शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश को 2017 के विधानसभा चुनावों में वीरभद्र सिंह की कांग्रेस व धूमल की भाजपा से मुक्त कराने के दावे करने वाली आप पार्टी की राज्य इकाई के संयोजक राजन सुशांत व राज्य प्रवक्ता सुभाष चंद के बीच भंयकर वाकयुद्ध हुआ व इसके एक दिन बाद संयोजक राजन सुशांत ने रिटेंशन पाॅलिसी व बिजली बिलों को लेकर प्रदेश की वीरभद्र सिंह सरकार पर हमला बोला।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक सुशांत व सुभाष दोनों के बीच पार्टी मीटिंग में जबरदस्त वाकयद्ध हुआ और दोनों ने एक दूसरे की शिकायतें आला कमान से की है। कहा जा रहा है कि आलाकमान को इस वाकयुद्ध की आडियो भी भेजी गई है। राज्य प्रवक्ता सुभाष ही नहीं आप के युवा प्रभारी के साथ भी वाकयुद्ध हुआ है।

ऊना रैली उसके बाद सुंदरनगर का बूूथ प्रभारियों का सम्मेलन व अब पार्टी मीटिंग में हुए वाकयुद्ध की सारी जानकारी प्रदेश प्रभारी संजय सिंह को है लेकिन संजय सिंह व आप के बड़े बाकी नेता प्रदेश की इकाई में चले घमासान पर पूरी तरह से खामोश है और तमाशा देख रहे है। लेकिन इस तरह की घटनाओं से पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविन्द केजरीवाल व संजय सिंह भाजपा व कांग्रेस के नेताओं की नजरों में खुद तमाशा बनते जा रहे हैै।
यहां ये गौरतलब है कि राजन सुशांत व सुभाष चंद्र दोनों ही भाजपा से आम आदमी पार्टी में आए हैं। सुशांत के राजनीतिक गुरू भाजपा के वरिष्ठ नेता शांता कुमार हैं तो सुभाष भाजपा के दूसरे बड़े नेता प्रेम कुमार धूमल की चैखट से बाहर निकल कर आए हैं। शांता कुमार ने सुशांत तो धूमल ने सुभाष को अगल-अलग समय पर ऐन मौकों पर पटखनी दी है। सुशांत धूमल के निशाने पर रहे हैं तो सुभाष को वीरभद्र के साथ-साथ धूमल का भी साथ नही मिला है। लेकिन कहा जाता है कि दोनों के संपर्क अपने पुराने आकाओं व उनके लोगों से किसी न किसी तरह बने हुए हंै। इस भयंकर वाकयुद्ध के पीछे समझा जा रहा है कि सुभाष धूमल खेमें के कई नेताओं समेत पहले भाजपा में रह चुके बाकी नेताओं को भी आप में शामिल कराना चाहते है जबकि सुशांत धूमल खेमे के किसी भी नेता को फूटी आंख नही सुहाते है। वो भाजपा में अपने चहेतों को पार्टी में लाना चाहते हैं।
उधर वीरभद्र सिंह व धूमल अपने लोगों को किसी भी तरह आप में घुसपैठ करवाने की फिराक में हैं। कांग्रेस व भाजपा ने दिल्ली में भी इसी तरह का खेल खेला था जिससे अरविन्द केजरीवाल को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। वीरभद्र सिंह व धूमल पहले भी इस तरह केे खेल खेलते रहे हंै। इन सब मसलों को लेकर हिमाचल आप में शुरू से जबरदस्त जंग छिड़ी हुई है। जिससे न तो सुशांत बाहर आ पा रहे और न ही केजरीवाल व संजय सिंह कुछ फैसला ले रहे हैं। इस स्थिति के बीच सुशांत समय समय पर वीरभद्र सिंह सरकार व धूमल पर जुबानी हमला बोलकर अपनी राजनीति आगे बढ़ा रहे है। ये वो भी जानते है कि उनके साथ तो पार्टी के पदाधिकारी है और न ही जनता। वो जतना को अपने साथ जोड़ने में भी नाकाम साबित हुए हैं। जिन लोगों को जोड़ा गया है, उनका जुलूस खुद संजय सिंह सुंदरनगर में बूथ प्रभारियों की हुई बैठक में निकाल चुके हैं।
आप की खराब हालात के बीच आज राजन सुशांत ने रिटेंशन पाॅलिसी व बिजली बिलों के मुद्दे पर सरकार को घेरने की रणनीति तैयार की है। पार्टी ने जरूरत से ज्यादा बिजली बिल वसूल कर उपभोक्ताओं की जेब ढीली करने का आरोप सरकार व राज्य बिजली बोर्ड पर लगाया है।
