Sunday, 21 June 2026
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आसान नही होगा अगले मुख्य सचिव और डीजीपी का चयन

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश वर्तमान मुख्य सचिव विनित चौधरी दो माह बाद सितम्बर में सेवानिवृत हो रहे हैं। उनके बाद प्रदेश का अगला मुख्य सचिव कौन होगा इसको लेकर अभी से चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। चौधरी 1982 बैच के अधिकारी हैं इनके बाद 1983 बैच के चार अधिकारी उपमा चौधरी, डा. आशा राम सिहाग, वीसी फारखा और डा. भारती सिहाग हैं 1984 बैच में तरूण श्रीधर और अरविंद मेहता हैं। इसके बाद 1985 बैच के चार अधिकारी हैं। 1987 बैच तक के सारे आईएएस अतिरिक्त मुख्य सचिव पदोन्नत हो चुके हैं। इस समय प्रदेश में 1983 बैच के केवल वीसी फारखा कार्यरत हैं बाकी सभी केन्द्र सरकार में हैं। 1984 बेच के भी दोनो अधिकारी केन्द्र मे हैं। 1985 बैच के तीन अधिकारी प्रदेश में कार्यरत है जिनमें डा. बाल्दी मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव हैं। इन्ही में से कोई प्रदेश का अगला मुख्य सचिव होगा। चर्चाओं के अनुसार 1985 बैच के जो अधिकारी प्रदेश में कार्यरत है उन्ही में से किसी की नियुक्ति हो जायेगी क्योंकि 1983 बैच के फारखा वीरभद्र के समय में मुख्य सचिव रह चुके हैं और उनकी नियुक्ति प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में होना तय मानी जा रही है।
लेकिन जब वीरभद्र के शासनकाल में विनित चौधरी को नज़रअन्दाज करके फारखा को मुख्य सचिव बनाया गया था जब चौधरी और दीपक सानन ने इस नियुक्ति को कैट में चुनौती दी थी। क्योंकि उस समय इस चयन के लिये जो सोलह अधिकारियों की सूची तैयार की गयी थी और तर्क दिया गया था कि यह सब अतिरिक्त मुख्य सचिव होने के नाते मुख्य सचिव के समकक्ष हो जाते हैं उस समय चौधरी ने कैट में यह कहा था कि

That the note artificially expands the list of officers who are eligible to be considered for appointment as Chief Secretary by including officers holding posts of Additional Chief Secretary that have been created in contravention of the IAS Pay Rules and the IAS Cadre Rules and Government of India instructions disallowing creation of posts in the apex grade under the 2nd proviso to Rule 4(2) of the IAS Cadre Rules.
That the note indicates that all 16 officers have been placed in the apex grade after due screening by the screening committee which is factually incorrect because respondent No. 3 Sh VC Pharka along with Respondent no 4, was granted the Chief Secretary's grade without any consideration by the Screening Committee and was, therefore, not eligible for being considered for appointment to the post of Chief Secretary.
That the note fails to draw attention to the fact that recommendation of the Civil Services Board was now mandatory for making any appointment to cadre posts after amendment in the IAS (Cadre Rules) in pursuance of the Supreme Court's judgment in the TSR Subramanian case and consequential amendments in the IAS Cadre Rules.
Two officers of the 1983 batch viz Upma Chawdhry and Vidya Chander Pharka were promoted to the Chief Secretary's grade on 04.03.2014 by upgrading two posts of Principal Secretary to the Govt out of which one post was to re-convert to the post of Principal Secretary on 30.4.2015. The apex scale was released without any assessment by the Screening Committee. As per information obtained under RTI, no information about the meeting of the Screening Committee is available with the State Govt.

