Tuesday, 04 August 2026
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संसद के घेराव ने खड़े किए लोकतंत्र पर बड़े सवाल

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संसद है। यही वह मंच है, जहां सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है और विपक्ष जनता की आवाज उठाता है। लेकिन जब संसद के बाहर हजारों लोग अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हों और संसद के भीतर लगातार हंगामे के कारण कार्यवाही ही न चल पाये, तो यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं रहती। यह लोकतंत्र के सामने खड़े उस संकट की ओर इशारा करती है, जहां संवाद की जगह टकराव लेता जा रहा है।
मानसून सत्र के पहले ही दिन संसद के बाहर बड़ी संख्या में छात्र, युवा और विभिन्न संगठनों के लोग अपनी मांगों को लेकर पहुंचे। उनका कहना था कि शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और अन्य जनहित के मुद्दों पर सरकार को जवाब देना चाहिए। सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए दिल्ली पुलिस ने संसद की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेड लगाए और प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। कई जगह धक्का-मुक्की हुई, लोगों को हिरासत में लिया गया और पूरे इलाके को छावनी में बदल दिया गया। यह दृश्य देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने बड़ा सवाल बन गया है।
यह बात सही है कि देश की सर्वाेच्च लोकतांत्रिक संस्था की सुरक्षा सर्वाेपरि होनी चाहिए। लेकिन उतना ही बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों बन रही है कि बड़ी संख्या में युवा और नागरिक अपनी बात संसद तक पहुंचाने के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हो रहे हैं? यदि लोगों को लगता है कि उनकी आवाज सामान्य लोकतांत्रिक माध्यमों से नहीं सुनी जा रही, तो यह किसी भी सरकार के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
संसद के भीतर विपक्ष ने कई मुद्दों पर सरकार से चर्चा की मांग की। जवाब में सरकार ने विपक्ष पर कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाया। जिस संसद में महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याओं और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए, वहां पूरा दिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में निकलता है। इससे सबसे बड़ा नुकसान उन करोड़ों नागरिकों का है, जिन्होंने अपने प्रतिनिधियों को संसद इसलिए भेजा है कि वे उनकी समस्याओं का समाधान निकालें।
आज की राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि सरकार और विपक्ष दोनों एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराने में लगे रहते हैं, लेकिन जनता के मूल सवाल पीछे छूट जाते हैं। सरकार कहती है कि विपक्ष संसद नहीं चलने देता, जबकि विपक्ष का आरोप है कि सरकार चर्चा से बचती है। लेकिन आम नागरिक के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उसकी समस्याओं पर चर्चा कब होगी?
