शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के सांगटी वार्ड से भाजपा ने पहली बार जीत दर्ज की है। इससे पहले यहां पर माकपा और कांग्रेस का ही कब्जा रहा है। यह दूसरी बात है कि इस जीत की पटकथा लिखने के लिये भाजपा को उसी चेहरे पर दाव खेलना पड़ा जिसे वह कांग्रेस में सेंध लगाकर भाजपा में लायी थी। भाजपा की जीत का चेहरा बनी मीरा शर्मा ने इस वार्ड से तीसरी बार तीसरे दल में आकर भी अपनी जीत बरकरार रखी है। इस तरह भाजपा की यह उसकी विचारधारा की नही बल्कि उसकी जोड़तोड़ की जीत ज्यादा मानी जा रही है। क्योंकि यही मीरा शर्मा सबसे पहले यहां से माकपा और फिर कांग्रेस से जीत चुकी है। हालांकि इस बार प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बावजूद वह केवल 44 मतों से ही जीत पायी है जबकि कांग्रेस में वह 271 मतों से जीती थी। लेकिन जीत का अपना ही एक अलग अर्थ होता है और नगर निगम शिमला का प्रदेश की राजनीति में एक केन्द्रिय स्थान है। चुनाव की दृष्टि से शिमला को मिनी हिमाचल माना जाता है इस नाते इस जीत के राजनीतिक मायने अलग हो जाते हैं। भाजपा में इस जोड़-तोड़ का पूरा श्रेय शिमला के विधायक शिक्षा मन्त्री सुरेश भारद्वाज और चौपाल के विधायक बलवीर वर्मा के प्रबन्धन को जाता है जिन्होंने मीरा को ओकओवर में बिल्कुल गुपचुप तरीके से भाजपा में शामिल करवाया तथा इससे पहले किसी को भी इसकी भनक तक नही लगने दी।
शिमला पूरा जिला कांग्रेस गढ़ माना जाता रहा है क्योंकि इसी शिमला के वीरभद्र प्रदेश के छः बार मुख्यमन्त्री रह चुके हैं। फिर जब नगर निगम शिमला के चुनाव हुए थे तब वीरभद्र स्वयं चुनाव प्रचार में उत्तरे थे। माना जाता है कि जिला शिमला की राजनीति में उनके परोक्ष/ अपरोक्ष दखल के बिना कुछ भी नहीं घटता है। फिर इस उपचुनाव से पहले ही प्रदेश कांग्रेस को इसी जिले के कुमारसेन से कुलदीप राठौर के रूप में नया अध्यक्ष भी मिल गया था। इस परिप्रेक्ष में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि भाजपा न केवल कांग्रेस का प्रत्याशी ही सेंध लगाकर छीनने में कामयाब हुई बल्कि वीरभद्र के शिमला में यह जीत दर्ज करने में भी सफल हो गयी।
अब प्रदेश में लोकसभा चुनाव होने है और यह चुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनो के लिये महत्वपूर्ण होंगे। इन चुनावों में साम, दाम, दण्ड और भेद सबका बराबर इस्तेमाल किया जायेगा। अभी भाजपा के शिमला से वर्तमान सांसद वीरेन्द्र कश्यप के खिलाफ ‘‘कैश आन कैमरा’’ मामले में अदालत में आरोप तय हो गये हैं। इसी के साथ विधानसभा अध्यक्ष राजीव बिन्दल का मामला भी अदालत में गंभीर मोड़ पर है। सरकार इसे वापिस लेने के लिये अदालत में आग्रह दायर कर चुकी है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसे मामलों में दिये गये फैसलों के परिप्रेक्ष में इसे वापिस का पाना अदालत के लिये भी बहुत आसान नही रह गया है क्योंकि इसमें अभियोजन पक्ष की ओर से सारी गवाहीयां हो चुकी है। अब केवल डिफैन्स की ओर से ही गवाहीयां आनी है। ऐसे में इस स्टैज पर इस मामले के वापिस होने पर कई सवाल उठेंगे और यह भी संभव है कि कोई भी इसे उच्च न्यायालय के संज्ञान में ले आये तथा यह सरकार के लिये पेरशानी का कारण बन जाये।
इस परिदृश्य में सरकार और भाजपा के लिये सांगटी में मिली जीत को लोकसभा में दोहराने के लिये काफी संभलकर चलना होगा। क्योंकि यह स्वभाविक होगा कि कांग्रेस का नया अध्यक्ष इस हार के कारणों पर रिपोर्ट लेगा ही। ऐसे में जिस तरह की ब्यानबाजी इस चुनाव तक बड़े नेताओ की आती रही है उसका कड़ा संज्ञान लेते हुए इस तरह के आचरण पर कड़ाई से रोक लगायी जाये। अबतक भाजपा को कांग्रेस के अन्दर बनती इस तरह की स्थितियों का लाभ मिलता रहा है जो आगे शायद ज्यादा संभव नही हो पायेगा।
शिमला/शैल। क्या प्रदेश कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनावों में मिली शर्मनाक हार का बदला 2019 में ले पायेगी? उस समय केन्द्र और प्रदेश दोनों जगह कांग्रेस की सरकारें थी और मण्डी से स्वयं वीरभद्र की पत्नी पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह चुनाव मैदान में थी। लेकिन भाजपा उस समय चारों सीटें कांग्रेस से छीनने में सफल हो गयी थी। आज केन्द्र और राज्य में दोनों जगह भाजपा की सरकारें हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या वीरभद्र और कांग्रेस इस हार का बदला ले पायेंगे? यह सवाल तब 

