आर्थिक संकट का बहाना या शासन की विफलता? साढ़े तीन साल बाद सुक्खू सरकार पर उठने लगे सवाल
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Created on Thursday, 25 June 2026 12:23
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Written by Shail Samachar
शिमला/शैल। जब दिसम्बर 2022 में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सत्ता संभली थी, तब से लेकर आज तक उनकी सरकार का सबसे बड़ा राजनीतिक तर्क प्रदेश की खराब आर्थिक स्थिति रहा है। हर बड़े फैसले, हर वित्तीय कटौती और हर अधूरे वादे के पीछे सरकार ने खजाना खाली होने का हवाला दिया। मुख्यमंत्री कई बार सार्वजनिक मंचों से यह तक कह चुके हैं कि हिमाचल की आर्थिक स्थिति कभी भी श्रीलंका जैसी हो सकती है। लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि स्थिति इतनी ही गंभीर थी तो साढ़े तीन साल के कार्यकाल में सरकार ने उसे सुधारने के लिए क्या ठोस परिणाम दिए?
साढ़े तीन सालो में आर्थिक संकट की आड़ में प्रदेश की जनता पर लगातार बोझ डाला गया है। पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ी, बिजली-पानी महंगे हुए, विभिन्न सरकारी सेवाओं पर शुल्क बढ़े जिससे आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त भार पड़ा है। सरकार ने इसे वित्तीय सुधारों की मजबूरी बताया, लेकिन जनता के सामने यह सवाल आज भी कायम है कि इन फैसलों से प्रदेश की आर्थिक सेहत में आखिर कितना सुधार हुआ है।
कांग्रेस चुनाव से पहले जिन गारंटियों और वादों को लेकर सत्ता में आई थी, वे भी अब सरकार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक बोझ बनते दिखाई दे रहे हैं। रोजगार, आर्थिक सहायता और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के बड़े दावे किए गए थे, लेकिन अधिकांश वादे अभी भी अधूरे हैं। यही कारण है कि सरकार लगातार अपने बचाव में दिखाई देती है, जबकि जनता परिणामों की प्रतीक्षा कर रही है।
हाल ही में नगर निकाय और पंचायत चुनावों के परिणामों ने भी राजनीतिक संकेत दिए हैं। कांग्रेस भले इन चुनावों को स्थानीय मुद्दों से जोड़कर देख रही हो, लेकिन यह सरकार के खिलाफ बढ़ती नाराजगी का संकेत तो नही है? चुनावी नतीजों ने इतना जरूर स्पष्ट किया है कि सरकार के सामने जनविश्वास बनाए रखने की चुनौती पहले से कहीं अधिक बड़ गयी है।
सबसे बड़ा विरोधाभास हाल ही में सामने आया जब सरकार ने कुछ समय पहले वित्तीय संकट का हवाला देकर विधायकों के वेतन और भत्तों में कटौती की, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उन्हें फिर बहाल करने की घोषणा कर दी। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर तीन महीने के भीतर ऐसा कौन सा आर्थिक चमत्कार हुआ जिसने सरकार का रुख बदल दिया? क्या प्रदेश की वित्तीय स्थिति अचानक सुधर गई या फिर इसके पीछे राजनीतिक समीकरण अधिक प्रभावी थे?
कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भी सरकार दबाव में दिखाई दे रही है। शिमला में एक महिला की गोली मारकर हत्या की घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। घटना से पहले महिला द्वारा सोशल मीडिया पर सुरक्षा की गुहार लगाए जाने के दावे सामने आए। यदि ये दावे सही हैं तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता और कानून-व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
पर्यटन प्रदेश की अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता है, लेकिन हाल के महीनों में पर्यटकों से जुड़े विवादों और आपराधिक घटनाओं के वीडियो लगातार सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं। इन घटनाओं ने हिमाचल की शांत और सुरक्षित पर्यटन स्थल वाली छवि को प्रभावित किया है। सरकार के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए कि प्रदेश की पहचान और अर्थव्यवस्था दोनों पर इसका असर पड़ सकता है।
राजनीतिक स्तर पर भी कांग्रेस पूरी तरह सहज नहीं दिख रही। मंत्रियों, विधायकों और संगठन के नेताओं के बीच समय-समय पर सामने आने वाली नाराजगी ने यह संदेश दिया है कि सत्ता और संगठन के बीच सब कुछ सामान्य नहीं है।
मुख्यमंत्री सुक्खू के सामने अब चुनौती केवल विपक्ष का मुकाबला करने की नहीं है, बल्कि अपने ही दावों को साबित करने की है। सरकार का आधे से अधिक कार्यकाल पूरा हो चुका है। ऐसे में जनता अब आर्थिक संकट की कहानी नहीं, बल्कि आर्थिक सुधार का परिणाम देखना चाहती है। रोजगार कहां है, निवेश कहां है, कानून-व्यवस्था में सुधार कहां है और चुनावी वादों की वास्तविक स्थिति क्या है इन सवालों के जवाब आने वाले समय में सरकार की राजनीतिक दिशा तय करेंगे।
फिलहाल इतना तय है कि हिमाचल की राजनीति में अब बहस इस बात पर नहीं है कि प्रदेश आर्थिक संकट में था या नहीं, बल्कि इस बात पर है कि साढ़े तीन साल बाद भी क्या सरकार उस संकट से बाहर निकलने का कोई भरोसेमंद रास्ता दिखा पायी है। यही सवाल आने वाले समय में मुख्यमंत्री सुक्खू और उनकी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा बनने वाला है
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