लोकतंत्र में विरोध करना नागरिकों का अधिकार है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से रखने की स्वतंत्रता देता है। इतिहास गवाह है कि देश में कई बड़े जनआंदोलनों ने सरकारों को अपने फैसले बदलने पर मजबूर किया है। इसलिए किसी भी विरोध प्रदर्शन को केवल कानून-व्यवस्था का मामला मान लेना उचित नहीं है।
संसद का बार-बार ठप होना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है, लेकिन यह सवाल संसद के भीतर प्रभावी बहस के माध्यम से अधिक मजबूत बनते हैं। यदि हर दिन कार्यवाही बाधित होगी, तो जनता के मुद्दों पर कानून कैसे बनेंगे? सरकार जवाब कैसे देगी? और लोकतांत्रिक प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ेगी? विरोध आवश्यक है, लेकिन समाधान उससे भी अधिक आवश्यक है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक गंभीर सवाल खड़ा किया है। क्या हमारे लोकतंत्र में संवाद की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है? जब सरकार जनता के असंतोष को केवल राजनीतिक विरोध मानने लगे और विपक्ष हर मुद्दे पर सदन को ठप करने की रणनीति अपनाए, तब लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण तत्व-संवाद-कमजोर पड़ जाता है। लोकतंत्र केवल बहुमत से सरकार बनाने का नाम नहीं है, बल्कि असहमति को सुनने और उसका सम्मान करने का भी नाम है।
देश का युवा आज रोजगार चाहता है, पारदर्शी भर्ती चाहता है, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहता है और अपने भविष्य को लेकर स्पष्ट नीति चाहता है। किसान अपनी आय की चिंता कर रहा है, मध्यम वर्ग महंगाई से परेशान है और आम नागरिक बेहतर स्वास्थ्य तथा शिक्षा सुविधाओं की उम्मीद कर रहा है। दुर्भाग्य यह है कि इन मुद्दों पर गंभीर चर्चा अक्सर राजनीतिक शोर में दब जाती है। संसद का उद्देश्य यही है कि इन विषयों पर खुली बहस हो, लेकिन यदि संसद ही लगातार बाधित होती रहे, तो लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था अपनी भूमिका कैसे निभाएगी?
सरकार को यह समझना होगा कि यदि नागरिक अपनी बात कहने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं, तो जरूरी है कि उनकी चिंताओं को गंभीरता से सुना जाए और समयबद्ध समाधान दिया जाए। वहीं विपक्ष को भी जनता ने केवल विरोध करने के लिए नहीं, बल्कि बेहतर विकल्प प्रस्तुत करने और संसद में प्रभावी बहस करने के लिए चुना है।
संसद का घेराव और संसद का ठप होना-दोनों ही स्वस्थ लोकतंत्र के संकेत नहीं हैं। आज देश को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है, जिसमें सरकार जवाब देने से न बचे, विपक्ष बहस से न भागे और जनता को अपनी बात कहने के लिए सड़कों पर उतरने की नौबत न आये। लोकतंत्र की असली ताकत बैरिकेड, नारे और हंगामे में नहीं, बल्कि संवाद, जवाबदेही और संवेदनशील शासन में होती है।
आज जरूरत इस बात की है कि संसद फिर से जनता की उम्मीदों का सबसे बड़ा मंच बने। सरकार जनता की आवाज सुने, विपक्ष रचनात्मक भूमिका निभाए और राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर बहस हो। क्योंकि यदि संसद में संवाद खत्म हो गया, तो लोकतंत्रा केवल चुनाव तक सीमित रह जाएगा। और लोकतंत्रा की सबसे बड़ी हार वही होगी, जब जनता को यह लगने लगे कि उसकी आवाज संसद के भीतर नहीं, केवल संसद के बाहर ही सुनी जा सकती है।