आप के प्रदेश संयोजक राजन सुशांत ने पत्रकार वार्ता में कहा कि राज्य विद्युत बार्ड द्वारा बिजली बिल में मीटर रैंट सहित अन्य कई तरह के चार्जिज लगाए जा रहे हैं, जो कि सरासर गलत हैं।
उन्होंने कहा कि बिजली बोर्ड द्वारा 200 से लेकर 700 रूपये तक की कीमतों के मीटर लगाए गए हैं। जिनकी एवज में बिजली बिलों में हर महीने 15 रूपये मीटर रेंट वसूला गया। लेकिन पिछले कई दशकों से यह मीटर रैंट उपभोक्ताओं से वसूला जा रहा है। जबकि मीटर की असल कीमत मात्रा एक साल के बिल में ही पूरी हो जाती है।
उन्होंने कहा कि मीटर रैंट के नाम पर बिजली बिलों में वसूली का चलन अभी भी बदस्तूूर जारी है और इसे रोकने के लिए सरकार को तुरंत पहल करनी चाहिए।
बिजली बिलों में 50 से 70 रूपये तक सर्विस चार्ज वसूला जाने को भी सुशांत ने अनुचित ठहराया और कहा कि बिजली की दरें निर्धारित करने से पहले विद्युत नियामक आयोग 9 प्रकार के अलग-अलग खर्चे पहले ही जोड़ लेता है। ऐसे में बिजली बिल पर सर्विस जार्च और अन्य शुल्क लगाए जाना व्यवहारिक नही है।
सुशांत ने कहा कि प्रदेश में 22 लाख विद्युत उपभोक्ता हैं, जिनमें साढ़े 19 लाख घरेलू उपभोक्ता हैं तथा बिजली बोर्ड की मनमानी से उनकी जेबों पर डाका डाला जा रहा है।
सुशांत ने यह भी कहा कि बिजली बिलों के मुद्दे पर सरकार का दोहरा चेहरा सामने आया है। एक तरफ बिलों में अनुचित खर्चे जोड़कर ग्राहकों को गुमराह किया जा रहा है और दूसरी तरफ राज्य सरकार बिजली बिलों पर सब्सिडी देकर अपनी पीठ थपथपा रही है।
आप नेता ने कहा कि बिजली बिल के मुददे को पार्टी जोरशोर से उठाएगी और जनता को जागरूक करने के लिए 8 जून को प्रत्येक विधानसभा क्षेत्रों में दो घंटे का धरना दिया जाएगा। बाद में पार्टी के नेता विधानसभा हल्कों में संबंधित जिला प्रशासन को ज्ञापन भी सोंपेंगे। उन्होंने रिटेंशन पाॅलिसी पर कहा कि जो क्षेत्रा नगर निगम में बाद में मिलाए गए है उनके मकान मालिकों की क्या गलती है । उन्होंने तो मकान बहुत पहले बना लिए है। उन्हें मकान नियमित करने के लिए पैसा क्यों देना चाहिए।
जो भी हो आम आदमी पार्टी में चल रही जंग पर प्रदेश कांग्रेस व भाजपा में खूब चुटकुले सुनाए जा रहे है। इसी बीच यह भी जानकारी बाहर आयी है कि पार्टी का केन्द्रिय नेतृत्व शीघ्र ही इस बारे में कोई बड़ा फैसला ले सकता है। माना जा रहा है कि केन्द्रिय नेतृत्व यहां के सारे पदाधिकारियों को हटाकर सारी कमान अपने हाथ में ले सकता है।
शिमला। आज की राजनीति में केजरीवाल एक ऐसा नाम बन गया है जिसका किये बिना कोई भी राजनीतिक चिन्तन /बहस पूरी नहीं हो सकती। ऐसा इसलिये हैे कि 2014 के लोकसभा चुनावों में देश की जनता भाजपा के पक्ष में एकतरफा फैसला देकर जो संकेत दिया था उसे दिल्ली और बिहार विधान सभा चुनावों में एकदम पलट दिया। दिल्ली में केजरीवाल की आप ऐसा राजनितिक इतिहास रचा है शायद उसे ’’आप’’ भी दूसरी बार दोहरा सके। बिहार में भी आप ने स्वयं चुनाव न लडकर नीतिश, लालू और कांग्रेस के गठबधन को सक्रिय समर्थन देकर अपने को राजनीतिक गणना और विश्लेषण में बनाये रखा है। आज आप पंजाब विधानसभा चुनावों के लिये कांग्रेस तथा अकाली भाजपा गठनबन्धन के विकल्प के रूप में चर्चित होता जा रहा है। पंजाब की अंतिम राजनीतिक तस्वीर क्या उभरती है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन यह तय है कि वहां पर आप को अनदेखा करना संभव नही है। 2014 के लोक सभा चुनावों में आप पहली बार राजनीतिक पटल पर उभरी और आज भाजपा -कांग्रेस के संभावित विकल्प की गणना तक पहुंच चुकी है। यह अपने में एक बडी उपलब्धि है । आप को इस मुकाम तक पहुंचाने मे केजरीवाल की भूमिका प्रमुख रही है। बल्कि यह कहना ज्यादा संगत होगा कि कांग्रेस के अन्दर जो स्थान नेहरू गांधी परिवार का है आप में वही स्थान केजरीवाल का बनता जा रहा है। केजरीवाल एक तरह से आप का प्लस और माईनस दोनों बन चुका है। 

