Saturday, 20 June 2026
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अरूण धूमल कौन है - बहुत कमजोर प्रतिक्रिया है वीरभद्र की

शिमला /शैल। पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल के बेटे अरूण धूमल की मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और उनके परिवार के खिलाफ आक्रामकता फिर से बढ़ने लगी है। शिमला में वीरभद्र सिंह द्वारा 1974 में हाॅलीलाज पांच हजार
में बेचे प्लाट को 2007 में हिमाचल सरकार द्वारा 25 लाख में अधिग्रहण कर लिए जाने का मुद्दा उछालने के बाद ऊना में पत्रकार वार्ता में ई डी द्वारा दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में अटैच की गई अचल सम्पति का मुद्दा उछालकर वीरभद्र को प्रतिक्रिया देने पर विवश कर देना राजनीतिक सन्दर्भाें में अरूण धूमल की एक बडी सफलता है। अरूण धूमल के आरोपों का यह जवाब देना की अरूण धूमल कौन है वीरभद्र के स्तर के मुताबिक एक बहुत ही कमजोर प्रतिक्रिया है। बल्कि इससे अपरोक्ष में यह प्रमाणित हो जाता है कि इन आरोपों का कोई जवाब ही नहीं है क्योंकि छोटे धूमल ने हर आरोपों के दस्तावेजी प्रमाण मीडिया के साथ जारी किए हैं। अरूण धूमल के आरोपों पर मोहर लगाते हुए भाजपा विधेयक ने भी वीरभद्र सिंह को चुनौति दी है कि वह इन आरोपोे पर मानहानि का मामला दायर करने का साहस दिखाए। अरूण धूमल और भाजपा के साथ ही एच पी सी ए ने भी वीरभद्र और उनके बेटे विक्रमादित्य के खिलाफ जोरदार हमला किया बल्कि पहली बार एच पी सी ए ने बिना नाम लिए शान्ता कुमार के खिलाफ भी निशाना साधा है।वीरभद्र पर हो रहे इन हमलों में कांग्रेस संगठन की और से कोई भी उनके बचाव में नहीं आया है।