इस तर्क के आधार पर तो आज भी वही स्थिति खड़ी है। मुख्य सचिव के बाद केवल तीन ही अन्य अधिकारी प्रदेश में अतिरिक्त मुख्य सचिव हो सकते हैं और यह दायरा 1983 बैच में ही पूरा हो जाता हैं
कैट में जो तर्क चौधरी ने रखा था लगभग उसी तर्ज पर कैग रिपोर्ट मेंं भी पहली बार अतिरिक्त मुख्य सचिवों की इतनी लम्बी सूची पर आपत्ति उठाई गयी है। जब मुख्य सचिव सहित केवल तीन ही अन्य अधिकारी अतिरिक्त मुख्य सचिव हो सकते हैं तो फिर इस बार भी मुख्य सचिव के लिये चयन का दायरा कैसे बढ़ पायेगा। जब वर्तमान मुख्य सचिव अगले मुख्य सचिव के चयन के लिये फाईल तैयार करेंगे तो वह अपनी ही याचिका में उठाये तर्क से बाहर कैसे जा पायेंगे। इसके लिये माना जा रहा है कि इस बार चयन का दायरा 1983 बैच के अधिकारियों तक ही सीमित होकर रह जायेगा। क्योंकि तब मुख्यमन्त्री 30 वर्ष का सेवाकाल पूरा कर चुके अधिकारियों को अतिरिक्त मुख्य सचिव पदोन्नत करने का दम नही दिखा पा रहे हैं तो मुख्य सचिव के चयन के लिये वह 1985 के अधिकारियों तक कैसे आ पायेंगे इसको लेकर चर्चाओं का दौर शुरू है।
ठीक ऐसी ही स्थिति डीजीपी के पद के चयन के लिये होने जा रही है। गुड़िया कांड के परिदृश्य में सामेश गोयल को डीजीपी के चयन के पद से हटाकर एसआर मरढ़ी को डीजीपी बनाया गया था। लेकिन जब इसी कांड के अभियुक्त शिमला के पूर्व एसपी डी डब्ल्यू नेगी को मिलने वीरभद्र के पूर्व सुरक्षा कर्मी पदम सिंह के साथ कैंथु जेल में मिलने पंहुच गये थे और उसका कड़ा संज्ञान लेते हुए डीजीपी जेल गोयल ने जेल अधीक्षक से जवाब तलब कर लिया जब यह विवाद कुछ और ही रूख ले गया। इसके बाद कसौली गोली कांड में फिर पुलिस की फजीहत हुई। इसी सबको सामने रखते हुए फिर नये डीजीपी की तलाश की चर्चाएं शुरू हो गयी। इन चर्चाओं के बीच संजय कुण्डु का नाम सामने आया। यहां तक चर्चाएं बाहर आ गयी की कुण्डु को प्रदेश में लाने के लिये मुख्यमन्त्री कार्यालय से पत्र लिखा गया। मुख्यमन्त्री कुण्डु के घर दिल्ली में नाश्ते पर भी हो आये है। यह भी चर्चा का विषय बन गया। यह प्रचारित हो गया कि कुण्डु को सचिवालय में मुख्यमन्त्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव के रूप में तैनाती दी जायेगी। इन्ही चर्चाओं के बीच कुण्डु दिल्ली से पद मुक्त भी हो गये। लेकिन पदमुक्त होने के साथ ही छुटटी पर भी चले गये।
अब सर्वोच्च न्यायालय ने भाजपा नेता अश्वनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने 2006 के प्रकाश सिंह और एन के सिंह के मामले में आये फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकारें अब कार्यकारी डीजीपी के रूप में कोई नियुक्ति नही कर सकेंगे। डीजीपी की नियुक्ति के लिये सरकार को तीन माह पहले पांच नामों का एक पैनल संघ लोक सेवा आयोग को भेजना होगा। आयोग उसमें से तीन नामों का चयन करके राज्य सरकार को भेजेगा और सरकार को उन्ही तीन नामों में से किसी एक को डीजीपी नियुक्त करना होगा। ऐसे में जो यह माना जा रहा था कि कुण्डु पर मुख्यमन्त्री का भरोसा बन गया है और वह ही आने वाले दिनों में प्रदेश के डीजीपी होंगे। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद यह संभावना समाप्त हो गयी है। ऐसे में अब प्रदेश को नया डीजीपी मिल पाता है या नहीं इसको लेकर स्थिति उलझ गयी है।

राज्य सहकारी बैंक ने दी कर्जदार को राहत और गारन्टर को सज़ा