लेकिन आज आप को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने के लिये उन्हें हर राज्य में अपनी टीम का चनय करते समय यह ध्यान रखना होगा कि वहां भी उन्हेे दूसरे केजरीवल ही मिले। आज केजरीवाल और मोदी की केन्द्र सरकार में हर समय टकराव चल रहा है। केजरीवाल के 67 विधायकों की टीम में बहुत सारे चेहरे ऐसे भी रहे होगें जिनके बारे में सारी जानकारियां उनके विधायक बनने के बाद मिली हो क्योंकि चुनाव के समय एक लहर थी जिसमें गुण दोष की परख कर पाना संभव नहीं था। लेकिन आज अन्य राज्यों में संगठन खडा़ करते समय गुण दोष को नजर अन्दाज करना हितकर नही रहेगा। केजरीवाल ने जिस तरह से भाजपा के नितिन गडकरी के खिलाफ पूर्ति उ़द्योग समूह को लेकर हमला बोला था उसके कारण गडकरी को अध्यक्षता का दूसरा कार्यकाल नहीं मिल पाया था। लेकिन गडकरी ने जब अपने उपर लगे आरोपों को लेकर अदालत में मानहानि दायर किया तब केजरीवाल को वह आरोप प्रमाणित करने भारी पड गये थे। परन्तु अब जब उसी तर्ज पर केजरीवाल ने क्रिकेट के मुद्दे पर अरूण जेटली को घेरा है तब स्थितियां अलग है। क्योंकि आज दिल्ली सरकार की अपनी जांच रिपोर्ट और भाजपा सासंद कीर्ति आजाद के जेटली पर आरोप केजरीवाल के स्टाक में मौजूद है।
लेकिन जिस ढंग से केजरीवाल ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चुनौति दे रखी उसका राजनीतिक बदला लेने के लिये भाजपा राज्यों में अपने लोगों को आप मे भेजने की रणनीति बनाकर आप को तोड़ने का प्रयास अवश्य करेगी । क्योंकि भाजपा औकर आप का सत्ता में आना अन्ना आन्दोलन का ही प्रतिफल है । लेकिन यह भी एक कडवा सच है कि अन्ना का सारा आदोंलन संघ प्रायोजित था और आज उसी आन्दोलन का नाम लेकर भाजपा और उसके समर्थित संगठनों के लेाग आप में घुसने का प्रयास करेगें ।क्योंकि आज भाजपा को जो राजनितिक चुनौती आप से है वह कांग्रेस से नहीं है। भले ही कांग्रेस आज भी सबसे बडा राजनितिक संगठन है और भाजपा जन समर्थन खोती जा रही है लेकिन कांग्रेस के ऊपर भ्रष्टाचार के जो आरोप लग चुके है उनके साये से वह अभी तक उक्त नहीं हो पायी है। कांग्रेस ने अपने किसी भी नेता को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते हटाया नही बल्कि यदि ध्यान से देखा जाये तो मोदी सरकार ने भी कांग्रेस पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर से ध्यान हटाना शुरू कर दिया है। जबकि देश में सत्ता परिवर्तन भ्रष्टाचार के कारण हुआ है। लेकिन आज भ्रष्टाचार की जगह कुछ दूसरे मुद्दे उछाल दिये गये है और भ्रष्टाचार पृष्ठभूमि में चला गया है। केजरीवाल और आप को भाजपा और कांग्रेस का विकल्प बनने के लिये इस स्थिति पर विचार करना होगा।
शिमला/शैल। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह केेे समर्थकों ने मंगलवार को उनके नाम से ब्रिगेड गठित करके प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में सनसनी पैदा कर दी थी। लेकिन बुधवार को ही इस ब्रिगेड को भंग करके इस सनसनी में कई और सवाल जोड़ दिये है। यह ब्रिगेड गठित क्यों किया गया और फिर इसे दूसरे ही दिन भंग क्यों कर दिया?


