शिमला/शैल। पूर्व मन्त्री और पर्यटन विकास बोर्ड के उपाध्यक्ष रहे मेजर विजय सिंह मनकोटिया की पद से बर्खास्तगी के बाद वीरभद्र के खिलाफ उठे विरोध और विद्रोह के स्वरों की गूंज बढ़ती जा रही है। मनकोटिया की बर्खास्तगी के बाद सबसे पहले परिवहन मन्त्री जी.एस. बाली खुलकर उनके समर्थन में आ खड़े हुए। बाली के बाद छः विधायकों और कुछ जिलाध्यक्षों ने वीरभद्र और सरकार की कार्यप्रणाली पर असन्तोष व्यक्त करते हुए कांग्रेस हाईकमान को पत्र भेज दिया और इसकी एक प्रति वाकायदा पार्टी अध्यक्ष को भी थमा दी । पार्टी अध्यक्ष सुक्खु ने इस पत्र को रिकार्ड पर स्वीकारा है।
इस पत्र पर आयी वीरभद्र की प्रतिक्रियाएं भी इसे सत्यापित करती है। बल्कि अब बाली के जन्म दिन पर इक्कठे हुए विधायकों और मन्त्रीयो तथा अन्य नेताओं की इस उपस्थिति को मीडिया ने वीरभद्र विरोधीयों का शक्ति प्रर्दशन करार दिया है। स्वभाविक है कि मीडिया के इस आकलन को इन नेताओं की हरी झण्डी अवश्य रही होगी। फिर वीरभद्र इस सबसे कहीं न कहीं आहत अवश्य है।
इस परिदृश्य में यह सवाल उठता है कि वीरभद्र के खिलाफ मुखर हुए विद्रोह के यह स्वर कहां तक जायेंगें सूत्रों की माने तो हाईकमान ने भी इस सबको गंभीरता से लिया है और इसी कारण से प्रदेश के प्रभारीयों को बदला गया है। अब केन्द्र के यह प्रभारी विरोधीयो को लेकर क्या रिपोर्ट देते हैं और संगठन तथा सरकार में उभरे टकराव को कैसे शान्त करवाते हैं इसका पता तो आने वाले समय में ही लगेगा लेकिन इस समय भाजपा ने भी चुनावो के मद्देनजर सरकार को कानून और व्यवस्था के मुद्दे पर तो वीरभद्र को भ्रष्टाचार पर घेरने की रणनीति बनाई है। कानून और व्यवस्था के नाम पर अभी कुछ ही समय में प्रदेश के अगल-अलग हिस्सों से रेप और फिर हत्या के ही कई मामले सामने आ गये हैं। इन मुद्दों पर सरकार को घेरने के लिये भाजपा की संगठन के तौर पर पूरी तैयारी और क्षमता है। जबकि कांग्रेस में सरकार और संगठन दोनों के स्तर पर कहीं कुछ नजर ही नही आता है। अभी कोटखाई प्रकरण में ही सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ जिस तरह के आरोप प्रचारित हुए हैं उन पर किसी कोने से कोई काऊंटर नही आया है। जिसका अपरोक्ष में अर्थ आरोपों को स्वीकारना हो जाता है।
भ्रष्टाचार के मामले में अब तिलक राज शर्मा का एक और प्रकरण सरकार के नाम पर जुड़ गया है। पांच लाख की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े गये उद्योग विभाग के सयुंक्त निदेशक के खिलाफ सीबीआई मुख्यमन्त्री के ओएसडी रघुवंशी को भी सरकारी गवाह बनाकर पेश करेगी। क्योंकि इस मामलें की एफआईआर के मुताबिक तिलक राज शर्मा से यह पांच लाख रघुवंशी को जाना था। यह स्वयं तिलक राज की रिकार्डिंग में आ चुका है। इससे यह तो स्वतः ही प्रमाणित हो जाता है कि यह रिश्वत ली जा रही थी। अब रघुवंशी यही कहेगा कि उसने पांच लाख की कोई मांग नही की थी और न ही पहले कभी तिलक राज से ऐसे कोई पैसा लिया गया है। लेकिन इस सबसे यही प्रमाणित होगा कि उद्योग विभाग में रिश्वत ली जा रही थी। यही आरोप विपक्ष लगाता आया है। यह इस परिदृश्य में भ्रष्टाचार और कानून एवम् व्यवस्था के सवालों पर वीरभद्र के विरोधीयों को शान्त करना आसान नही होगा। सरकार और संगठन में उठा यह सवाल घातक होगा यह तय है । इस पर यदि यह विद्रोही अब शान्त होकर बैठ जाते है तो इनका भी नुकसान होना तय है क्योंकि तब जनता का इन पर विश्वास खत्म हो जायेगा।
