Saturday, 20 June 2026
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क्या भाजपा अपने आरोप पत्र पर कारवाई के लिये शपथ पत्र के साथ लोकायुक्त या धारा 156(3) के तहत अदालत का रूख करेगी?

शिमला/बलदेव शर्मा
वीरभद्र सरकार के चार वर्ष पूरे होन पर जहां सरकार ने इस अवसर पर धर्मशाला में अपनीे उपलब्धियों का ब्योरा प्रदेश की जनता के सामने रखा है वहीं शिमला में भाजपा ने इन चार वर्षों में हुए भ्रष्टाचार को एक आरोप पत्र के माध्यम से राज्यपाल के संज्ञान में लाकर इस पर जांच की मांग की है। सरकार का मुख्य दायित्व होता है जनता के विकास के लिये काम करना, उनके जानमाल की रक्षा करना और कानून एवम व्यवस्था बनाये रखना। लोकतन्त्रिक व्यवस्था में सरकार का यह सवैंधानिक दायित्व होता है। अपना दायित्व निभाकर सरकार लोगों पर कोई मेहरबानी नही करती इसलिये सरकार द्वारा किये गये कार्यों को सरकार की उपलब्धि कहना सही नही है। इसी तरह विपक्ष का दायित्व रहता है कि सरकार के हर काम पर बारीक नजर रखे और किसी भी काम में कोई भ्रष्टाचार न होने दे। जहां भी भ्रष्टाचार सामने आये उस पर कड़ी कारवाई सुनिश्चित करवाये किसी भी सरकार ओर उसके विपक्ष का आकलन इन्ही मानकों पर होता है।
सरकार की उपलब्धियां कितनी सही मायनों में जमीन पर है और कितनी केवल कागजों पर ही हैं इसकी प्रत्यक्ष जानकारी जनता को अपने आस - पास हुए विकास से मिल जायेगी। जनता को सरकार की येाजनाओं का प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष लाभ कितना मिला है इसकी भी उसे सीधी जानकारी मिल जाती है क्योंकि वही इनकी मुक्त भोगी होती है। लेकिन इस सबको अमलीशक्ल देते हुए किस स्तर पर कितना घपला-घोटाला हुआ है इसकी उसे कोई सीधी जानकारी नहीं रहती है। इसके लिये वह मीडिया और विपक्ष पर निर्भर करता है क्योंकि इन्ही दो से यह अपेक्षा रहती है कि वह सरकार के कामकाज पर नज़र रखते हुए उसे भ्रष्टाचार करने सेे रोके और उसकी जानकारी जनता के सामने रखे।
प्रदेश भाजपा ने वीरभद्र सरकार के खिलाफ आरोप पत्र राज्यपाल को सौंप कर अपनी जिम्मेदारी का पक्ष निभाया है। सरकार में फैले भ्रष्टाचार को जनता की अदालत में लाकर रख दिया है। लेकिन क्या भाजपा की बतौर विपक्ष जिम्मेदारी इसी से पूरी हो जाती है। सरकार के चार वर्ष के कार्यकाल में भाजपा का यह तीसरा आरोप पत्र है। इस कार्यकाल से पहले भी जब भी भाजपा विपक्ष में रही है वह सरकार के खिलाफ आरोप पत्र राज्यपाल को सौंपती रही है। ठीक इसी तरह कांग्रेस ने भी हर बार विपक्ष में आने पर सरकार के खिलाफ आरोप पत्र सौंपने की रस्म पूरी ईमानदारी से अदा की है। लेकिन दोनों ही पार्टियों ने सत्ता में आने पर अपने ही सौंपे हुए आरोप पत्रों पर कभी कोई कारवाई नही की है। इन राजनीतिक दलों के इस आचरण से जनता का विश्वास टूटा है। जनता की नजर में भ्रष्टाचार के इस हमाम में यह सब बराबर के नंगे है। यह आरोप पत्र भ्रष्टाचार को मुद्दा बनानेे की भूमिका तो अदा करते है और सरकार बदलने का कारण बनते हैं। लेकिन भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी अपनेे स्थान पर यथास्थिति बने रहते हैं। बल्कि भ्रष्टाचार पर जन चर्चा को रोकने के लिये आरोप लगाने वालों के खिलाफ मानहानि के दसवे दायर करने तक आ जाते हैं।
इस परिदृश्य में क्या भाजपा के इस आरोप पत्र का परिणाम भी यही रहेगा यह सवाल अहम है। हर आरोप पत्र राज्यपाल को सौंपा जाता है। बल्कि कांग्रेस ने तो 2012 में महामहिम राष्ट्रपति को आरोप पत्र सौंपा था। लेकिन ऐसे आरोप पत्र सौंपने का कोई परिणाम नही आता है। क्योंकि राजभवन के से यह आरोप पत्र सरकार के सचिवालय को भेज दिये जाते हैं और आरोप पत्र सौंपने वाले खामोश होकर अपनी राजनीति में व्यस्त हो जाते हैं। राजभवन के पास ऐसे मामलों की जांच के लिये अपना कोई स्वतन्त्र तन्त्र नहीं होता और सरकार तथा उसकी विजिलैन्स इन पर कोई कारवाई करती नहीं है। जबकि विजिलैन्स इन आरोप पत्रों को सोर्स रिपोर्ट बनाकर इन पर कारवाई करने के लिये अधिकृत है। जो आरोप पत्र भाजपा ने सौंपा है उसमें बहुत
संगीन आरोप है। संभवतः इसी संगीनता को सुंघते हुए मुख्यमन्त्री ने इन आरोपों पर मानहानि का दावा दायर करने की धमकी भी दी है। मुख्यमन्त्री की धमकी के परिदृश्य में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि भाजपा की आरोप पत्र कमेटी इस आरोप पत्र के साथ अपना एक शपथ पत्र लगाकर इसे प्रदेश के लोकायुक्त को सौंपे। लोकायुक्त के अतिरिक्त दूसरा विकल्प इन आरोपों पर धारा 156(3) के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाकर इन पर सीधे एफआईआर दर्ज करवाने का रास्ता अपनाये। यदि ऐसा नही होता है तो स्पष्ट हो जायेगा कि भाजपा भ्रष्टाचार के खिलाफ कतई गंभीर नही है बल्कि इसके माध्यम से केवल राजनीति करना चाहती है।

