Saturday, 20 June 2026
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रेणु साहनी धर और सी पी सुजाया की कडी में उपमा चौधरी


शिमला/शैल। प्रदेश का मुख्यसचिव कौन होता है इस पर प्रदेश की निगाहें लगी हुई हैं। मुख्यमंत्राी किस पर अपना भरोसा जताते हैं और उस भरोसे का आधार क्या रहेगा इसका खुलासा तो आने वाले दिनों में आमने आयेगा। लेकिन यह तय माना जा रहा है कि वीरभद्र शासन में किसी महिला का मुख्यसचिव बन पाना संभव नही है। इस समय वरियता में सानन और विनीत चौधरी के बाद उपमा चौधरी का नाम आता है। उपमा का दामन एक-दम पाक साफ है। उसकी एसीआर भी outstanding है। लेकिन इसके बावजूद भी मुख्यमंत्राी उस पर भरोसा जताने को तैयार नहीं है। माना जा रहा है कि वीरभद्र की नजरे इनायत उनके करीबी वी सी फारखा पर रहेगी।
लेकिन इस मौके पर सचिवालय के गलियारों से लेकर सकैण्डल तक एक चर्चा अवश्य आ गई है। और इस चर्चा में पूर्व में मुख्यसचिव पद के लिए नजरअन्दाज हुई दो महिला अफसरों का नाम सबकी जुबान पर आ गया है। पुर्व में वरिष्ठ आई ए एस अधिकारी रेणु साहनी धर और सी पी सुजाया के नाम लोग याद कर रहे हैं। इन अधिकारियों को भी मुख्य सचिव की ताजपोशी से वंचित रखा गया था। आज यदि वी सी फारखा मुख्य सचिव का पद पाने में सफल हो जाते हैं तो कांग्रेस और वीरभद्र के साथ यह जुड़ जाएगा कि वह महिला अधिकारियों को मुख्य सचिव जैसे पद के योग्य ही नहीं मानते हैं क्योंकि उपमा चौधरी का नाम इस कड़ी में तीसरा जुड़ जायेगा।
इस समय आई ए एस और आई पी एस तथा अन्य सेवाओं में दर्जनों महिला अधिकारी है।। इन अधिकारियों के मनोबल पर किस तरह का असर पडेगा और यह अधिकारी कांग्रेस और वीरभद्र सिंह को लेकर इस सं(र्भ में किस तरह की धारणा बनाते हैं इसका खुलाया भी आने वाले दिनों में ही सामने आयेगा। लेकिन इन दिनों बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ आदि के जो कार्यक्रम चल रहे हैं उन कार्यक्रमों पर भी यह सवाल तो अवश्य ही उठेगा कि क्या हम ईमानदारी से ही इन कार्यक्रमों को अंजाम दे रहे हैं या फिर केवल एक रस्म अदायगी ही निभाई जा रही है। उधर कुछ सिरफिरे इस नजरअन्दाजी को आने वाले चुनावों में कांग्रेस और वीरभद्र के महिला आदर सम्मान की सच्चाई के रूप में भी भुनाने का प्रयास करने की योजना अभी से ही बनाने लगे हैं।

दिल्ली उच्च न्यायालय का वीरभद्र को दस्तावेज देने से इन्कार और हिमाचल उच्च न्यायालय ने आनन्द चौहान से पूछा मेनटेनेविलिटीे का आधार


शिमला/शैल। सीबीआई और ई डी द्वारा वीरभद्र के आवास और अन्य स्थानों पी की गयी छापामारी के आधार बने तथा जांच के दौरान जुाये गये दस्तावेज उन्हे सौंपने की गुहार दिल्ली उच्च न्यायालय से लगाई थी जिसे अन्ततः अदालत ने अस्वीकार कर दिया है। 