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में आम आदमी पार्टी के आकार ले पाने को लेकर फिर सवाल उठने शुरू हो गये हैं और यह सवाल इसलिये उठ रहे हैं क्योंकि पार्टी की प्रदेश ईकाई के भंग कर दिये जाने के करीब एक साल बाद पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और प्रदेश के प्रभारी संजय सिंह ने पिछले सप्ताह शिमला में कार्यकर्ताओं के सम्मेलन को संबोधित करने के बाद आयोजित की गयी पत्रकार वार्ता में यह घोषणा की कि पार्टी प्रदेश में विधानसभा चुनाव लड़ सकती है। इस संबन्ध में रिपोर्ट तैयार करने के लिये एक सात सदस्यों की कमेटी गठित करने की भी जानकारी दी और यह भी दावा किया कि पन्द्रह दिन के भीतर पार्टी के प्रदेश संयोजक की भी घोषणा कर दी जायेगी। लेकिन अब सात सदस्यों की कमेटी के स्थान पर ग्यारह सदस्यों की कमेटी गठित की गयी है। पार्टी के प्रभारी संजय सिंह के शिमला से दिल्ली पहुंचते-पहुंचते ही कमेटी के सदस्यों की संख्या
7 से 11 हो गयी है। प्रदेश के 12 जिलें है और कमेटी में करीब आधे जिलों के ही सदस्य हैं इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जिन कारणों से प्रदेश ईकाई को एक वर्ष पहले भंग कर दिया गया था वह आज भी वैसे ही बने हुए हैं। क्योंकि अभी जो कार्यकर्ता सम्मेलन हुआ उसके मंच पर लगे वैनर को लेकर इन कार्यकर्ताओं में हाथा-पाई की नौबत तक आ गयी और बैनर को मंच से हटवा दिया गया। यह झगड़ा उन लोगों ने किया जो लम्बे अरसे से अपने को सोशल मीडिया पर प्रदेश का भावी मुख्यमन्त्री प्रचारित करते आ रहे हैं। इन्ही लोगों के कारण अब फिर नयी शुरूआत से पहले ही पार्टी के बनने से पहले ही उसके बिखरने के आसार सामने आ गये हैं। क्योंकि जो 11 सदस्य चुनावों को लेकर अपनी रिपोर्ट देंगे उनमें संभवतः एक भी सदस्य ऐसा नही हो जो यह दावा कर सके कि वह अमुक विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लडे़गा।
अभी जिस तरह कार्यकर्ता सम्मेलन में झगडा हुआ है और जो कमेटी सामने आयी है उससे यह तय है कि पार्टी को प्रदेश संयोजक तय करना आसान नही होगा। आप ने 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रदेश की चारों सीटों पर उम्मीदवार उतार कर शुरूआत की थी लेकिन चुनावों के दौरान भी संगठन का कोई स्वरूप नही बन पाया। चुनावों कें बाद स्थिति यह बनी कि जिन चार लोगों ने लोकसभा का चुनाव लड़ा था उनमें से दो ने तभी पार्टी से किनारा कर लिया। इसके बाद जो दो बचे उनमें से एक को संयोजक बनाया गया। उसने संगठन के लिये जो भी किया उसके कारण प्रदेश ईकाई को भंग करना पड़ा और आज वह संयोजक भापजा में घर वापसी का आवेदक है कभी भी इसकी घोषणा हो सकती है। निष्पक्ष विश्लेष्कों का मानना है कि आज पार्टी में कार्यकर्ताओं के नाम पर जो भी लोग बचे हैं उनमें से जमीन पर काम करने वाला शायद एक प्रतिशत भी पूरा न हो और बाकी सारे सोशल मीडिया के नेता हैं। आज यह सोशल मीडिया के हीरो पार्टी के सर्वेसर्वा बनना चाह रहे हैं लेकिन इनमें से एक भी चुनाव लड़ने की स्थिति में नही है।
