Sunday, 21 June 2026
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एच पी सी ए प्रकरण पर सरकार की गंभीरता सवालों में

शिमला/शैल। जयराम सरकार एचपीसीए के खिलाफ वीरभद्र शासनकाल में बनाये गये मामलों को वापिस लेने के लिये कितनी गंभीर हैं इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरकार के एडवोकेट जनरल ने सर्वोच्च न्यायालय को सरकार की मंशा से अवगत करवा दिया है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय से अभी इसके लिये हरी झण्डी नही मिली है। बल्कि जब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के लिये आया उस दिन पी चिदाम्बरम भी न्यायालय में उपस्थित रहे थे। इसके बाद दूसरी पेशी में अनूप चौधरी उपस्थित रहे। चिदाम्बरम और चौधरी दोनो ही वीरभद्र सिंह के वकील रहे हैं और इस मामले में एचपीसीए ने एक स्टेज पर वीरभद्र सिंह को भी प्रतिवादी बना रखा है। इस नाते एचपीसीए पर अपना पक्ष रखने का हक भी वीरभद्र सिंह को हासिल हो जाता है। क्योंकि वीरभद्र के पांच वर्ष के कार्यकाल की यही सबसे बड़ी उपलब्धि रही है कि विजिलैन्स ने न केवल एचपीसीए के खिलाफ मामले ही बनाये बल्कि उनको अदालत तक भी पहुंचा दिया। आज अदालत तक पहुंच चुके इन मामलों को वापिस लेना भी आसान नही रह गया है।
लेकिन इसी के साथ सरकार की नीयत और नीति को लेकर भी सवाल उठने शुरू हो गये हैं। क्योंकि एचपीसीए का एक सबसे बड़ा आज भी रजिस्ट्रार सहकारी सभाएं और उच्च न्यायालय के बीच लंबित चल रहा है। इसमें यह फैसला आना है कि एचपीसीए सोसायटी है या कंपनी। जयराम सरकार को भी सत्ता में आये चार माह हो गये हैं उच्च न्यायालय में एजी के साथ सरकार के वकीलों की पूरी टीम मौजूद है परन्तु इस मामले को फैसला शीघ्र आने के लिये कोई कदम नही उठाये गये हैं। यही नही एचपीसीए में जिन अधिकारियों के खिलाफ भी मामले बने थे सरकार ने इन अधिकारियों के खिलाफ मुकद्दमा चलाने की अनुमति वापिस लेने का फैसला लिया हैं सरकार ने अपने फैसले से विजिलैन्स को अवगत भी करवा दिया है लेकिन विजिलैन्स ने अभी अदालत के सामने सरकार के इस फैसलेे को नही रखा है। उच्चस्थ सूत्रों के मुताबिक विजिलैन्स इन मामलों को वापिस लेने के पक्ष में नही है। विजिलैन्स इस संद्धर्भ में सरकार के फैसले से सहमत नही है।
इसमें सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि सरकार ने भी अभी तक विजिलैन्स को इस बारे में पूछा ही नही है। ऐसा माना जा रहा है कि सरकार भी इसमे राजनीतिक औपचारिकता निभाने के अतिरिक्त और ज्यादा गंभीर नही है। क्योंकि यदि संवद्ध अधिकारी इन मामलों से किसी कारण से बाहर हो जाते हैं तो इनका अदालत में सफल होना स्वतः ही संदिग्ध हो जाता है और वीरभद्र के जो लोग इनमें अभियुक्त नामज़द है वह पहले ही मुख्य अभियुक्त न होकर खाना 12 में दर्ज हैं। इस परिदृश्य में जयराम सरकार का आरसीएस और उच्च न्यायालय में लंबित मामले में कोई त्वरित कदम न उठाना तथा विजिलैन्स का मुकद्दमें की अनुमति वापिस लेने के फैसलों को अभी तक अदालत में न ले जाना राजनीतिक अर्थो में कुछ और ही संकेत देता है।

अवैध निर्माणों पर अदालत द्वारा चिन्हित जिम्मेदार कर्मीयों के खिलाफ अब तक कारवाई क्यों नही

