा इन्दर सिंह ठाकुर पहले प0 सुखराम और अब ठाकुर कौल सिंह का विश्वस्त है। यही सारे लोग यहां से पार्टी के स्थानीय नेता और प्रमुख कार्यकर्ता है। अब डा0 मस्त राम का नाम भी इस सूची में जुड गया है। इन सारे स्थानीय लोगों को आपस में ईनामदारी से इकट्ठे करने पर ही यहां से कांग्रेस की जीत सुनिश्चित की जा सकती है।
इसी तरह शिमला शहरी में भी वामपंथियों और भाजपा का अपने -अपने कट्टर वोट का एक तय आंकडा है जो कभी भी इधर उधर नही होता है। फिर अब शिमला (शहरी) में ढली से ऊपर के पहाड़ी वोट की तुलना में यहां पर ऊना के वोटर की संख्या अधिक है। शिमला (शहरी) में सूद समुदाय का भीे अपना खास प्रभाव है। शहर का अधिकांश बिजनेस समुदाय इसी सूद समुदाय से है। फिर शिमला अर्बन कांग्रेस कमेटी में वीरभद्र समर्थको और विरोधीयों में निश्चित तय मतभेद है। यहां से कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करने के लिये इन सब अलग-अलग वर्गो को एक सूत्रा में बांधकर रख पाना ही सबसे बड़ी चुनौती है फिर इस बार पहली बर्फबारी में जिस तरह से यहां पर सारी आवश्यक सेवायें चरमरा गयी थी उससे सरकार की कार्यप्रणाली और विकास के सारे दावों पर ऐसा प्रश्न चिन्ह लगा है। जिसका नुकसान चुनावों में होना तय है। बल्कि इसी गणित में यदि शिमला ग्रामीण को भी आंका जाये तो वहां भी स्थितियां बहुत सुखद नहीं है। शिमला ग्रामीण में किये गये सारे विकास कार्यों का जमीनी प्रभाव क्या और कितना रहा है। इसका खुलासा पिछले लोकसभा चुनावों में सामने आ चुका है। शिमला ग्रामीण में कांगे्रस संगठन पर जिन लोगों का कब्जा है उनका जनता से दूर-दूर तक कोई तालमेल नही हैं बल्कि यहां के कांग्रेस प्रधान का नाम तो भाजपा के आरोप पत्र में भी बडी सुर्खियों में दर्ज है।
ऐसे में माना जा रहा है कि वीरभद्र ने अभी से अपनेे बेटे और अपनी सांकेतिक उम्मीदवारी घोषित करके इन चुनाव क्षेत्रों में पूरे हालात को अपनेे नियन्त्रण रखने का दांव चला दिया है। अब यहां की कमान कौन संभालता है इस पर सबकी नजर रहेगी। क्योंकि एक समय तो दबी जुबान में यहां तक चर्चा उठ गयी थी कि शिमला ग्रामीण पर हर्षमहाजन की भी नजर है। क्योंकि हर्ष महाजन ने भी शिमला ग्रामीण में परोक्ष/अपरोक्ष में कई संपत्तियों पर निवेश किया हुआ है। अब चुनावों के दौरान इस तरह के कई खुलासे सामने आने की संभावनाएं है। इस सबका चुनावी गणित पर असर पडना स्वाभाविक हैं क्योंकि यही के प्रस्तावित क्रिकेट स्टेडियम के दो किलोमीटर के दायरे में कई बडे़ नौकरशाहों और राजनेताओ ने जमीनें खरीद रखी है। यह जमीन खरीद भी चुनावों में एक बडा मुद्दा बनना तय है। वीरभद्र और उनका बेटा इन चुनौतियों से कैसे निपटते है इस पर अभी से सबकी नजरें लग गयी है।