आम आदमी पार्टी से देश की जनता को उम्मीद बंधी थी कि पार्टी कांग्रेस और भाजपा का एक कारगर विकल्प बन पायेगी। दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणामों से जनता उत्साहित हुई थी लेकिन उसके बाद जो कुछ दिल्ली में घटता गया और उसका प्रभाव परिणाम नगर निगम चुनावों में सामने आया उससे आम आदमी का विश्वास बुरी तरह टूटा है। उसके साथ ही पंजाब विधान सभा चुनावों में जिस तरह से प्रदेश नेतृत्व को लेकर विवाद उठा उसका परिणाम चुनावों में सामने आया है। बल्कि अभी भी पंजाब विधानसभा में ‘आप’ के विधायक दल के नेतृत्व को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है वह पुराने ही विवाद का प्रतिफल है। इसलिये आज ‘आप’ के केन्द्रिय नेतृत्व को हर प्रदेश की व्यहारिक स्थिति को सामने रखकर कदम उठाने होंगे। पार्टी को किन कारणों से यहां की ईकाई भंग करनी पड़ी कौन लोग उसके लिये कितने जिम्मेदार रहे है और आज उन सबकी स्थिति क्या है इसको लेकर जब तक केन्द्रिय नेतृत्व स्पष्ट नही हो जाता है तब तक किसी भी प्रयास का कोई परिणाम सकारात्मक नही रहेगा यह तय है।
इस समय विधान सभा चुनावों में हिस्सा लेना चुनाव आयोग के नियमों के कारण हो सकता है पार्टी की आवश्यकता हो क्योंकि राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता बनाये रखने के लिये यह अनिवार्य हो सकता है। परन्तु इसके लिये यदि एक बार फिर चयन करने में पार्टी से चूक हो जाती है तो उसका नुकसान न केवल पार्टी को ही होगा बल्कि प्रदेश को भी होगा। आज प्रदेश को कांग्रेस और भाजपा का विकल्प चाहिये क्योंकि प्रदेश गहरे आर्थिक और राजनीतिक संकट की ओर बढ़ता जा रहा है। लेकिन इसमें यह भी ध्यान रखना होगा कि यह दोनों बड़े दल आसानी से यह विकल्प नही बनने देंगे। इस समय पार्टी को प्रदेश में संठगन खड़ा करते समय यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका नेतृत्व इतना सशक्त होना चाहिए कि वह कांग्रेस और भाजपा के नेता और नीतियों पर एक साथ प्रहार कर सके। इसी के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रदेश को लेकर उसके अपने पास कितना कारगार रोड मैप है। आप की जो टीम अब तक सामने आयी है उस पर अभी आम आदमी का भरोसा नही बन पा रहा है। फिर ‘आप’ का केन्द्र में भाजपा से जो टकराव चल रहा है उसको भी ध्यान में रखकर चलना होगा। इसके लिये प्रदेश की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति की पूरी समीक्षा और उसके लिये कांग्रेस और भाजपा नेतृत्व कहां-कहां और कितना जिम्मेदार रहा है इसका पूरा लेखा जोखा हर समय तैयार रखना होगा।
शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और उनकी पत्नी तथा अन्य के खिलाफ ईडी में चल रहे मनीलाॅंड्रिंग मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस प्रकरण में वीरभद्र सिंह, प्रतिभा सिंह, चुन्नी लाल, विक्रमादित्य सिंह और पिचेश्वर गड्डे द्वारा दायर याचिकाओं को तीन जुलाई को सुनाये फैसले में अस्वीकार कर दिया है। इन लोगों ने ईडी की कारवाई को "Without jurisdiction and authority of law "कह कर चुनौती देते हुए इस संद्धर्भ में दर्ज मामले को निरस्त करने तथा ईडी की अब तक की कारवाई को रद्द करने का आग्रह किया था इन याचिकाओं को अस्वीकार करते हुए न्यायालय ने कहा है कि It is clear from the above discussion that the Prevention of Money-Laundering Act,