अपनी इसी कार्यशैली का अनुसरण करते हुए वीरभद्र ने इस मानहानि मामलें डालने की रणनीति का सहारा लिया और अरूण जेटली, धूमल, अनुराग पर यह मामले डाले।
लेकिन अरूण जेटली के खिलाफ मामला वापिस लेकर अपनी रणनीतिक असफलता को जग जाहिर होने से बचा नहीं पाये। इसी तरह पूर्व डी जी पी मिन्हास के खिलाफ हर कुछ दावे करते रहे वीरभद्र मिन्हास का कुछ नही बिगाड़ सके। अवैध फोन टेंपिग का खुद शिकार रह चुके वीरभद्र के इस मामले में भी सारे दावे हवाई सिद्ध हुए हंै। ध्ूामल के संपति मामले की जांच में भी वीरभद्र बुरी तरह असफल हुए हैं। कुल मिलाकर इस कार्यकाल में वीरभद्र हर कदम पर बुरी तरह असफल रहे हंै। इतनी सारी असफलताओं का मूल कारण रहा है कि इस बार 2012 में सत्ता संभालने से पहले ही वह आयकर और सीबीआई जांचों का चक्रव्यूह अपने साथ लेकर आये थे। सत्ता संभालने के बाद संयोग से उनके गिर्द एक ऐसा घेरा बन गया जिसने यह सुनिश्चित रखा की वीरभद्र केन्द्र की जांच ऐजैन्सीयों के घेरे से कभी बाहर आ ही न पायंे। आज वीरभद्र पूरी तरह केन्द्र की ऐजैन्सीयों के ऐसे पक्के फंदे में फंसे हुए हंै जहां से बाहर निकल पाना संभव नहीं लगता।
ऐसी वस्तुस्थितियों में घिरे हुए वीरभद्र के सलाहकारों ने वीरभद्र ब्रिगेड के नाम से एक समानान्तर संगठन खड़ा करवा कर अपने ही हाथांे अपने खिलाफ फतवा लिख दिया कि उनकी सरकार और संगठन पूरी तरह असफल और निश्क्रिय हो चुके हंै जो उनकी नीतियों को जन-जन तक ले जाने में फेल हो चुके हंै। अपने ही हाथों अपने खिलाफ यह फतवा लिखकर यह उम्मीद करना कि पार्टी उनके ब्रिगेड गठित करने के फैसले का खुले मन से समर्थन करेगी अपने को ही धोखा देने से अधिक कुछ नहीं हो सकता है यह प्रमाणित हो गया। ब्रिगेड को इस तरह की वस्तुस्थितियों में भी समर्थन मिलने का जिसने भी आकलन किया होगा उसकी राजनीतिक समझ को लेकर कुछ नही कहा जा सकता। बल्कि इस ब्रिगेड के भंग कर दिये जाने से यह संदेश जाता है कि आज वीरभद्र के साथ चुने हुए विधायकों का समर्थन नही के बराबर है। बल्कि वही लोग उनके साथ हैं जो जिन्हे सत्ता में आने पर कुछ हासिल हुआ है लेकिन इन लोगों के सहारे सरकार नहीं चलाई जा सकती है। सरकार के लिये चुने हुए विधायकों का ही समर्थन चाहिये। आज ब्रिगेड के गठन और उसको भंग करने के दोनों ही फैसलोें से वीरभद्र और रणनीतिकारों की करारी हार हुई है बल्कि जिन लोगों को ब्रिगेड के नाम पर सामने ला दिया गया है कल को उनसे सवाल पूछे जायेंगे कि वह वीरभद्र की किन नीतियों के समर्थक हंै। क्योंकि भ्रष्टाचार के आरोपों से इस तरह के समर्थन से बाहर नहीं निकला जा सकता है।

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