पिछले चार माह में हुए जमीन खरीद के बडे़ मामले जांच ऐजैन्सीयों के राडाॅर पर


शिमला/बलदेव शर्मा

आयकर और ईडी ने राजस्व प्रशासन से तलब किया रिकार्ड
शिमला शहर के 65 मामले जांच के दायरे में

कालेधन के खिलाफ अपनी कारवाई को आगे बढ़ाते हुए केन्द्र सरकार के आयकर विभाग के जांच विंग और ईडी ने जिलों के राजस्व प्रशासन से पिछले चार माह में जमीन खरीद-बेच के उन मामलों का रिकार्ड तलब किया है। जिनमें 25 लाख या इससे अधिक का लेन-देन हुआ है। स्मरणीय है कि केन्द्र सरकार ने इसी वर्ष स्वेच्छा से कालाधन/बेनामी संपत्तियों की घोषणा की योजना जारी की थी। यह येाजना 30 सितम्बर को समाप्त हुई और उसके बाद इस योजना के तहत हुए खुलासों का आकलन करने के बाद 8 नवम्बर को नोटबंदी की घोषणा की गयी। अब नोटबंदी के साथ ही जमीन खरीद के बड़े मामलों की जांच शुरू की जा रही है। राजस्व प्रशासन से रिकार्ड तलब करने के साथ ही 11 जनवरी को आयकर विभाग राजस्व अधिकारियों के साथ बैठक करने जा रहा है। इस बैठक में जमीन खरीद के आये रिकार्ड पर विस्तृत चर्चा की जायेगी ।
सूत्रों के मुताबिक शिमला जिला प्रशासन ने 1.4.16. से 30.11.16 तक हुए सारे जमीन खरीद-बेच सौंदो का रिकार्ड भेज दिया है। इसके मुताबिक 1.4.16 से 30.11.16 तक शिमला शहर में 25 लाख या इससे अधिक के लेन-देन की 123 रजिस्ट्रीयां हुई हैं। अगस्त से नवम्बर तक 65 रजिस्ट्रीयां हुई हैं । जबकि 8.11.2016 को नोटबंदी की घोषणा के बाद 2.27 करोड़ की खरीद बेच की पांच रजिस्ट्रीयां हुई है। इनमें 26.10.2016 और 4.11.2016 को शिमला के करेडू में कुल्लु-मनाली के डुंगरी निवासी बख्शी परिवार के सदस्यों के नाम रजिस्ट्रीयां हुई है। इनमें हरेक रजिस्ट्री में प्रत्येक प्लाट 325.75 वर्ग मीटर है और हर प्लाट की कीमत 28 लाख दर्ज है। इसी दौरान कलस्टन में गुडगांव निवासी चीमा परिवार ने 141.26 वर्ग मीटर 49.84 लाख में 10.10.2016 को खरीदी और 18.10.2016 गौतम नगर दिल्ली के अमित भारद्वाज ने पांजडी़ में 229.92 वर्ग मीटर 80 लाख में खरीदी है। इन दोनों मामलों में धारा 118 के तहत सरकार से अनुमति लिये जाने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। जबकि कुल्लु मनाली के डुंगरी निवासी बख्शी परिवार में पत्नी का कृषक प्रमाण पत्र मनाली का बना हुआ है और पति का कृषक प्रमाण पत्र नालागढ़ से बना है। नालागढ़ से कृषक प्रमाण पत्र बनाये जाने का आधार इनके दादा का कभी नालागढ़ में कृषक होना बताया गया है। क्योंकि हिमाचल सरकार ने 2014 में एक संशोधन करके उन लोगों को कृषक होने का लाभ दिया है जिनके पूर्वज कभी प्रदेश में कृषक रहे हों।
आठ नवम्बर को नोटबंदी की घोषणा के बाद शहर में 2.27 करोड़ के पांच मामले पंजीकृत हुए हैं। क्या इन मामलों में सारा लेन-देन चैक के माध्यम से हुआ है। इसका पूरा खुलासा समाने नहीं आया है। बहरहाल यह सारे मामले जांच ऐजैन्सी के राडाॅर पर आ गये हैं।