शिमला/शैल। क्या कर्ज लेने वाले की संपत्ति को अटैच करने के बावजूद उसकी नीलामी से पहले कर्जदार की गारंटी देने वाले की संपत्ति को नीलाम किया जाना चाहिये? यह सवाल राज्य सहकारी बैंक की चम्बा शाखा में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बैंक से एक व्यक्ति प्रदीप, सुपुत्र प्यारे लाल ने एससीएसटी कारपोरेशन के माध्य से वर्ष में का ट्टण लिया। इस ऋण के लिये उसकी गारंटी भी उसके ससुर ने ही दी। लेकिन ससुर उत्तम चन्द ने इसकी जानकारी अपने परिवार तक को नही दी। दुर्भाग्यवश ऋण लेकर जो ट्रक टाटा 709 खरीदा था उसका छः माह बाद ऐक्सीडैण्ट हो गया और इस दुर्घटना में ट्रक का पूरा नुकसान हो गया। इस नुकसान के कारण कर्ज की किश्तों की अदायगी नही हो पायी। दुर्घटना के बाद इन्शोयरैन्स से क्लेम मिलने में भी कुछ समय लग गया। बैंक ने ऋण वसूली के लिये कर्जदार और गांरटी देने वाले दोनो के खिलाफ कारवाई शुरू की। यह कारवाई शुरू होने पर कर्जदार ने अदालत से लिखित में आग्रह किया कि जब तक क्लेम नही मिल जाता है इस कारवाई को रोक दिया जाये। यह भी आग्रह किया कि कर्ज वसूली के लिये उसकी गारंटी देने वाले के खिलाफ कारवाई न की जाये क्योंकि उसके अपने पास कर्ज चुकता करने के लिये पर्याप्त संपत्ति है।
इस पर कुछ समय के लिये वसूली की कारवाई स्थगित कर दी गयी। फिर इन्श्योरैन्स से 3.50 लाख क्लेम भी मिल गया जो सीधा बैंक को अदा कर दिया गया लेकिन इससे पूरा कर्ज चुकता नही हो पाया। संयोगवश इसके बाद गारंटी देने वाले की मौत हो गयी। उसकी मौत के बाद उसकी संपत्ति उसके बच्चों के नाम आ गयी। लेकिन तब तक भी परिवार को यह जानकारी नही हो पायी कि इस संपत्ति की गारंटी देकर प्रदीप कुमार ने बैंक से ऋण लिया है और उसकी अदायगी नही हुई है। यह जानकारी इसलिये बाहर नही आ पायी क्योंकि ऋण लेने वाला चम्बा की जिला अदालत में पैटीशन राईटर है और अपने प्रभाव के कारण किसी को भी यह जानकारी नही होने दी। क्योकि गारंटी देने वाला भी पढ़ा लिखा नही था केवल उर्दु में दस्तखत करने जानता था। अब जब बच्चों की संपत्ति की इस कर्ज गांरटी के कारण नीलामी की नौबत आ गयी तब परिवार को पूरे मामले का पता चला। परिवार ने अपने नाबालिग बच्चों के माध्यम से संपत्ति की नीलामी पर रोक लगवायी है। इस रोक के बाद कर्जदार की संपत्ति के बारे में जानकारी हासिल करके उसे बैंक और अदालत के संज्ञान में लायी है। इस संज्ञान के बाद कर्जदार की संपत्ति भी अटैच हो गयी है। यह संपति चम्बा शहर मे ही स्थित है और इसको नीलाम करके सारा ऋण चुकता हो जाता है लेकिन यह संपत्ति 16.2.2010 को अटैच हो गयी है।
लेकिन यह हो जाने के बावजूद भी बैंक ऋण धारक की संपत्ति को नीलाम करवाने के लिये आवश्यक कदम उठाने की बजाये गारंटी रखी हुई संपत्ति को ही नीलाम करवाने के कदम उठा रहा है। बैंक की इस बेइन्साफी के बारे में बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष हर्ष महाजन से भी इन लोगों ने लिखित में शिकायत की थी जिस पर आश्वासन के अतिरिक्त और कुछ हासिल नही हुआ है। एससीएसटी कारपोरेशन से भी इस बारे शिकायत की गयी लेकिन वहां भी कोई कारवाई नही हुई। बैंक के इस व्यवहार के कारण परिवार तनाव में चलन रहा है। परिवार बैंक से यह निवेदन बार बार कर चुका है कि यदि कर्जदार की अटैच की हुई संपत्ति की नीलामी कर्ज की पूरी अदायगी नही हो पाती है तो वह शेष बचे कर्ज को भरने के लिये तैयार हैं। लेकिन उनके इस आग्रह को बैंक स्वीकार नही कर रहा है। ऋण नियम साफ है कि यदि कर्जधारक की संपत्ति से कर्ज की पूरी वसूली नही हो पाती है तब गारंटी देने वाले की संपत्ति की नालीमी की नौबत आती है। बैंक स्थापित नियम और मानवीय दृष्टिकोण को नज़रअंदाज करके इस परिवार को क्यों कोई आत्मघाती कदम उठाने पर बाध्य कर रहा है यह एक चर्चा का विषय बना हुआ है। क्या बैंक जंगल राज की ओर बढ़ रहा है?