कांग्रेस के लिये घातक हो सकता है दूसरी राजधानी का दाॅव

शिमला/बलदेव शर्मा
धर्मशाला को प्रदेश की दूसरी राजधानी घोषित करने के वीरभद्र सिंह के फैसले से राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में ही नही वरनआम आदमी के बीच भी इस फैसले की व्यवहारिकता को लेकर प्रतिक्रियाओं और चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। क्योंकि यह फैसला चुनावी वर्ष में लिया गया है। यदि यही फैसला सत्ता संभालने के साथ 2013 में ही ले लिया जाता तो इसके परिणाम कुछ और होते। सरकारें और राजनीतिक दल सत्ता के लिये किस हद तक जा सकते हैं इससे आम आदमी पूरी तरह परिचित है। चुनावी वर्ष में लिये गये  फैसले ही नही वरन चुनाव को सामने  रखकर चुनाव घोषणा पत्र में किये गये वायदों पर कितना और कैसे अमल किया जाता है इसका उदाहरण बेरोजगारी भत्ते के रूप में सामने है। राजधानी बनाने और एक प्राईमरी स्कूल खोलने में दिन रात का अन्तर होता है। कांग्रेस सत्ता में है और वीरभद्र का पार्टी के अन्दर राजनीतिक कद उस बरगद की तरह है जिसके नीचे और कुछ नही उग पाता है। इसलिये कांग्रेस के अन्दर एक भी व्यक्ति से यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि वह ऐसे फैसलों के गुण दोष की समीक्षा राजनीतिक स्वार्थो से ऊपर उठकर कर सकें। शीर्ष प्रशासन में जोे लोग ऐसे  फैसलों के भागीदार रहे होंगे उनसे भी ऐसे अहम फैसले परद गुण दोष के आधार पर बेवाक राय की उम्मीद करना गलत होगा। क्योेंकि  उनकी दुनिया भी वीरभद्र से शुरू होकर हाॅलीलाज तक समाप्त हो जाती है। उनमें से अधिकांश तो सेवानिवृति के बाद वीरभद्र की कृपा से ही पदों पर बैठे हैं और कुछ को इसी कृपा के कारण समय से पूर्व  ही बड़ा फल मिल गया है। इसलिये जहां व्यक्तिगत लाभ की नीयत पर निष्पक्ष विवेक की बारीे आती है वहां अक्सर स्वार्थ का ही पलड़ा भारी रहता है। ऐसे में शीर्ष प्रशासन और कांग्रेस संगठन से प्रदेशहित में इस फैसले पर निष्पक्षता की उम्मीद करना सही नही होगा।
लेकिन इसी के साथ यह समझना भी बहुत आवश्यक है कि वीरभद्र ने यह फैसला लिया ही क्योंघ्आज वीरभद्र उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां दूसरी राजधानी बसाने और उसे व्यवहारिक तौर पर अमल में लाने जितना  राजनीतिक वक्त शायद उनके पास नही है। इससे इस फैसले की आने वाले समय में होने वाली निन्दा और स्तुति का उन पर कोई फर्क ही नही पडेगा। जो भी फर्क पडेगा वह केवल कांग्रेस और प्रदेश पर ही पडेगा जिससे वीरभद्र सिंह को व्यक्तिगत तौर पर कोई बडा सरोकार शायद नही रह गया है। फिर वीरभद्र सिंह इस समय सीबीआई ईडी और आयकर के जितने मामले झेल रहे है उनका अन्तिम फैसला जब भी आयेगा वह संभवतः उनके पक्ष में नही रहेगा यह माना जा रहा है। वीरभद्र छठी बार मुख्यमन्त्राी बन चुके हैं अब सातवीं बार वह बन पाते हैं या नही इससे ज्यादा महत्वपूर्णे उनके लिये यह हैं कि क्या उनके बाद उनकी राजनीतिक विरासत को उनका परिवार आगे बढ़ा पायेगा या नही। अपनी पत्नी को उन्हें सांसद तक बनवाया लेकिन वह राजनीति में स्थापित नहीं हो पायी। अब सब कुछ बेटे विक्रमादित्य पर टिका है।  