वन महोत्सव हर वर्ष आता है और इसके साथ बड़े स्तर पर पौधरोपण अभियान चलाए जाते हैं। सरकारी विभाग, स्कूल-कॉलेज, पंचायतें, सामाजिक संस्थाएं और आम लोग इसमें भाग लेते हैं। पौधे लगाए जाते हैं, जागरूकता कार्यक्रम होते हैं और सरकारें बड़ी संख्या में पौधे लगाने के आंकड़े जारी करती हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि इन पौधों में से कितने पौधे एक, दो या पांच साल बाद भी जीवित रहते हैं? वन महोत्सव की सफलता पौधे लगाने की संख्या से नहीं, बल्कि उनके पेड़ बनने से तय होनी चाहिए।
आज जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। जिससे बादल फटने, बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे समय में जंगलों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए जंगलों की रक्षा को आपदा प्रबंधन की नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई बार पौधरोपण को केवल आंकड़ों की सफलता मान लिया जाता है। एक दिन में हजारों पौधे लगा देना आसान है, लेकिन उन्हें कई वर्षों तक बचाना कठिन काम है। पौधों को पानी चाहिए, सुरक्षा चाहिए और नियमित देखभाल चाहिए। कई स्थानों पर पौधे लगाने के बाद उनकी निगरानी नहीं होती। कुछ पौधे गर्मी में सूख जाते हैं, कुछ पशुओं से नष्ट हो जाते हैं और कुछ बारिश या भूस्खलन में बह जाते हैं। ऐसे में केवल पौधरोपण के आंकड़े पर्यावरण संरक्षण की वास्तविक तस्वीर नहीं बताते।
सरकार को अब पौधे लगाने के साथ उनके संरक्षण की जिम्मेदारी भी तय करनी चाहिए। यदि किसी विभाग ने एक हजार पौधे लगाए हैं तो अगले तीन से पांच वर्षों तक यह रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए कि उनमें से कितने जीवित हैं। पौधों की देखभाल करने वाले कर्मचारियों या संस्थाओं की जिम्मेदारी तय हो। हर वर्ष केवल नए पौधे लगाने के बजाय पुराने पौधों की स्थिति की समीक्षा भी हो। इससे सरकारी योजनाओं की वास्तविक सफलता सामने आएगी।
हिमाचल में पौधरोपण के दौरान स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता देना भी जरूरी है। पौधरोपण की योजना वैज्ञानिक आधार पर तैयार होनी चाहिए, केवल लक्ष्य पूरा करने के लिए नहीं। वन संरक्षण में स्थानीय लोगों की भागीदारी भी जरूरी है। पंचायतों, महिला मंडलों, युवक मंडलों और स्कूलों को पौधों की देखभाल से जोड़ा जा सकता है। स्कूलों में वन महोत्सव को एक दिन के कार्यक्रम तक सीमित करने के बजाय पूरे साल की गतिविधि बनाया जा सकता है। प्रत्येक छात्र या समूह को पौधे की जिम्मेदारी दी जाए और उसके विकास का रिकॉर्ड रखा जाए। इससे बच्चों में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना पैदा होगी। आने वाली पीढ़ी को यह समझना होगा कि पेड़ केवल पर्यावरण को सुंदर बनाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी हैं।
वन महोत्सव का अर्थ केवल पौधे लगाना नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ जंगलों को बचाना, जलस्रोतों को सुरक्षित रखना और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर पर्यावरण तैयार करना होना चाहिए। विकास के नाम पर जंगलों पर बढ़ते दबाव के बीच यह संतुलन बनाना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। सड़क, पर्यटन और अन्य विकास कार्य जरूरी हैं, लेकिन इनके कारण पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने की ठोस व्यवस्था भी होनी चाहिए।
वन महोत्सव वास्तव में तभी सफल होगा जब यह एक दिन के कार्यक्रम से निकलकर पूरे वर्ष की जिम्मेदारी बने। हर साल पौधे लगाने की संख्या बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है कि पहले लगाए गए पौधों को बचाया जाए। एक पौधा लगाना आसान है, लेकिन उसे पेड़ बनाना कठिन है।
इसलिए अब वन महोत्सव का लक्ष्य केवल ‘कितने पौधे लगाए गए’ नहीं, बल्कि ‘कितने पौधे बचाए गए और कितने पेड़ बने’ होना चाहिए। पेड़ आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी, हवा और सुरक्षित पर्यावरण की गारंटी हैं। यदि आज जंगल सुरक्षित रहेंगे तभी कल पहाड़, जलस्रोत और मानव जीवन सुरक्षित रह पाएंगे। यही वन महोत्सव की वास्तविक भावना और सबसे बड़ी जरूरत है।