वीरभद्र की और से आयी कमजोर प्रतिक्रिया पर यह सवाल उठता है कि क्या वीरभद्र और उनकी सरकार के पास धूमल परिवार के खिलाफ कुछ भी नहीं है? जबकि वीरभद्र बार बार धूमल सम्पतियों की जांच को लेकर बड़े बड़े ब्यान दागते रहे हैं। विजिलैन्स ने भी धूमल सम्पतियों की जांच को लेकर छपे समाचारों का कभी प्रतिवाद नहीं किया है। राजनीति का यह स्वभाविक नियम है कि अपने विरोधी के आरोप को सीधे नकारने के साथ ही उसके खिलाफ इतना बड़ा और जोरदार आरोप लगा दो कि उसके आगे आपका आरोप स्वतः ही छोटा पड़ जाए। वीरभद्र और उनकी पूरी टीम इस मोर्चे पर बुरी तरह असफल सिद्ध हो रही है। इससे यह प्रमाणित होता है कि या तो यह टीम पूरी तरह खाली है या फिर वीरभद्र के प्रति उनकी निष्ठाएं बदल चुकी हैं। इसमें चाहे जो भी स्थिति हो यह अन्ततः वीरभद्र के लिए घातक सिद्ध होगी।
इस समय वीरभद्र और उनके परिवार के खिलाफ सी बी आई और ई डी में दर्ज मामलों की जांच चल रही है। कानूनी प्रतिक्रियाओं का पूरा पूरा लाभ उठाकर इस मामले को यहां तक खींचने में भले ही सफल हो गये हों पर इस मामले को खत्म नहीं करवा पाए हैं। आज जो बड़े बाबू वीरभद्र के चारों ओर घेरा डालकर बैठे हैं उनका अपना स्वार्थ इतना भर ही है कि किसी तरह मुख्यमन्त्री अपना यह कार्यकाल पूरा कर लें। इस कार्यकाल के बाद इन मामलों में उनके परिवार का क्या होता है इससे इस टीम का कोई लेना देना नहीं है। संगठन के तौर पर भी वीरभद्र के गिर्द पुराने हारे हुए नेताओं की एक ऐसी टीम संयोगवश खड़ी हो चुकी है जिसने आगे चुनाव लड़ना ही नहीं है। इस टीम का स्वार्थ भी इतना मात्र ही है कि जब तक वीरभद्र सत्ता में बने रहेंगे तब तक ही उन्हें लाभ मिलता रहेगा। लेकिन जैसे जैसे धूमल/ भाजपा का अटैक वीरभद्र के खिलाफ बढ़ता जाएगा उसी अनुपात में अदालत और जांच एजैन्सीयों पर भी उसका असर पड़ता जाएगा। क्योंकि जब कोई दस्तावेजी प्रमाण मीड़िया के माध्यम से सार्वजनिक होते जाते है तब उन्हे नजर अन्दाज कर पाना संभव नहीं रह जाता है। आज वीरभद्र हर रोज इस तरह की स्थिति में घिरते जा रहे हैं और बहुत सम्भव है कि निकट भविष्य में उनके कुछ विश्वस्तों के खिलाफ भी ऐसे ही हालात देखने को मिलें। क्योंकि सूत्रों की माने तो कई पुराने मामलों को ताजा करने की रणनीति पर काम चल रहा है जिसके परिणाम और भी घातक होंगे। माना जा रहा है कि पिछले दिनों एक पत्रकार के माध्यम से वीरभद्र, धूमल और विक्रमादित्य के बीच में हुई बैठक में जो कुछ भी तय हुआ था उसका तत्कालिन लाभ तो कुछ को मिल गया था लेकिन अब उस बैठक से वीरभद्र के अतिरिक्त अन्य सभी पल्ला झाड़ रहें हैं क्योंकि इस बैठक के बाद बड़ी विजयी मुद्रा में उस पत्रकार को कहा था कि अब भविष्य में अरूण धूमल की जुबान बन्द रहनी चाहिए। लेकिन अरूण धूमल की पत्रकार वार्ताओं से स्पष्ट हो गया है कि यह सब बीते कल की बात हो गई है। राजनीति में इसके कई अर्थ निकलते हैं।

