शिमला/शैल। भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा के अध्यक्ष सांसद अनुराग ठाकुर की एचपीसीए को प्रदेश सरकार ने वर्ष 2002 में धर्मशाला में क्रिकेट स्टेडियम तथा 2009 में खिलाडीयों को आवासीय सुविधा तैयार करने के लिये विलेज काॅमन लैण्ड आवंटित की थी। उस आवंटन के बाद स्टेडियम का निमार्ण हुआ। फिर पैब्लियन के नाम से पांच सितारा आवासीय सुविधा का निमार्ण हुआ और 2012 में इस आवासीय निमार्ण के कर्मशियल यूज की अनुमति भी एचपीसीए को दे दी गयी। इसी बीच एचपीसीए ने अपने को सोसायटी से कंपनी में तबदील कर लिया।
एचपीसीए को दोनों मर्तबा जमीन सोसायटी के नाम पर लगभग मुफ्त में मिली थी। होटल दी पैब्लियन का कर्मशियल यूज भी सोसायटी के नाम पर मिला था। सहकारिता नियमों के मुताबिक सोसायटी के नाम पर सरकार से ली गयी सुविधाऐं कंपनी बनाये जाने से पहले सरकार को वापिस की जानी चाहिए थी जो कि नही हुई। यही नही सटेडियम के साथ ही राजकीय महाविद्यायल धर्मशाला का एक दो मंजिला आवासीय होस्टल था जो गिरा दिया गया है और उसकी जमीन पर एचपीसीए द्वारा नाजायज कब्जे का आरोप है। इस क्रिकेट ऐसोसियेशन को दी गयी जमीन पर सैंकडों पेड़ भी थे जिन्हें अवैध रूप से काट लिये जाने का भी आरोप है। एचपीसीए पर इस तरह की अवैधताओं के आरोपों को लेकर धर्मशाला की अदालत में सीआरपीसी की धारा 156;3द्ध के तहत मामला दर्ज कर जांच करने की गुहार भी लगायी गयी थी। जिसके परिणाम स्वरूप इस समय एचपीसीए के खिलाफ सोसायटी से कंपनी बनाये जाने काॅलिज के आवासीय परिसर को गिरा कर उस पर अवैध कब्जा करने तथा आवंटित जमीन पर से सैकड़ों पेड़ों को अवैध रूप से काटने के आरोपों को लेकर अलग अलग मामले 2013 से चल रहे हैं।
इन्ही आरोपों में से राजकीय काॅलिज धर्मशाला के आवासीय परिसर की भूमि पर एचपीसीए के कथित अवैध कब्जे की पुष्टि करने के लिये 3-10-13 को विजिलैन्स ने डीसी कांगडा को इस जमीन की डिमार्केशन करके रिपोर्ट सौपने का आग्रह किया। इस पर 14-11-13 को तहसीलदार धर्मशाला ने डिमार्केशन करके अपनी रिपोर्ट सौंप दी। जब तहसीलदार की रिपोर्ट विजिलैन्स में 16-11-13 को पहुंची तो उसमें कई खसरा नम्बरो में करीब 2100 वर्ग मीटर भूमि पर अवैध कब्जा होने का खुलासा था। इस पर एडीजीपी विजिलैन्स ने 20-2-14 को एससी धर्मशाला को पत्रा भेजकर इस अवैध को लेकर मामला दर्ज करके जांच करने का आग्रह किया जिस पर 8-4-14 को पुलिस थाना धर्मशाला में आईपीसी की धारा 441 और 447/34 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया। मामला दर्ज होने के बाद सीजेएम धर्मशाला में चालान पेश हुआ।
इस चालान पर अदालत ने 17-11-15 और 21-11-15 को इसमें नामजद अभियुक्तों अनुराग ठाकुर और विशाला मरवाहा को अदालत में तलबी के आदेश भेज दिये। इन आदेशों और इस सं(र्भ में दर्ज एफआईआर को रद्द किये जाने की गुहार प्रदेश उच्च न्यायालय में लगाई गयी जिसे स्वीकारते हुए जस्टिस राजीव शर्मा ने 2अगस्त को सुनाये फैसले में इसमें दर्ज एफआईआर, पेश हुए चालान तथा तलवी आदेशों को निरस्त कर दिया है।