प्रदेश युवा कांगे्रस का अध्यक्ष बनाकर उन्हेे ट्रनिंग दी जा रही है। पिछले कुछ अरसे से वीरभद्र उन्हें अपने साथ प्रदेश भर में घुमा रहे हैं। विक्रमादित्य भी राजनीति में आक्रामक होने की कला  सीख रहे हैं। पिछले कुछ अरसे में विधानसभा चुनावों के लिये टिकट आवंटन में अपनाये जाने वाले मानकों और उसमें हाईकमान की भूमिका को लेकर आये उनके वक्तव्य इसी ओर इंगित करते हैं। पार्टी के अन्दर विक्रमादित्य को कोई बड़ी चुनौती न मिले इसके लिये पहले वीरभद्र बिग्रेड और अब उसको पंजीकृत एनजीओ की शक्ल देना इस दिशा का एक बड़ा कदम है। अब इस एनजीओ की जो राज्य समिति घोषित की गयी है वह पूरी तरह एक समान्तर संगठन है। लेकिन संयोगवश विक्रमादित्य का नाम भी सीबीआई ईडी और आयकर में जुड़ता जा रहा है और वही वीरभद्र की सबसे बड़ी चिन्ता है।
सीबीआई ईडी प्रकरण में दिल्ली उच्च न्यायालय में फैसला रिजर्व चल रहा है और कभी भी घोषित हो सकता है। अगर इसमें राहत ना मिली जिसकी संभावना अधिक है तब पार्टी के अन्दर और बाहर पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल जायेगा। एक बड़ा मुद्दा चर्चा का विषय बन जायेगा। राजनीतिक दबाव बढ़ जायेगा। वीरभद्र इन सारी संभावनाओं के प्रति पूरी तरह सचेत हैं। ऐसी परिस्थितियों में उठने वाली प्रतिकूल राजनीतिक चर्चाओं का  रूख बदलने के लिये एक इससे भी बडे़ मुद्दे की आवश्यकता रहेगी। राजनीतिक पंडितो के मुताबिक वीरभद्र ने अचानक धर्मशाला को दूसरी राजधानी घोश्षित करके जन बहस के लियेे एक बड़ा मुद्दा इस तरह उछाला है इस मुद्दे पर विपक्ष भी बहुत सावधानी से अपनी प्रतिक्रिया देगा। कांग्रेस में हर आदमी वीरभद्र के सामने उनकी हां में हां मिलाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पायेगा। अन्यथा सभी जानते हैं कि प्रदेश की आर्थिक स्थिति इस तरह के फैसले की अनुमति नही देती है। धर्मशाला में एक केन्द्रिय विश्वविद्यालय के लिये जो सरकार जमीन उपलब्ध नही करवा पायी। वह राजधानी के लिये कहां से जमीन लायेगी। यह जमीन कब चिन्हित की जायेगी और कब इसके अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होगीघ् इस तरह के कार्यो के लिये वर्षो लग जाते हैं जिसका अर्थ है कि सरकार के इस कार्यकाल में यह सब हो पाना संभव नही होगा। इसके बाद इसके लिये धन का प्रावधान कहां से होगा यह सबसे बड़ा सवाल रहेगा। ऐसे में राजधानी की घोषणा का जो हथियार अपनाया गया है वह कांग्रेस को ही कितना काटता और विपक्ष को कितना यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।