क्या सवाल पूछना भी अपराध हो गया है?

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली पहचान यह है कि सरकार सवालों का जवाब दे, आलोचना को सुने और संस्थाओं पर जनता का भरोसा बनाए रखे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं ने यह चिंता गहरा दी है कि क्या देश में जवाबदेही की जगह प्रचार ने ले ली है? क्या युवाओं के भविष्य, जनता की आस्था और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध जैसे गंभीर मुद्दे राजनीतिक शोर में दबते जा रहे हैं?
NEET पेपर लीक मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। करोड़ों छात्र वर्षों तक कठिन मेहनत करते हैं। परिवार अपनी जमा-पूंजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करता है। लेकिन जब परीक्षा की गोपनीयता ही संदिग्ध हो जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान किसी सरकार का नहीं, बल्कि उस छात्र का होता है जिसने अपनी पूरी युवा उम्र एक परीक्षा के भरोसे लगा दी। यदि एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में पेपर लीक की घटनाएं सामने आती हैं, तो यह केवल परीक्षा प्रणाली की विफलता नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न है। इस समय सरकार द्वारा केवल कारवाई की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है भरोसा तभी लौटेगा जब ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति असंभव बना दी जाए।
इसी तरह, राम मंदिर करोड़ों भारतीयों की आस्था का केंद्र है। इस आस्था का सम्मान हर लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी है। लेकिन आस्था जितनी पवित्र होती है, उससे जुड़े आर्थिक और प्रशासनिक प्रबंधन की जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक होती है। यदि किसी भूमि खरीद, दान राशि या वित्तीय लेन-देन को लेकर सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब तथ्यों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक नारों से। यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि विभिन्न समय पर लगाए गए आरोपों में से कई न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाये निष्पक्ष जांच और पारदर्शिता ही लोकतांत्रिक रास्ता है।
हाल ही में लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले NEET पेपर लीक में शिक्षा मंत्री धमेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। यह पहला अवसर नहीं है जब विरोध प्रदर्शनों को लेकर सरकार पर सवाल उठे हों। किसान आंदोलन, पहलवानों का धरना, मणिपुर को लेकर प्रदर्शन और लद्दाख के मुद्दे हर बार यह बहस सामने आई कि क्या सरकार संवाद को प्राथमिकता देती है या विरोध को प्रशासनिक चुनौती मानकर देखती है।
आज की राजनीति में एक विचित्र प्रवृत्ति दिखाई देती है। जो सरकार में है, वह हर आलोचना को राष्ट्र-विरोध या राजनीतिक षडयंत्र बताने लगता है और जो विपक्ष में है, वह हर घटना को सरकार की पूर्ण विफलता घोषित कर देता है। इस टकराव में सबसे अधिक नुकसान जनता के भरोसे का होता है।
युवाओं का प्रश्न केवल रोजगार का नहीं, बल्कि अवसरों की समानता का भी है। यदि परीक्षा प्रणाली पर विश्वास नहीं रहेगा, तो प्रतिभा हतोत्साहित होगी। यदि शांतिपूर्ण विरोध पर संदेह की दृष्टि होगी, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होगा। यदि धार्मिक आस्था से जुड़े संस्थानों की पारदर्शिता पर सवालों का उत्तर तथ्यों से नहीं दिया जाएगा, तो संदेह और बढ़ेगा।
सरकार का दायित्व केवल योजनाएं घोषित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि संस्थाएं निष्पक्ष और विश्वसनीय रहें। विपक्ष की जिम्मेदारी केवल आरोप लगाने तक सीमित नहीं है उसे तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर सरकार से जवाब मांगना चाहिए।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संसद नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। जब युवा परीक्षा पर भरोसा खोने लगें, नागरिक शांतिपूर्ण विरोध को लेकर आशंकित हों और आस्था भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाए, तब यह केवल किसी एक दल की समस्या नहीं रह जाती। यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चेतावनी होती है।
सवाल यह नहीं है कि सत्ता में कौन है। सवाल यह है कि क्या देश की संस्थाएं इतनी मजबूत हैं कि किसी भी सरकार के रहते हुए जनता का विश्वास बना रहे? क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा केवल बहुमत से नहीं होती वह पारदर्शिता, जवाबदेही, संवैधानिक अधिकारों के सम्मान और असहमति के लिए खुले स्थान से होती है। यही वह कसौटी है जिस पर हर सरकार चाहे किसी भी दल की हो आंकी जाएगी।