शिमला/शैल। कसौली हत्या कांड का कड़ा संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल राज्य सरकार को लताड़ ही लगायी है बल्कि पूरे प्रदेश में हुए अवैध निर्माणों और उनके खिलाफ की गयी कारवाई की भी रिपोर्ट तलब की है। शीर्ष अदालत ने कुल्लु , मनाली , कसोल, धर्मशाला और मकलोड़गंज में हुए निर्माणों का विशेष रूप से जिक्र किया है। स्मरणीय है कि जब 2016 में सरकार ने टीपीसी एक्ट में संशोधन करके इसमें धारा 30बी को जोड़ा था तब इसे 2017 में तीन अलग-अलग याचिकाओं CWP 612 of 2017, CWP 704 of 2017 तथा CWP 819 of 2017 के माध्यम से प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। इन याचिकांओं के माध्यम से उच्च न्यायालय के संज्ञान में लाया गया था कि इस संशोधन के माध्यम से सरकार अवैध निर्माणों के 35000 दोषीयों को राहत पहुंचाना चाहती है। उस समय सरकार ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए यह कहा था कि ऐसे लोगों को नोटिस देकर यह कहा गया है कि वह इन अवैध निर्माणों को स्वयं गिरा दें। लेकिन इसी के साथ यह भी कहा था कि ऐसा करने से कानून और व्यवस्था की स्थिति पैदा हो जायेगी लेकिन अदालत ने सरकार के तर्कों को खारिज करते हुए इस संशोधन को रद्द कर दिया था। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायमूर्ति त्रिलोक चौहान की खंडपीठ ने यह कहा कि In view of our aforesaid discussion, we hold that:

(i) Insertion of Section 30-B by the Amending Act is contrary to the object and purpose of the Principal Act, as also ultra vires the Constitution of India, as such we strike it down.

(ii) Judgment rendered in Consumer Action Group (supra) is clearly distinguishable, having no binding effect on the grounds of assailing the validity of the Amending Act.

(iii)&(iv) In view of specific finding in Shayra Bano (supra), holding the observations made in Binoy Viswam (supra) that arbitrariness cannot be a ground for invalidating a legislation, only to be in per incurium, as such, we hold the amendment to be violative of Article 14 of the Constitution, being manifestly arbitrary, irrational,illogical, capricious and unreasonable.
(v) Much, as we had desired, the amendment being totally ultra vires, cannot be saved by adopting the doctrine of severability. 

अदालत के इस फैसले के बाद अब जयराम सरकार ने भी उसी तरह संशोधन सदन से पारित करवा लिया है। जबकि अदालत ने इन अवैध निर्माणों के लिये दोषी अधिकारियों /कर्मचारियों के खिलाफ कारवाई करने की अनुशंसा की है जब अदालत में यह मामला चल रहा था तब प्रशासन ने ऐसे अवैध निर्माणों की शिनाख्त करके अदालत को सूचित भी कर दिया था। इस सूचना के बाद ही अदालत ने इन अवैध निर्माणों के बिजली, पानी काटने के आदेश दिये थे। इन अवैध निर्माणों की सूची में कई प्रभावशाली लोग शामिल हैं। इन्ही लोगों के दबाव में जयराम सरकार को यह संशोधन लाना पड़ा है। लेकिन उच्च न्यायालय के साथ ही एनजीटीे और फिर सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन अवैधताओं के लिये जिम्मेदार अधिकारियों/कर्मचारियों के खिलाफ कारवाई करने के आदेश किये हैं। शीर्ष अदालत ने तो ऐसे करीब एक दर्जन लोगों को सीधे नाम से चिन्हित करते हुए प्रदेश के मुख्य सचिव को इनके खिलाफ कारवाई करने के निर्देश दिये हुए हैं। 

लेकिन इन लोगों के खिलाफ न तो पूर्व मुख्य सचिव वीसी फारखा ने कोई कारवाई की और न ही अब विनित चौधरी कोई कारवाई करे पा रहे हैं। इन चिन्हित लोगों में टीसीपी, पर्यटन और प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के लोग हैं। सूत्रों की माने तो अब जब कसौली में इन निर्माणों को गिराये जाने के लिये जिलाधीश सोलन के आदेशों पर चार टीमें गठित की जा रही थी उस समय भी इन्ही चिन्हित लोगों में से कुछ अवैध निर्माणों के मालिकोे को यह आश्वासन दे रहे थे कि सब कुछ ठीक हो जायेगा। यह दावा किया जा रहा था कि सरकार कोई न कोई रास्ता निकाल लेगी। कसौली कांड के बाद जिस तरह के ब्यान आये हैं उनसेे भी यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि कहीं न कहीं किसी बड़े का आश्वासन अवश्य था और इसी बड़े के कारण मुख्य सचिव कोई कारवाई भी नही कर पा रहे हैं।

 