कर्ज में डूबे प्रदेश की दस्तावेजों के आइने में प्रदेश की वित्तीय स्थिति

31 मार्च 2017 को 45000 करोड़ से ऊपर हो जायेगा प्रदेश का कर्जभार
 

शिमला/बलदेव शर्मा

वर्ष 2016-17 के बजट दस्तावेजों के मुताबिक 31 मार्च  2017 को प्रदेश का कर्जभार 45000 करोड़ से ऊपर पहुंच जायेगा यह तय है। वर्ष 2016 में मुख्यमन्त्री ने जितनी घोषणाएं कर रखी हैं यदि उन सबको अमली जामा पहनाया जाता है तो कर्जभार इतना अधिक हो जायेगा जो एफआरबीएम के प्रावधानों से आगे बढ़ जायेगा। भारत सरकार के सचिव राजस्व खर्च 2016 में ही प्रदेश सरकार को एक पत्र लिखकर इस बारे में सचेत कर चुकी है। वित्त विभाग के सूत्रों के मुताबिक सरकार इस समय कुछ खर्चे तो आपदा प्रबन्धन के नाम पर केन्द्र से मिलने वाली धनराशी में से कर रही है। अभी बर्फबारी के वक्त तो मुख्यमन्त्री ने 25 करोड़ जारी किये जाने के आदेश किये थे वह पैसा भी  आपदा प्रबन्धन में से ही लिया गया है। आज चैदहवें वित्तायोग के तहत जो सहायता सरकार को मिली है उससे सरकार का काम चल रहा है लेकिन जून 2017 तक वित्त विभाग एक बड़े वित्तिय संकट की संभावना मान रही है। पूर्व मुख्यमन्त्री  और नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल अभी हाल ही में घटते राजस्व पर चिन्ता व्यक्त कर चुके हंै। लेकिन सरकार ने इसके वाबजूद सीमेन्ट पर 50ः टैक्स घटा दिया है।
अब वीरभद्र ने धर्मशाला को दूसरी राजधानी घोषित करके प्रदेश पर और वित्तिय बोझ पड़ने का प्रबन्ध कर दिया है। धर्मशाला में जब विधानसभा भवन बना था उस समय उस पर करीब 30 करोड़ खर्च हुए थे। इस समय यदि अस्थायी तौर पर भी पूरे प्रशासन को तीन चार माह के लिये धर्मशाला श्फ्टि करना पडता है तो उस पर ही सैंकडो करोड़ खर्च हो जायेंगे। वीरभद्र की घोषणा को अमली शक्ल देने के लिये राजधानी बनाने बसाने पर हजारों करोड़ खर्च होेंगे। इस समय भारत सरकार के पत्र के मुताबिक सरकार को आगे कर्ज उठाना भी आसान नही होगा। वर्ष 2016-17 के बजट दस्तावेज के मुताबिक सरकार ने 2014-15 में 5201.74 करोड़, 2015-16 में 4787.40 और 2016-17 में 6083.75 करोड़ ऋण के माध्यम से जूटाने का प्रावधान बजट में रखा है। इस समय 2002- 03 में सरकार का जो कर्जभार  130209.47 करोड़ था वह 31 मार्च 2015 को 35151.60 करोड़ तक पहुंच  गया है। इसमें 2015-16 और 2016-17 का कर्ज जोड़कर यह 45000 करोड़ से ऊपर चला जाता है। बढते कर्ज की इस स्थिति को देखते हुए मुख्यमन्त्री की घोषणाओं को किस तरह लिया जाना चाहिये यह एक बडा सवाल बनकर खडा है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


बेरोजगारी भत्ते पर वीरभद्र का स्टैण्ड पार्टी के लिये राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा सवाल खड़ा कर सकता है