राम मंदिर चंदा चोरी-आस्था पर सवाल या व्यवस्था की परीक्षा?

राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मामला अब केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह गया है। यह कानून, प्रशासन, धार्मिक संस्थाओं की जवाबदेही और राजनीतिक आचरण-चारों की परीक्षा बन चुका है। जिस धन को श्रद्धालु भगवान के चरणों में श्रद्धा और विश्वास के साथ अर्पित करते हैं, यदि उसी की सुरक्षा पर सवाल उठने लगें तो यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक विश्वास को भी गहरी चोट पहुंचाता है।
घटना सामने आते ही राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई। सत्ता पक्ष इसे कानून के अनुसार सुलझाने की बात कर रहा है, जबकि विपक्ष जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या जांच वास्तव में बिना किसी दबाव के आगे बढ़ रही है और क्या दोषी, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून के दायरे में आएगा?
देश और प्रदेश दोनों में हमने कई ऐसे मामले देखे हैं, जहां शुरुआती दिनों में कारवाई तेज दिखाई देती है, लेकिन समय बीतने के साथ जांच की गति धीमी पड़ जाती है। कुछ मामलों में आरोपियों तक कानून पहुंचता है, जबकि कुछ मामलों में फाइलें ही चर्चा का विषय बनकर रह जाती हैं। इसलिए इस मामले में भी जनता केवल एफआईआर या गिरफ्तारी नहीं, बल्कि अंतिम परिणाम देखना चाहती है।
यदि मंदिर के दान की चोरी हुई है, तो सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि सुरक्षा व्यवस्था में चूक कहां हुई। क्या सीसीटीवी कैमरे पूरी तरह कार्यरत थे? दान पेटियों को खोलने और धन की गिनती की प्रक्रिया क्या थी? क्या नियमित ऑडिट होता था? क्या किसी कर्मचारी या प्रबंधन स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत की आशंका है? इन सवालों के जवाब जांच का हिस्सा बनने चाहिए। यदि व्यवस्था में खामियां हैं, तो केवल दोषियों को पकड़ना पर्याप्त नहीं होगा पूरी प्रणाली में सुधार भी आवश्यक होगा।
इस मामले का दूसरा पक्ष राजनीति है। हर संवेदनशील मुद्दे की तरह यहां भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है। विपक्ष सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहा है, जबकि सरकार विपक्ष पर राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगा रही है। लेकिन जनता की चिंता अलग है। उसे यह जानना है कि मंदिर के चढ़ावे की सुरक्षा कैसे होगी और दोषियों को सजा मिलेगी या नहीं। राजनीतिक बयान न तो चोरी की भरपाई कर सकते हैं और न ही जनता का विश्वास वापस ला सकते हैं।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जांच एजेंसियां समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से काम करें। यदि जांच लंबी खिंचती है, महत्वपूर्ण तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया जाता या कारवाई केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित रह जाती है, तो स्वाभाविक रूप से यह धारणा बनेगी कि कहीं न कहीं प्रभावशाली लोगों को बचाया जा रहा है। वहीं यदि जांच तकनीकी साक्ष्यों, वित्तीय रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, डिजिटल प्रमाण और गवाहों के आधार पर निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ती है, तो कानून पर जनता का भरोसा मजबूत होगा।
धार्मिक संस्थानों में आने वाला दान करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक होता है। इसलिए अब समय आ गया है कि मंदिरों में दान प्रबंधन को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। डिजिटल लेखा-जोखा, नियमित स्वतंत्र ऑडिट, सीसीटीवी की सतत निगरानी, दान पेटियों की वैज्ञानिक सुरक्षा और जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था आज की आवश्यकता है। आस्था को केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि मजबूत संस्थागत व्यवस्था से भी सुरक्षित रखा जा सकता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या दोषियों के खिलाफ कारवाई होगी? इसका उत्तर राजनीति नहीं, बल्कि जांच देगी। यदि कानून निष्पक्ष है तो किसी भी व्यक्ति की पहचान, पद या प्रभाव जांच के रास्ते में नहीं आना चाहिए। लेकिन यदि राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक हस्तक्षेप जांच की दिशा तय करने लगें, तो यह केवल एक मामले की विफलता नहीं होगी, बल्कि न्याय व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न होगा।
राम मंदिर चंदा चोरी का मामला किसी दल की जीत या हार का विषय नहीं बनना चाहिए। यह आस्था, ईमानदारी और कानून के शासन की परीक्षा है। सरकार की जिम्मेदारी है कि जांच को पूरी स्वतंत्रता दे और उसकी प्रगति समय-समय पर सार्वजनिक करे। विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह जवाबदेही की मांग करे, लेकिन बिना प्रमाण किसी निष्कर्ष पर न पहुंचे। और जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे केवल एक बात साबित करें कि कानून के सामने कोई भी व्यक्ति बड़ा नहीं है।
यदि इस मामले में निष्पक्ष जांच, समयबद्ध कारवाई और दोषियों को सजा मिलती है, तो यह केवल चोरी के एक मामले का समाधान नहीं होगा, बल्कि जनता के विश्वास की भी रक्षा होगी। लेकिन यदि मामला राजनीति, दबाव और देरी की भेंट चढ़ गया, तो सबसे बड़ी हार किसी दल की नहीं, बल्कि उस आस्था की होगी जिसके नाम पर करोड़ों लोग मंदिर की दहलीज तक पहुंचते हैं।