2002 is a complete Code which overrides thegeneral criminal law to the exrent of inconsistency. This law establishes its own enforcement machinery and other authorities with adjudicatory powers and jurisdiction. There is no requirement in law that an officer empowered by PMLA may not take up investigation of a PMLA offence or may not arrest any person as permitted by its provision without obtaining authorization from the court. Such inhibitions cannot be read into the law by the court.अदालत के इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि ईडी को इस संद्धर्भ में अगली कारवाई बढ़ाने के लिये किेसी तरह की कोई बंदिश नही है। स्मरणीय है कि इसी मामले में ईडी ने 23 मार्च 2016 को पहला अटैचमैन्ट आदेश जारी किया था जिसमें करीब आठ करोड़ की चल/ अचल संपत्ति अटैच की गयी थी। इस आदेश में यह साफ कहा गया था कि वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर के संद्धर्भ में अभी तक जांच जारी है। इस आदेश के बाद एलआईसी ऐजैन्ट आनन्द चैहान की गिरफ्तारी हुई थी। चैहान तब से लेकर आज तक हिरासत में चल रहा है। चैहान के खिलाफ चालान भी ट्रायल कोर्ट में दाखिल हो चुका है। अदालत ने इसका संज्ञान लेकर अगली सुनवाई भी शुरू कर दी है और अब इसमें चार सितम्बर तक अनुपूरक चालान दायर करने का समय दिया है। चैहान की हिरासत भी तब तक बढ़ा दी गयी है।
इस प्रकरण में ईडी ने 31.3.17 को दूसरा अटैचमैन्ट आदेश जारी करके विक्रमादित्य की कंपनी मैप्प्ल डैस्टीनेशन और ड्रीम बिल्ड द्वारा डेेरा मण्डी महरौली में एक पिचेश्वर गड्डे परिवार से खरीदे गये फार्म हाऊस को अटैच किया है, इसमें यह आरोप है कि इस फार्म हाऊस की खरीद में वक्कामुल्ला द्वारा वीरभद्र को दिये गये 2.4 करोड़ के ऋण में से ही 90 लाख रूपया वीरभद्र ने विक्रमादित्य को दिया है इस फार्म हाऊस की रजिस्ट्री 1.20 करोड़ की है और 90 लाख के बाद शेष बचा 30 लाख 15-15 लाख के दो चैकों के माध्यम से एक जय दुर्गा कंपनी द्वारा विक्रमादित्य को दिया गया है। इस प्रकरण में वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर, राम प्रकाश भाटिया, विनित मिश्रा और गड्डे परिवार की भूमिका विशेष रही है। फार्म हाऊस को लेकर जारी हुए अटैचमैन्ट आदेश के अनुसार वक्कामुल्ला 19.11.2011, 22.11.2011 और 25.11.2011 को 2 करोड़ विक्रमादित्य के खाते में जमा करवाता है। उसके बाद 10.1.2012 को विक्रमादित्य की कपंनी 1.50 करोड़ तारिणी और 50 लाख वक्कामुल्ला के खाते में जामा करवाते हैं। ईडी ने इस लेन देन पर अभी तक विक्रमादित्य से उनका पक्ष नहीं पूछा है। प्रतिभा सिंह ने इस पर ईडी को यही कहा है कि इसकी जानकारी विक्रमादित्य ही दे सकते है।
ऐसे में अब उच्च न्यायालय के फैसले के बाद ईडी इस मामले में सीधे चालान ही दायर करती है या इसमें फिर से सम्मन जारी करके इस प्रकरण में सामने आये लोगों से पूछताछ करती है या नही। इस अटैचमैन्ट आदेश के बाद किसी की गिरफ्तारी होती है या नही इस पर सबकी निगाहें लगी हुई है। यदि इस मामलें में सीधे चालान ही अदालत में जाता है (जो कि चार सितम्बर तक दायर करना ही होगा) तो इस प्रकरण का प्रदेश की राजनीति पर कांग्रेस के संद्धर्भ में कोई ज्यादा नकारात्मक प्रभाव नही पडे़गा क्योंकि उस स्थिति में कई वर्षों तक यह मामला अदालत में ही उलझा रहेगा।
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