केजरीवाल बनाम भाजपा-कांग्रेस

शिमला। आज की राजनीति में केजरीवाल एक ऐसा नाम बन गया है जिसका किये बिना कोई भी राजनीतिक चिन्तन /बहस पूरी नहीं हो सकती। ऐसा इसलिये हैे कि 2014 के लोकसभा चुनावों में देश की जनता भाजपा के पक्ष में एकतरफा फैसला देकर जो संकेत दिया था उसे दिल्ली और बिहार विधान सभा चुनावों में एकदम पलट दिया। दिल्ली में केजरीवाल की आप ऐसा राजनितिक इतिहास रचा है शायद उसे ’’आप’’ भी दूसरी बार दोहरा सके। बिहार में भी आप ने स्वयं चुनाव न लडकर नीतिश, लालू और कांग्रेस के गठबधन को सक्रिय समर्थन देकर अपने को राजनीतिक गणना और विश्लेषण में बनाये रखा है। आज आप पंजाब विधानसभा चुनावों के लिये कांग्रेस तथा अकाली भाजपा गठनबन्धन के विकल्प के रूप में चर्चित होता जा रहा है। पंजाब की अंतिम राजनीतिक तस्वीर क्या उभरती है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन यह तय है कि वहां पर आप को अनदेखा करना संभव नही है। 2014 के लोक सभा चुनावों में आप पहली बार राजनीतिक पटल पर उभरी और आज भाजपा -कांग्रेस के संभावित विकल्प की गणना तक पहुंच चुकी है। यह अपने में एक बडी उपलब्धि है । आप को इस मुकाम तक पहुंचाने मे केजरीवाल की भूमिका प्रमुख रही है। बल्कि यह कहना ज्यादा संगत होगा कि कांग्रेस के अन्दर जो स्थान नेहरू गांधी परिवार का है आप में वही स्थान केजरीवाल का बनता जा रहा है। केजरीवाल एक तरह से आप का प्लस और माईनस दोनों बन चुका है। ऐसा होने के बहुत सारे कारण है जिन पर चर्चा की जा सकती है। केजरीवाल का बतौर मुख्य मन्त्री अपने पास एक भी विभाग को न रखना । एक ऐसा हथिहार बन गया है जिसके कारण वह निःसंकोच भ्रष्टाचार की हर शिकायत पर कारवाई करने का दम दियाा रहे है।
लेकिन आज आप को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने के लिये उन्हें हर राज्य में अपनी टीम का चनय करते समय यह ध्यान रखना होगा कि वहां भी उन्हेे दूसरे केजरीवल ही मिले। आज केजरीवाल और मोदी की केन्द्र सरकार में हर समय टकराव चल रहा है। केजरीवाल के 67 विधायकों की टीम में बहुत सारे चेहरे ऐसे भी रहे होगें जिनके बारे में सारी जानकारियां उनके विधायक बनने के बाद मिली हो क्योंकि चुनाव के समय एक लहर थी जिसमें गुण दोष की परख कर पाना संभव नहीं था। लेकिन आज अन्य राज्यों में संगठन खडा़ करते समय गुण दोष को नजर अन्दाज करना हितकर नही रहेगा। केजरीवाल ने जिस तरह से भाजपा के नितिन गडकरी के खिलाफ पूर्ति उ़द्योग समूह को लेकर हमला बोला था उसके कारण गडकरी को अध्यक्षता का दूसरा कार्यकाल नहीं मिल पाया था। लेकिन गडकरी ने जब अपने उपर लगे आरोपों को लेकर अदालत में मानहानि दायर किया तब केजरीवाल को वह आरोप प्रमाणित करने भारी पड गये थे। परन्तु अब जब उसी तर्ज पर केजरीवाल ने क्रिकेट के मुद्दे पर अरूण जेटली को घेरा है तब स्थितियां अलग है। क्योंकि आज दिल्ली सरकार की अपनी जांच रिपोर्ट और भाजपा सासंद कीर्ति आजाद के जेटली पर आरोप केजरीवाल के स्टाक में मौजूद है।
लेकिन जिस ढंग से केजरीवाल ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चुनौति दे रखी उसका राजनीतिक बदला लेने के लिये भाजपा राज्यों में अपने लोगों को आप मे भेजने की रणनीति बनाकर आप को तोड़ने का प्रयास अवश्य करेगी । क्योंकि भाजपा औकर आप का सत्ता में आना अन्ना आन्दोलन का ही प्रतिफल है । लेकिन यह भी एक कडवा सच है कि अन्ना का सारा आदोंलन संघ प्रायोजित था और आज उसी आन्दोलन का नाम लेकर भाजपा और उसके समर्थित संगठनों के लेाग आप में घुसने का प्रयास करेगें ।क्योंकि आज भाजपा को जो राजनितिक चुनौती आप से है वह कांग्रेस से नहीं है। भले ही कांग्रेस आज भी सबसे बडा राजनितिक संगठन है और भाजपा जन समर्थन खोती जा रही है लेकिन कांग्रेस के ऊपर भ्रष्टाचार के जो आरोप लग चुके है उनके साये से वह अभी तक उक्त नहीं हो पायी है। कांग्रेस ने अपने किसी भी नेता को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते हटाया नही बल्कि यदि ध्यान से देखा जाये तो मोदी सरकार ने भी कांग्रेस पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर से ध्यान हटाना शुरू कर दिया है। जबकि देश में सत्ता परिवर्तन भ्रष्टाचार के कारण हुआ है। लेकिन आज भ्रष्टाचार की जगह कुछ दूसरे मुद्दे उछाल दिये गये है और भ्रष्टाचार पृष्ठभूमि में चला गया है। केजरीवाल और आप को भाजपा और कांग्रेस का विकल्प बनने के लिये इस स्थिति पर विचार करना होगा।