यह आरोपपत्र आने के बाद कांग्रेस की नीयत पर सवाल उठे हैं क्योंकि यह आरोप उसकी वरीयता के अनुरूप गंभीर नही थे। बल्कि जो आरोप ठाकुर राम लाल ने कुछ समय पूर्व बिलासपुर में एक पत्रकार वार्ता में लगाया था वह तक इस आरोप में दर्ज नही हो पाया। इस तरह के कई गंभीर मुद्देे ऐसे रहे हैं जिन्हे यदि आरोपपत्र में शामिल किया जाता तो सरकार के लिये गंभीर परेशानी खड़ी हो सकती थी लेकिन ऐसा नही हो पाया है। इससे यही उभरता है कि या तो कांग्रेस आरोप पत्र बनाने में ही गंभीर नही और उसके लिये उसने ईमानदारी से कोई तैयारी ही नही की या फिर नीयत ही साफ नही थी। इस समय देश की राजनीति जिस मुहाने पर खड़ी है उससे यह आंशका बनती जा रही है कि आने वाले चुनावों में हिसां तक हो सकती है। इस चुनाव में जो तथ्य पूर्ण आक्रामकता से जनता के सामने आयेगा उसी का पलडा भारी रहेगा।
इस परिप्रेक्ष में प्रदेश कांग्रेस ईकाई को प्रदेश सरकार के खिलाफ भी आक्रामक होना पड़ेगा। क्योंकि राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ स्थानीय मुद्दों पर भी प्रदेश की जनता का ध्यान आकर्षित करना पड़ेगा। लेकिन अभी तक इस तरह की तैयारी कांग्रेस की ओर से सामने नही आ पायी है। जबकि यह चुनाव पूरी तरह आक्रामक होने जा रहा है। इस समय कांग्रेस के खिलाफ सरकार के पास भाजपा के आरोप पत्र का एक बड़ा हथियार सुरक्षित पड़ा है। हांलाकि सरकार इस पर अभी तक गंभीर नही है लेकिन यह गंभीरता कभी भी आ सकती है। फिर वीरभद्र सिंह और परिवार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति और मनीलाॅंड्रिंग के मामले लंबित चल रहे हैं। मनीलाॅंड्रिंग में ईडी वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर की जमानत रद्द करवाने का प्रयास कर ही चुकी है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि राजनीति में कभी भी कुछ भी घटित हो सकता है। इसमें यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जो पहले आक्रामकता अपना लेता है वह विरोधी पर भारी पड जाता है। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि कांग्रेस और सरकार में से कौन पहले आक्रामकता अपनाता हैं क्योंकि वीरभद्र और सुक्खु की एकजुटता से सियासी समीकरणों में जो बदलाव आया है उससे इस तरह की आक्रामकता की संभावनाएं बहुत बढ़ गई हैं।
शिमला/शैल। सर्व कर्मचारी पैन्शनर, श्रमिक, युवा बेरोजगार संयुक्त मोर्चा की गतिविधियों में इन दिनों फिर से बढ़ौत्तरी आ गयी है। इसका संकेत मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल दास वर्मा द्वारा इस संगठन में बिजली बोर्ड कर्मचारी यूनियन के 

गोपाल दास वर्मा पिछले लोकसभा चुनावों और विधानसभा चुनावों में भी काफी सक्रिय रहे हैं। अब फिर से लोकसभा चुनाव आ रहे हैं। माना जा रहा है कि इन चुनावों को ध्यान में रखते हुए वर्मा ने इस संयुक्त मोर्चा की गतिविधियों को बढ़ावा देने की नीयत से ही इसमें पूर्व कर्मचारी नेताओं को जोड़ने की मुहिम शुरू कर दी है। आने वाले चुनावों में इस मोर्चा की भूमिका कितनी और क्या रहती है इस पर अभी से कुछ लोगों की नजरें लग गयी हैं।

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