उच्च न्यायालय ने पूरे मामले में तहसीलदार की डिमार्केशन रिपोर्ट और एफआईआर में लगायी गयी धाराओं 441 और 447 के प्रावधानों को अपने फैसले का आधार बनाया है। डिमार्केशन के लिये एक तय प्रक्रिया है जिसके तहत संद्धर्भित जमीन के साथ लगने वाली हर जमीन के मालिकों को इसमें तलव किया जाता है। उनका पक्ष और एतराज सुने जाते हैं । जिसके खिलाफ डिमार्केशन हो रही है और जो डिमार्केशन करवा रहा है सबका इसमें शामिल होना तथा सहमत होना अनविार्य है। यदि कोई नही आता है तो उसका अलग से उल्लेख किया जाता है। लेकिन इस डिमार्केशन में तहसीलदार ने किसी भी संवद्ध पक्ष को इसमें बुलाया ही नही। फिर जिन खसरा नम्बरों की उसने पैमाईस करके अवैध कब्जा निकाला बाद में अपने 161 के ब्यान में कहा कि सही खसरा नम्बर और हंै। रिपोर्ट मांगी जाती है तो उसमें किसी संव( पक्ष को बुलाने की अनिवार्यता नही हैं के साथ अवैध कब्जे को लेकर धारा 163 के तहत कारवाई करनी होती है। इसमें कब्जा होने का आरोप था लेकिन शिक्षा विभाग ने अपने तौर पर इसमें कोई कारवाई नही की पुलिस ने धारा 441/ 34 के तहत मामला दर्ज किया। अदालत के मुताबिक इन धाराओं के अपेक्षित मानदण्ड इसमें पूरे ही नही होते। जब यह मामला उच्च न्यायालय में पहुंचा तब अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह का इसमें जबाब आया है। अदालत का कहना है कि यह जबाब याचिका में उठाये गये बिन्दुओं से एकदम हटकर हैं। स्मरणीय है कि जब यह मामला उच्च न्यायालय में पहंुचा तब गृह और शिक्षा विभाग के सचिव की जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति पीसी धीमान के पास थी। लेकिन उन्होने उस समय भी इस मामले के सारे पक्षों की ओर ध्यान नही दिया जबकि जमीन शिक्षा विभाग की थी और मूल मामले मंे वह पहले ही अभियुक्त नामजद हैं।
जब इस मामले का चालान तैयार हुआ तब अभियोजन पक्ष ने भी इन बिन्दुओं की ओर ध्यान नही दिया। तहसीलदार ने डिमार्केशन के लिये तय प्रक्रिया पर अमल क्यों नही किया? स्टेडियम और होटल निमार्ण टीसीपी द्वारा स्वीकृत नक्शे के अनुसार हुआ कहा गया है। टीसीपी के संज्ञान में नाजायज कब्जे की बात क्यों नही आयी? जिस गुरमीत की प्राईवेट जमीन पर भी अवैध कब्जा होने का जिक्र तहसीलदार की रिपोर्ट में आया है। उसके ध्यान में यह तथ्य क्यों नही आया या वह इस पर खामोश क्यों बैठा रहा ।
तहसीलदार की रिपोर्ट में आया है कि एचपीसीए के स्टेडियम के लिये 49118.25 वर्गमीटर भूमि आवंटित हुई थी जबकि उसके कब्जे में केवल 45959.68 वर्गमीटर भूमि है तो फिर उसकी शेष आंवटित भूमि कंहा है। ऐसे बहुत सारे बिन्दु इस फैसले के बाद सामने आये हैं जो कि वीरभद्र प्रशासन की कार्य प्रणाली पर गंभीर सवाल खडे़ करते हैं।
शिमला/शैल। वीरभद्र मनीलॅाडंरिग प्रकरण में गिरफ्तार एल आई सी ऐजैन्ट आनन्द चौहान को फिर जमानत नही मिली है। वह आठ जुलाई से ईडी की हिरासत में हैं। शनिवार को विशेष अदालत में आनन्द चौहान की जमानत का विरोध करते हुए ऐजैन्सी के वकील एन के मत्ता ने विषेश अदालत को बताया कि मामले की जांच एक गभीर मोड पर है तथा इसमें कुछ और लोगों को पूछताछ के लिये बुलाया गया है। ऐसे में आनन्द चैहान को जमानत देना जांच को प्रभावित कर सकता है। जबकि आनन्द चौहान की वकील रिवेका जाहन ने अदालत से आग्रह किया कि सारा मामला दस्तावेजी प्रमाणों पर आधारित है और वह तो इसमें एक छोटी सी कडी है। विशेष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसमें 16 अगस्त की अगली तारीख तय कर दी है।