अरूण धूमल ने फिर खोला मोर्चा, वीरमद्र पर लगाये आरोप

1974 में बेचे प्लाट पर उठाये सवाल

शिमला/शैल। पूर्व मुख्यमन्त्री और नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल के छोटे बेटे अरूण धूमल ने एक बार फिर वीरभद्र सिंह के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए दावा किया है कि अभी तो ई.डी. ने केवल आठ करोड़ की संपति ही अटैच की है लेकिन इसमें निकट भविष्य में जो खुलासे वह करेगें उससे संपति का दायरा हजारों करोड़ हो जायेगा। वीरभद्र पर अपने नये हमले को मिशन 2016 का नाम देते हुए इसे शीघ्र ही अंजाम तक पहुंचाने का दावा किया है। हमले की पहली कड़ी में अरूण धूमल ने वीरभद्र सिंह द्वारा 1974 में अपने जाखू स्थित आवास हाॅलीलाज में 1341.57वर्ग मीटर भूमि पांच हजार में कुमार सेन निवासी दीवान चन्द भलैक को बेचने का खुलासा किया। इस खुलासे में धूमल ने जानकारी दी की जमीन तो बेच दी मगर इसके खरीददारों को यंहा पर कोर एरिया के नाम पर मकान बनाने की अनुमति नहीं लेने दी अैार अन्ततः 2007 के अपने शासन काल में महज तीन माह में ही इस जमीन का 25,74,179.00 रूपये में प्रदेश सरकार द्वारा अधिग्रह करवा दिया। इस अधिग्रहण का मकसद नगर शिमला के वन क्षेत्र का विस्तार करना कहा गया है।
1974 में पांच हजार में बेची ज़मीन का 2007 में 25 लाख में प्रदेश सरकार द्वारा वानिकी के नाम पर अधिग्रहण करना और आज तक उसमें एक भी पेड़ का न लगाया जाना वीरभद्र और उनकी सरकार की नीयत और नीति पर कई गंभीर सवाल खडे़ करता है। इसमें एक रोचक तथ्य यह है कि इस जमीन के मालिकों ने अधिग्रहण का विरोध किया था और इसे लेकर अदालत तक पहुंच चुके हैं। लेकिन अधिग्रहण नियमों में यह प्रावधान है कि यदि अधिगृहित की गयी जमीन का उद्देश्य तीन वर्षाें में पूरा नहीं होता है तो ज़मीन मालिक को वापिस दिये जाने का भी नियमों में प्रावधान है इस जमीन को लेकर यह भी सवाल उठा है कि जब इसी हाॅलीलाज क्षेत्र में वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य को गैस्ट हाऊस निर्माण की दो-दो अनुमतियां मिल सकती हैं तो फिर इन लोगों को मकान बनाने की अनुमति क्यों नहीं मिली। वैसेे 1974 के बाद प्रदेश में दो बार शान्ता कुमार और दो ही बार धूमल की सरकारें भी सत्ता में रह चुकी हैं। नगर निगम के मुताबिक विक्रमादित्य को गैस्ट हाऊस की पहली अनुमति 2011 में धूमल के शासन में मिली थी।
अरूण धूमल ने विक्रमादित्य के निमार्णधीन गैस्ट हाऊस को लेकर यह भी सवाल पूछा कि यह गैस्ट हाऊस तोअभी बन ही रहा है फिर पाॅवर कंपनी को किराये पर कौन सा गैस्ट हाऊस दिया गया था? अरूण धूमल के यह नये हमले कब तक चलते हैं और इनका परिणाम क्या निकलता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि अब यह बात दूर तक जायेगी। क्योंकि इस बीच धूमल और वीरभद्र में पत्रकार शशी कान्त की मध्यस्थता के परिणामस्वरूप सीजफायर हो चुका था। लेकिन अब यह सीजफायर उस वक्त टूटा है जब ई.डी. आठ करोड़ की संपतियां जब्त कर चुका है और वीरभद्र की विजिलैन्स धूमल को नोटिस भेजने की रस्म अदायगी कर चुकी है। अरूण धूमल ने इस नोटिस पर विजिलैन्स अधिकारियों को इसके परिणाम भुगतने के लिये भी तैयार रहने की चेतावानी दी है। अरूण धूमल निकट भविष्य में वीरभद्र प्रकरण में क्या नये खुलासे करते हैं यह तो वक्त ही बतायेगा। लेकिन इतना तय है कि अब इसमें शीघ्र ही कुछ नया देखने को मिलेगा।

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