डिजिटल इंडिया की चुनौतियां

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हुई थी, वह आज भारत की अर्थव्यवस्था, प्रशासन और सामाजिक जीवन की धुरी बन चुकी है। बैंक खाते खोलने से लेकर अस्पताल में पंजीकरण, सरकारी सब्सिडी प्राप्त करने, टैक्स भरने, न्यायालयों में मामलों की ऑनलाइन सुनवाई, डिजिटल भुगतान और शिक्षा तक, शायद ही कोई ऐसा क्षेत्रा बचा हो जहां डिजिटल इंडिया की छाप दिखाई न देती हो। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि शासन और नागरिकों के संबंधों में आये बुनियादी बदलाव का संकेत भी है।
भारत ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है। आधार, जनधन खाते और मोबाइल कनेक्टिविटी पर आधारित ‘जैम ट्रिनिटी’ ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को नई दिशा दी है। यूपीआई ने नकद लेन-देन की संस्कृति को चुनौती देते हुए डिजिटल भुगतान को आम नागरिक की दिनचर्या का हिस्सा बना दिया है। डिजिलॉकर, ई-संजीवनी, उमंग, दीक्षा और सरकारी ई-मार्केटप्लेस जैसे प्लेटफॉर्म ने प्रशासन को अधिक सुविधाजनक और नागरिक-केंद्रित बनाया है। लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या डिजिटल व्यवस्था हर नागरिक के लिए समान रूप से सुलभ, सुरक्षित और भरोसेमंद बन पाई है? ग्रामीण भारत में इंटरनेट की पहुंच बढ़ी है, लेकिन आज भी अनेक गांवों में मोबाइल नेटवर्क कमजोर है, इंटरनेट की गति अस्थिर रहती है और बिजली आपूर्ति की समस्या डिजिटल सेवाओं के उपयोग में बाधा बनती है। केवल कनेक्टिविटी उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है उसकी गुणवत्ता और निरंतरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कोई किसान ऑनलाइन फसल बीमा का आवेदन ही न कर सके या कोई छात्रा डिजिटल कक्षा से जुड़ने में असमर्थ रहे, तो डिजिटल क्रांति का लाभ अधूरा रह जाएगा।
डिजिटल साक्षरता भी उतनी ही बड़ी चुनौती है। स्मार्टफोन हाथ में आ जाने भर से कोई व्यक्ति डिजिटल रूप से सक्षम नहीं हो जाता। साइबर धोखाधड़ी, फर्जी लिंक, ओटीपी ठगी और ऑनलाइन वित्तीय अपराधों के बढ़ते मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि डिजिटल शिक्षा तकनीकी विस्तार के साथ-साथ चलनी चाहिए। यदि नागरिक सुरक्षित डिजिटल व्यवहार नहीं सीखेंगे, तो डिजिटल सुविधा उनके लिए जोखिम का कारण भी बन सकती है। ऐसे में मजबूत साइबर सुरक्षा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है।
डिजिटल इंडिया की सबसे बड़ी सफलता यह रही है कि उसने सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाई है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से बिचौलियों की भूमिका कम हुई है और लाभार्थियों तक योजनाओं का पैसा सीधे पहुंचा है। लेकिन दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जिन लोगों के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट या डिजिटल कौशल नहीं है, वे सरकारी सेवाओं से वंचित न रह जाएं। डिजिटल समावेशन का अर्थ यही है कि तकनीक सुविधा का माध्यम बने, बाधा का नहीं।
भारत अब एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग, क्वांटम तकनीक और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है। यह अवसर भी है और जिम्मेदारी भी। यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और न्याय जैसे क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण सेवाएं उपलब्ध करा सकें, तो भारत वास्तव में समावेशी डिजिटल अर्थव्यवस्था का वैश्विक मॉडल बन सकता है।
डिजिटल इंडिया के अगले दशक की सफलता इस बात से तय होगी कि क्या यह कार्यक्रम केवल ऐप और प्लेटफॉर्म बनाने तक सीमित रहता है या वास्तव में हर नागरिक को समान अवसर और सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध करा पाता है। अब लक्ष्य केवल अधिक डिजिटल सेवाएं शुरू करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जो सरल, सुरक्षित, समावेशी और विश्वसनीय हो। डिजिटल विकास तभी सार्थक होगा जब तकनीक का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, उसकी निजता सुरक्षित रहे, साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण हो और डिजिटल व्यवस्था पर जनता का विश्वास लगातार मजबूत होता रहे। यही वह कसौटी होगी, जिस पर डिजिटल इंडिया के अगले दशक की सफलता का वास्तविक आकलन होगा।