प्रशासनिक तबादलों ने फिर-उठाये सरकार की नीयत और नीति पर सवाल

शिमला/शैल। जयराम सरकार पर विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप यह लग रहा है कि सरकार अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादलों में ही उलझकर रह गयी है। यह आरोप कितना सही है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जनवरी से लेकर जून तक लगभग हर माह प्रशासनिक अधिकारियों तक के तबादले होते रहे हैं। बल्कि यहां तक होता रहा है कि आज आदेश जारी हुए तो कल ही कुछेक को फेन पर निर्देश दे दिये गये कि आपने अभी कार्यभार ग्रहण नही करना है। कई पदों पर तो यहां तक रहा है कि तीन-तीन, चार- चार बार अधिकारी बदले गये हैं। विपक्ष के आरोप का जवाब भी सरकार की ओर से यही आया है कि कांग्रेस के समय में भी यही होता था। कुल मिलाकर छः महीने के कार्यकाल के बाद भी प्रशासनिक अधिकारियों में स्थिरता का भाव नहीं आ पाया है और यही सरकार का सबसे नकारात्मक पक्ष चल रहा है।
प्रशासन में व्याप्त इसी अस्थिरता का परिणाम है कि सरकार अभी तक प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में खाली चले आ रहे सदस्यों के पदों को अब तक नहीं भर पायी है। क्योंकि इन पदों के लिये संभावित उम्मीदवारों के रूप में पूर्व मुख्य सचिव और वर्तमान मुख्य सचिव दोनो का नाम माना जा रहा है। वर्तमान मुख्य सचिव की सेवानिवृति सितम्बर माह मे है इसलिये चर्चा है कि ट्रिब्यूनल के पद सितम्बर के बाद ही भरे जायेंगे भले ही कर्मचारी न्याय के लिये बाट जोहते रहें। विश्वविद्यालय में अभी तक वाईसचान्सलर का चयन नही हो पा रहा है। लोकायुक्त और मानवाधिकार आयोग खाली चल रहे हैं जबकि इन पदों पर तो अब तक नियुक्तियां हो जानी चाहिये थी। इससे सुशासन को लेकर सरकार की छवि पर प्रश्नचिन्ह लगने शुरू हो गये हैं।
प्रशासन पर मुख्यमन्त्री की पकड़ कितनी बन पायी है और प्रशासन की आन्तरिक समझ सरकार को कितनी आ पायी है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जब सरकार ने पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव को सेवानिवृति से एक सप्ताह पूर्व तक की स्टडी लीव सारे नियमों/कानूनों को ताक पर रखकर दे दी। यह फैसला अपराध की श्रेणी में आता है पूरे प्रशासन में कर्मचारियों तक यह चर्चा का विषय बना हुआ है। इसी तरह अब आरसीएस के पद पर की गयी नियुक्ति को लेकर सवाल उठने शुरू हो गये हैं क्योंकि एचपीसीए कंपनी है या सोसायटी यह मामला अभी तक आरसीएस के पास फैसले के लिये लंबित चल रहा है। अब जिस अधिकारी को आरसीएस की जिम्मेदारी दी गयी है वह स्वयं एचपीसीए में नामजद है। एचपीसीए का मामला एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दे का रूप ले चुका है। क्योंकि वीरभद्र के पांच साल के सारे कार्यकाल में विजिलैन्स के पास एक प्रमुख मुद्दा रहा है। यह प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय तक भी पंहुचा हुआ है। सरकार इसमें एचपीसीए की मदद करना चाहती है जबकि कांग्रेस इस पर बराबर शोर करेगी। ऐसे में जब सरकार आरसीएस के पद पर ऐसी नियुक्ति करेगी तो इसका सीधा सा अर्थ होगा कि आप जानबझूकर कांग्रेस को एक मुद्दा दे रहे हैं। अप्रत्यक्षतः इससे यह भी संकेत जायेगा कि शायद एचपीसीए को लेकर सरकार की नीयत ही साफ नही है।