नोटबंदी के बाद हुई खरीद















चर्चा में है यह बैंक

शिमला। प्रदेश के सचिवालय के गलियारों से लेकर स्कैण्डल प्वाईंट तक यह चर्चा हर कहीं सुनी जा सकती है कि हिमाचल में शिमला सहित कई स्थानों पर कई बैंकों के कई अधिकारियों और कर्मचारियों ने पुराने नोटों को बदलने में काफी माल बना लिया है। पुराने नोट बिजली, पानी, टेलीफोन, ट्रांसपोर्ट, गैस खरीद आदि के भुगतान के लिये मान्य कर दिये गये थे। कई लोगों ने सुविधाओं का खुलकर दुरूपयोग किया है। पुराने नोट बदलने की सुविधा आरबीआई ने सहकारी बैंकों को छोड़कर अन्य सभी बैकों को दे रखी थी। सहकारी बैंक इस सुविधा से इस धारणा पर वांच्छित रखे गये थे कि वह सीधे राजनेताओं/बड़े लोगों के प्रभाव में रहते हैं। हिमाचल का राज्य सहकारी बैंक अब श्डयूल बैंक की श्रेणी में आ चुका है इस लिये उसके पास यह सुविधा थी।
नोट बदलने में बड़े लोगों ने गरीबों के जनधन योजना के तहत जीरो बैलेन्स से खुले खातों का दुरूपयोग किया है। यह अब जगजाहिर हो चुका है। शिमला के मालरोड़ स्थित एक बैंक के बाहर नोट बदलवाने के लिये लगी भीड़ में बार-बार वही मजदूर देखे जाते रहे हैं। तर्क यह दिया जा रहा था कि उनके मालिक ने उनको एक वर्ष का वेतन एडवांस में दे दिया है। गरीबों के खातों के इस तरह के दुरूपयोग की रिपोटों पर ही आयकर और ईडी ने बैंकों से ऐसे खातांे और उनमें हुए लेन देन की जानकारी मांग रखी है। राज्य के सहकारी बैंक प्रबन्धन से भी यह जानकारी मांगी गयी है।
नोटबंदी के बाद किस बैंक में कितने पुराने नोट बदले गये। यह नोट किससे आये किसके खाते में जमा हुए इसका पूरा विवरण बैंकों से मांगा गया है। चर्चा है कि राज्य के सहकारी बैंक में भी करीब छः सौ करोड़ के पुराने नोट बदले गये हैं। यह इतनी बड़ी धन राशी कितने लोगों की थी? क्योंकि इतनी बड़ी रकम नकदी में दो चार दस लोगों के ही पास होना संभव नही लगती। क्यांेकि इतनी राशी को साधारण से बदलना संभव ही नही था क्योंकि इसके लिये एक सीमा तय थी। इसलिये माना जा रहा है कि इसकी जांच में कोई बड़ा खुलासा सामने आ सकता है।
मजे की बात तो यह है कि नोट बदलने के पवित्र कार्य में हिमाचल हाईकोर्ट यूको बैंक की शाखा का नाम भी चर्चा में चल रहा है। कई बड़ो ने इस बैंक शाखा का भी पूरा-पूरा लाभ उठाया है क्योंकि शिमला में एसबीआई के बाद आरबीआई की चैस्ट केवल यूको बैंक के ही पास है। चर्चा है कि इसके प्रबन्धकों ने बड़ो के घरों में जा कर नोटों की डिलिवरीे दी है। इस कड़ी में आईसीआईसीआई बैंक का विवरण तो आयकर विभाग के पास जांच केे लिये पहुंच भी चुका है और उसमें काफी बडे़ खुलासे सामने आने की संभवना है।

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