लेकिन यह रिकार्ड अदालत के सामने अश्वय रखा जायेगा जिससे यह सन्तोष किया जा सके की जांच ऐजैन्सी ज्याती नही कर रही है। अदालत ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि जांच के दौरान रिकार्ड देने का कोई प्रावधान नही है। इस अस्वीकार का असर ई डी द्वारा की गयी संपति अटैचमैन्ट के आदेश को निरस्त करने की गुहार पर भी पड सकता है दिल्ली उच्च न्यायालय के इस अस्वीकार के बाद यह माना जा रहा है कि अब जल्द ही चालान अदालत तक पहुंच जायेगा। क्योंकि 173 सी आर पी सीे के तहत जो रिपोर्ट अदालत में फाईल होने की जो अनिवार्यता ई डी के 2002 के मूल अधिनियम में थी वह जनवरी 2013 में अधिसूचित हुए संशोधन में समाप्त कर दी गयी है।
दूसरी ओर वीरभद्र के साथ सह अभियुक्त बने आनन्द चौहान और चुन्नी लाल ने भी मामलों में अब हिमाचल उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर अपने लिये उसी तर्ज पर राहत मांगी है। प्रदेश उच्च न्यायालय में इतनी देर बाद आयी इस याचिका पर रजिस्ट्री में कुछ एतराज लगाये गये थे जिन्ह दूर करने के बाद सुनवाई के लिये आयी इस याचिका पर अदालत ने इसकी मेनटेनेविलिटी का आधार आनन्द चैहान से पूछा है। इस याचिका पर प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक हल्कों में अलग तरह की अटकलों का दौर चल पड़ा है।
क्योंकि यदि आनन्द चैहान और चुन्नी लाल ने यह याचिका उसी समय डाल दी होती जब वीरभद्र को राहत मिली थी तब इसको लेकर कोई और सवाल न उठते। लेकिन अब जब यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में ट्रांसफर हो चुका है तब भी इस याचिका का हिमाचल उच्च न्यायालय में दायर किया जाना कई सवालों का जन्म देता है क्योंकि जब यह याचिका हिमाचल उच्च न्यायालय में सुनवाई के लिये आयी उसी दिन दिल्ली उच्च न्यायालय मे ईडी ने वीरभद्र सिंह, प्रतिभा सिंह, आनन्द चैहान, चुन्नी लाल और विक्रमादात्यि तथा अपराजिता सिंह को तलब कर रखा था। इस पूरे परिदृश्य में यह माना जा रहा हैं कि इस प्रकरण में शीघ्र ही कुछ बड़ा घटने वाला है।

सचिवालय से मन्त्री नदारद क्यों

शिमला/शैल। वीरभद्र के मन्त्री प्रदेश सचिवालय से अकसर नदारद देखे जा रहे हैं। मीडिया में यह नदारदगी सुर्खियां भी बटोर चुकी है। इस पर वीरभद्र कई बार मन्त्रियों को नसीहत और निर्देश भी जारी कर चुके हैं कि वह कम-से-कम सप्ताह में तीन दिन सचिवालय में रहकर लोगों की समस्याएं सुनें और उन पर काम करें। सुधीर शर्मा पर तो मुख्यमन्त्री गैर हाजिरी को लेकर व्यंग्यात्मक उलाहना भी कर चुके है। लेकिन मुख्यमन्त्री के निर्देशों का विद्या स्टोक्स और धनीराम शांडिल के अतिरिक्त और किसी पर कोई असर नही हुआ है और इनका यह है कि इनके पास और कहीं जाने की जगह ही शायद नहीं है। मन्त्रियों का असर बड़े बाबूओं पर भी बराबर देखने को मिल रहा है कुछ अधिकारी तो नियमित रूप से हर सप्ताह दो-तीन दिन तक सचिवालय में नदारद रहते हैं। मजे कि बात तो यह है कि यह मन्त्राी लोग अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों के बाहर भी नहीं देखे जा रहे हैं।
सचिवालय से मन्त्रियों का लगातार नदारद रहना जनता के लिए चिन्ता और चिन्तन का विषय बनता जा रहा है। क्योंकि मुख्यमन्त्री भी यदि दिल्ली की यात्रा पर नहीं है तो वह भी प्रदेश के किसी-न-किसी विधानसभा क्षेत्रा के दौरे पर ही रहते हैं। मुख्यमन्त्री के निर्देशों का उनके मन्त्रियों पर असर क्यों नही हो रहा है जब इस बारे थोडी जानकारी जुटायी गई तो यह सामने आया है कि वीरभद्र के मन्त्री ही मुख्यमन्त्री की हर गतिविध् िपर पूरी बारीकी से नजर रख रहे हैं। दिल्ली में सीबीआई और्र इ. डी. के मामलों में कब क्या हो रहा है यह उनको वीरभद्र से ज्यादा जानकारी है। मुख्यमन्त्री कब हाई कमान के किस सूत्र से मिल रहे हैं और हाई कमान का नजरिया उनको लेकर क्या चल रहा है इसकी भी पूरी खबर ये लोग रख रहे हैं। कुछ लोग तो कपिल सिब्बल और सलमान खुर्शीद के माध्यम से इनके केसों की भी पूरी जानकारी रख रहे हैं। ऐसे ही एक जानकार का दावा है कि इन वकीलों ने वीरभद्र के साथ-साथ हाई कमान को भी इन केसों के संभावित अन्तिम परिणामों से आगाह भी कर रखा है। चर्चा है कि इसी सबको सामने रख कर वीरभद्र सिंह ने हाई कमान को पंजाब से पहले ही प्रदेश विधानसभा के चुनाव करवा लिए जाने का सुझाव तक दे रखा है। छठी बार मुख्यमन्त्री बने वीरभद्र की राय को हाई कमान ने पूरी गम्भीरता से लिया है। लेकिन इनकी जानकारी जैसे ही बाकी मन्त्रियों तक अपने-अपने सूत्रों से पहुंची है तभी से उन्होने भी अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों का रूख कर लिया है।

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