प्रदेश के सहकारी बैंकों में 900 करोड़ से अधिक का एनपीए हो चुका है। यह जानकरी जयराम सरकार के पहले बजट सत्र में एक प्रश्न के माध्यम से सामने आयी है। प्रश्न के उत्तर में एनपीए के यह आंकड़े दिये गये हैं। जिसका अर्थ है कि सरकार और बैंक प्रबन्धनों ने पूरी जांच पड़ताल के बाद ही यह जानकारी सदन को दी है। इस एनपीए पर अब कारवाई आगे बढ़ाने की बजाये सहकारी बैंको के प्रबन्ध निर्देशकों की नियुक्ति को ही सरकार स्थायी रूप से नही दे पा रही है। उधर प्रबन्धन को ही कुछ लोगों ने एनपीए को लेकर यह वकालत करनी भी शुरू कर दी है कि सबकुछ ठीक है और कोई घपला नही हुआ है। चर्चा है कि बैंको के पूर्व प्रबन्धन ने एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी के माध्यम से जयराम सरकार के शीर्ष प्रशासनिक स्तर पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके एनपीए की जांच को शुरू होने से पहले ही दबाने का पूरा प्रबन्ध कर दिया है। ऐसी ही स्थिति कई अन्य मामलों में भी है जिनका जिक्र बाद में उठाया जायेगा।
इस तरह प्रशासन में जो कुछ हो रहा है उसका प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष सारा प्रभाव राजनीतिक नेतृत्व पर ही पडे़गा। नेतृत्व को ही जनता में जवाब देना पड़ता है यह स्थिति मुख्य सचिव को लेकर उठे मामले में आ चुकी है। केन्द्र सरकार में किन कारणों से वह सचिव के पैनल में नही आ पाये हैं उसको लेकर राज्य सरकार की अपनी भूमिका बहुत सीमित है लेकिन जो कुछ केन्द्र में घटा है उसका यह आरोप तो लग ही गया है कि इससे अधिकारी की निष्ठा तो संदिग्धता के दायरे में आ जाती है। इस आरोप पर मुख्यमन्त्री को विवशता में बचाव में उतरना पड़ा है। आने वाले समय में ऐसे कई और मामले खड़े होंगे जहां इस तरह के बचाव में उतरना पड़ेगा। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि प्रशासन में जो स्थिरता अभी तक नही बन पा रही है वह महज़ संयोगवश है या उसके पीछे एक सुनिश्चित रणनीति काम कर रही है। क्योंकि यह अपने में ही हास्यस्पद हो जाता है कि पहले तो तबादले के आदेश जारी हो जायें और उसके तुरन्त बाद उनकी अनुपालना फोन करके रोक दी जाये। इससे यह सवाल उठता है कि क्या मुख्यमन्त्री ने आदेश करने से पूर्व इस पर पूरा विचार नहीं किया या फिर बाद में प्रशासन ने अपने ही स्तर पर फेरबदल कर लिये। वास्तविकता कुछ भी रही हो लेकिन आम आदमी पर इसको लेकर सरकार का प्रभाव अच्छा नही पड़ रहा है।

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