विकास की अंधी दौड़ में हिमाचल का बढ़ता संकट

हिमाचल प्रदेश में मानसून की शुरुआत से पहले ही भूस्खलन, पहाड़ दरकने और पेड़ों के गिरने की घटनाएं सामने आने लगी हैं। हर साल की तरह इस बार भी प्रशासन अलर्ट पर है, आपदा प्रबंधन की बैठकें हो रही हैं, विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए जा रहे हैं और संभावित नुकसान को कम करने की रणनीतियों पर चर्चा हो रही है। लेकिन इन सारी तैयारियों के बीच सबसे बड़ा सवाल फिर सामने खड़ा है क्या हिमाचल केवल आपदाओं के बाद राहत, मुआवजे और पुनर्वास तक सीमित रहेगा, या कभी उन नीतियों और विकास मॉडल पर भी गंभीरता से सवाल उठाएगा जो इन आपदाओं को लगातार गहरा रहे हैं?
पिछले कुछ वर्षों का इतिहास देखें तो हिमाचल प्रदेश ने ऐसी त्रासदियां झेली हैं, जिन्हें केवल प्राकृतिक आपदा कहकर नहीं टाला जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश में आयी आपदाओं से सैकड़ों लोगों की जानें गई, हजारों मकान क्षतिग्रस्त हुए, सड़कें बह गईं, पुल टूट गए और हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। शिमला के समरहिल में मंदिर ध्वस्त हुआ, कृष्णानगर में मकान जमींदोज हुए, मंडी, कुल्लू, चंबा और किन्नौर में पहाड़ टूटे और पूरी बस्तियां खतरे की जद में आ गईं। उस समय विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि यह केवल अत्यधिक वर्षा का परिणाम नहीं है, बल्कि वर्षों से प्रकृति के साथ की जा रही छेड़छाड़ का नतीजा भी है।
विडंबना यह है कि इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी विकास के मॉडल पर गंभीर पुनर्विचार नहीं हुआ। आज भी प्रदेश में फोरलेन परियोजनाएं, सुरंग निर्माण, जलविद्युत परियोजनाएं और बड़े-बड़े भवन निर्माण कार्य उसी गति से चल रहे हैं। विकास किसी भी राज्य की आवश्यकता है, लेकिन सवाल विकास का नहीं, उसके स्वरूप का है। क्या हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास का वही मॉडल लागू किया जा सकता है जो मैदानी इलाकों में अपनाया जाता है?
हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसकी भौगोलिक संरचना नाजुक है और यहां की मिट्टी तथा चट्टानें लगातार परिवर्तनशील हैं। इसके बावजूद अनेक स्थानों पर पहाड़ों को लगभग सीधा काटा जा रहा है। भारी निर्माण गतिविधियों के कारण कई क्षेत्रों में जल स्रोतों के सूखने, भूमि धंसने और घरों में दरारें आने की शिकायतें लगातार मिलती रही हैं। किन्नौर, चंबा, मंडी और कुल्लू जैसे जिलों में स्थानीय समुदाय वर्षों से अपनी चिंताएं व्यक्त कर रहे हैं। दुर्भाग्य से इन चिंताओं को अक्सर विकास विरोधी मानसिकता बताकर खारिज कर दिया जाता है।
एक और बड़ा संकट प्राकृतिक जल निकासी तंत्र के साथ हो रही छेड़छाड़ है। जब भारी वर्षा होती है तो पानी अपना रास्ता खुद बनाता है और तब वह अपने साथ मिट्टी, पत्थर, मकान और कभी-कभी पूरी जिंदगी बहा ले जाता है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई भी इस संकट को बढ़ा रही है। आज विकास परियोजनाओं के नाम पर हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं।
इन परिस्थितियों में भी हर आपदा के बाद सरकारें राहत पैकेजों, मुआवजों और पुनर्वास योजनाओं पर अधिक ध्यान देती हैं, जबकि आपदा की जड़ों पर प्रहार करने के लिए कठोर निर्णय लेने से बचती हैं। पर्यावरणीय मंजूरियों में ढील, निर्माण मानकों के पालन में लापरवाही और परियोजनाओं की निगरानी में कमजोर व्यवस्था ऐसे मुद्दे हैं जिन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
यह भी सच है कि हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य को सड़कें, बिजली और आधुनिक सुविधाएं चाहिएं। लेकिन विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी मानना सबसे बड़ी भूल होगी। आज जरूरत केवल आपदा प्रबंधन की नहीं, बल्कि आपदा रोकथाम की है। प्रकृति बार-बार चेतावनी दे रही है क्या हम उससे पहले अपनी गलतियों को सुधारने का साहस दिखा पायेंगे।
हिमाचल का भविष्य राहत शिविरों और मुआवजे की घोषणाओं से सुरक्षित नहीं होगा। वह तभी सुरक्षित होगा जब विकास की हर योजना में पहाड़ों की संवेदनशीलता, पर्यावरणीय संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के हितों को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी जाएगी। अन्यथा हर मानसून के साथ हम वही दुखद कहानियां दोहराते रहेंगे और प्रकृति हमें हमारी भूलों की कीमत चुकाने पर मजबूर करती रहेगी।
 
 
 
 

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