स्मरणीय है कि आनन्द चौहान ने बतौर एल आई सी ऐजैन्ट 2010 में वीरभद्र सिंह, प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य सिंह के नाम करीब छः करोड़ रूपये की पाॅलिसीयां बनाई। लेकिन इनके लिये जो प्रीमियम अदा हुआ उसकी अदायगी चौहान ने अपने खातों से की और इसके लिये इसी अवधि 2009-10 और 2011 में उनके खातांे में करोड़ांे का कैश जमा हुआ जिसे दिसम्बर 2011 में आयकर के सामने पेश होकर वीरभद्र के बागीचे की आय बताया तथा खुद को बागीचे का प्रबन्धक/ प्रबन्धक के तौर पर वीरभद्र के साथ 15-6-08 को हस्ताक्षरित एक एग्रीमैन्ट भी पेश कर दिया। आनन्द चौहान के इस स्टैण्ड के बाद मार्च 2012 में वीरभद्र ने पिछले तीन वर्षो की आयकर रिटर्नज संशोधित कर दी। आकर रिटर्नज संशोधित करने के साथ ही छः करोड के सेब की सेल का खाका तैयार किया गया जिसमें चुन्नी लाल का भी सहायोग लिया गया। लेकिन बागीचे से छः करोड का सेब तीन वर्षों में हो पाना किसी भी जांच में प्रमाणित नही हो पाया है। इसलिये अब आनन्द चौहान, वीरभद्र सिंह, प्रतिभा सिंह और अन्य को इस छः करोड का मूल स्त्रोत ऐजैन्सी को बताना है। इस मामले में ईडी कीरब आठ करोड़ की चल अचल संपति 23-3-16 को अटैच कर चुका है। विक्रमादित्य और अपराजिता को इसमें ईडी लाभार्थी करार दे चुका है।
इसी तरह वक्कामुल्ला चन्द्र शेखर से भी प्रतिभा सिंह ने अपने चुनाव शपथ पत्रा में अपने और वीरभद्र के नाम पर चार करोड़ का ब्याज मुक्त कर्ज लिया दिखाया है। इसी वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर से विक्रमामदित्य की कंपनी के नाम भी कर्ज लिया गया है। वक्कामुल्ला की एक कंपनी से प्रतिभा सिंह, अपराजिता और अमित पाल ने एक करोड़ के शेयर खरीदे हैं। इस तरह सेब बागीचे से छः और वक्कामुल्ला चन्द्र शेखर से परिवार के पास बारह करोड़ से अधिक पैसा आना वीरभद्र और प्रतिभा सिंह स्वयं स्वीकार चुके हैं और ईडी को आशंका है कि यह पैसा मनीलाॅडंरिग है जिसे वैध बनाने के लिये लोगों का सहयोग लिया गया है। इसलिये लाॅडरिंग में जितने लोगों का सहयोग रहा है उनसे पूछताछ होना स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त इस पैसे का मूल स्त्रोत क्या है और उसमें किसका क्या सहयोग रहा है इस संद्धर्भ में सीबीआई द्वारा पूछताछ की जानी है। सीबीआई के कस्टोडियल जांच के आग्रह को सर्वोच्च न्यायालय से भी एक प्रकार से हरी झण्डी मिल चुकी है। माना जा रहा है कि इस ट्रेल का हिस्सा बने कुछ लोगों की शीघ्र ही गिरफ्तारी हो सकती है और इसमें सीबीआई तथा ईडी दोनों ऐजैन्सीयां पूरे तालमेल से काम कर रही हैं। सूत्रो की माने तो केन्द्रिय मन्त्री के रूप में रहे वीरभद्र का सारा कार्यकाल लगभग जांच की आशंका में आ चुका है।
आय से अधिक संपति मामले में सीबीआई फिर पंहुची सर्वोच्च न्यायालय
शिमला/शैल। वीरभद्र सिंह के साथ आय से अधिक संपत्ति और मनीलाॅडंरिग मामलों में सहअभियुक्त बनी प्रतिभा सिंह ने दिल्ली उच्च न्यायालय से ईडी द्वारा संभावित गिरफ्तारी से बचने के लिये स्थायी राहत का आग्रह किया था। जिसे अदालत स्वीकार नहीं कर पायी है। उच्च न्यायालय ने प्रतिभा सिंह को ईडी की जांच में आठ अगस्त को शामिल होने के निर्देश देते हुए केवल इतनी राहत प्रदान की है कि उन्हें उस दिन गिरफ्तार न किया जाये। प्रतिभा सिंह के जांच में शामिल