मकलोड़गंज पर अभी तक जिला जज ही नही दे पाये हैं जांच रिपोर्ट

शिमला/शैल। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से मैकलोड़गंज में हुए अवैध निर्माण पर रिपोर्ट तलब की है। मैकलोड़गंज के बी ओ टी के माध्यम से बने बस अड्डा प्रकरण की जांच सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदेश के मुख्य सचिव से लेकर कांगड़ा के जिला जज् को सौंपी थी। इस पर चार माह में रिपोर्ट जानी थी जो अब एक वर्ष से भी अधिक का समय बीत जाने के बाद भी नही गयी है। अब सरकार इसमें सर्वोच्च न्यायालय के सामने क्या तथ्य रखती है इस पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं। क्योंकि यदि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अनुपालना उसका अधीनस्थ जिला जज ही तय समय में न कर पाये तो फिर प्रशासनिक अधिकारियों से ऐसी अनुपालना की अपेक्षा कैसे की जा सकती है यह एक बड़ा सवाल सर्वोच्च न्यायालय के सामने रहेगा।
स्मरणीय है कि धर्मशाला के मकलोड़गंज में बीओटी के आधार पर बन रहे बस अड्डा और चार मंजिला होटल तथा शाॅपिंग कम्पलैक्स के निर्माण को एक अनुज भारद्वाज ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित सीईसी में चुनौती दी थी। इसमें यह आरोप लगाया गया था कि यह निर्माण वनभूमि पर हो रहा है और इसके लिये वन एवम् पर्यावरण अधिनियम के तहत वांच्छित अुनमति नही ली गयी है। इस मामलें पर सीईसी ने अपनी रिपोर्ट 18 सितम्बर 2008 को सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी थी। इस रिपोर्ट में पूरे निमार्ण पर कानूनी प्रावधानों की घोर उल्लंघना के गंभीर आरोप लगे है। इस उल्लंघना में पूरे संवद्ध प्रशासन की भी मिली भगत पायी गयी है। इस उल्लंघना के लिये प्रदेश सरकार को एक करोड़ का जुर्माना लगाया गया था और निर्माण कर रही कंपनी मै. प्रशांती सूर्य को ब्लैक लिस्ट किया गया था।
सीईसी की इस रिपोर्ट को प्रशांती सूर्य ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जिस पर मई 2016 में फैसला आया। इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने मै. प्रशांती सूर्य को 15 लाख का जुर्माना लगाया और बस अड्डा प्रबन्धन एवम् विकास अथॅारिटी पर दस लाख और पर्यटन विभाग पर भी पांच लाख का जुर्माना लगाया। जुर्माने के साथ इसमें बन रहे होटल और रेस्तरां को गिराने के भी आदेश पारित किये हैं। इसी के साथ प्रदेश के मुख्य सचिव को पूरे प्रकरण की जांच करके बस अड्डा प्राधिकरण के संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करके उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कारवाई की अनुशंसा की है।
बस अड्डा प्राधिकरण ने सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले की फिर से अपील की। इस अपील की सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पहले फैसले को संशोधित करते हुए इसकी जांच मुख्य सचिव से लेकर जिला जज धर्मशाला को सौंप दी और चार माह में इसकी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को सौंपने के निर्देश दिये। यह निर्देश 2017 में दिये गये थे और करीब एक वर्ष हो गया है। लेकिन यह रिपोर्ट अभी तक नहीं जा सकी है। इस संबंध में जब जिला जज के कार्यालय से संर्पक किया तो उन्होने कहा कि उन्हे इसकी जानकारी ही नही है। जिला जज से इस बारे में बात नही हो सकी। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के वाबजूद जिला जज द्वारा चार माह में रिपोर्ट न सौंपा जाना प्रशासनिक हल्कों में चर्चा का विषय बना हुआ है। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के इन आदेशों के बाद जिला जज द्वारा सरकार से इस मामले में सहायता के लिये एक वकील मांगा गया था जो सरकार ने उपलब्ध करवा दिया था। यह वकील भी एक वर्ष पहले दे दिया गया था लेकिन इसके वाबजूद इसमें अभी तक और कोई कारवाई नही हो पायी है। यदि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अनुपालना तय समय के भीतर जिला जज द्वारा भी न हो पाये तो स्वभाविक रूप से यह चर्चा का विषय तो बनेगा ही।We accordingly modify our order dated 16.05.2016 and direct the District Judge to hold an inquiry into the conduct of all officers responsible for the construction of the bus stand /hotel /accompanying complex and to submit a report to this Court as to the circumstances in which the alleged construction was erected and the role played by the officers associated with the same. The District Judge may appoint a suitable presenting officer to assist him in the matter. We further direct that the Government of Himachal Pradesh and the petitioner authority shall render all such assistance as may be required by the District Judge in connection with the inquiry and produce all such record and furnish all such information as may be requisitioned by him. Needless to say that the District Judge shall be free to take the assistance of or summon any official from the Government or outside for recording his/ her statement if considered necessary for completion of the inquiry. The District Judge is also given liberty to seek any clarification or direction considered necessary in the matter. He shall make every endeavour to expedite the completion of the inquiry and as far as possible send his report  before this Court within a period of four months from the date a copy of this order is received by him.

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