शिमला/बलदेव शर्मा
प्रदेश कांग्रेस ने 2012 के चुनावी घोषणा पत्र में बेरोजगार युवाओं से वायदा किया था कि सत्ता में आने पर वह उन्हें प्रतिमाह नियमित रूप से एक हजार रूपये का बेरोजगारी भत्ता प्रदान करेगी। इस वायदे से कार्यकाल के अन्तिम वर्ष में सरकार पलट गयी है। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह ने इस वायदे को अव्यवहारिक करार देते हुए इसे सिरे से खारिज कर दिया है। बेरोजगारी भत्ते के मुद्दे पर परिवहन मन्त्री जीएसबाली और मुख्यमन्त्री के बीच मन्त्रीमण्डल की बैठक में अच्छी खासी तकरार भी हो चुकी है। मन्त्रीमण्डल की इस बैठक के बाद मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और परिवहन मन्त्री जीएसबाली अलग-अलग प्रदेश कांग्रेस की प्रभारी अंबिका सोनी से भेंट भी कर चुके हैं। बल्कि इस भेंट के बाद वीरभद्र सिंह ने बेरोजगारी भत्ते की मांग का विरोध और भी मुखर कर दिया है। कांगड़ा के जसूर में एक जनसभा को सबोंधित करते हुए बेरोजगारी भत्ते की अवधारणा को ही न्याय संगत मानने से इन्कार कर दिया है। दूसरी ओर अभी पंजाब विधानसभा चुनावों के लिये पूर्व प्रधानमन्त्री डा0 मनमोहन सिंह के हाथों दिल्ली में जो घोषणा पत्र जारी किया गया है उसमें बेरोजगारी भत्ता एक बहुत बड़ा वायदा बन कर सामने आया है। पंजाब के लिये चुनाव घोषणा पत्र डा0 मनमोहन सिंह के हाथों जारी किया गया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इस घोषणा पत्र को कांग्रेस हाईकमान की स्वीकृति अवश्य रही होगी। क्योंकि कांग्रेस एक क्षेत्रीय संगठन नहीं बल्कि सबसे बड़ा राष्ट्रीय राजनीतिक दल है। डा0 मनमोहन सिंह लगातार दस वर्ष तक देश के प्रधानमन्त्री रह चुके हैं और एक जाने माने अर्थ शास्त्री भी हैं। फिर यह स्वाभाविक है कि कोई भी राष्ट्रीय राजनीतिक दल किसी भी प्रदेश के चुनावी घोषणा पत्र में कोई भी चुनावी वायदा करते हुए यह अवश्य सुनिश्चित करेगा कि इस वायदे का राष्ट्रीय स्तर पर क्या असर पडेगा। प्रदेश कांग्रेस ने जब 2012 के चुनावों में बेरोजगारी भत्ते का वायदा किया था उस समय भी इसे हाईकमान की स्वीकृति रही है। इस परिदृश्य में आज चुनावी वर्ष में इस वायदे से मुख्यमन्त्री का पलटना राजनीतिक हल्कों में चर्चा का मुद्दा बना हुआ है।
आज प्रदेश में प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक युवा बेरोजगारी की सुची में जुड़ रहे हैं। इन बेरोजगार युवाओं के लिये रोजगार के साधन उपलब्ध नहीं हैं। सरकार के वर्ष 2015 -16 के आर्थिक सर्वेक्षण में दर्ज आंकड़ो को यदि सही माना जाये तो वर्ष 2001 में रैगुलर सरकारी कर्मचारियों की संख्या 1,39,882 थी जो कि 2015 में 1,82,049 है। जिसका अर्थ है कि 15 वर्षो में केवल करीब 42 हजार को ही रैगुलर नौकरी मिल पायी है। आर्थिक सर्वेक्षण के आकंडो के मुताबिक 2001 में पार्ट टाईम कर्मचारी थे 9,794 जो कि 2015 में 6,312 रह गये। 2001 में वर्क चार्ज 3100 थे और 2010 से शुन्य चल रहे हैं। दैनिक वेतन भोगी 2001 में 46,455 थे और 2015 में इनकी संख्या 11,552 है। इन आंकडो से स्पष्ट हो जाता है कि 15 वर्षो में कितने लोगों को सरकार में कितना रोजगार मिल पाया है। इन आंकड़ो में कान्ट्रैक्ट एडहाॅक और वालंटियर के आंकडे शामिल नही है। यह आंकडे़ आर्थिक सर्वेक्षण में दर्ज हैं और विधानसभा के पटल पर रखे जा चुके हैं। इन इन आंकड़ो से स्पष्ट हो जाता है कि इन 15 वर्षो में जो भी सरकारें प्रदेश में रही हंै और उन्होने युवाओं को रोजगार देने के जो भी दावे किये हैं वास्तव में वह कितने सही रहे होगें।
इन आंकडो के आईने से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि रोजगार के क्षेत्रा में सरकारों की जो भी नियत और नीति रही है उसके निष्पक्ष आकलन तथा उसको बदलने की आवश्कता हैं क्योंकि आंकड़ो की इस हकीकत को ज्यादा देर तक छिपाकर रखना संभव नही होगा। क्योंकि जब से मतदान की आयु सीमा 18 वर्ष कर दी गई है तब से 18 से 35 वर्ष के आयुवर्ग के मतदाओं की संख्या सबसे अधिक हो गयी है। संभवतः इसी हकीकत को सामने रखकर युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने का वायदा किया जा रहा है। क्योंकि इस समय कौशल विकास प्रशिक्षण के नाम पर जो आंकडे़ सामने रखे जा रहे है यदि उन्हे सही भी मान लिया जाये तो भी इससे बेरोजगारी से निपटने के लिये कई दशक लग जायेंगे। ऐसे में चुनावी वर्ष में मुख्यमन्त्राी वीरभद्र सिंह का बेरोजगारी भत्ते पर लिया गया स्टैण्ड न केवल हिमाचल में ही पार्टी के लिये कठिनाई पैदा करेगा बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर देगा।

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