होने के बाद ईडी इस संद्धर्भ में अदालत के सामने रिपोर्ट रखेगा जिसमें यह खुलासा रहेगा कि उन्होने जांच में कितना सहयोग दिया, भविष्य में सहयोग का कितना भरोसा दिया और रिपोर्ट में यह भी रहेगा कि ईडी प्रतिभा सिंह के सहयोग से कितना सन्तुष्ट है।
स्मरणीय है कि ईडी ने 27.10.2015 को मनीलाॅडरिंग का मामला दर्ज किया था और उसके बाद 21.3.2016 तक करीब आठ बार इस दंपत्ति को जांच में शामिल होने के नोटिस भेजे थे लेकिन यह लोग एक बार भी जांच में शामिल नही हुए जिसके बाद 23.3.2016 को ईडी ने करीब आठ करोड़ की संपत्ति के अटैचमैन्ट आदेश जारी कर दिये। अब 8 जुलाई को इसी मामले में सह अभियुक्त बने चुन्नी लाल और आनन्द चैहान को सीबीआई तथा ईडी ने हिरासत में ले लिया। आनन्द चैहान अभी तक ईडी की हिरासत में है और उसे जमानत नही मिली है। चुन्नी लाल से सीबीआई ने पूछताछ की है और सूत्रों के मुताबिक सीबीआई ने उसके धारा 164 के तहत ब्यान करवा कर उसे सरकारी गवाह बना दिया है। वीरभद्र सीबीआई की जांच एक बार शामिल हो चके हैं लेकिन इस शामिल होने से सीबीआई ज्यादा सन्तुष्ट नही रही है और उसने वीरभद्र के खिलाफ असहयोग का आरोप लगाते हुए उनकी कस्टोडियल पूछताछ का आग्रह अदालत से किया था। उच्च न्यायालय ने यह मामला 23.8.2016 के लिये रखा है और सीबीआई को अभी तक कस्टोडियल जांच की अनुमति नही दी है। सूत्रों के मुताबिक सीबीआई अब इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गयी है।
सीबीआई ने 21.9.2015 को आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया था लेकिन अब यह मामला मनीलाॅडरिंग का भी बन गया है। कोई मामला मनीलाॅंडरिग के दायरे में तब आता है जब ऐसी आय से संपत्ति अर्जित की जाये जो कि वास्तव हुई ही न हो। वीरभद्र और प्रतिभा के मामले में भी 6 करोड़ की आय सेब के बागीचे से रिकार्ड पर दिखा दी गयी है जो कि आयकर से लेकर ईडी की जांच तक में बागीचे से होना प्रमाणित नही हो पायी है। ईडी के मुताबिक वीरभद्र, प्रतिभा ंिसंह के पास अपना ही काला धन था जिसे जायज बनाने के लिये आनन्द चैहान और चुन्नी लाल का सहारा लिया गया। क्यांेकि चुन्नी लाल के माध्यम से आनन्द चैहान ने छः करोड़ का सेब कब कैसे और किसे बेचा यह प्रमाणित नहीं हो पाया है। जबकि पैसा प्रतिभा सिंह के दिल्ली के एस बी आई बैंक खाते में जमा हुआ और फिर उससे ग्रेटर कैलाश में प्रतिभा सिंह के नाम पर 4,47,20,000 में पांच सौ गज का मकान खरीदा गया। इसमें यदि बागीचे से छः करोड़ की आय प्रमाणित न हो पायी तो यह मामला गंभीर होगा।
इसी तरह अपने चुनावी शपथ पत्र में प्रतिभा सिंह ने वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर से करीब 6.5 करोड़ का कर्ज परिवार के सदस्यों के नाम पर लिया दिखाया है। यह कर्ज बिना ब्याज और बिना जमानत के है। इस कर्ज के बाद ही महरोली में फार्म हाऊस की खरीद हुई है। वक्कामुल्ला चन्द्र शेखर से लिया गया यह कर्ज भी जांच के दायरे में है। ईडी ने 23.3.2016 के अपने अटैचमैन्ट आर्डर में साफ लिखा है कि वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर को लेकर जांच चल रही है। सूत्रों के मुताबिक अब यह जांच पूरी हो चुकी है और संभवतः प्रतिभा सिंह से इस संद्धर्भ में भी पूछताछ होगी। सूत्रों के मुताबिक जांच ऐजैन्सीयों को वक्कामुल्ला के पास भी आय के कोई बड़े स्त्रोत नही मिले हैं। जिनके आधार पर वह इतना बड़ा ब्याज मुक्त कर्ज दे पाता। वक्कामुल्ला के पास भी यदि इतनी बड़ी आय के वैध स्त्रोत न मिले तो यह लेन देन भी मनीलाॅडरिंग माना जायेगा। इस लेन देन के लाभार्थीयों में वीरभद्र परिवार के सदस्यों के साथ ही ओएसडी अमित पाल सिंह भी शामिल हैं।
इस तरह से वक्कामुल्ला से हुए लेन देन की केन्द्रिय भूमिका में प्रतिभा सिंह आती है। इसलिये इस लोन की प्रमाणिकता को लेकर पहली पूछताछ प्रतिभा सिंह से होनी है क्योंकि जो पावर प्रोजेैक्ट वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर ने हिमाचल सरकार से लिया था उसमें वह डिफालटर रहे हंै। यह भी चर्चा है कि इसी वक्कामुल्ला के साथ इस परिवार के कुछ सदस्यों की कुछ मिनी हाईडल प्रोजैक्टस में भी हिस्सेदारी है। स्मरणीय है कि ईडी ने मामला दर्ज करने के बाद देश के कुछ स्थानों पर इस मामले में छापामारी की थी। इस छापामारी के सूत्र क्या रहेे हंै और छापामारी में किससे क्या हाथ लगा है इसको लेकर भी सवाल पूछे जाने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक जो अधिकारी प्रतिभा सिंह को उनके राजनीतिक कार्य निपटाने में सहयोग करते थे वह भी ऐजैन्सी के राडार पर चल रहे हैं और उनसे भी किसी स्टेज पर पूछताछ की जा सकती है।
अब केन्द्रिय मन्त्री मण्डल में हुए फेरबदल में स्टील मन्त्रालय की जिम्मेदारी चैधरी विरेन्द्र सिंह को मिली है। चैधरी विरेन्द्र ंिसंह जब कांग्रेस में थे तब वह हिमाचल के प्रभारी थे। लेकिन प्रभारी के नाते उनके रिश्ते वीरभद्र सिंह से बहुत अच्छे नही रहे यह सब जानते हैं। विरेन्द्र सिंह ने जब कांग्रेस छोड़ी थी तब वीरभद्र सिंह ने ही उनके खिलाफ सबसे ज्यादा कटु प्रतिक्रिया दी थी। अब सीबीआई ने जो सर्वोच्च न्यायालय में फिर से दस्तक दी है उसे भी इसी परिदृश्य में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि वीरभद्र के स्टील मन्त्री के कार्यकाल में वर्ष 2011 में सेल के आधुनिकीकरण के लिये 10,883 करोड़ और आरआईएनएल के लिये खर्च किये गये 12,228 करोड़ भी सीबीआई की जांच के दायरे में चले रहे हैं। इस आधुनिकीकरण के तहत सरकारी और निजि क्षेत्र में 64 रिसर्च प्रोजैक्टस शुरू किये गये थे जिन पर 2010 मे 442 करोड़ खर्च किये गये थे। इसी आधुनिकीकरण के तहत ही एक स्क्रैब सबकमेटी गठित की गयी थी। इस कमेटी द्वारा किये गये कार्यो पर भी जांच की संभावना है। Sail द्वारा पीआरपी के तहत 2011 में कुछ अधिकारियों को की गयी 232 करोड़ की पेमैन्ट को लेकर तो कैग ने भी अपनी रिपोर्ट में कड़ी टिप्पणीयां की हुई हैं। माना जा रहा है कि कैग की टिप्पणीयांें को आधार बनाकर सीबीआई स्टील मन्त्रालय को लेकर एक बड़ी जांच को भी अंजाम दे सकता है। इस परिदृश्य में आने वाले दिनों में आय से अधिक संपत्ति और मनीलाॅडरिंग के मामले वीरभद्र परिवार पर और भारी पड़ सकते हैं यदि वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर और बागीचे की आय प्रमाणित न हो पायी तो।
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